समीक्षा- 'वो खाली बेंच' - ANTARDHWANI

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मन की आवाज़ 

Monday, 22 February 2021

समीक्षा- 'वो खाली बेंच'


कहानी संग्रह   *वो खाली बेंच*

लेखिका- मालती मिश्रा 

समीक्षा- रतनलाल मेनारिया 'नीर'


मालती मिश्रा जी की कहानी संग्रह की चर्चा करने से पहले इनके परिचय के बारे जानना आवश्यक है। वैसे मालती जी का परिचय देने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इनका परिचय खुद इनकी कहानियाँ देती हैं। आदरणीय मालती मिश्रा जी दिल्ली की युवा साहित्यकारा हैं। कई पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित हो चुके हैं व कई साहित्यिक सम्मानों से नवाजी गई हैं। इनका यह दूसरा कहानी संग्रह है तथा एक और  कहानी संग्रह प्रकाशित होने वाली है। 

मालती मिश्रा का बहुचर्चित कहानी संग्रह *वो खाली बेंच* पढ़ा तो मैं पढ़ता चला गया इस कहानी संग्रह  में कुल 12 कहानियाँ हैं। हर कहानी में एक सस्पेन्स दिया है व हर कहानी एक अनोखी छाप छोड़ती है। इनकी कहानियों की भाषा शैली पाठकों के दिल को छू जाती है। इस कहानी-संग्रह की पहली कहानी *वो खाली बेंच* पढ़ी इस कहानी की रूप रेखा से ऐसा लगता है कि प्रेमी व प्रेमिका  कश्मीर की वादियों की सैर कर रहे हैं। यह एक प्रेम कथा है। समरकांत व रत्ना एक दूसरे  से बहुत प्यार करते हैं,  उनकी पहली मुलाकात भी उस बेंच से ही हुई थी। लेकिन एक ऐसा तूफान आया कि रत्ना कभी नहीं मिली हमेशा के लिए यह दुनिया छोड़ दी। कई वर्ष बीत गये समरकान्त आज भी उस बेंच को देखते रहते हैं लेकिन रत्ना कभी लौट कर नही आई।

इस कहानी का कथानक कमज़ोर रहा है पात्र कम होते हुए भी कहानी को बेवजह लंबा खींचा गया। यह कह सकते हैं। यह एक अधूरा प्यार है फिर भी कहानी की भाषा पाठकों के मन को छू जाती है।  दूसरी कहानी *जिम्मेदार कौन* कहानी में आज की परिस्थिति में आज की शिक्षा प्रणाली का दोष है या अभिभावकों का लेकिन आज की परिस्थिति में दोष तो दोनों का है,  न अभिभावक पहले जैसे रहे न स्कूल की शिक्षा प्रणाली पहले जैसी रही। बेवजह एक शिक्षक को 50000 हजार रुपये भरने पड़े जो अभिभावकों पर एक प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। बिना  जानकारी के शिक्षक को दोषी ठहराना  बहुत ग़लत है।  हमारे शास्त्रों में माता-पिता के बाद गुरु का दर्जा होता है। सबसे ऊँचा दर्जा दिया है। अगर शिक्षक के साथ ही अभिभावक शोषण करते हैं तो बहुत शर्मनाक बात है। इस कहानी का जिस तरह से अन्त हुआ बहुत चौंकाने वाला था। लेकिन एक तरह  से आज की शिक्षा बाजारवाद की गुलाम हो गई है यह इस कहानी में बखूबी दर्शाया गया है।

*माँ बिन मायका* कहानी दिल की गहराइयों को छू गई हर बेटी  के लिए मायका बहुत महत्वपूर्ण होता है अगर माता-पिता के नहीं होने के बाद बेटी का मायके में कोई सम्मान नहीं होता है तो हर बेटी  को बहुत दुख होता है वह चाह कर भी किसी के सामने मायके की बुराई नहीं करेगी बल्कि श्रेष्ठ ही बताएगी ।

*आत्मग्लानि* कहानी में मुख्य पात्र शिखर से अनजाने में पाप हो जाता है, बाद में वह प्रायश्चित  भी करता है तथा उस पाप की कीमत भी चुकाता है। उसे बहुत आत्मग्लानि होती है शिखर ने समय रहते उस पाप का पश्चाताप कर लिया जो अच्छा किया। *पुरुस्कार* कहानी में कई जगह बहुत लचीलापन है कहानी की रफ्तार बहुत धीमी है । फिर नंदनी के साथ अच्छा न्याय नहीं हो सका नंदनी एक ईमानदार शिक्षिका के साथ एक मेहनती शिक्षिका है, उसे स्कूल का डायरेक्टर बुरी तरह अपमानित करके स्कूल से निष्काषित कर करता है जो बहुत ही अन्याय पूर्ण बात है। उसको अच्छे पुरस्कार के बदले अपमान मिला।  *सौतेली माँ* एक ऐसा शब्द है जो हर औरत को बुरा बनाता है जो बहुत गलत है। तरु उसकी सगी बेटी नहीं फिर भी उसे बहुत प्यार देती है, बहुत स्नेह देती है लेकिन वह हमेशा अपने ससुराल वालों के सामने सोतेली माँ ही नजर आती है। एक बार उर्मिला को स्वयं को अपने परिवार के सामने सच्ची माँ साबित करने का समय आ गया और एक घटना से सौतेली माँ का तमगा हमेशा-हमेशा के लिए हट गया और वह सबकी नजरों में एक अच्छी व सच्ची माँ बन गई।

*पिता* कहानी में पिता को उसकी बेटियों के प्रति अथाह प्यार रहता है लेकिन परिवार के घरेलू झगड़े व पति-पत्नी के बीच तालमेल नही होने से व मन मुटाव के कारण दोनों के बीच तलाक हो जाता है और न चाहते हुए भी दोनों बच्चियों को पिता के प्यार से वंचित रहना पड़ा। पिता व बेटियों की एक भावनात्मक कहानी है। *डायन* कहानी  एक भावनात्मक कहानी है। कबीर की माँ एक अन्धविश्वासी औरत थी, एक  बाबा की वज़ह से  बेचारे कबीर का घर तबाह हो गया और उसकी माँ मरते मरते अपनी बहू पर ऐसा कलंक लगा कर चली गई कि बेचारी मंगला का जीवन नरक बन गया। गाँव वाले उसे डायन समझने लगे। जबकि हकीकत में मंगला बहुत ही समझदार औरत है। कहानी पढ़कर लगता है कि आज भी हम किस दुनिया में जी रहें हैं, बेचारी मंगला को कुछ लोग डायन  मानकर बुरी तरह पीटते हैं, एक निहत्थी औरत पर हमला करना इस दकियानूसी लोगों की सोच पर कई प्रकार के प्रश्न खड़ा करता है।

*चाय का ढाबा* कहानी में बाल मजदूरी पर प्रहार किया है साथ ही कहानी के मुख्य पात्र के बेटे को भी हकीकत का अहसास कराया है। 

*चाय पर चर्चा* पर दादा व पोते के बीच अनोखे प्यार को दर्शाया है। व *पुनर्जन्म* कहानी पूरी तरह काल्पनिक होकर एक सस्पेन्स टाइप कहानी है। कहानी को इस तरह खत्म करना ऐसा लगता है कहानी और बड़ी होती तो अच्छा रहता।

कुल मिलाकर मालती जी की सभी कहानियाँ पाठकों को पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं और सभी कहानियों में ऐसा प्रतीत होता है कि ये सभी लेखिका के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं। इन कहानियों मे आदरणीय मालती जी ने कुछ हकीकत व कुछ कल्पनाओं का सहारा लेकर जिदंगी से रुबरू कराने की कोशिश की है। इस कहानी संग्रह में लेखिका ने औरत की करुणा, संवेदनाएँ, माँ का  वात्सल्य, पिता के प्रति निस्वार्थ भाव से प्रेम कई जगह कथाकार ने सामाजिक कुरीतियों पर भी कुठाराघात किया है।

मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि इनके कहानी संग्रह *वो खाली बेंच* को सभी पाठकों  को पढ़ना चाहिए। मुझे ऐसा विश्वास है यह कहानी संग्रह व्यापक रूप् में चर्चित होगा।

शुभकामनाओं सहित-----


समीक्षक- रतनलाल मेनारिया 'नीर'


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