रविवार

संस्कारों का कब्रिस्तान बॉलीवुड

 


संस्कारों का कब्रिस्तान बॉलीवुड

हमारा देश अपनी गौरवमयी संस्कृति के लिए ही विश्व भर में गौरवान्वित रहा है परंतु हम पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध में अपनी संस्कृति भुला बैठे और सुसंस्कृत कहलाने की बजाय सभ्य कहलाना अधिक पसंद करने लगे। जिस देश में धन से पहले संस्कारों को सम्मान दिया जाता था, वहीं आजकल अधिकतर लोगों के लिए धन ही सर्वेसर्वा है। धन-संपत्ति से ही आजकल व्यक्ति की पहचान होती है न कि संस्कारों से। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा भी है...
*वित्तमेव कलौ नॄणां जन्माचारगुणोदयः ।
धर्मन्याय व्यवस्थायां कारणं बलमेव हि॥
*
अर्थात् "कलियुग में जिस व्यक्ति के पास जितना धन होगा, वो उतना ही गुणी माना जाएगा और कानून, न्याय केवल एक शक्ति के आधार पर ही लागू किया जाएगा।"

आजकल यही सब तो देखने को मिल रहा है, जो ज्ञानी हैं, संस्कारी हैं, गुणी हैं किन्तु धनवान नहीं हैं, उनके गुणों का समाज में कोई महत्व नहीं, लोगों की नजरों में उनका कोई अस्तित्व नहीं है न ही उनके कथनों का कोई मोल परंतु यदि कोई ऐसा व्यक्ति कुछ कहे जो समाज में धनाढ्यों की श्रेणी में आता हो तो उसकी कही छोटी से छोटी बात न सिर्फ सुनी जाती है बल्कि अनर्गल होते हुए भी लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण बन जाती है और यही कारण है कि निम्नता की सीमा पार करके कमाए गए पैसे से भी ये बॉलीवुड के कलाकार प्रतिष्ठित सितारे कहलाते हैं। आज भी हमारी संस्कृति में स्त्रियाँ अपने पिता, भाई और पति के अलावा किसी अन्य पुरुष के गले भी नहीं लगतीं (ये गले लगने की परंपरा भी बॉलीवुड की ही देन है) न ही ऐसे वस्त्र धारण करती है जो अधिक छोटे हों या स्त्री के संस्कारों पर प्रश्नचिह्न लगाते हों, परंतु हमारे इसी समाज का एक ऐसा हिस्सा भी है जहाँ पुरुष व स्त्रियाँ खुलेआम वो सारे कृत्य करते हैं जिससे न सिर्फ स्त्रियों के चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगता है बल्कि समाज में नैतिकता का स्तर भी गिरता है।
आजादी के नाम पर निर्वस्त्रता की मशाल यहीं से जलती है और समाज में बची-खुची आँखों की शर्म को भी जलाकर राख कर देती है और शर्मोहया की चिता की वही राख बॉलीवुड की आँखों का काजल बनती है।
पैसे कमाने के लिए ये मनोरंजन और कला के नाम पर समाज में अश्लीलता और अनैतिकता परोसते हैं और आम जनता मुख्यत: युवा पीढ़ी  इनकी चकाचौंध में फँसकर धीरे-धीरे अंजाने ही वो सब करने लगती है जिससे समाज में नैतिकता का स्तर गिरता जा रहा है।
महात्मा गाँधी ने अपनी जीवनी में लिखा था कि उन्होंने एक बार बाइस्कोप में राजा हरिश्चंद्र की कहानी देखी और उसका उनके मन पर इतना गहरा असर हुआ कि उन्होंने उसी समय से हमेशा सत्य बोलने की प्रतिज्ञा की। अब प्रश्न उठता है कि यदि चित्र के रूप में देखी गई कोई कहानी एक बार में किसी किशोर हृदय पर इतना असर छोड़ सकती है, तो वर्तमान समय में जब बच्चे, किशोर और युवा चलचित्र के रूप में अश्लीलता को  रोज-रोज देखते हैं तब उनके हृदय पर कितना असर पड़ता होगा!!! यह समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के लिए काफी है।

एक समय था जब हमारे ही देश में पहली हिन्दी फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' में हिरोइन के लिए कोई महिला नहीं मिली तो पुरुष ने महिला का रोल निभाया था और आज का समय है कि जितने कम वस्त्र उतने अधिक पैसे वाली थ्योरी पर चल रहे बॉलीवुड में थोड़े से पैसे और नाम के लिए अभिनेत्रियाँ कम से कम वस्त्रों में फोटो खिंचवाती हैं। वही बॉलीवुड कलाकार युवा पीढ़ी के आदर्श बन जाते हैं जिनका स्वयं का कोई आदर्श, कोई उसूल नहीं या फिर ये कहें कि उनके आदर्श और उसूल बस पैसा ही है परंतु विडंबना यह है कि जनता और सरकार सभी इनकी सुनते हैं।
ये मनोरंजन के नाम पर नग्नता और व्यभिचार दर्शा कर जहाँ एक ओर समाज के युवा पीढ़ी को बरगलाते हैं वहीं आजकल टीवी, सिनेमा, मोबाइल, लैपटॉप जैसे आधुनिक तकनीक छोटे-छोटे बच्चों के हाथों में किताबों की जगह ले चुके हैं, फिर इंटरनेट और सोशल मीडिया से कोई कब तक अछूता रह सकता है। चाहकर भी बच्चों को इनसे दूर नहीं रखा जा सकता और इनमें संस्कार और नैतिकता के पाठ नहीं पढ़ाए जाते बल्कि स्त्रियों की आजादी के नाम पर अंग प्रदर्शन, युवाओं की आजादी के नाम पर खुलेआम अश्लीलता फैलाना, ये सब आम बात हो चुकी है। इतना ही नहीं वामपंथी विचारधारा के समर्थक और प्रचारक बॉलीवुड में भरे पड़े हैं और ये समाज में होने वाले सभी प्रकार के देश विरोधी गतिविधियों का समर्थन करके उन्हें मजबूती देते हैं।
मेहनत तो एक आम नागरिक भी करता है और अपनी मेहनत से कमाए गए उन थोड़े से पैसों से ही अपना परिवार पालता है परंतु अधिक पैसों के लालच में अपने संस्कार नहीं छोड़ता अपनी लज्जा को नहीं छोड़ता परंतु उस सम्मानित किंतु साधारण व्यक्ति की बातों का कोई महत्व नहीं वह कुछ भी कहे किसी को सुनाई नहीं देता लेकिन यही अनैतिक और संस्कार हीन सेलिब्रिटी यदि छींक भी दें तो अखबारों की सुर्खियाँ और न्यूज चैनल के ब्रेकिंग न्यूज बन जाते हैं, इसीलिए तो इनका साहस इतना बढ़ जाता है कि ये ग़लत चीजों या घटनाओं का खुलकर समर्थन करते हैं और चाहते हैं कि सरकार उनकी अनर्गल बातों का आदेशों की भाँति पालन करे। बॉलीवुड से राजनीति में आना तो आजकल चुटकी बजाने जितना आसान हो गया है क्योंकि सब पैसों और प्रसिद्धि का ही खेल है। जिसके पास बॉलीवुड और राजनीतिक कुर्सी दोनों का बल होता है, वो अपने आप को ही राज्य या देश मान बैठे हैं, इसीलिए तो बिना सोचे समझे ही निर्णय सुना देते हैं कि जिसने हमारे विरुद्ध कुछ कहा उसने अमुक राज्य का अपमान किया और उसे अमुक राज्य में रहने का कोई अधिकार नहीं। किसी को लगता है कि महाराष्ट्र के बाहर से आए  बॉलीवुड में काम करने वाले सभी सितारे उनकी दी हुई थाली (बॉलीवुड) में खाते हैं अर्थात् बॉलीवुड रूपी थाली उन्होंने ही दिया था, दिन-रात जी-तोड़ परिश्रम का कोई महत्व नहीं, इसलिए यदि ये दिन को रात और रात को दिन या ड्रग्स को टॉनिक कहें तो उस बाहरी सितारे को भी ऐसा ही करना चाहिए, नहीं किया तो किसी का घर तोड़ दिया जाएगा या किसी की हत्या कर दी जाएगी।
देश के किसी भी कोने में देश के हित में लिए गए किसी निर्णय का विरोध करना हो या हिन्दुत्व विरोधी प्रदर्शन करना हो या सरकार को अस्थिर करने के लिए किसी असामाजिक कार्य का समर्थन करना हो तो ये जाने-माने सितारे हाथों में तख्तियाँ लेकर फोटो खिंचवा कर अपना विरोध प्रदर्शन करते हैं किंतु जब कहीं सचमुच अन्याय हो रहा हो या कोई अनैतिक कार्य हो रहा हो तब ये तथाकथित प्रतिष्ठित लोग कहीं नजर नहीं आते।
समाज में नैतिकता के गिरते स्तर का जिम्मेदार बॉलीवुड ही है और उदाहरणार्थ सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु की जाँच के दौरान नशालोक की सच्चाई सामने आने लगी और बॉलीवुड के नशा गैंग की संख्या द्रौपदी के चीर की तरह बढ़ती ही जा रही है। जहाँ बाप-बेटी के रिश्ते की मर्यादा नहीं होती, जहाँ दिन-रात गांजा ड्रग्स के धुएँ के बादल घिरे रहते हैं, जहाँ इन वाहियात कुकृत्यों का समर्थन न करने वालों के लिए मौत को गले लगाने के अलावा कोई स्थान नहीं...हम उसी बॉलीवुड की फिल्मों को देखने के लिए पैसे खर्च करते हैं और इनकी अनैतिकता को मजबूती प्रदान करते हैं। ये बॉलीवुड हमारी संस्कृति हमारे संस्कारों का कब्रिस्तान है। इसकी शुद्धि जनता के ही हाथ में है नहीं तो कहते हैं न कि 'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता।' यदि जनता एक साथ इन्हें सबक नहीं सिखाती तो अकेले आवाज उठाने वाला कब कहाँ अदृश्य हो जाए कुछ पता नहीं होता, या फिर उसका घेराव करके उसकी आवाज को ही नकारात्मक सिद्ध कर दिया जाता है। 
जनता मुख्यत: आज की युवा पीढ़ी को इन्हें बताना होगा कि उन्हें आदर्शविहीन अनैतिक सामग्री से भरी फिल्में स्वीकार नहीं और न ही ऐसी अश्लीलता परोसने वाले फिल्मी सितारों को अपना आदर्श मान सकते हैं। देश को अनैतिक संस्कारहीन सेलिब्रिटी की नहीं बल्कि ऐसे नागरिकों की आवश्यकता है जो हमारे देश की संस्कृति के रक्षक बन सके न कि उसे विकृत करके इसकी छवि को धूमिल करें।

चित्र- साभार गूगल से 

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

मंगलवार

उपन्यास कैसे लिखें

 उपन्यास लिखने के चरण


एक उपन्यास लिखना एक कठिन काम हो सकता है, लेकिन इसे प्रबंधनीय चरणों में विभाजित करने से प्रक्रिया को और अधिक प्रबंधनीय बनाने में मदद मिल सकती है। उपन्यास लिखते समय विचार करने के लिए यहां कुछ बुनियादी कदम दिए गए हैं:


विचार-मंथन और रूपरेखा: 

अपनी कहानी के लिए विचार-मंथन करके शुरुआत करें। प्लॉट, पात्रों, सेटिंग और थीम के बारे में सोचें जिन्हें आप एक्सप्लोर करना चाहते हैं। एक बार जब आप अपनी कहानी के बारे में सामान्य विचार प्राप्त कर लेते हैं, तो अपनी लेखन प्रक्रिया का मार्गदर्शन करने के लिए एक रूपरेखा तैयार करें।


चरित्रों का विकास करना: 

बैकस्टोरी, व्यक्तित्व लक्षण और प्रेरणाएँ बनाकर अपने मुख्य पात्रों को बाहर निकालें। यह आपको यथार्थवादी और भरोसेमंद चरित्र बनाने में मदद करेगा जिसकी पाठक परवाह करेंगे।

पहला मसौदा लिखना: 

एक बार जब आपके पास एक रूपरेखा और विकसित चरित्र तैयार हों, तो पहला मसौदा लिखना शुरू करने का समय आ गया है। इस स्तर पर अपने लेखन को बेहतर बनाने के बारे में ज्यादा चिंता न करें, बस अपने विचारों को कागज पर उतारने पर ध्यान दें।


संशोधन और संपादन: 

एक बार जब आप अपना पहला मसौदा पूरा कर लेते हैं, तो नए परिप्रेक्ष्य प्राप्त करने के लिए अपने काम से कुछ समय निकाल लें। फिर, वापस आकर अपने काम की समीक्षा करें, प्लॉट की खामियों, विसंगतियों और अन्य मुद्दों पर ध्यान दें जिन्हें ठीक करने की आवश्यकता है।


प्रतिक्रिया माँगना: 

उद्योग में बीटा पाठकों, लेखन समूहों या पेशेवरों से प्रतिक्रिया प्राप्त करें। अतिरिक्त संशोधन करने और अपनी कहानी को बेहतर बनाने के लिए इस फ़ीडबैक का उपयोग करें।


पॉलिश करना और प्रकाशित करना: 

एक बार जब आप अपनी कहानी से खुश हो जाते हैं, तो अपने लेखन को चमकाने और उसे प्रकाशन के लिए तैयार करने पर काम करें। इसमें एक पेशेवर संपादक को काम पर रखना, अपनी पांडुलिपि को प्रारूपित करना और अपने बुक कवर और मार्केटिंग योजना पर काम करना शामिल हो सकता है।


याद रखें, एक उपन्यास लिखने की प्रक्रिया लंबी और चुनौतीपूर्ण होती है, लेकिन इसे प्रबंधनीय चरणों में तोड़कर और लगातार बने रहने से, आप एक महान पुस्तक लिखने के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। 


मालती मिश्रा 'मयंती'

रविवार

पुस्तक कैसे लिखें..

 पुस्तक कैसे लिखें..


पुस्तक लेखन एक लिखित कार्य बनाने की प्रक्रिया है जिसे पाठकों के आनंद लेने के लिए प्रकाशित और वितरित किया जा सकता है। किताब लिखना एक चुनौतीपूर्ण और समय लेने वाला काम हो सकता है, लेकिन यह उन लोगों के लिए एक पुरस्कृत अनुभव भी हो सकता है जिनके पास बताने के लिए कहानी या साझा करने के लिए जानकारी है।


विषय निर्धारित करें-

किताब लिखना शुरू करने के लिए, सबसे पहले यह जानना ज़रूरी है कि आप किस तरह की किताब लिखना चाहते हैं और आपके लक्षित दर्शक/पाठक कौन हैं। इससे आपको अपने लेखन पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलेगी और यह सुनिश्चित होगा कि आपकी पुस्तक इस तरह से लिखी गई है जो आपके पाठकों को जोड़ेगी और उनके साथ प्रतिध्वनित होगी।


रूपरेखा तैयार करें-

एक बार आपके पास अपनी पुस्तक के लिए एक विचार होने के बाद, पुस्तक की संरचना के लिए एक रूपरेखा या योजना बनाना महत्वपूर्ण है। यह आपको व्यवस्थित रहने और अपने लेखन को ट्रैक पर रखने में मदद कर सकता है। कुछ लेखक अधिक विस्तृत रूपरेखा का उपयोग करना पसंद करते हैं, जबकि अन्य केवल एक सामान्य विचार रखना पसंद करते हैं कि वे प्रत्येक अध्याय में क्या शामिल करना चाहते हैं।


समय सारणी और लेखन लक्ष्य निर्धारित करें-

जैसा कि आप लिखना शुरू करते हैं, लेखन के लिए नियमित समय निर्धारित करना और प्रक्रिया के प्रति प्रतिबद्ध रहना महत्वपूर्ण है। इसमें दैनिक शब्द गणना लक्ष्य निर्धारित करना या लिखने के लिए नियमित समय और स्थान खोजना शामिल हो सकता है। प्रतिक्रिया के लिए खुला होना और यह सुनिश्चित करने के लिए अपने काम को संशोधित करना भी महत्वपूर्ण है कि यह सबसे अच्छा हो सकता है।


प्रकाशन प्रक्रिया तथा प्रकाशक की जानकारी हासिल करें- 

एक बार जब आपकी पुस्तक पूरी हो जाती है, तो आप किसी प्रकाशक की तलाश करना या अपना काम स्वयं प्रकाशित करना चुन सकते हैं। स्व-प्रकाशन हाल के वर्षों में एक तेजी से लोकप्रिय विकल्प बन गया है, लेखकों को उनके काम को प्रकाशित करने और वितरित करने में मदद करने के लिए कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं।


कुल मिलाकर, किताब लिखना उन लोगों के लिए एक चुनौतीपूर्ण लेकिन पुरस्कृत अनुभव हो सकता है जो इस प्रक्रिया के लिए प्रतिबद्ध हैं। समर्पण, कड़ी मेहनत और सीखने और सुधार करने की इच्छा से कोई भी एक सफल पुस्तक लेखक बन सकता है।

चित्र साभार- गूगल से 

मालती मिश्रा 'मयंती'

शुक्रवार

कहाँ जा रहे आज के बच्चे

 कहाँ जा रहे आज के बच्चे (4/5/22)  


प्रातःकालीन निर्मलता की चादर ओढ़े धरती पर नाजुक कोपलों पर झिलमिलाते पावन ओस की बूँदों की तरह निर्मल, निश्छल और कोमल होता है बचपन, जो उदीयमान बाल सूर्य की शांत नर्म और रुपहली किरणों के स्पर्श से मोती की मानिंद जगमगा उठता है और हवा के थपेड़े से बिखर कर अपना अस्तित्व मिटा बैठता है। बाल्यावस्था वह अवस्था है जब बच्चे का मन कोरे कागज सा होता है, जो चाहो जैसा चाहो उसे वैसा ही बनाया जा सकता है। इसके लिए बच्चे को विशेष देखभाल के साथ-साथ स्वस्थ वातावरण की भी आवश्यकता होती है किन्तु वर्तमान समय में विशेष देखभाल तो संभव है लेकिन स्वस्थ वातावरण का मिलना अपने-आप में एक चुनौती है। आधुनिक परिवेश में जहाँ भौतिकवाद का बोलबाला है ऐसी स्थिति में समाज में सम्मानजनक और सुविधाजनक जीवन जीने के लिए आर्थिक स्थिति का मजबूत होना अहम् हो गया है। रहन-सहन से लेकर आने वाली पीढ़ियों के भविष्य निर्माण तक में प्रतियोगिता सर्वव्यापी है। ऐसी परिस्थिति में अपनी गृहस्थी को सुचारू और सुनियोजित रूप से चलाने के लिए पति-पत्नी दोनों ही आर्थिक उत्सर्जन में सहभागिता सुनिश्चित करते हैं, जिसके कारण उन्हें अक्सर परिवार से अलग एकल परिवार के रूप में रहना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर कुछ आधुनिकता के शिकार तथा कुछ घरों में स्थान के अभाव के कारण भी एकल परिवार में रहने को प्राथमिकता देते हैं। ऐसी परिस्थितियों में जो सबसे अधिक प्रभावित होता है वह है बच्चों का जीवन। 

पहले बच्चा परिवार में दादा-दादी, नाना-नानी के साथ रहता था विभिन्न रिश्तों में घिरा होता था तो रिश्तों के महत्व को समझता और सामंजस्य बिठाना सीखता था। बड़ों का आदर छोटों से स्नेह करने का आदी होता था, वहीं दादी-नानी की कहानियों से स्वस्थ मनोरंजन और ज्ञान पाता था। पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियों से अपनी संस्कृति से परिचित होता था। घरों से बाहर अन्य बच्चों के साथ खेलता था तो वह शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होता था और साथ ही उसमें आपसी मेलजोल, सहयोग और अनुशासन के गुणों का विकास होता था। सही मायने में संयुक्त परिवार में ही बच्चा सही देखभाल और परवरिश प्राप्त करता था, विभिन्न रिश्ते-नातों से परिचित होता था तथा सभी रिश्तों के साथ सामंजस्य बिठाना सीखता था, किन्तु जैसे-जैसे हम आधुनिकता की दौड़ में शामिल होते गए वैसे-वैसे अपनों से दूर और एकाकी होते गए। आज सब कुछ मशीनी हो गया है यहाँ तक कि बच्चों का पालन-पोषण भी। एकल परिवार में जहाँ पति-पत्नी दोनों कामकाजी होते हैं वहाँ पत्नी को या कहूँ कि माँ को बच्चों की देखभाल करने का समय नहीं होता। समय के साथ समाज में तालमेल बिठाने के लिए तथा बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए यह आवश्यक भी हो चला है और इसीलिए माँ को बच्चे को आया के भरोसे या क्रच में छोड़ना पड़ता है। बच्चे से दिनभर की दूरी और समय तथा पूरा प्यार न दे पाने का अपराधबोध माता-पिता को बच्चों के प्रति अति  संरक्षात्मक बना देता है और इस अपराध बोध से निकलने के लिए वह बच्चे की हर उचित-अनुचित माँगों को पूरा करते हैं। फलस्वरूप बच्चा जिद्दी और लापरवाह बन जाता है, आवश्यक नहीं कि सभी बच्चे या सभी माता-पिता ऐसे ही हों परंतु यदि 10-20 प्रतिशत भी होते हैं तो भी यह चिंताजनक है। 

आज के समय में शिक्षण पद्धति भी बच्चों को तकनीक का आदी बना रहा है। शिक्षा के दौरान बच्चों से नेट से सामग्री की खोज करवाना, क्रिया-कलाप आदि में नेट का प्रयोग आजकल शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बन गया है और जो बच्चा यह नहीं कर पाता वह अन्य बच्चों के बीच हीन महसूस करता है, अतः आधुनिक शिक्षा में तकनीक का प्रयोग करना आना बेहद आवश्यक है। दूसरी ओर बच्चा माता-पिता के कार्यों को बाधित न करे इसलिए माता-पिता द्वारा इन्हें तब से ही मोबाइल पकड़ा दिया जाता है, जब इन्होंने बोलना भी ठीक से नहीं सीखा होता। थोड़ा और बड़ा होगा तो टैबलेट्स और फिर लैपटॉप दे देते हैं। 

घर में बड़े-बुजुर्गों का अभाव, सुरक्षा की दृष्टि से तथा समय के अभाव के कारण बाहर न खेलने की मजबूरी, ऐसी अवस्था में टेलीविजन, फोन, लैपटॉप आदि ही साथ देते हैं। माता पिता के पास बच्चों के साथ खेलने का समय नहीं होता तो बच्चा फोन में गेम खेलता है, पढ़ाने का समय नहीं तो बच्चा इंटरनेट से ढूँढ़ कर पढ़ने लगा, ऐसे में वह इंटरनेट से उचित-अनुचित के ज्ञान के अभाव में हानिकारक विज्ञापनों और भी ऐसी चीजें देखता है जो उसके अबोध मन को दिशाहीन कर सकती हैं। कदम-कदम पर प्रतियोगिता भरी जिंदगी में ट्यूशन, ट्रेनिंग आदि के जरिए बच्चे को प्रतियोगिताओं को पास करने लायक तो बना दिया जाता है पर एक सहृदय, संस्कारी, संवेदनशील, छोटे-बड़ों व स्त्रियों का सम्मान, तथा अपनी संस्कृति से जुड़ा हुआ, परंपराओं का निर्वहन करने वाला व्यक्ति नहीं बना पाते क्योंकि बच्चे के माता-पिता को बच्चे का भविष्य सिर्फ अधिकाधिक धन कमाने में दिखाई देता है, इसलिए उन्हें अपने बच्चे को आर्थिक दौड़ में आगे रहने वाला धावक बनाना होता है और इसके लिए स्वयं पैसा कमाने की भाग-दौड़ में उनके पास बच्चे के लिए समय ही नहीं होता। ऐसी स्थिति में हम उम्मीद करते हैं कि हर बच्चा संस्कृति से प्यार करने वाला हो, गुरुजनों तथा बड़ों का सम्मान करने वाला हो....वस्तुतः हमारी ऐसी अपेक्षाएँ निराधार हैं, हम उन बच्चों से ये अपेक्षा कैसे कर सकते हैं जिन्हें ऐसी शिक्षा ऐसी परवरिश दी ही नहीं गई। यानि जो बीज हमने बोये ही नहीं उसकी फसल काटना चाहते हैं। हम कहते तो हैं कि आजकल के बच्चे कहाँ जा रहे हैं? क्या भविष्य होगा इनका और देश का, परंतु हमें यह देखने की आवश्यकता है कि हम बच्चों को क्या दे रहे हैं।

चित्र साभार- गूगल से

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

शनिवार

बढ़ती असहिष्णुता के कारण और निवारण

 

बढ़ती असहिष्णुता के कारण और निवारण

वसुधैव कुटुंबकम् की मान्यता का अनुसरण करने वाले हमारे देश में अनेक विविधताओं के बाद भी सांस्कृतिक सह अस्तित्व की विशेषताएँ देखी जा सकती हैं।
यहाँ के लोग नए परिवेश के साथ आसानी से सिर्फ घुल-मिल ही नहीं जाते, बल्कि उनकी विशिष्टताओं को अंगीकार कर अपनी जीवनशैली में अपना भी लेते हैं। यही कारण है कि सहनशीलता, भाईचारा, धैर्य जैसे गुण हमेशा से हम भारतीयों की खासियत रहे हैं।
किन्तु वर्तमान समय में यदि हम अपने चारों ओर दृष्टिपात करें तो बेहद निराशा जनक परिस्थिति दिखाई देती है। पारिवारिक हो, सामाजिक हो या धार्मिक हर स्तर पर धैर्य और सहनशीलता का ह्रास होता जा रहा है।
ऐसा नहीं है कि असहिष्णुता हमारे व्यवहार की अचानक पैदा हो गई कोई नई उपज है।
बल्कि पारिवारिक या सामाजिक स्तर पर यह पहले भी यदा-कदा देखने को मिल जाती थी लेकिन इसके बावजूद यह आम जन की मानसिकता पर हावी नहीं थी।
किन्तु आज हर स्तर पर यह असहिष्णुता हमारी सोच और हमारे व्यवहार को अपनी गिरफ्त में लेती जा रही है।

लोगों के बर्दाश्त करने की क्षमता घटती जा रही है और छोटी-छोटी बातों में लोग अपना आपा खो दे रहे हैं। जो बातें या स्थितियाँ उनको पसंद नहीं आतीं या उनकी इच्छाओं और उम्मीदों के प्रतिकूल होती हैं ऐसी किसी भी बात या घटना के प्रति वे कई बार उचित-अनुचित सोचे बिना ही इतनी तीखी प्रतिक्रिया दे देते हैं, जो उस छोटी सी बात या घटना के लिए आवश्यक नहीं थी और ऐसी प्रतिक्रियाएँ सिर्फ दूसरों के ही नहीं बल्कि अपनों के प्रति भी देखने को मिलती हैं।
जिसके कारण न सिर्फ माहौल तनावपूर्ण हो जाता है बल्कि आपसी रिश्तों में कड़वाहट उत्पन्न होती है और आपसी सौहार्द्र खत्म हो जाता है।
अक्सर ऐसी खबरें देखने-पढ़ने को मिलती हैं
सड़क पर एक वाहन के दूसरे वाहन से हल्का सा छू जाने भर से हाथा-पाई हो जाती है, कभी-कभी तो जान से मार देने की घटनाएँ भी सामने आई हैं।
आजकल तो रोजमर्रा के जीवन में भी ऐसी घटनाएँ देखी जाती हैं कि पीछे से हॉर्न बजाने वाली गाड़ी को भीड़ की वजह से यदि रास्ता नहीं मिल पाया, तो वह अपशब्द बोलते और घूरते हुए ऐसे आगे निकलता है जैसे आगे वाले ने रास्ता न देकर कितना बड़ा अपराध कर दिया हो।
कक्षा में डाँट देने या सजा दे देने पर विद्यार्थी ने बाहर जाकर शिक्षक को गोली मार दिया।
पिता ने पुत्र को गेम खेलने से मना किया तो पुत्र उसकी हत्या कर देता है।
पैसों के लिए घर के बुजुर्गो की हत्या कर देना आम घटना हो चुकी है
कोई मेरी गाड़ी को बार-बार ओवरटेक कैसे कर सकता है। इस बात से क्रोधित होकर आगे जाने वाली गाड़ी पर गोलियों की बौछार कर देना..
ऐसी खबरों को पढ़ कर 'विजय दान देथा' की वर्षों पुरानी कहानी 'अनेकों हिटलर' की याद ताजा हो गई। उन्होंने इस कहानी में चित्रित किया है कि गाँव के एक सम्पन्न और दबंग परिवार के तीन भाई नया-नया ट्रैक्टर खरीद कर हँसी-ठिठोली करते हुए शान से घर लौट रहे थे। रास्ते में एक साइकिल वाला एक-दो बार उनके ट्रैक्टर से आगे निकल जाता है। यह ट्रैक्टर चलाने वालों की बर्दाश्त से बाहर था कि साइकिल वाले ने कैसे उनको पीछे करने की हिमाकत कर दी। इसी आक्रोश में उन लोगों ने उसे ट्रैक्टर से कुचल दिया।
दशकों पुरानी यह कहानी आज हमारे समक्ष जीवंत रूप में दिखाई देती है।
ऐसी घटनाओं को देखते हुए समझा जा सकता है कि किसी से अपनी उम्मीद के अनुसार व्यवहार न होते देखकर प्रतिक्रिया स्वरूप बगैर उचित-अनुचित की परवाह किये ही परिस्थिति की माँग से ज्यादा तीखी और आक्रामक प्रतिक्रिया कर देना ही असहिष्णुता है। यहाँ तक कि ऐसे लोग समाज द्वारा स्वीकृत मानकों को भी लाँघ जाते हैं, जबकि समान परिस्थिति में अधिकांश लोग शांत और सहज बने रहते हैं।

ऐसे धैर्य खो चुके लोगों को थोड़ा विरोध भी उनके आत्मसम्मान और प्रभुत्व को आहत कर देता है और भविष्य को लेकर वे आशंकित हो जाते हैं। सही-गलत की सोच से परे वे आत्मकेंद्रित हो जाते हैं और उनकी संवेदनशीलता दूसरों के प्रति घट जाती है, फलस्वरूप वो दूसरे के द्वारा किए गए व्यवहार के आशय और भावों को समझ नहीं पाते और ऐसा कुछ कर बैठते हैं जो उन्हें नहीं करना चाहिए।

ऐसी अवस्था में व्यक्ति आंतरिक संवेगों से अधिक प्रभावित होता है, जिससे उसमें संवेगात्मक अस्थिरता और उत्तेजना देखी जाती है। कुछ समय के लिये उसका विवेक क्षीण पड़ जाता है और सही-गलत, नैतिक-अनैतिक का ज्ञान समाप्त हो जाता है। दूसरों के प्रति घटी हुई संवेदनशीलता और उत्तेजना की अवस्था, दोनों मिल कर उसे असहिष्णु बना देते हैं।
मनोविज्ञान की दृष्टि से असहिष्णुता के अनेक कारणों में प्रमुख हैं, पहचान और प्रभाव की चाहत, बढ़ती महत्वाकांक्षा, बढ़ता मानसिक तनाव, रिश्तों का सिकुड़ता दायरा, सामाजीकरण का सिमटना, रिश्तो में नफा-नुकसान का आंकलन, संवाद में कमी, बेरोक-टोक वाला व्यक्तिगत जीवन, घटती संवेदनशीलता, मीडिया का बढ़ता प्रभाव इत्यादि।
यह देखा जाता है कि मीडिया भी आपराधिक और नकारात्मक खबरों को ही ज्यादा दर्शाती है जबकि ऐसी परिस्थिति में बुद्धिजीवियों और मीडिया दोनों का उत्तरदायित्व है कि ऐसी स्थिति में वे समाज सुधार की सिर्फ चर्चा न करें, बल्कि जमीनी स्तर पर लोगों के सामने ऐसे सकारात्मक उदाहरण बार-बार पेश करें जो उनके इर्द-गिर्द ही घट रहे हैं लेकिन सनसनीखेज नहीं होने के कारण उन पर किसी का ध्यान नहीं जाता।
साहित्यकारों को भी इस दिशा में सकारात्मक पहल करने की आवश्यकता है, प्रेमचंद की कहानी "ईदगाह" जैसी प्रेरणाप्रद कहानियों के समान अन्य सकारात्मक संदेश से लगातार प्रेरित करने का प्रयास करते रहना चाहिए।

यह भी आवश्यक है कि लोग मोबाइल, टी.वी., इन्टरनेट की दुनिया और एयरकंडिशनर के आरामदेह कमरे से निकल कर दूसरों से संवाद बनाएँ।
आपस की बढ़ती दूरियों, अविश्वास, प्रतिस्पर्धा और बदले की भावना से प्रेरित इस दौर से ऊबे और घबराए आम लोगों को आपसी संवाद की तथा एक दूसरे के भावों को समझने और महसूस करने की आवश्यकता है, जिसके लिए जरूरत है कि लोग चेतन स्तर पर अपनों की सीमा को बढ़ा कर आसपास, पड़ोस, मित्र, रिश्तेदार, कुछ परिचित और अपरिचित तक ले जाएँ, जिससे उनके आपसी संपर्क का दायरा बढ़ेगा।
दिल में दबी बातों को साझा कर बोझिल मन को सुकून मिलता है। सिर रख कर रोने वाले कंधे मिलते हैं। खुशी और उपलब्धियों को बाँटने वाले लोग मिलते हैं। बस जरूरत है अपने अहम को छोड़ दूसरों की तरफ हाथ बढ़ाने की।

इसके साथ ही अपने आधुनिक व्यस्तता भरे जीवन में भी बच्चों की परवरिश पर माता-पिता को व्यक्तिगत तौर पर ध्यान देना होगा। उनमें हार स्वीकार करने और "ना" सुनने की क्षमता विकसित करनी होगी। उनमें यह भाव जगाना होगा कि पढ़ाई सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धियाँ हासिल करने, ऊँचे पदों पर जाने और पैसा कमाने के लिए ही नहीं की जाती, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास में योगदान देने के लिए भी की जाती है। ऊँचाई पर पहुँचने के लिए शॉर्टकट छोड़कर सीढ़ी-दर-सीढ़ी मिली छोटी-छोटी सफलताओं में खुश होने की आदत को विकसित करना होगा।

जीवन की आपाधापी में बढ़ती उम्र के साथ जो शौक अधूरे रह गए, उन्हें नए सिरे से जीवित करना चाहिए, इससे नई ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। आजकल हमारी आदत बन चुकी है कि हर कार्य को लाभ-हानि की तुला में रखकर सोचते हैं, जबकि हमें इस लाभ-हानि को छोड़कर सिर्फ अपने शौक पूरे करने के लिए भी अपने पसंदीदा कार्यों को कुछ समय देना चाहिए, इससे मानसिक तनाव से मुक्ति मिलेगी और व्यक्ति के मन में दबी बहुत सारी ग्रंथियाँ खुल जाएँगी और कई चीजों के प्रति उनकी स्वीकार्यता बढ़ जाएगी और आपसी सौहार्द्र विकसित होगा।

चित्र साभार - गूगल से

मालती मिश्रा

प्रकृति के नैसर्गिक रूप को बिगाड़ कर विकास संभव नहीं

 प्रकृति के नैसर्गिक रूप को बिगाड़कर विकास संभव नहीं

पर्यावरण प्रदूषण किसी एक देश नहीं बल्कि विश्व के सामने व्यापक समस्या बनकर खड़ा है। इसीलिए पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षण के प्रति सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता लाने के उद्देश्य से 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 1972 में आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन में चर्चा के बाद 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई और 5 जून 1974 को पहली बार विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। किन्तु पर्यावरण की सुरक्षा किसी एक दिन के संकल्प से नहीं हो सकती बल्कि इसके लिए चहुँमुखी जागृति और क्रियान्वयन की आवश्यकता है। वर्तमान समय में जिस प्रकार से लगातार जनसंख्या बढ़ती जा रही है, उतनी ही तेजी से लोहे और कंक्रीट के जंगल भी बढ़ते जा रहे हैं, जिसका नकारात्मक प्रभाव सीधे पर्यावरण पर पड़ रहा है। प्रकृति के अपने कुछ नियम हैं, जिनके विपरीत विकास कार्य किए जा रहे हैं और जंगलों व नदियों के स्वरूपों को भी बिगाड़ा जा रहा है। इससे पृथ्वी का संतुलन भी बिगड़ रहा है। विकास के नाम पर पृथ्वी विनाश की प्रयोगशाला बनती जा रही है।

देश का विकास आवश्यक है, तभी देश के नागरिकों का विकास होगा और उन्हें सभी सुख-सुविधाएँ प्राप्त हो सकेंगी किन्तु विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति की ओर से विमुख हो जाने से हम विनाश की ओर बढ़ रहे हैं।  क्योंकि विकास के नाम पर लगातार पेड़ों की कटाई और जंगलों का खात्मा करके हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। जिससे न सिर्फ नदी-तालाब सूखते जा रहे है, भूमिक्षरण बढ़ता जा रहा है, भूमि बंजर होती जा रही है और पशु-पक्षियों को बेघर करके उनसे उनके जीने का अधिकार छीन रहे हैं। विकास तो तभी संभव है जब देश का पर्यावरण स्वच्छ हो, चारों ओर हरियाली हो। जिस तरह से विकसित देश प्रकृति के संसाधनों का दोहन कर रहे हैं, विकासशील देश भी उन्हीं के नक्शे कदम पर चलकर अंधाधुंध प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे हैं।  

विकास के नाम पर पहाड़ों-जंगलों को काटकर सुरंगें बनाना, नदियों-तालाबों को पाटकर ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी करना प्राकृतिक आपदा को आमंत्रित करना ही है।

देश को गंगा-यमुना जैसी सदानीरा नदियाँ देने वाले पहाड़ के करीब 12 हजार प्राकृतिक स्रोत या तो सूख चुके हैं या फिर सूखने के कगार पर हैं। पानी और ऊर्जा के स्रोतों को विकृत और वायु को लगातार दूषित किया जा रहा है।

तूफान, भूकंप, बाढ़, सूखा, भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं का कारण विकास के नाम पर प्रकृति से किए जा रहे खिलवाड़ के कारण ही हैं। केदारनाथ आपदा, नेपाल की महाविनाशकारी भूकंप, और समय-समय पर आने वाली प्राकृतिक आपदाएँ हमें चुनौती दे रही हैं कि यदि अंधाधुंध हो रहे प्राकृतिक दोहन को रोका नहीं गया तो आगे और भी भयानक परिणाम सामने आ सकते हैं। 

प्रकृति के नैसर्गिक रूप को बिगाड़कर, पर्यावरण को जहरीला करके विकास संभव नहीं।  

आज हम घरों को, बालकनियों को प्लास्टिक की हरियाली से कितना भी सजा लें किंतु हरियाली के नैसर्गिक गुण कहाँ से लाएँगे, उनसे प्राप्त होने वाली प्राणवायु और शीतलता इन दिखावटी पौधों से तो प्राप्त नहीं किया जा सकता। विकास के नाम पर बाग-बगीचे-जंगल काट कर बड़ी-बड़ी इमारतें बनाकर उसमें मानव का निवास तो बन गया परंतु उनमें रहने वाले पशु-पक्षियों का आवास और भोजन छीन लिया गया, जिसके कारण न जाने कितने वन्य जीव दिन-प्रतिदिन लुप्त होते जा रहे हैं। वायु प्रदूषित होती जा रही है, नदियाँ सूखती जा रही हैं, जो हैं उनका जल विषैला होता जा रहा है, धरती की उर्वरा शक्ति समाप्त होती जा रही है, जिसके कारण फसलों की अच्छी पैदावार के लिए रसायनिक खादों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। फलस्वरूप हमारा खानपान दूषित होता जा रहा है और बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं। क्या इसे हम सार्थक विकास की श्रेणी में रख सकते हैं? सही मायने में स्वच्छ और प्रदूषण रहित वातावरण ही विकास को सार्थक कर सकता है। 

विकास आवश्यक है किन्तु प्रकृति को हानि पहुँचाए बिना। अत: मौजूदा प्राकृतिक अस्थिरता से उबरने के लिए और पर्यावरण को शुद्ध करने के लिए अंधाधुंध प्राकृतिक दोहन से बचते हुए अधिकाधिक वृक्षारोपण ही एकमात्र उपाय हो सकता है, क्योंकि वृक्ष ही हमें इस लाइलाज बीमारी से उबार सकते हैं। वृक्षों के महत्व को बताते हुए एक श्लोक प्रचलित है...

दशकूपसमा वापी, दशवापीसमो ह्रदः। दशह्रदसमो पुत्रो, दशपुत्रसमो द्रुमः।।

अर्थात् दस कुओं के बराबर एक बावड़ी, दस बावड़ियों के बराबर एक सरोवर, दस सरोवरों के समान एक पुत्र और दस पुत्रों के समान एक वृक्ष का महत्त्व होता है। अत: हमारा कर्तव्य है कि विकास के नाम पर यदि हम एक वृक्ष काटते हैं तो हमें उससे पहले, दस वृक्ष लगाने चाहिए। इतना ही नहीं समाज के प्रत्येक व्यक्ति को प्रण करना चाहिए कि वह यथासंभव वृक्ष लगाएँगे और उनकी देखभाल करेंगे।


मालती मिश्रा 'मयंती'



शुक्रवार

मकरसंक्रांति

 मकरसंक्रांति 




हमारे देश में मनाए जाने वाले सभी त्योहारों के पीछे न सिर्फ धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताएँ होती हैं बल्कि इन सभी त्योहारों के पीछे सामाजिक, वैज्ञानिक, आयुर्वेदिक और स्वास्थ्य संबंधी कारण भी जुड़े होते हैं।

हम सभी इनके पीछे जुड़े कारणों की जानकारी के अभाव में इन्हें सिर्फ धर्म से जोड़ते हैं।

ऐसा ही पर्व है मकरसंक्रांति। मकरसंक्रांति हर वर्ष माघ माह में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर मनाया जाता है। किसी विद्वान ने कहा है- 

‘‘माघ मकरगत रबि जब होई। 

तीर्थपतिहिं आव सब कोई।।’

अंग्रेजी तिथि के अनुसार यह हर वर्ष १४ जनवरी को आता है। जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में आता हैं, तभी मकरसंक्रांति का पर्व मनाया जाता है। देवताओं के दिनों की गणना इसी दिन से आरंभ होती होती है। इस दिन को मोक्ष प्राप्ति का दिन भी माना जाता है। महाभारत कथा के अनुसार कुरुश्रेष्ठ भीष्म पितामह ने भी अपने प्राण त्यागने के लिए इसी दिन की प्रतीक्षा की थी ताकि उन्हें मोक्ष मिल सके। 

पौराणिक मान्यता के अनुसार सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश करने के बाद ही गंगा जी अपने उद्गम स्थान से निकलकर भागीरथ का अनुसरण करते हुए कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए सागर में जाकर मिली थीं, इसीलिए इस दिन गंगा स्नान का भी विशेष महत्व है।

मकरसंक्रांति के दिन प्रातःकाल निरोगी काया के लिए पवित्र नदियों मुख्यत: गंगा नदी में स्नान करके तन को स्वच्छ, पवित्र और निरोगी करने का प्रचलन है। कहीं-कहीं शरीर पर गुड़ और तिल का लेप/उबटन लगाकर स्नान करने की प्रथा है।कहते हैं कि तिल और गुड़ आयुर्वेदिक औषधि का कार्य करते हैं इससे शरीर निरोगी होता है। जो लोग किन्हीं कारणों से गंगा स्नान नहीं कर पाते वे घर में ही नहाने के पानी में गंगाजल और तिल डालकर स्नान करते हैं।

स्नान के पश्चात् सूर्यदेव की पूजा अर्चना करके सूर्यदेव को अर्घ्य दिया जाता है, अर्घ्य के लिए लोटे के जल में तिल, लाल पुष्प, अक्षत, सुपारी और लाल वस्त्र या कलावा डालते हैं। 

पूजा अर्चना के पश्चात् दान-पुण्य की प्रथा है।‌ अन्नदान को श्रेष्ठ दान माना जाता है तथा तिल और गुड़ के दान को पवित्र और पुण्य दायक माना जाता है, इसीलिए लोग कच्ची खिचड़ी, तिल, गुड़ और वस्त्रों का दान करते हैं।

तिल और गुड़ का इस पर्व में विशेष महत्व है, नहाने से पहले तिल गुड़ का उबटन लगाते हैं, नहाने के पानी में तिल डालते हैं, खाने में तिल के तेल का प्रयोग किया जाता है। तिल और गुड़ का आयुर्वेदिक महत्व भी है, गुड़ खाने से पाचन शक्ति में वृद्धि होती है, जिससे पेट संबंधी बीमारी से मुक्ति मिलती है। तिल त्वचा और पेट दोनों के लिए लाभदायक होने के साथ हड्डियों के लिए भी वरदान स्वरूप है। 

इसके साथ ही हवन में भी तिल और गुड़ की आहुति की परंपरा है।


इस पर्व को देश के अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न नाम से भिन्न-भिन्न रूप में मनाया जाता है। उत्तर भारत में इस पर्व को मकरसंक्रांति तथा गुजरात में उत्तरायण के नाम से जाना जाता है। उत्तराखंड में इसे उत्तरायणी, गढ़वाल में खिचड़ी संक्रांति तथा असम में बिहू के नाम से जाना जाता है। केरल में यह त्योहार पोंगल के नाम से तीन दिवस तक बड़े ही धूमधाम और पारंपरिक रूप से मनाया जाता है। 


उत्तर प्रदेश के कुछ प्रांतों तथा बिहार में इस दिन नई फसल के चावल और दाल को मिलाकर खिचड़ी बनाया जाता है, देवताओं को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है, कच्ची खिचड़ी का दान दिया जाता है तत्पश्चात् स्वयं खिचड़ी खाने की प्रथा है, इसलिए इस पर्व को खिचड़ी के नाम से जानते हैं। उत्तर भारत में इसे मकरसंक्रांति तथा गुजरात में उत्तरायण के नाम से जाना जाता है। 

पंजाब में इस पर्व को लोहड़ी के नाम से जाना जाता है तथा एक रात्रि पूर्व मनाया जाता है। वहाँ इस दिन से नव वर्ष का आरंभ माना जाता है तथा नई फसल की कटाई प्रारंभ करते हैं। नई फसल के प्रतीक स्वरूप मक्के के फूले, मूंगफली, गुड़ और तिल की रेवड़ियाँ आदि अग्नि देव को समर्पित करके नाच-गा कर धूमधाम से यह त्योहार मनाया जाता है।


सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश करने पर ऋतु में भी सकारात्मक परिवर्तन आता है। इसी दिन से प्रकाश में वृद्धि और तिमिर का ह्रास होता है अर्थात् दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं। सूर्य के उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश के कारण उसके ताप में वृद्धि होने लगती है, फलस्वरूप सर्दी कम होने लगती है, जिसके कारण सर्दी से जकड़े हुए तन में स्फूर्ति जाग्रत होती है, आलस्य समाप्त होता है और क्रियाशीलता बढ़ने लगती है। 

मालती मिश्रा 'मयंती'


मंगलवार

राजनीति का शिकार भारत का किसान

राजनीति का शिकार भारत का किसान

 

राजनीति का शिकार भारत का किसान

'किसान'..... इस साधारण से शब्द में एक ऐसी महान छवि समाई हुई है जो संपूर्ण मानव समाज का ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों का भी पोषक है, जो अन्नदाता है। जो स्वयं भूखा रहकर औरों का पेट भरता है, जो स्वयं चीथड़े लपेट औरों के लिए कपास और रेशम तैयार करता है। 'जय जवान जय किसान' का नारा यही दर्शाता है कि ये दोनों ही समाज और देश के वो कर्णधार हैं जिनके कंधों पर देश का रक्षण और भरण-पोषण टिका हुआ है, जिनके कारण ही देश का अस्तित्व कायम हैं बाकी सब तो उत्कृष्टता बढ़ाने की सामग्री हैं। यदि घर की दीवारें ही न हों तो सजाएँगे किन्हें?

सदियों से यही चला आ रहा है किसान अपने दिन का आराम और रात की नींदें कुर्बान करके अपनी फसल को पुत्रवत् पोषित करता है।

वह मौसम की हर मार से उसे बचाने का प्रयास करता है। पूस-माघ की कड़कड़ाती सर्दी में भी यदि उसे आभास हो कि सुबह पाला पड़ने वाला है तो उस पाले से अपनी फसल को बचाने के लिए वह हड्डियाँ गलाने वाली सर्दी की परवाह किए बिना रात को खेतों में पानी भरता है ताकि सुबह का पाला उसकी फसल खराब न कर सके। उस भयंकर सर्दी में भी वह फसल की रखवाली के लिए घर की छत का आनंद छोड़कर खेतों में पड़ी टूटी-फूटी झोपड़ी में सोता है, हिंदी के महान साहित्यकार 'मुंशी प्रेमचंद' की कहनी 'पूस की रात' में किसान की इसी दशा का वर्णन मिलता है। कठोर परिश्रम और देख-रेख के बाद जब वह अंकुर निकलते देखता है तो इस प्रकार प्रसन्न होता है जैसे एक पिता अपने पुत्र को पहली बार देखकर प्रसन्न होता है। लहलहाती फसल को देखकर उसकी छाती उसी प्रकार गर्व से फूल जाती है जिस प्रकार अपने पुत्र की तरक्की से एक पिता की।
उस फसल को देखकर उसे अपनी पत्नी की वह सूती साड़ी याद आती है जो कई जगह से सिलकर पहनने लायक बनाई गई है, उसे अपनी पत्नी के लिए नई साड़ी की उम्मीद उस फसल में नजर आती है, अपने बच्चों की कई महीने से रुकी हुई स्कूल की फीस और किताबें तथा बूढ़े पिता के टूटे हुए चश्में की उम्मीद नजर आती है। बिटिया की शादी के लिए बचत करने के सपने भी आँखों में पलने लगते है। वह फसल कटकर घर आने से पहले पूरे परिवार के महीनों से रुकी जरूरतों के पूरा होने की उम्मीद जगा देती है, इसीलिए फसल को किसी भी प्रकार की क्षति से बचाने के लिए, उसे समय पर पानी और खाद मिले इसके लिए किसान हर संभव प्रयास करता है यहाँ तक कि उसके खाद, सिंचाई आदि की व्यवस्था के लिए फसल पकने पर कर्ज चुका देने की पूरी आशा के साथ वह कर्जदार भी बन जाता है।
खेत की जोताई, बीज रोपाई, सिंचाई ,फसल की खाद आदि से लेकर अनाज घर तक लाने के लिए वह न जाने कितनी नींदें और कितने समय का भोजन भी त्याग चुका होता है परंतु जब उसकी आवश्यकताओं के पूरा होने का समय आता है तो इसी फसल को तैयार होने तक लिया गया कर्ज उसके समक्ष मुँह बाए खड़ा होता है। वह चाह कर भी कर्ज से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाता, चाह कर भी अपने सपने पूरे करना तो दूर अपनी आवश्यक आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं कर पाता। उसी फसल में से उसे अगली फसल में लगने वाला खर्च भी निकालना होता है और पूरे साल परिवार का भरण-पोषण भी करना है सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ भी पूरा करना है ऐसे में यदि अनाज का उचित मूल्य न मिल सके या उसे बेचने की सही सुविधा का अभाव हो तो वह तो वैसे ही असहाय हो जाता है।
हमारे हिंदी साहित्यकारों ने अपने साहित्य में किसानों की जिस दयनीय दशा का उल्लेख किया है माना कि वर्तमान समय में किसानों की स्थिति उससे भिन्न है परंतु यह भी सत्य है कि पूर्णतया भिन्न नहीं है, किसान आज भी कर्ज के बोझ तले दबा है, किसान आज भी मौसम की मार झेलता है, वह पहले मदद के लिए साहूकारों का मुँह देखता था, वह आज भी मदद के लिए सरकार का मुँह देखता है। आज भी उसे अपनी मेहनत को औने-पौने दाम में बेचना पड़ता है।
इतनी समस्याएँ क्या कम थीं जो आजकल राजनीतिक पार्टियों द्वारा आए दिन आंदोलन, बंद आदि करवाकर इनके लिए और समस्या खड़ी कर दी जाती हैं। खेत के खेत खड़ी फसलों को बर्बाद कर दिया जाता है, ट्रक के ट्रक सब्जियाँ, दूध आदि बर्बाद किए जाते हैं, जो कि किसान की स्वयं की सहमति नहीं होती उससे जबरन करवाया जाता। कोई भी किसान पुत्रवत पाली गई फसल बर्बाद नहीं कर सकता। ऐसी अनचाही परिस्थिति का वह राजनैतिक शिकार होता है और अनचाहे ही राजनीति के जाल में फँस जाता है।

मालती मिश्रा 'मयंती'

रविवार

संस्कारों का कब्रिस्तान बॉलीवुड

 


संस्कारों का कब्रिस्तान बॉलीवुड

हमारा देश अपनी गौरवमयी संस्कृति के लिए ही विश्व भर में गौरवान्वित रहा है परंतु हम पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध में अपनी संस्कृति भुला बैठे और सुसंस्कृत कहलाने की बजाय सभ्य कहलाना अधिक पसंद करने लगे। जिस देश में धन से पहले संस्कारों को सम्मान दिया जाता था, वहीं आजकल अधिकतर लोगों के लिए धन ही सर्वेसर्वा है। धन-संपत्ति से ही आजकल व्यक्ति की पहचान होती है न कि संस्कारों से। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा भी है...

वित्तमेव कलौ नॄणां जन्माचारगुणोदयः ।

धर्मन्याय व्यवस्थायां कारणं बलमेव हि ॥

अर्थात् "कलियुग में जिस व्यक्ति के पास जितना धन होगा, वो उतना ही गुणी माना जाएगा और कानून, न्याय केवल एक शक्ति के आधार पर ही लागू किया जाएगा।"


आजकल यही सब तो देखने को मिल रहा है, जो ज्ञानी हैं, संस्कारी हैं, गुणी हैं किन्तु धनवान नहीं हैं, उनके गुणों का समाज में कोई महत्व नहीं, लोगों की नजरों में उनका कोई अस्तित्व नहीं है न ही उनके कथनों का कोई मोल परंतु यदि कोई ऐसा व्यक्ति कुछ कहे जो समाज में धनाढ्यों की श्रेणी में आता हो तो उसकी कही छोटी से छोटी बात न सिर्फ सुनी जाती है बल्कि अनर्गल होते हुए भी लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण बन जाती है और यही कारण है कि नीचता की सीमा पार करके कमाए गए पैसे से भी ये बॉलीवुड के कलाकार प्रतिष्ठित सितारे कहलाते हैं। आज भी हमारी संस्कृति में स्त्रियाँ अपने पिता, भाई और पति के अलावा किसी अन्य पुरुष के गले भी नहीं लगतीं (ये गले लगने की परंपरा भी बॉलीवुड की ही देन है) न ही ऐसे वस्त्र धारण करती है जो अधिक छोटे हों या स्त्री के संस्कारों पर प्रश्नचिह्न लगाते हों, परंतु हमारे इसी समाज का एक ऐसा हिस्सा भी है जहाँ पुरुष व स्त्रियाँ खुलेआम वो सारे कृत्य करते हैं जिससे न सिर्फ स्त्रियों के चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगता है बल्कि समाज में नैतिकता का स्तर भी गिरता है। 

आजादी के नाम पर निर्वस्त्रता की मशाल यहीं से जलती है और समाज में बची-खुची आँखों की शर्म को भी जलाकर राख कर देती है। और शर्मोहया की चिता की वही राख बॉलीवुड की आँखों का काजल बनती है। 

पैसे कमाने के लिए ये मनोरंजन और कला के नाम पर समाज में अश्लीलता और अनैतिकता परोसते हैं और आम जनता मुख्यत: युवा पीढ़ी  इनकी चकाचौंध में फँसकर धीरे-धीरे अंजाने ही वो सब करने लगती है जिससे समाज में नैतिकता का स्तर गिरता जा रहा है। एक समय था जब हमारे ही देश में पहली हिन्दी फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' में हिरोइन के लिए कोई महिला नहीं मिली तो पुरुष ने महिला का रोल निभाया था और आज का समय है कि थोड़े से पैसे और नाम के लिए अभिनेत्रियाँ निर्वस्त्र होकर फोटो खिंचवाती हैं। वही बॉलीवुड कलाकार युवा पीढ़ी के आदर्श बन जाते हैं जिनका स्वयं का कोई आदर्श, कोई उसूल नहीं या फिर ये कहें कि उनके आदर्श और उसूल बस पैसा ही है परंतु विडंबना यह है कि जनता और सरकार सभी इनकी सुनते हैं। 

ये मनोरंजन के नाम पर नग्नता और व्यभिचार दर्शा कर जहाँ एक ओर समाज के युवा पीढ़ी को बरगलाते हैं वहीं आजकल टीवी, सिनेमा, मोबाइल, लैपटॉप जैसे आधुनिक तकनीक छोटे-छोटे बच्चों के हाथों में किताबों की जगह ले चुके हैं, फिर इंटरनेट और सोशल मीडिया से कोई कब तक अछूता रह सकता है। चाहकर भी बच्चों को इनसे दूर नहीं रखा जा सकता और इनमें संस्कार और नैतिकता के पाठ नहीं पढ़ाए जाते बल्कि स्त्रियों की आजादी के नाम पर अंग प्रदर्शन, युवाओं की आजादी के नाम पर खुलेआम अश्लीलता फैलाना। ये सब आम बात हो चुकी है। इतना ही नहीं वामपंथी विचारधारा के समर्थक और प्रचारक बॉलीवुड में भरे पड़े हैं और ये समाज में होने वाले सभी प्रकार के देश विरोधी गतिविधियों का समर्थन करके उन्हें मजबूती देते हैं।

मेहनत तो एक आम नागरिक भी करता है और अपनी मेहनत से कमाए गए उन थोड़े से पैसों से ही अपना परिवार पालता है परंतु अधिक पैसों के लालच में अपने संस्कार नहीं छोड़ता अपनी लज्जा को नहीं छोड़ता परंतु उस सम्मानित किंतु साधारण व्यक्ति की बातों का कोई महत्व नहीं वह कुछ भी कहे किसी को सुनाई नहीं देता लेकिन यही अनैतिक और संस्कार हीन सेलिब्रिटी यदि छींक भी दें तो अखबारों की सुर्खियाँ और न्यूज चैनल के ब्रेकिंग न्यूज बन जाते हैं, इसीलिए तो इनका साहस इतना बढ़ जाता है कि ये ग़लत चीजों या घटनाओं का समर्थन करते हैं और चाहते हैं कि सरकार उनकी अनर्गल बातों का आदेशों की भाँति पालन करे। बॉलीवुड से राजनीति में आना तो आजकल चुटकी बजाने जितना आसान हो गया है क्योंकि सब पैसों और प्रसिद्धि का खेल है। जिसके पास बॉलीवुड और राजनीतिक कुर्सी दोनों का बल होता है, वो अपने आप को ही राज्य या देश मान बैठे हैं, इसीलिए तो बिना सोचे समझे ही निर्णय सुना देते हैं कि जिसने हमारे विरुद्ध कुछ कहा उसने अमुक राज्य का अपमान किया और उसे अमुक राज्य में रहने का कोई अधिकार नहीं। किसी को लगता है कि महाराष्ट्र से बाहर से आए  बॉलीवुड में काम करने वाले सभी सितारे उनकी दी हुई थाली (बॉलीवुड) में खाते हैं अर्थात् बॉलीवुड रूपी थाली उन्होंने ही दिया था, दिन-रात जी-तोड़ परिश्रम का कोई महत्व नहीं, इसलिए यदि ये दिन को रात और रात को दिन या ड्रग्स को टॉनिक कहें तो उस बाहरी सितारे को भी ऐसा ही करना चाहिए, नहीं किया तो किसी का घर तोड़ दिया जाएगा या किसी की हत्या कर दी जाएगी। 

देश के किसी भी कोने में देश के हित में लिए गए किसी निर्णय  का विरोध करना हो या हिन्दुत्व विरोधी प्रदर्शन करना हो या सरकार को अस्थिर करने के लिए किसी असामाजिक कार्य का समर्थन करना हो तो ये जाने-माने सितारे हाथों में तख्तियाँ लेकर फोटो खिंचवा कर अपना विरोध प्रदर्शन करते हैं किंतु जब कहीं सचमुच अन्याय हो रहा हो या कोई अनैतिक कार्य हो रहा हो तब ये तथाकथित प्रतिष्ठित लोग कहीं नजर नहीं आते। 

समाज में नैतिकता के गिरते स्तर का जिम्मेदार सिर्फ बॉलीवुड ही है और अब सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु की जाँच के दौरान नशालोक की सच्चाई सामने आ रही है जिसे बॉलीवुड के नशा गैंग की संख्या द्रौपदी के चीर की तरह बढ़ती ही जा रही है। जहाँ बाप-बेटी के रिश्ते की मर्यादा नहीं होती, जहाँ दिन-रात गांजा ड्रग्स के धुएँ के बादल घिरे रहते हैं, जहाँ इन वाहियात कुकृत्यों का समर्थन न करने वालों के लिए मौत को गले लगाने के अलावा कोई स्थान नहीं...हम उसी बॉलीवुड की फिल्मों को देखने के लिए पैसे खर्च करते हैं और इनकी अनैतिकता को मजबूती प्रदान करते हैं। ये बॉलीवुड हमारी संस्कृति हमारे संस्कारों का कब्रिस्तान है। इसकी शुद्धि जनता के ही हाथ में है नहीं तो कहते हैं न कि 'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता।' यदि जनता एक साथ इन्हें सबक नहीं सिखाती तो अकेले आवाज उठाने वाले का वही हश्र होगा जो कंगना रनौत का हुआ या उससे भी बुरा। इसका निर्णय जनता को ही लेना होगा आज की युवा पीढ़ी को इन्हें बताना होगा कि वे इन आदर्शविहीन अनैतिक फिल्मी सितारों को अपना आदर्श नहीं मान सकते। देश को अनैतिक संस्कारहीन सेलिब्रिटी की नहीं बल्कि ऐसे नागरिकों की आवश्यकता है जो हमारे देश की संस्कृति के रक्षक बन सके न कि उसे विकृत करके इसकी छवि को धूमिल करें। 


मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

भजनपुरा, दिल्ली- 110053

मोबाइल नं० 9891616087


शिक्षक के अधिकार व कर्तव्य


माता-पिता बच्चे को न सिर्फ जन्म देते हैं बल्कि पहले गुरु भी वही होते हैं। बच्चा जब दुनिया में आता है तब आसपास के वातावरण से, परिवार से, रिश्तों से तथा समाज व समाज के लोगों से उसका परिचय माँ ही करवाती है, वह बच्चे को जैसा बताती है वह वही मानता है, माँ ही बच्चे की उँगली पकड़ धरती पर उसे पहला कदम रखना सिखाती है, गिरने के पश्चात् संभलना और पुनः उठकर खड़े होना सिखाती है। माँ हृदय की कोमलता के वशीभूत होकर यदि लड़खड़ाकर गिरते बच्चे को लगने वाली चोट के दर्द से पिघल कर उसे उस चोट से बचाने के लिए पुनः उठना ही न सिखाती तो बच्चा पूरी जिंदगी के लिए न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक विकलांगता का शिकार हो जाता किन्तु उस समय माँ का हृदय जानता है कि कब उसे नरमी से और कब सख्ती अख्तियार करते हुए बच्चे को गिरकर संभलना और पुनः उठकर चलना सिखाना है और परिणाम स्वरूप बच्चा गिरता है संभलता है और फिर उठकर चलता और दौड़ता है। इन सबके दौरान जो गौर करने वाली बात है, वह है कि बच्चे के जीवन की प्रथम गुरु माँ बच्चे के हितार्थ आवश्यकतानुसार सख्त भी होती है और नरम भी। धीरे-धीरे बच्चे के बड़े होने के साथ-साथ उसकी शिक्षा-दीक्षा हेतु उसे गुरु के सुपुर्द किया जाता है और माता-पिता अपने पुत्र को गुरु के सुपुर्द कर आश्वस्त हो जाते। फिर गुरु बच्चों में अपनी शिक्षा के द्वारा मानवीय व सामाजिक गुणों का विकास करते हैं। बच्चा स्वभावतः बेहद जिज्ञासु, नटखट व स्वछंद प्रवृत्ति का होता है। कभी-कभी तो किसी-किसी बच्चे को स्वछंद से अनुशासित बनाने में गुरु को लोहे के चने चबाने पड़ते हैं। पर गुरु की मर्यादा उसे उस काम को चुनौती की भाँति स्वीकारने पर विवश करती है, इसलिए वह उस बच्चे को कभी नरमी तो कभी सख्ती से सिखाने का प्रयास करता है।

एक समय था जब 'गुरु' शब्द को ही सम्मान सूचक मानते थे किन्तु धीरे-धीरे समाज की मान्यताएँ बदलीं, लोगों की सोच में परिवर्तन हुआ, रहन-सहन में बदलाव के साथ-साथ पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव न सिर्फ लोगों की मानसिकता में परिवर्तन लाया है हमारी शिक्षा पद्धति भी इससे बेहद प्रभावित हुई है। फलस्वरूप गुरुकुल से पाठशाला बने शिक्षण केंद्र विद्यालय और फिर कॉन्वेंट स्कूल बन गए और इसी के साथ जो पहले गुरु हुआ करते थे वो अब शिक्षक हो गए तथा शिष्य अब विद्यार्धी/शिक्षार्थी बन गए हैं। जहाँ पहले गुरु प्रधान हुआ करता था अब विद्यार्थी प्रधान होता है, तो जिसकी प्रधानता होगी उसी का दबाव रहेगा। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और अधिकार भावना की प्रबलता के कारण वर्तमान समय में बच्चे अति संवेदनशील भावनाओं से ग्रस्त हैं। दूसरी ओर मानसिक व शारीरिक दबाव के फलस्वरूप कुछ शिक्षक भी अपनी गरिमा को भूल जाते हैं और अपनी सीमा को भूलकर बर्बरता पर उतर आते हैं किन्तु ऐसा अपवाद स्वरूप ही होता है और ऐसी घटनाओं को देखते हुए तथा विद्यार्थियों की अति संवेदनशीलता को देखते हुए कानून बना दिया गया जिसके तहत शिक्षक के कर्तव्यों को तथा विद्यार्थियों के अधिकारों को वरीयता दी गई। किन्तु जिस प्रकार हर एक कानून का दुरुपयोग भी होता है, उसी प्रकार विद्यार्थियों के अधिकारों का भी दुरुपयोग होने लगा है।

 आजकल माता-पिता दोनों ही कामकाजी होने के कारण स्वयं तो अपने बच्चों को समय दे नहीं पाते किन्तु बच्चों के प्रति अति सुरक्षा की भावना से ग्रस्त होकर शिक्षक की थोड़ी सख्ती भी बर्दाश्त नहीं कर पाते और बिना सत्य जाने शिक्षक के प्रति नकारात्मक सोच के वशीभूत होकर आक्रामक कदम उठा लेते हैं और कानून का दुरुपयोग करने से भी नहीं चूकते। 
सामाजिक और शैक्षणिक परिवर्तन के फलस्वरूप आज का गुरु गुरु नहीं शिक्षक बन गया है, वह शिक्षक जो सम्मानित तो है किन्तु केवल हवाओं में, किंवदंतियों में। सच्चाई के धरातल पर उतरकर देखें तो न उसका कोई अधिकार है न कोई मान, इतना ही नहीं उसकी अपनी कोई ज़िंदगी भी नहीं है। वह बस आज के सिस्टम का मारा वह बेचारा जीव है, जो बिना आवाज निकाले चुपचाप पिसता है, चीख भी नहीं सकता। अगर आवाज निकालने का प्रयास भी करता है तो उसकी आवाज को शिक्षक की गरिमा के नीचे दबा दिया जाता है, शिक्षक है वह, उसके कंधों पर समाज निर्माण का उत्तरदायित्व है, उसे अपना उत्तरदायित्व पूरी श्रद्धा से पूरी मेहनत से निभाना चाहिए। उसे कितनी भी जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा दिया जाय पर वह शिक्षक है इसलिए उसे पाँच घंटे में पंद्रह घंटे का कार्य करना भी आना चाहिए और साथ ही विद्यार्थियों की पढ़ाई भी प्रभावित नहीं होनी चाहिए। उसे विद्यार्थियों को सजा देना तो दूर उन्हें डाँटना, आँख दिखाना और छूना भी वर्जित है, मारना या पीटना तो अपराध की श्रेणी से बहुत ऊपर है किन्तु उनको शिष्ट बनाना है। वह शिक्षक जो छात्र के भविष्य को सुधारने के लिए पूर्ण समर्पण भाव से नित नए तरीके खोजता है, विद्यार्थियों को और सिस्टम को एक पल नहीं लगता उसे अपराधी के कटघरे में खड़ा करने में। वह समझ भी नहीं पाता कि उससे क्या गलती हुई है, उसे अपराधी बनाकर बच्चे व उसके माता-पिता के समक्ष खड़ा कर दिया जाता है। 
वर्तमान समय में अध्यापक का सम्मान व अधिकार महज़ एक मृगतृष्णा है जो दूर से एक सुखद भ्रम उत्पन्न करता है किन्तु वास्तविकता कुछ और ही होती है। शिक्षण संस्थाएँ मानों मानवीय भावनाओं से शून्य हो चुकी हैं जिसके फलस्वरूप उनके सोच के अनुसार शिक्षक/शिक्षिका कभी बीमार नहीं हो सकते, उन्हें  अपने परिवार के प्रति समर्पित होने से पहले विद्यालय के प्रति समर्पित होना चाहिए। विद्यालय समय में अपने परिवार से बिल्कुल कट चुके होते हैं चाहे वहाँ कोई इमरजेंसी भी क्यों न हो पर उन तक सूचना पहुँचना अत्यंत दुरुह होता है। शिक्षक आठ के आठ पीरियड खड़े होकर ही पढ़ाने को मज़बूर होते हैं। इस दौरान वह कितनी भी शारीरिक समस्या के शिकार हो जाएँ परंतु कभी इस ओर न तो शैक्षणिक विभागों की दृष्टि पड़ी न मानवाधिकार विभाग की और न ही सरकार की। किन्तु विद्यार्थी की उग्रता व अशिष्टता के लिए यदि यही शिक्षक उसे डाँट दे या पाँच मिनट खड़ा कर दे तो सभी तन्त्र जागरूक हो जाते हैं। 
वर्तमान समय में 90% विद्यार्थी भी शिक्षक को एक वेतनभोगी कर्मचारी ही समझते हैं इससे अधिक कुछ नहीं, और तो और वो उन्हें विद्यालय या सिस्टम का नहीं बल्कि अपना कर्मचारी समझते हैं क्योंकि उनके द्वारा दी गई फीस से शिक्षक वर्ग की मासिक तनख्वाह निकलती है। इस समय के बच्चों के विचार व उनका व्यवहार देखकर देश के भविष्य के विषय में सोचती हूँ तो एक प्रश्न खड़ा हो जाता है कि वो बच्चे जिनमें अभी 10 वीं 12 वीं तक भी अनुशासन, शिष्टाचार व  विनम्रता के भाव नहीं पनप सके, वो देश के कर्णधार कैसे बन सकते हैं?
प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि क्यों यह बच्चे इतने अधिक उग्र, अनुशासनहीन और संवेदनहीन हो चुके हैं? क्यों वही माता-पिता जो अपने बच्चे को खड़ा करने के लिए उसे चोट सहन करने देते थे वही क्यों उसके भविष्य को बनाने के लिए उसके प्रति थोड़ी सख्ती भी बर्दाश्त नहीं कर पाते? क्यों उन्हें शिक्षक अपने बच्चे के समक्ष सदैव हाथ बाँधे खड़ा हुआ चाहिए? अक्सर देखा जाता है कि वही बच्चा शिक्षक का सम्मान नहीं करता जिसके माता-पिता शिक्षक का सम्मान नहीं करते। जो माता-पिता शिक्षक के प्रति सम्मान दर्शाते हैं वो बच्चे भी सम्मान करते हैं। 
अतः आज भी माता-पिता ही बच्चे के गुरु हैं वो बच्चे को जैसी शिक्षा देते हैं बच्चा वैसा ही बनता है, बच्चे को शिष्ट-अशिष्ट बनाना अब सिर्फ माता-पिता के हाथ में है शिक्षक से भी उसे क्या और कितना सीखना है यह भी माता-पिता ही निर्धारित करते हैं। विद्यालय और शिक्षक तो महज किताबी ज्ञान ही दे पाते हैं। गिने-चुने विद्यार्थी ही होते हैं जो शिक्षक को गुरु मानकर उनकी बातों का अनुसरण करते हैं और निःसन्देह ऐसे विद्यार्थी मानवीय मूल्यों के वाहक तथा आदर्श नागरिक होते हैं।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

शनिवार

नारी सम्मान

नारी सम्मान

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमंते तत्र देवताः
कहा जाता है कि जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवताओं का निवास होता है किन्तु आधुनिक समाज में नारी को पूजा की नहीं आदर की पात्र बनने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। यह विषम परिस्थिति मात्र कुछ महीनों या कुछ वर्षों की देन नहीं है बल्कि यह तो सदियों से ही चला आ रहा है कि नारी को देवी की पदवी से गिरा कर उसे भोग्या समझा जाने लगा तभी तो महाभारत काल में ही धर्म के वाहक माने जाने वाले पांडव श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर ने अपनी पत्नी द्रुपद नरेश की पुत्री और इंद्रप्रस्थ की महारानी द्रौपदी को ही जुए में दाँव पर लगा दिया और विजेता कौरवों ने उनकी पत्नी को जीती हुई दासी मान भरी सभा में अपमान किया।
दहेज प्रथा, सती प्रथा जैसी कुरीतियों का शिकार नारी ही होती आई है, भोग्या भनाकर बाजारों में बेची जाती रही है, तरह-तरह की शारीरिक व मानसिक प्रताड़नाओं का शिकार आज भी होती है। नारी की दुरुह दशा पर सूफी संतों की दृष्टि तो पड़ी किन्तु पुरुषत्व के चश्मे के साथ.. तभी तो तुलसीदास जैसे महाकवि लिख डालते हैं-
"ढोल,गँवार,शूद्र,पशु नारी,
ये सब ताड़न के अधिकारी।।"
समाज सुधारक मानवता के द्योतक, निराकार ब्रह्म के उपासक, समाज के पथ-प्रदर्शक कहे जाने वाले संत कबीर दास लिखते हैं-
"नारी की झाँई पड़त,
अंधा होत भुजंग,
कबिरा तिन की कौन गति,
नित नारी के संग।"

रहीम दास कहते हैं-
"उरग तुरग नारी नृपति,
नीच जाति,हथियार।
रहिमन इन्हें सँभालिये,
पलटत लगत न वार।"

एक ओर पुरुष समाज नारी पर दया दिखाते हैं वहीं दूसरी ओर उसे निम्न कोटि की, भोग्या और मनोरंजन की वस्तु मानकर अपने झूठें अहं पिपासा को तृप्त करते हैं।
पुरुषों की ऐसे ही कृत्यों को देख कर साहिर लुधियानवी ने नारी टीस को महसूस किया और उसे अपनी कलम की स्याही बना ली और इसी तिलमिलाहट में लिख बैठे....
"बिकती हैं कहीं,बाजारों में,
तुलती है कहीं दीनारों में।
नंगी नचवाई जाती है, अय्याशों के दरबारों में।
यह वो बेइज्जत चीज है जो बँट जाती है इज्जतदारों में।।

समय के साथ-साथ समाज सुधारकों व विद्वानों की दृष्टि नारी की दयनीय दशा पर पड़ी और उन्होंने स्वीकारा कि किसी भी देश की सामाजिक व मानसिक उन्नति का अनुमान हम उस देश-काल की स्त्रियों की स्थिति से लगा सकते हैं, नारी समाज देश का आधा भाग होती है, जब तक समाज में महिलाएँ भी पुरुषों के समान सुरक्षित, समर्थ और शक्तिशाली नहीं होंगी तब तक समाज में संतुलन नहीं होगा और असंतुलित समाज या देश का सकारात्मक उत्थान संभव नहीं।
गुप्त जी 1914 में प्रकाशित महत्वपूर्ण काव्य 'भारत-भारती' में आधुनिक महिलाओं की उन्नति पर अत्यधिक बल देते हुए देश में शिक्षा के व्यापक स्तर पर प्रसार की बात करते हुए कहते हैं कि "हमारी शिक्षा तब तक कोई काम नहीं आएगी, जब तक महिलाएँ शिक्षित नहीं होंगी, यदि पुरुष शिक्षित हो गए और महिलाएँ अनपढ़ रह गईं तो हमारा समाज ऐसे शरीर की तरह होगा जिसका आधा हिस्सा लकवे से बेकार है।"
तब स्त्री को इस योग्य बनाने का अभियान चलाया गया कि वह पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चलने में सक्षम हो सके। इसके लिए एक ओर विभिन्न संस्थाओं के द्वारा जनता को सामाजिक बुराइयों के प्रति जागरूक करने का काम किया गया, तो दूसरी ओर भारतेन्दु हरिश्चंद्र और उनके साथी लेखकों द्वारा अपने नाटकों, निबंधों और काव्यों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया गया। आधुनिक युग के सुधार आंदोलनों पर यदि दृष्टिपात करें तो पाएँगे कि उस समय के अधिकांश सुधार आंदोलन नारी-उत्थान से संबंधित थे जैसे- पर्दा-प्रथा, सती-प्रथा, शिशु-कन्या-हत्या, बाल-विवाह आदि।
उस समय का ये संघर्ष आज हमें मामूली लग सकता है किन्तु उस देश-काल के नजरिए से सोचें तो यह बहुत ही दुरुह व संघर्षपूर्ण कार्य था।
धीरे-धीरे ये कुरीतियाँ तो समाप्त हो गईं परंतु पितृसत्तात्मक समाज का चलन खत्म नहीं हुआ और स्त्री-पुरुष के अंतस में जो स्त्रियों को पुरुषों से कमतर या उनके अधीन मानने की धारणा समा चुकी है, वह अब भी निरापद कायम है। आज भी कानूनी रूप से समान अधिकारों के आवरण में समानता लुप्त है,  हमारे देश में अभी भी महिला और पुरुष की साक्षरता दर समान नहीं है एक सैंपल सर्वे के रिपोर्ट के अनुसार पुरुषों की साक्षरता दर ८३ प्रतिशत है तो महिलाओं की ६७ प्रतिशत, अर्थात् अभी भी पुरुषों की तुलना में १६ प्रतिशत महिलाएँ अशिक्षित हैं। विभिन्न संथानों में कार्यरत महिलाओं को पुरुषों के समान कार्य, समान पद के लिए समान वेतन नहीं प्राप्त होता।
आज स्त्री समर्थ होने के बाद भी यही मानती है कि शादी से पहले पिता शादी के बाद पति और वृद्धावस्था में पुत्र के बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं। अभी भी लड़की के विवाह का फैसला भी पिता ही लेता है। दाह संस्कार पुत्र ही करता है। पिता की संपत्ति में कानूनन बराबर अधिकार होने के बाद भी बेटियों को उनके अधिकारों से वंचित रखा जाता है। संपत्ति में हिस्सा लेने के उपरांत भाइयों-भाइयों का रिश्ता तो बना रह सकता है परंतु यदि बहन को हिस्सा देना पड़े तो भाई-बहन का रिश्ता दांव पर लग जाता है। कहते हैं स्त्री ही स्त्री की शत्रु होती है, स्त्रियों को पीछे धकेलने में स्त्रियों का योगदान सर्वाधिक होता है। कौन से कार्य लड़कों के हैं और कौन से कार्य लड़कियों के इसका निर्धारण घर में ही माँ तथा अन्य बड़े बुज़ुर्गों द्वारा कर दिया जाता है और इसी मानसिकता के साथ बेटियों की परवरिश की जाती है कि उन्हें घर के सारे काम करने आने चाहिए क्योंकि उनका प्रथम कार्यक्षेत्र घर की चारदीवारी के भीतर होता है, वह चाहे बाहर नौकरी पेशा ही क्यों न हों किन्तु घर के भीतर के सारे काम, परिवार के सदस्यों की देख-रेख आदि उनका उत्तरदायित्व है वहीं दूसरी ओर लड़कों को इस सीख के साथ बड़ा किया जाता है कि उनका कार्यक्षेत्र सिर्फ घर से बाहर है।
आज भी समाज में संस्कार, लज्जा, चरित्र आदि को संभालने का उत्तरदायित्व सिर्फ स्त्री का माना जाता है। यदि स्त्री अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना चाहे तो मर्यादा रूपी हथियार दिखा कर उसकी आवाज दबा दी जाती है। यूँ तो बेटा-बेटी समान हैं परंतु बेटियों को संस्कारों का पाठ पढ़ाते समय बेटों को वही पाठ पढ़ाने की प्रथा अब भी नहीं है, आज भी समाज में स्त्रियों को सीता, सावित्री जैसी पौराणिक आदर्शों का उदाहरण देकर उनकी सोच को दायरों में सीमित करने का प्रयास किया जाता है किन्तु पुरुषों से राम बनने की अपेक्षा नहीं की जाती। यदि कोई लावारिस नवजात शिशु पाया जाता है तो उँगली सिर्फ माँ पर उठाई जाती है, पिता के विषय में तो कोई सोचता ही नहीं।
हम आधुनिक समाज में जी रहे हैं और आज स्त्रियों ने धरती से अंतरिक्ष तक हर क्षेत्र में अपनी योग्यता को सिद्ध किया है, फिर भी देर रात अकेली घर से बाहर जाते हुए वह डरती है, क्योंकि आज भी स्त्री पुरुषों की नजर में भोग्या बनी हुई है। आधुनिकता का दंभ भरने वाला हमारा समाज आज भी स्त्री को वह सम्मान वह अधिकार नहीं दे पाया जिसका वर्णन हमारे वेदों और प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है। इसका कारण यही है कि पुरुष समाज अपना सत्तात्मक दंभ छोड़ना नहीं चाहता, इसीलिए स्त्री जब भी अधिकारों के लिए सजग हुई तभी पुरुषों की नजर से विलग हुई, जब भी इसने सिर उठाने का प्रयास किया पुरुष का अहंकार  आहत हुआ, जब भी स्त्री ने कमर सीधा कर सीधे खड़े होने की कोशिश की पुरुष को अपनी कमर झुकती महसूस हुई, जब भी इसने धरती पर अपने पैर जमाना चाहा पुरुषों को अपने पैरों तले की धरती खिसकती दिखाई दी और जब भी स्त्री ने अपना मौन तोड़ा तभी पुरुष वर्ग को अपने अस्तित्व पर खतरा मंडराता नजर आया।
ऐसा ही होता है जब हम किसी के अधिकारों पर जबरन आधिपत्य जमा कर बैठे होते हैं, तो उसकी तनिक सी सतर्कता हमारे कान खड़े कर देती है और हर जायज क्रियाकलाप भी हमें नागवार गुजरती है।
आज महिला दिवस के अवसर पर नारियों को तरह-तरह के सम्मान दिए जाते हैं, तरह-तरह से उनकी उपलब्धियों और संघर्षों को सराहा जाता है किन्तु यह सब भी सिर्फ सामयिक ही होता है यदि नारी-सम्मान को धरातल पर लाना है तो जन-जन को उसके सम्मान को हृदय में स्थान देना होगा, उसे वर्ष में एक दिन नहीं बल्कि हर दिन हर पल सम्मान की दृष्टि से देखना होगा उसे अपने समक्ष प्रतिद्वंद्वी न समझकर अपने समकक्ष सहभागी सहयोगी समझना होगा तभी सही मायने में नारी को सगर्व सम्मान की प्राप्ति हो सकेगी।

मालती मिश्रा 'मयंती'

विश्व पुस्तक मेला २०१९


*विश्व पुस्तक मेला २०१९*

प्रगति मैदान नई दिल्ली में प्रत्येक वर्ष विश्व पुस्तक मेला का वृहद् आयोजन किया जाता है, यह मेला राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एन.बी.टी.) अर्थात् नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। पिछले 41 वर्षों से इस मेले का आयोजन होता आ रहा है। इस वर्ष (2019) भी नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा भारतीय व्यापार संव‌र्द्धन परिषद (आइटीपीओ) के सहयोग से इसका आयोजन किया गया।
इस वर्ष मेले की थीम है- 'दिव्यांग जनों की पठन आवश्यकताएं।'
हॉल नं० 7 ई में थीम मंडप का निर्माण किया गया है। थीम को ध्यान में रखते हुए मेले के इस संस्करण का ध्यान ऑडियो, स्पर्शनीय, मूक और ब्रेल किताबों की प्रदर्शनियों के जरिए समावेशी ज्ञान के विचार को बढ़ावा देने के लिए ‘रीडर्स विद स्पेशल नीड्स’ पर है।
जो कि बेहद आकर्षक है तथा चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट व राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की तरफ से लगाए गए स्टॉल छोटे बच्चों व अभिभावकों के आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं।
अतिथि क्षेत्र का दर्जा देने के लिए शारजाह क्षेत्र को चुना गया है।
मेले में करीब 700 देशी व 20 के लगभग विदेशी प्रकाशकों की संख्या है। प्रतिदिन प्रकाशक अपने प्रकाशन की पुस्तकों का लोकार्पण करके लेखकों और कवियों का ध्यान आकृष्ट करने के साथ-साथ पाठकों की रुचियों का भी संवर्धन करने में रत हैं। यह मेला कवियों/लेखकों, छोटे बच्चों व अभिभावकों से लेकर स्कूल-कॉलेज के युवा तथा उम्रदराज पाठकों तक हर आयु-वर्ग के आकर्षण का केन्द्र है क्योंकि सभी को अपनी आवश्यकता और पसंद की सामग्री यहाँ सहजता से प्राप्त हो जाती है। हर वर्ष मेले में आने वालों के लिए कुछ न कुछ नया अवश्य होता है, इस बार भी कई ऐसे ही आकर्षण के केन्द्रों में से एक है 21 घंटे की बोलती रामायण तथा दूसरा प्रतिदिन दोपहर दो से शाम चार बजे के दौरान होने वाला फिल्मोत्सव भी है।
जैसे-जैसे मेले का समापन दिवस नजदीक आता जा रहा है वैसे-वैसे मेले में आने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। मेले में भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में रुचि रखने वालों के लिए अलग-अलग स्टॉल पर उनकी रुचि की सामग्री प्राप्य है। प्रतियोगी पुस्तकें तथा साहित्य संबंधी पुस्तकें हॉल नं०12 में उपलब्ध हैं तो धार्मिक आस्था वाले लोगों से गीताप्रेस स्टॉल भरा दिखता है। हॉल सं. 8 से 11 तथा 12 में सामान्य तथा व्यापार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा सामाजिक विज्ञान और मानविकी से जुड़े पुस्तकों एवं सामग्रियों को देखने के लिए भीड़ उमड़ती दिखती है। पुस्तक मेले में लेखक एवं साहित्य मंच (ऑथर्स कॉर्नर) हमेशा ही व्यस्त दिखाई देता है, रोज ही भिन्न-भिन्न पुस्तकों का लोकार्पण तथा विभिन्न विषयों पर परिचर्चाओं के आयोजन होते हैं जो साहित्य में रुचि रखने वालों के आकर्षण के केन्द्र होते हैं।
शुक्रवार दिनांक 10 जनवरी 2019 भी पुस्तक लोकार्पण और परिचर्चा की दृष्टि से बहुत ही आकर्षक रहा। इस दिन एक ओर गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा की दो पुस्तकों 'राजधर्म और लोकधर्म' तथा 'लोकरंग में सराबोर' का लोकार्पण हुआ तथा दूसरी ओर
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की ओर से आयोजित परिचर्चा में अर्जुन पुरस्कार विजेता पैरा ओलंपियन 'राजिंदर सिंह', पैरा एथलीट 'मनप्रीत कौर' तथा 'परविंदर सिंह' ने अपनी-अपनी संघर्ष यात्रा से लोगों को अवगत कराया। इसी दिन वाणी प्रकाशन द्वारा आयोजित पुस्तक लोकार्पण में कुमार विश्वास ने अपनी प्रकाशित और आगामी पुस्तकों के विषय में जानकारी दी तथा हॉल नं० 8 के प्रथम तल स्थित ऑडिटोरियम में समदर्शी प्रकाशन नें भी मालती मिश्रा 'मयंती' की पुस्तक 'इंतजार' अतीत के पन्नों से' (कहानी-संग्रह) के साथ अपनी सात पुस्तकों का लोकार्पण किया।
साहित्य तक अधिकाधिक लोगों की पहुँच को सस्ता व सुगम बनाने के लिए इस बार टिकटों की दरें घटाई गई हैं तथा सुगमता को ध्यान में रखते हुए प्रगति मैदान के सभी एंट्री गेट के साथ-साथ दिल्ली के 50 चयनित मेट्रो स्टेशन पर टिकट उपलब्ध कराए गए हैं। अब लोगों को एंट्री की टिकट के लिए लंबी लाइन लगाने की आवश्यकता नहीं होती, यही कारण है कि गेट पर अधिकाधिक भीड़-भाड़ और शोरगुल नजर नहीं आता।
2019 का यह विश्व पुस्तक मेला बेहद आकर्षक और साहित्य प्रेमियों के लिए संतोषजनक और उल्लासपूर्ण होने के बाद भी यदि विगत वर्षों से तुलना करें तो आंशिक रूप फीकापन अवश्य है जिसका मुख्य कारण जगह की कमी है। प्रगति मैदान में काफी स्थान इस समय निर्माणाधीन होने के कारण पुस्तक मेले को इस वर्ष कम स्थान मिल पाया जिसके कारण हर वर्ष लगने वाले नक्षत्र के स्टॉल कहीं नजर नहीं आए इसलिए इससे जुड़ी सामग्रियों में रुचि रखने वालों को थोड़ी निराशा अवश्य हुई फिरभी साहित्य प्रेमियों की संतुष्टि के लिए यहाँ प्रचुर मात्रा में हर प्रकार की सामग्री उपलब्ध है।

मालती मिश्रा 'मयंती'