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Wednesday, 29 May 2019

पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी शिलांग द्वारा सम्मानित मालती मिश्रा 'मयंती'


विगत 24-26 मई 2019 को मुझे  'पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी शिलांग' द्वारा आयोजित साहित्यिक सम्मेलन में हिस्सा लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। दिल्ली से लगभग 2224 किलोमीटर दूर शिलांग जाकर इस सम्मेलन में हिस्सा लेना मेरे लिए बेहद रोचक, ज्ञानवर्धक व यादगार रहा। वहाँ मुझे (मालती मिश्रा 'मयंती') 'डॉ० महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान' से सम्मानित किया गया।
हिन्दी भाषा के विकास की दिशा में अग्रसर 'पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी शिलांग' द्वारा मौपट स्थित सीमा सुरक्षा बल (सीसुब) की 11 वीं वाहिनी के सेक्टर मुख्यालय के हॉल में  आयोजित अखिल भारतीय स्तर का 23 वाँ त्रिदिवसीय 'राष्ट्रीय हिन्दी विकास सम्मेलन' 24 मई 2019 से प्रारंभ होकर 26 मई 2019 को संपन्न हुआ। इस त्रिदिवसीय कार्यक्रम की समस्त व्यवस्था अकादमी के सचिव डॉ० अकेला भाई के नेतृत्व में किया गया, जिसमें देश के लगभग 18 से 20 राज्यों से लगभग 100 से 120 हिन्दी साहित्यसेवियों, लेखकों, कवियों ने हिस्सा लिया। श्रीमती उर्मि कृष्ण (शुभ तारिका अंबाला छावनी) के निर्देशन तथा अकादमी के अध्यक्ष डॉ. विमल बजाज की अध्यक्षता में इसका सफल आयोजन संपन्न हुआ। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि मौपट सेक्टर मुख्यालय के उप महानिरीक्षक श्री अवतार सिंह शाही थे तथा विशिष्ट अतिथि श्री शंकरलाल गोयंका (जीवनराम मुंगी देवी गोयंका चैरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टी प्रभारी), सीसुब मौपट के समादेष्टा कुलदीप सिंह और समाजसेवी श्री पुरुषोत्तम दास चोखानी की उपस्थिति में तीन दिनों का यह साहित्यिक और पर्यटन का भव्य आयोजन हुआ।
प्रथम दिवस आयोजन हॉल के द्वार पर सभी प्रतिभागियों का वहाँ की परंपरा के अनुसार टीका लगाकर, हाथ में पारंपरिक धागा बाँधकर व पटका (पारंपरिक दुपट्टा) डालकर स्वागत किया गया। अपराह्न तीन बजे दीप प्रज्ज्वलन तथा सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। मुख्य अतिथि श्री अवतार सिंह शाही ने उपस्थित साहित्यकारों को संबोधित करते हुए कहा कि "जवान मातृभूमि की रक्षा तथा साहित्यकार मातृभाषा व राष्ट्रभाषा के संरक्षण व विकास का कार्य करता है। गैर हिन्दी भाषी क्षेत्र में आयोजित इस सम्मेलन में अगले दो दिनों तक हिन्दी भाषा के विकास के लिए जो मंथन चलने वाला है निश्चय उससे अमृत निकलेगा जो हिन्दी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेगा।" उन्होंने देशभर से आए हिन्दी सेवियों के बीच हिस्सा लेने का अवसर प्रदान करने के लिए आभार व्यक्त किया तथा अपनी ओर से पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। अकादमी के अध्यक्ष बजाज जी ने बताया कि उनकी संस्था विगत 29 वर्षों से हिन्दी भाषा के विकास के लिए कार्य कर रही है और इस क्षेत्र में उन्हें काफी सफलता मिली है। कार्यक्रम के दौरान कई पुस्तकों का लोकार्पण किया गया तथा साहित्यकारों को असमिया शॉल, जापी, प्रशस्तिपत्र तथा मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया। देश के विभिन्न क्षेत्रों में हिन्दी भाषा की स्थिति तथा विकास हेतु क्या किया जाना चाहिए इस विषय पर चर्चाएँ तथा देर रात तक विभिन्न क्षेत्रों से आए कवियों का काव्यपाठ हुआ। दूसरे दिन भी कार्यक्रम के दौरान परिचर्चाएँ, काव्यपाठ, साहित्यकारों का सम्मान सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ जिसमें विभिन्न प्रदेशों के पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किए गए। तीसरे दिन (रविवार) को पर्यटन शिविर का आयोजन हुआ जिसमें देश भर से आए साहित्यकारों को शिलोंग के एलीफैंट फॉल्स तथा चेरापूंजी के मावसमाई केव, थारखरांग पार्क व ईको पार्क जैसे विभिन्न पर्यटन स्थलों का अवलोकन कराया गया। मेघालय के खासी हिल्स की प्राकृतिक सौंदर्य ने सभी को आकर्षित किया। इस पर्यटन का मुख्य उद्देश्य देश के विभिन्न राज्यों के साहित्यकारों को मेघालय की प्राकृतिक उपलब्धियों और यहाँ की संस्कृति व परंपराओं से परिचित कराना था। कुछ साहित्यकारों ने स्थानीय निवासियों से बातचीत की तथा उनकी दैनिक क्रियाओं, रहन-सहन, खान-पान व परंपराओं की जानकारी प्राप्त की। अकादमी हिन्दी भाषा के विकास के लिए पूरे समर्पण के साथ अग्रसर है, अकादमी के सचिव डॉ० अकेला भाई के अनुसार आयोजन का यह तीसरा दिवस एक प्रदेश के लोगों को दूसरे प्रदेश के लोगों से परिचित करवाता है जिससे दूर-दराज तक पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति की पहचान बनती है।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️ 

Saturday, 18 May 2019

थैंक यु, मि. गोडसे...

( ले० डॉ. शंकर शरण )

नाथूराम गोडसे के नाम और उनके एक काम के अतिरिक्त लोग उन के बारे में कुछ नहीं जानते। एक लोकतांत्रिक देश में यह कुछ रहस्यमय बात है। रहस्य का आरंभ 8 नवंबर 1948 को ही हो गया था, जब गाँधीजी की हत्या के लिए चले मुकदमे में गोडसे द्वारा दिए गए बयान को प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। गोडसे का बयान लोग जानें, इस पर प्रतिबंध क्यों लगा?

इस का कुछ अनुमान जस्टिस जी.डी. खोसला, जो गोडसे मुकदमे की सुनवाई के एक जज थे, की टिप्पणी से मिल सकता है। अदालत में गोडसे ने अपनी बात पाँच घंटे लंबे वक्तव्य के रूप में रखी थी, जो 90 पृष्ठों का था। जब गोडसे ने बोलना समाप्त किया तब का दृश्य जस्टिस खोसला के शब्दों में... “सुनने वाले स्तब्ध और विचलित थे। एक गहरा सन्नाटा था, जब उसने बोलना बंद किया। महिलाओं की आँखों में आँसू थे और पुरुष भी खाँसते हुए रुमाल ढूँढ रहे थे।… मुझे कोई संदेह नहीं है, कि यदि उस दिन अदालत में उपस्थित लोगों की जूरी बनाई जाती और गोडसे पर फैसला देने कहा जाता तो उन्होंने भारी बहुमत से गोडसे के ‘निर्दोष’ होने का फैसला दिया होता।” ("द मर्डर ऑफ महात्मा एन्ड अदर केसेज फ्रॉम ए जजेस नोटबुक, पृ. 305-06)

यही नहीं, तब देश के कानून मंत्री डॉ. अंबेडकर थे। उन्होंने गोडसे के वकील को संदेश भेजा कि यदि गोडसे चाहें तो वे उन की सजा आजीवन कारावास में बदलवा सकते हैं। गाँधीजी वाली अहिंसा दलील के सहारे यह करवाना सरल था। किंतु गोडसे ने आग्रह पूर्वक मना कर, उलटे डॉ. अंबेदकर को लौटती संदेश यह दिया, “कृपया सुनिश्चित करें कि मुझ पर कोई दया न की जाए। मैं अपने माध्यम से यह दिखाना चाहता हूँ कि गाँधी की अहिंसा को फाँसी पर लटकाया जा रहा है।”

गोडसे का यह कथन कितना लोमहर्षक सच साबित हुआ, यह भी यहाँ इतने निकट इतिहास का एक छिपाया गया तथ्य है!

गाँधीजी की हत्या के बाद गाँधी समर्थकों ने बड़े पैमाने पर गोडसे की जाति-समुदाय की हत्याएं की। गाँधी पर लिखी, छपी सैकड़ों जीवनियों में कहीं यह तथ्य नहीं मिलता कि कितने चितपावन ब्राह्मणों को गाँधीवीदियों ने मार डाला था।

31 दिसंबर 1948 के "न्यूयॉर्क टाइम्स" में प्रकाशित समाचार के अनुसार, केवल बंबई में गाँधीजी की हत्या वाले एक दिन में ही 15 लोगों को मार डाला गया था। पुणे के स्थानीय लोग आज भी जानते हैं कि वहाँ उस दिन कम से कम 50 लोगों को मार डाला गया था। कई जगह हिंदू महासभा के दफ्तरों को आग लगाई गई। चितपावन ब्राह्मणों पर शोध करने वाली अमेरिकी अध्येता मौरीन पैटरसन ने लिखा है कि सबसे अधिक हिंसा बंबई, पुणे, नागपुर आदि नहीं, बल्कि सतारा, बेलगाम और कोल्हापुर में हुई। तब भी सामुदायिक हिंसा की रिपोर्टिंग पर कड़ा नियंत्रण था। अतः, मौरीन के अनुसार, उन हत्याओं के दशकों बीत जाने बाद भी उन्हें उन पुलिस फाइलों को देखने नहीं दिया गया, जो 30 जनवरी 1948 के बाद चितपावन ब्राह्मणों की हत्याओं से संबंधित थीं।

इस प्रकार, उस ‘गाँधीवादी हिंसा’ का कोई हिसाब अब तक सामने नहीं आने दिया गया है, जिस में असंख्य निर्दोष चितपावन ब्राह्मणों को इसलिए मार डाला गया था क्योंकि गोडसे उसी जाति के थे। निस्संदेह, राजनीतिक जीवन में गाँधीजी के कथित अहिंसा सिद्धांत के भोंडेपन का यह एक व्यंग्यात्मक प्रमाण था! चाहे, कांग्रेसी शासन और वामपंथी बौद्धिकों ने इन तथ्यों को छिपाकर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा किया।

कडवा सच तो यह है कि गोडसे ने गाँधीजी की हत्या करके उन्हें वह महानता प्रदान करने में केंद्रीय भूमिका निभाई, जो सामान्य मृत्यु से उन्हें मिलने वाली नहीं थी। स्वतंत्रता से ठीक पूर्व और बाद देश में गाँधी का आदर कितना कम हो गया था, यह 1946-48 के अखबारों के पन्नों को पलट कर सरलता से देख सकते हैं। नोआखली में गाँधी के रास्ते में पर लोगों ने टूटे काँच बिछा दिए थे। ऐसी वितृष्णा अकारण न थी। देश विभाजन रोकने के लिए गाँधी ने अनशन नहीं किया, और अपना वचन (‘विभाजन मेरी लाश पर होगा’) तोड़ा, यह तो केवल एक बात थी।

पश्चिमी पंजाब से आने वाले हजारों हिंदू-सिखों को उलटे जली-कटी सुनाकर गाँधी उनके घावों पर नमक छिड़कते रहते थे। दिल्ली की दैनिक प्रार्थना-सभा में गाँधी उन अभागों को ताने देते थे, कि वे जान बचाकर यहाँ क्यों चले आये, वहीं रहकर मर जाते तो अहिंसा की विजय होती, आदि। फिर, विभाजन रोकने या पाकिस्तान में हिंदू-सिखों की जान को तो गाँधीजी ने अनशन नहीं किया; किन्तु भारत पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपये दे, इसके लिए गाँधीजी ने जनवरी 1948 में अनशन किया था! तब कश्मीर पर पाकिस्तानी हमला जारी था, और गाँधीजी के अनशन से झुककर भारत सरकार ने वह रकम पाकिस्तान को दी। यह विश्व-इतिहास में पहली घटना थी जब किसी आक्रमित देश ने आक्रमणकारी को, यानी अपने ही विरुद्ध युद्ध को वित्तीय सहायता दी!

गोडसे द्वारा गाँधीजी को दंड देने के निश्चय में उस अनशन ने निर्णायक भूमिका अदा की। तब देश में लाखों लोग गाँधीजी को नित्य कोस रहे थे। पाकिस्तान से जान बचाकर भागे हिन्दू-सिख गाँधी से घृणा करते थे। वही स्थिति कश्मीरी और बंगाली हिन्दुओं की थी। ‘हिंद पॉकेट बुक्स’ के यशस्वी संस्थापक दीनानाथ मल्होत्रा ने अपनी संस्मरण पुस्तक ‘भूली नहीं जो यादें’ (पृ. 168) में उल्लेख किया है कि जब गाँधीजी की हत्या की पहली खबर आई, तो सब ने स्वतः मान लिया कि किसी पंजाबी ने ही उन्हें मारा।

फिर, उन लाखों बेघरों, शरणार्थियों के सिवा पाकिस्तान में हिन्दुओ का जो कत्लेआम हुआ, और जबरन धर्मांतरण कराए गए, उस पर भारत में दुःख, आक्रोश और सहज सहानुभूति थी। यह सब गाँधीजी के प्रति क्षोभ में भी व्यक्त होता था। विशेषकर तब, जब वे पंजाबी हिन्दुओं, सिखों को सामूहिक रूप से मर जाने का उपदेश देते हुए यहाँ मुसलमानों (जो वैसे भी असंगठित, अरक्षित, भयाक्रांत नहीं थे जैसे पाकिस्तान में हिन्दू थे। नहीं तो वे यहीं रह न सके होते) और उनकी संपत्ति की रक्षा के लिए सरकार पर कठोर दबाव बनाए हुए थे।

इस तरह, दुर्बल को अपने हाल पर छोड़ कर गाँधी सबल की रक्षा में व्यस्त थे! यह पूरे देश के सामने तब आइने की तरह स्पष्ट था। अतः उस समय की संपूर्ण परिस्थिति का अवलोकन करते हुए यह बात वृथा नहीं कि, यदि गाँधीजी प्राकृतिक मृत्यु पाते, तो आज उन का स्थान भारतीय लोकस्मृति में बालगंगाधार तिलक, जयप्रकाश नारायण, आदि महापुरुषों जैसा ही कुछ रहा होता। तीन दशक तक गाँधी की भारतीय राजनीति में अनगिनत बड़ी-बड़ी विफलताएं जमा हो चुकी थीं। खलीफत-समर्थन से लेकर देश-विभाजन तक, मुस्लिमों को ‘ब्लैंक चेक’ देने जैसे नियमित सामुदायिक पक्षपात और अपने सत्य-अहिंसा-ब्रह्मचर्य सिद्धांतों के विचित्र, हैरत भरे, यहाँ तक कि अनेक निकट जनों को धक्का पहुँचाने वाले कार्यान्वयन से बड़ी संख्या में लोग गाँधीजी से वितृष्ण हो चुके थे। लेकिन गोडसे की गोली ने सब कुछ बदल कर रख दिया। इसलिए भक्त गाँधीवादियों को तो गोडसे का धन्यवाद करते हुए, बतर्ज अनिल बर्वे, “थैंक यू, मिस्टर गोडसे!” जैसी भावना रखनी चाहिए।

गोडसे ने चाहे गाँधी को दंड देने का लिए गोली मारी, लेकिन वस्तुतः उसी नाटकीय अवसान से गाँधीजी को वह महानता मिल सकी, जो वैसे संभवतः न मिली होती। भारत में नेहरूवादी और मार्क्सवादी इतिहासकारों द्वारा घोर इतिहास-मिथ्याकरण का एक अध्याय यह भी है कि लोग गोडसे के बारे में कुछ नहीं जानते! यहाँ तक कि गाँधी-आलोचकों की लिस्ट में भी गोडसे का उल्लेख नहीं होता। इसी विषय पर लिखी इतिहासकार बी. आर. नंदा की पुस्तक, "गाँधी एन्ड हिज क्रिटिक्स" (1985) में भी गोडसे का नाम नहीं, जबकि गोडसे का 90 पृष्ठों का वक्तव्य, जो 1977 के बाद पुस्तिका के रूप में प्रकाशित होता रहा है, गाँधीजी के सिद्धांतों और कार्यों की एक सधी आलोचना है। लेकिन 67 वर्ष बीत गए, गोडसे की उस आलोचना का किसी भारतीय ने उत्तर नहीं दिया। न उस की कोई समीक्षा की गई। यदि गोडसे की बातें प्रलाप, मूर्खतापूर्ण, अनर्गल, आदि होतीं, तो उन्हें प्रकाशित करने पर प्रतिबंध नहीं लगा होता! लोग उसे स्वयं देखते, समझते कि गाँधीजी की हत्या करने वाला कितना मूढ़, जुनूनी या सांप्रदायिक था। पर स्थिति यह है कि विगत 38 वर्ष से गोडसे का वक्तव्य उपलब्ध रहने पर भी एक यूरोपीय विद्वान (कोएनराड एल्स्ट, "गांधी एंड गोडसेः ए रिव्यू एंड ए क्रिटीक" 2001) के अतिरिक्त किसी भारतीय ने उस की समीक्षा नहीं की है। क्यों?

संभवतः इसीलिए, क्योंकि उसे उपेक्षित तहखाने में दबे रहना ही प्रभावी राजनीति के लिए सुविधाजनक था। गोडसे की अनेक बातें संपूर्ण समकालीन सेक्यूलर भारतीय राजनीति की भी आलोचना हो जाती है। इस अर्थ में वह आज भी प्रासंगिक है। यह भी कारण है कि यहाँ राजनीतिक रूप से प्रभावी इतिहासकारों, बुद्धिजीवियों ने उसे मौन की सेंसरशिप से अस्तित्वहीन-सा बनाए रखा है। अन्यथा कोई कारण नहीं कि एक ऐतिहासिक दस्तावेज का कहीं उल्लेख न हो। न इतिहास, न राजनीति में उस का अध्ययन, विश्लेषण किया जाए। यह चुप्पी सहज नहीं है। यह न्याय नहीं है।

इस सायास चुप्पी का कारण यही प्रतीत होता है कि किसी भी बहाने यदि गोडसे के वक्तव्य को नई पीढ़ी पढ़े, और परखे, तो आज भी भारी बहुमत से लोगों का निर्णय वही होगा, जो जस्टिस खोसला ने तब अदालत में उपस्थित नर-नारियों का पाया था। तब गोडसे को ‘हिन्दू सांप्रदायिक’ या ‘जुनूनी हत्यारा’ कहना संभव नहीं रह जाएगा।

वस्तुतः नाथूराम गोडसे के जीवन, चरित्र और विचारों का समग्र मूल्यांकन करने से उन का स्थान भगत सिंह और ऊधम सिंह की पंक्ति में चला जाएगा। तीनों देश-भक्त थे। तीनों को राजनीतिक हत्याओं के लिए फाँसी हुई। तीनों ने अपने-अपने शिकारों को करनी का ‘दंड’ दिया, जिस से सहमति रखना जरूरी नहीं। मगर तीनों की दृष्टि में एक समानता तो है ही। भगत सिंह ने पुलिस की लाठी से लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए 17 दिसंबर 1928 को अंग्रेज पुलिस अधीक्षक जॉन साउंडर्स की हत्या की। ऊधम सिंह ने जलियाँवाला नरसंहार करने वाले कर्नल माइकल डायर को 13 मार्च 1940 को गोली मार दी। उसी तरह, नाथूराम गोडसे ने भी गाँधी को देश का विभाजन, लाखों हिन्दुओं-सिखों के साथ विश्वासघात, उन के संहार व विध्वंस तथा हानिकारक सामुदायिक राजनीति करने का कारण मानकर उन्हें 30 जनवरी 1948 को गोली मारी थी।

आगे की तुलना में भी, जैसे अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह और ऊधम सिंह को हत्या का दोषी मानकर उन्हें फाँसी दी, उसी तरह भारत सरकार ने भी नाथूराम गोडसे को फाँसी दी। तीनों के कर्म, तीनों की भावनाएं, तीनों का जीवन-चरित्र मूलतः एक जैसा है। इस सचाई को छिपाया नहीं जाना चाहिए।

उक्त निष्कर्ष डॉ. लोहिया के विचारों से भी पुष्ट होता है। देश का विभाजन होने पर लाखों लोग मरेंगे, यह गाँधीजी जानते थे, फिर भी उन्होंने उसे नहीं रोका। बल्कि नेहरू की मदद करने के लिए खुद कांग्रेस कार्य-समिति को विभाजन स्वीकार करने पर विवश किया जो उस के लिए तैयार नहीं थी। इसे लोहिया ने गाँधी का ‘अक्षम्य’ अपराध माना है। तब इस अपराध का क्या दंड होता?

संभवतः सब से अच्छा दंड गाँधी को सामाजिक, राजनीतिक रूप से उपेक्षित करना, और अपनी सहज मृत्यु पाने देना होता। पर, अफसोस!

डॉ. लोहिया के शब्दों पर गंभीरता से विचार करें – विभाजन से दंगे होंगे, ऐसा तो गाँधीजी ने समझ लिया था, लेकिन “जिस जबर्दस्त पैमाने पर दंगे वास्तव में हुए, उसका उन्हें अनुमान न था, इस में मुझे शक है। अगर ऐसा था, तब तो उन का दोष अक्षम्य हो जाता है। दरअसल उन का दोष अभी भी अक्षम्य है। अगर बँटवारे के फलस्वरूप हुए हत्याकांड के विशाल पैमाने का अन्दाज उन्हें सचमुच था, तब तो उन के आचरण के लिए कुछ अन्य शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ेगा।” ("गाँधीजी के दोष")

ध्यान दें, सौजन्यवश लोहिया ने गाँधी के प्रति उन शब्दों का प्रयोग नहीं किया जो उन के मन में आए होंगे। किंतु वह शब्द छल, अज्ञान, हिन्दुओं के प्रति विश्वासघात, बुद्धि का दिवालियापन, जैसे ही कुछ हो सकते हैं। इसलिए, जिस भावनावश गोडसे ने गाँधीजी को दंडित किया वह उसी श्रेणी का है जो भगतसिंह और ऊधम सिंह का था। इस कड़वे सत्य को भी लोहिया के सहारे वहीं देख सकते हैं। लोहिया के अनुसार, “देश का विभाजन और गाँधीजी की हत्या एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक पहलू की जाँच किए बिना दूसरे की जाँच करना समय की मूर्खतापूर्ण बर्बादी है।” यह कथन क्या दर्शाता है? यही, कि वैसा न करके क्षुद्र राजनीतिक चतुराई की गई। तभी तो जिस किसी को ‘गाँधी के हत्यारे’ कहकर निंदित किया जाता है, जबकि विभाजन की विभीषिका से उस हत्या के संबंध की कभी जाँच नहीं होती। क्योंकि जैसे ही यह जाँच होगी, जिसे लोहिया ने जरूरी माना था, वैसे ही गोडसे का वही रूप सामने होगा जो उन्हें भगत सिंह और ऊधम सिंह के सिवा और किसी श्रेणी में रखने नहीं देगा। इस निष्कर्ष से गाँधी-नेहरूवादी तथा दूसरे भी मतभेद रख सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे असंख्य अंग्रेज लोग भगत सिंह और ऊधम सिंह से रखते ही रहे हैं। आखिर वे तो हमारे भगत सिंह और ऊधम सिंह को पूज्य नहीं मानते! लेकिन वे दोनों ही भारतवासियों के लिए पूज्य हैं। ठीक उसी तरह, यदि हिंदू महासभा या कोई भी हिन्दू नाथूराम गोडसे को सम्मान से देखता है और उन्हें सम्मानित करना चाहता है तो इसे सहजता से लेना चाहिए।

आखिर, भगत सिंह या ऊधम सिंह के प्रति भी हमारा सम्मान उन के द्वारा की गई हत्याओं का सम्मान नहीं है। वह एक भावना का सम्मान है, जो सम्मानजनक थी। अतः नाथूराम गोडसे के प्रति किसी का आदर भी देश-भक्ति, राष्ट्रीय आत्मसम्मान और न्याय भावना का ही आदर भी हो सकता है। जिन्हें इस संभावना पर संदेह हो, वे गोडसे का वक्तव्य एक बार आद्योपांत पढ़ने का कष्ट करें।

अभिव्यक्ति का अधिकार

अभिव्यक्ति का अधिकार
स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक होने के नाते हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी प्राप्त है और सभी इस स्वतंत्रता का अपने-अपने ढंग से भरपूर लाभ भी उठाते हैं। स्वतंत्रता केवल मनुष्य मात्र के लिए नहीं अपितु समस्त जीवधारियों के लिए वरदान समान है, फिर चाहे वह विचाराभिव्यक्ति की हो या जीवन जीने की। परतंत्रता कब किसी को रास आई है चाहे वह मनुष्य हों या पशु-पक्षी। जैसा कि शिवमंगल सिंह 'सुमन' जी ने अपनी कविता में भी लिखा है कि..
"हम पंछी उन्मुक्त गगन के,
पिंजरबद्ध न गा पाएँगे।
कनक तीलियों से टकराकर,
पुलकित पंख टूट जाएँगे।"

परतंत्रता के व्यंजनों में वह स्वाद कहाँ जो स्वतंत्रता की रूखी-सूखी रोटी में है। हर प्राणी अपने हिस्से की आजादी और अधिकार चाहता है और वह तभी सुखी व प्रसन्न रह पाता है जब वह अपने अधिकारों का भरपूर प्रयोग करता है, जब किसी क्षेत्र में वह अपने अधिकार बंदिश में  महसूस करता है तो व्यक्ति को अपना जीवन दुरुह प्रतीत होने लगता है। ऐसा तभी होता है जब एक व्यक्ति या वर्ग के अधिकारों पर दूसरे व्यक्ति या वर्ग का वर्चस्व हावी होने लगता है। छोटे-छोटे कीट-पतंगे हों या सर्व शक्ति सम्पन्न मानव सभी अपने से कमजोर पर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहते हैं इसीलिए अनुशासन बनाए रखने हेतु नियम व कानून बनते हैं ताकि किसी एक की आजादी दूसरे के लिए अभिशाप न बने और सभी को समान अधिकार प्राप्त हो सके किन्तु आजकल अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर प्राप्त अधिकारों का इतना अधिक दुरुपयोग हो रहा है कि अधिकतर इसका विकृत रूप ही दृश्यमान होता है। अभिव्यक्ति के नाम पर देश विरोधी नारे लगाना, देश के द्वितीय सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति को निम्नतम स्तर तक जाकर गालियाँ देना, कहाँ तक उचित है? क्या ऐसी अभिव्यक्ति को आजादी मिलनी चाहिए। फिर देश की आम जनता को कष्ट तब होता है जब आम नागरिक की छोटी सी गलती के लिए उसे वही कानून सजा देता है जो कानून देश विरोधी नारों और कृत्यों के लिए उनकी अभिव्यक्ति की आजादी बताकर उन्हें छोड़ देता है। मुझे आज भी याद है जब कुछ वर्ष पहले महाराष्ट्र में एक लड़की और उसकी मित्र को इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया था क्योंकि उसने वहाँ के जाने-माने नेता के लिए घोषित अवकाश के विरोध में सोशल मीडिया में कुछ लिखा था और उसकी मित्र ने समर्थन स्वरूप लाइक किया था। तब वहाँ की पुलिस ने जबरन उन्हें गिरफ्तार कर लिया था और अब हमारे देश की राजधानी दिल्ली में देश के खिलाफ नारे लगाए जाते हैं पर पुलिस चार्जशीट तक तैयार नहीं कर पाती क्योंकि अभिव्यक्ति का अधिकार बताकर राज्य सरकार उसको अनुमति नहीं देती। विरोधी पार्टियों के नेता प्रधानमंत्री को गालियाँ देते हैं क्योंकि उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी है परंतु कानून उनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठा सकता क्योंकि गालियाँ देने वाले आम नागरिक नहीं हैं तो क्या संविधान ओहदा, रुतबा व खानदान देखकर परिवर्तित होता रहता है? अभी चंद वर्ष पूर्व अखलाक नामक एक विशेष धर्म के व्यक्ति की हत्या किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति के द्वारा कर दी जाती है तो संविधान के पूजकों द्वारा, कुछ कलम के पुजारियों द्वारा और कुछ अन्य बुद्धिजीवियों तथा मीडिया के द्वारा सिर्फ अपने ही देश में नहीं बल्कि अन्य दूसरे देशों में भी हमारे देश को असहिष्णु घोषित कर दिया गया जबकि अभी कुछ दिन पहले ही उसी विशेष संरक्षण प्राप्त वर्ग के लोगों के द्वारा पहले तो एक लड़की को उसके ही घर के पास छेड़ा जाता है फिर पिता के द्वारा अपनी पुत्री की सुरक्षा की कोशिश में पिता और भाई को चाकुओं से निर्ममता पूर्वक गोद दिया जाता है जिसमें पिता की मृत्यु हो जाती है। ...अब सभी शांति हैं.. न मीडिया चीख रही, न बुद्धिजीवियों की बुद्धि जागी, न साहित्यकारों के पास वापसी के लिए कोई अवॉर्ड बचे, न ही उनकी कलमों में स्याही बची...।।।आखिर क्यों????
क्योंकि इस बार पीड़ित आपके चहेते आपके द्वारा सुरक्षित वर्ग का नहीं या फिर इसलिए क्योंकि अपराधी आपके द्वारा सुरक्षित वर्ग के हैं???
कारण जो भी हो पर सवाल यही उठता है कि संविधान कहाँ है? किसके लिए है?
अभी आज ही टी.वी. पर समाचार देखा कि पश्चिम बंगाल के एस.आई.टी. अधिकारी राजीव को शारदा चिटफंड घोटाले के मामले में सी.बी.आई. गिरफ्तार करना चाहती थी तो वहाँ की मुख्यमंत्री ही गिरफ्तारी के विरोध में धरने पर बैठ गईं और उनकी माँग पर संविधान की रक्षक न्यायालय ने न सिर्फ गिरफ्तारी पर रोक लगाई बल्कि उसे सुरक्षा भी प्रदान किया। एक ऐसा व्यक्ति जो शक के घेरे में हो उसको बचाने के लिए मुख्यमंत्री खुलेआम धरना-आंदोलन आदि करने लगे तो इससे क्या यह विश्वास नहीं हो जाता कि असली गुनहगार कौन है! खैर जब सुनवाई के दौरान सुप्रीमकोर्ट को राजीव की गिरफ्तारी आवश्यक लगी तब भी इसी सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा उसे सात दिन का अवसर दिया जाता है कि वह अग्रिम जमानत ले ले ताकि उसकी गिरफ्तारी न हो सके...यदि यहाँ राजीव की जगह कोई आम नागरिक होता तो देश का यह सर्वोच्च न्यायालय उस आम नागरिक को भी यह अवसर देता कि वह अपने लिए अग्रिम जमानत ले ले... नहीं, तब हमारा संविधान कुछ और कहता। कई निरपराधों को सिर्फ शिकायत के बाद कई दिनों तक हवालात में घुटते देखा है। परंतु ये ओहदे व रसूखदारों का संविधान भी गिरगिट की तरह रंग बदलता है।
पश्चिम बंगाल में ही अभी हाल ही में चुनावों की गहमागहमी में किसी भाजपा कार्यकर्ता के द्वारा वहाँ की मुख्यमंत्री का चेहरा प्रियंका चोपड़ा के चेहरे की जगह लगाकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया जाता है जिसके लिए उस कार्यकर्ता को गिरफ्तार करवा दिया जाता है जबकि वही मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री को न जाने कितने अपशब्द कहती हैं जो उनके पद की गरिमा को धूमिल करते हैं पर उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होती क्योंकि उनका ओहदा उस कार्यकर्ता के ओहदे से बड़ा है..!! इसलिए अभिव्यक्ति की आजादी उन्हें ज्यादा है..!!! अपने देश में जब संविधान के रक्षक न्यायालय का ये दुहरा रवैया देखने को मिलता है तब मन खिन्न हो जाता है और संविधान व न्यायपालिका रसूखवालों के हाथ की कठपुतली मात्र नजर आता है।
जाने-माने लेखक श्री यशपाल जी द्वारा लिखित 'दुख का अधिकार' में जिस तरह उन्होंने दर्शाया है कि दुख मनाने का अधिकार भी उसी के पास है जो रसूखवाला है, निर्धन तो किसी अपने को खोने का दुख भी नहीं मना सकता। उसी प्रकार संविधान भी इतना लचर है कि यह रसूख देख रंग बदलता है या यूँ कहें कि संविधान स्वतंत्र नहीं बल्कि रसूख वालों के हाथ की कठपुतली है, तो गलत न होगा, जहाँ जिसका आधिपत्य होगा वहाँ उसी के अनुसार कानून चलेगा।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

Tuesday, 14 May 2019

जोकर


तुम सब जैसा मानव मैं पर,
अपनी कोई पहचान नहीं।
जोकर बन सभी हँसाता हूँ,
अपने भावों को दबा कहीं।

दिल में बहता गम का सागर,
होंठों पर हँसी जरूरी है।
तन्हा छिप-छिपकर रोते हैं,
बाहर हँसना मजबूरी है।

जोकर बन खुशियाँ बाँटी हैं,
दुहरा जीवन हम जीते हैं।
यूँ बूँद-बूँद रिसते गम को,
हम घूँट-घूँट कर पीते हैं।

पहना चेहरे पर चेहरा,
अपना चेहरा छिपाते हैं।
हिय दर्द भरा घन उमड़े जब,
हम नव खुशियाँ बरसाते हैं।

चित्र साभार.. गूगल से
©मालती मिश्रा 'मयंती'✍️


Sunday, 12 May 2019

माँ तू कितनी प्यारी है

माँ तू कितनी प्यारी है

हे मात तुझे शत-शत वंदन,
शब्दों से करती अभिनंदन।
गर पा जाऊँ एक अवसर मैं,
कर दूँ तुझ पर जीवन अर्पण।
अपनी सारी ममता माँ ने,
निज बच्चों पर वारी है।
माँ तू कितनी भोली है,
माँ तू कितनी प्यारी है।

बच्चों का बचपन माँ से है,
गोद में दुनिया समाई है।
हर मुश्किल में खड़ी रही,
माँ तू बनकर परछाई है।
इस कच्चे मन के अंतस को,
देकर संस्कार सजाया है।
इंसानों की भीड़ में मुझको,
मुझसे परिचित करवाया है।
माँ तेरी ही ममता से तो,
खुशियों की किलकारी है।
माँ तू कितनी भोली है,
माँ तू कितनी प्यारी है।

देती है हरपल ज्ञान हमें,
हर अच्छा-बुरा बताती है।
बनकर पहली गुरु बच्चों की,
जीवन का पाठ पढ़ाती है।
शीत में मीठी धूप है माँ,
खुशियों की फुलवारी है।
माँ तू कितनी भोली है,
माँ तू कितनी प्यारी है।

उँगली पकड़ चलना सीखा,
निज पैरों पर मैं खड़ी हुई।
तेरी ममता की छाया में,
मैं ना जाने कब बड़ी हुई।
अच्छी हूँ या कि बुरी हूँ माँ,
हूँ झूठी या फिर सच्ची हूँ।
दुनिया की नजर में बड़ी हुई,
पर आज भी तेरी बच्ची हूँ।
मेरे सब स्वप्न सजाने को,
अपनी नींदें वारी है।
माँ तू कितनी भोली है,
माँ तू कितनी प्यारी है।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

Saturday, 11 May 2019

माँ

माँ...
आज तुम्हारी बहुत
याद आ रही है
अपने इस सूने
जीवन में
तुम्हारी कमी
बहुत सता रही है
क्या खता थी मेरी
आखिर
मैं भी तो तुम्हारी
जाई थी
क्यों बेटे तो अपने
लेकिन बेटी पराई थी
चलो छोड़ो
वो दुनिया की रीत थी
ये मानकर हमने निभा लिया
पर क्यों बेटों ने
तुम पर भी
अपना आधिपत्य जमा लिया
जिस आँगन में खनकती
थी हँसी मेरी
आधा जीवन बीता था
उस आँगन से मेरी
तुलसी भी माँ
क्यों बेटों ने तेरे हटा दिया
जब तक थीं तुम
मैं आती थी
झूठा ही सही
पर थोड़ा तो
अपना अधिकार जताती थी
पर तुम भी निष्ठुर हो गईं
मुझसे मुख अपना मोड़ लिया
निर्दय दुनिया में क्यों माँ
अकेली मुझको छोड़ दिया
सच कहूँ तो अब लगता है
कि वह घर पराया
हो गया
जन्म जहाँ पाया मैंने
वो अंजाना साया हो गया।

मालती मिश्रा 'मयंती'

Tuesday, 7 May 2019

राजनीति का गिरता स्तर

राजनीति का गिरता स्तर

चुनावी दौर में पक्ष और विपक्ष की राजनीतिक पार्टियों के द्वारा एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना अकल्पनीय नहीं है बल्कि यह एक सहज प्रक्रिया है कि अपने प्रतिद्वंदी की कमियों उसके नकारात्मक कार्यों को जनता के समक्ष लाना और अपने सकारात्मक विचारों और समाज और देश के हितार्थ योजनाओं को जनता के समक्ष रखना उसके पश्चात् निर्णय को जनता पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि वह  किसको अपना नेता चुनना चाहे या किस पार्टी के हाथ पाँच वर्ष तक देश चलाने का उत्तरदायित्व सौंपे, यही उत्तरदायित्व है राजनीतिक पार्टियों का। परंतु आजकल की राजनीति धर्मयुद्ध या कर्मयुद्ध न होकर केवल सत्तायुद्ध बनकर रह गई है। आजकल न वाणी की मर्यादा रही न ही कर्मों की मर्यादा बची बस यदि कुछ शेष है तो स्वार्थ लोलुपता और विलासिता। राजनीतिक पार्टियों में न व्यक्ति के लिए सम्मान है न व्यक्तित्व के लिए और न ही पद की गरिमा के प्रति। वर्तमान में चलने वाले चुनावी प्रचार-प्रसार को देखकर तो मन क्षुब्ध हो जाता है कि ऐसे लोगों के हाथ यदि सत्ता की बागडोर आ जाएगी तो क्या देश का अस्तित्व खतरे में नहीं आ जाएगा जो खुलेआम देशद्रोह को बढ़ावा देने के पक्ष में हों जो देश के रक्षकों का कोई मानवाधिकार न मानते हुए आतंकवादियों के मानवाधिकार के लिए लड़ते हों। जो प्रधानमंत्री के पद की गरिमा को विस्मृत कर उन्हें सरेआम गालियाँ दें, क्या ऐसे लोग इस पद पर आसीन होकर पद की गरिमा को धूमिल न कर देंगे। परंतु इससे भी अधिक सोचनीय स्थिति तब उत्पन्न होती है जब ये पार्टियाँ शत्रु देश का पक्ष सिर्फ इसलिए लेती हैं ताकि अपने देश की सरकार की छवि अपने देश के साथ-साथ विदेशी स्तर पर खराब कर सकें। उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि अपने देश की सरकार की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खराब करके अपनी छवि को सुधार लेंगे परंतु यह विचारणीय है कि जो व्यक्ति अपने देश को सम्मान नहीं दे सकता, सिर्फ सत्ता प्राप्ति के प्रयास में एक व्यक्ति विशेष का विरोध करते-करते देश के सम्मान और सुरक्षा से खेलने लगता है, क्या उसके हाथों में देश सुरक्षित होगा? एक-दूसरे को हराने के लिए हर संभव प्रयास करना गलत नहीं है परंतु यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इस प्रयास में कहीं देश की गरिमा तो धूमिल नहीं हो रही है? आजकल सत्ता का लालच इतना प्रबल हो चुका है कि इसे पाने के लिए आज सभी विपक्षी जो कभी एक-दूसरे के कट्टर शत्रु हुआ करते थे, वो आज एकमत होकर बस एक ही व्यक्ति को हराने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

चुनाव में हर राजनीतिक पार्टी के पास देश के प्रति सकारात्मक मुद्दा होना आवश्यक है ताकि वो जनता को बता सकें कि उस क्षेत्र विशेष के लिए वो क्या योजना लाए हैं किंतु वर्तमान में पार्टियों के पास यदि कुछ है तो वो है विरोधी पार्टी के लिए गालियाँ। वो जितना अधिक अपमानजनक बातें कह सकें स्वयं को उतना ही श्रेष्ठ समझते हैं। ऐसी परिस्थितियों में जनता को ही विश्लेषण करना होगा कि किस पार्टी से देश व समाज का हित हुआ है, किसने देश के प्रति कितना सम्मान दर्शाया है और स्वविवेक से ही चुनाव करना होगा। देश की जनता को ही तय करना होगा कि लालच में आकर दिल्ली की जनता की तरह फिर पाँच वर्ष पछताना है या समझदारी का परिचय देना है। 
आजकल कुछ लोग नोटा के प्रति भी रुझान दर्शा कर स्वयं को योद्धा समझने लगते हैं, कोई प्रत्याशी पसंद नहीं तो नोटा दबा दिया परंतु कभी चिंतन नहीं करते कि नोटा का बटन दबाकर किसका हित किया? जबकि समझदारी तब होती कि जब प्रत्याशी पसंद नहीं आता तो दोनों या जितने भी हैं उनका तुलनात्मक विश्लेषण कर लें और जो सबसे कम बुरा हो उसका चयन करना चाहिए, क्योंकि ये नोटा कभी-कभी सबसे अनुपयुक्त प्रत्याशी को विजेता बनाकर नोटा वालों पर ही शासन करने का अधिकार दे देता है। अतः यह जनता के ही कर्तव्य क्षेत्र में आता है कि वह समाज व देश को कैसा नेता दे? हमें अपने निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर देश के हित के विषय में सोचना होगा तभी हमारा निर्णय निष्पक्ष हो सकता है और तभी हम स्वार्थ लोलुपता में घिरे नेताओं को सही सबक सिखा सकते हैं। जनता को ही यह दिखाना होगा कि उसे मुफ्तखोरी नहीं परिश्रम और स्वाभिमान पसंद है, जनता को ही दिखाना होगा कि वह  जाति-धर्म के आधार पर नेता नहीं चुन सकती। जिस दिन हमारे देश की जनता इन सब भावनाओं से ऊपर उठकर सिर्फ देशभक्ति को सर्वोपरि रखते हुए जाति-धर्म के नाम पर तथा व्यक्तिगत लाभ के नाम पर वोट देना बंद कर देगी, उस दिन ये नेतागण भी समाज व देशहित की बातें करना सीख जाएँगे। तभी देश उन्नतिशील होगा और उन्नत देश का नागरिक स्वतः सुखी व सम्पन्न होगा, क्योंकि देश को विकसित करने के लिए नागरिकों का विकास आवश्यक है और ऐसा तभी संभव है जब जाति-धर्म, वंशवाद और स्वार्थी प्रवृत्तियों का अंत हो जाए।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

Saturday, 4 May 2019

जनता सब पहचान रही

रात दिवा जिन जिन बातों का
खुलकर विरोध करते थे,
उनकी विदेश-यात्राओं पर
तुम तंज कसा करते थे।
परिणाम मिला जब आज सुखद
सब विदेश-यात्राओं का,
विश्व आतंकी घोषित हुआ
चैन उड़ा आकाओं का।
पहले तो तुम उछले-कूदे
मन ही मन बस रोए हो,
कलपे तड़पे सिर धुन-धुनकर
चिल्लाए पछताए हो।
नहीं बनी जब बात कहीं तो
नया स्वांग रचाने लगे,
लुटेरों के पंद्रह साल की
कोशिश ये बताने लगे।
कितना ही स्वांग रचो अब तुम
जनता को भरमाने को,
जनता सब पहचान रही है
तुम्हारे ताने-बाने को।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️