रविवार

पावन उद्देश्य की पहल है- 'इनसे हैं हम'

 पावन उद्देश्य की पहल है- 'इनसे हैं हम'





हमारे देश की सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक और भौगौलिक आजादी को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाले इक्यावन गौरवशाली पूर्वजों की गौरवगाथा को प्राप्त करके अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रही हूँ।

जिस प्रकार समस्त वसुधा को आलोकित करने के लिए सूर्य के प्रकाश, भवन को आलोकित करने के लिए दीप के प्रकाश और मन को आलोकित करने के लिए ज्ञान के प्रकाश की आवश्यकता होती है उसी प्रकार समाज और देश को आलोकित करने के लिए सुदृढ़, सर्वमान्य संस्कृति की आवश्यकता होती है और हमारा देश अपनी इसी अलौकिक सांस्कृतिक खूबियों और  समृद्धिशाली सभ्यता के कारण सदियों से विदेशी आक्रांताओं, लुटेरों की लोलुप आकांक्षाओं का केन्द्र रहा है। 

देश की अखण्डता और गौरवशाली संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए समय-समय पर भारत माँ के वीर सपूतों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर करके अपने जीवन को स्वतंत्रता प्राप्ति के यज्ञ में आहूत कर दिया, हम सदैव उन महान विभूतियों के ऋणी रहेंगे। 

नि:संदेह हमारे देश का इतिहास बहुत समृद्ध है किन्तु दुर्भाग्यवश उस समृद्धि के महानायकों की शौर्यगाथाएँ समय के गर्त में दफन होकर रह गईं और जितनी जानकारी उपलब्ध है वह अपूर्ण और निराशाजनक है। देश के वंशज अपने पूर्वजों के शौर्य और उनके बलिदानों से अनभिज्ञ रहें, यह बहुत ही दुर्भाग्य पूर्ण है। हमारे जिन पूर्वजों के कारण वर्तमान समय में हमारा अस्तित्व है, हम अधिकारपूर्वक स्वयं को इस देश का अटूट हिस्सा मानते हैं, उन्हीं शौर्यवान पूर्वजों की शौर्यगाथाओं को नितांत योजनाबद्ध रूप से दबा दिया गया और इतिहास में जो भी दर्शाया गया वह नकारात्मक और निराशाजनक छवि को ही प्रस्तुत करता है तथा अधिकतर महापुरुषों के विषय में तो ज्ञात ही नहीं हो सका। किन्तु जिस प्रकार बादलों के टुकड़े सूर्य को अपने पीछे छिपाकर भी उसकी किरणों के प्रकाश को फैलने से नहीं रोक पाते, उसी तरह उन महान पूर्वजों की शौर्यगाथाओं का आलोक भी आखिर समय के बादलों के पीछे से झाँकने लगा और भा०ज०म० के संरक्षक आ० राजेन्द्र अग्रवाल जी की सोच को मूर्त रूप देने के लिए आ० धर्मचन्द्र पोद्दार जी के मार्गदर्शन में देश के इक्यावन प्रांतों से इक्यावन प्रबुद्ध लेखकों ने हजारों वर्ष पुराने इतिहास को खंगालने का प्रयास किया, तथा डॉ० अवधेश कुमार 'अवध' जी के कुशल संपादन में 'इनसे हैं हम' का उद्भव हुआ। सह संपादक नितु सिंह नव्या और मुख पृष्ठ सज्जा के लिए आ० अवनीत कौर दीपाली जी का सहयोग प्रशंसनीय है। आ० अवधेश कुमार 'अवध' जी की कृपा से मुझे भी इस महती प्रयास में यूनानी इतिहासकारों द्वारा महिमामंडित सिकंदर के भारत को पददलित करके इस महान देश पर शासन करने के कुत्सित मंशाओं और प्रयासों पर विराम लगाकर उसे वापस लौटने पर विवश करने वाले पौरववंशी राजा महाराज पुरुषोत्तम के गौरवशाली जीवन पर, 'सीमा के सजग प्रहरी महाराज पुरु' शीर्षक के माध्यम से प्रकाश डालकर अपना आंशिक योगदान देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अपने देश के इन महान विभूतियों के त्याग और बलिदान को बच्चा-बच्चा जाने, इसी पावन उद्देश्य की पहल है 'इनसे हैं हम'। 

पुस्तक का परिचय देते हुए प्रधान संपादक डॉ० अवधेश कुमार 'अवध' लिखते हैं कि "लगभग सात लाख लोगों की सीधी कुर्बानी और उनसे जुड़े असंख्य लोगों के अहर्निश तप-त्याग का प्रतिफल आजादी के रूप में मिला। भारत के विगत ढाई हजार साल के इतिहास पर निष्पक्ष दृष्टि डालने से ज्ञात होता है कि हमारे महानायक पूर्वजों की शौर्यगाथा का आंकलन सर्वथा उचित तरीके से नहीं किया गया है। कोई न कोई ऐसी शक्ति रही जिसने किसी पूर्वाग्रह वश महान पूर्वजों की छवि को नकारात्मक कलेवर में प्रस्तुत किया या उल्लेखनीय नहीं समझा। बहुधा जिन उद्देश्यों के लिए कुर्बानियाँ दी गईं, प्रायः उत्तराधिकारी भटकते हुए देखे गए। इसी मानसिक यंत्रणा से सम्यक मुक्ति का एक प्रयास है, 'इनसे हैं हम'।"

हमारी नव पीढ़ी को हमारे पूर्वजों के ऐतिहासिक संघर्ष, एकता, विद्धता और कर्मठता का पाठ पढ़ाने हेतु इन अनमोल विभूतियों के बारे में अवगत करवाने के लिए यह पुस्तक मील का पत्थर साबित होगी।

इस पुस्तक के माध्यम से आगामी पीढ़ी इतिहास के गर्त में छिपे महान विभूतियों के शौर्यगाथाओं से परिचित हो सके, इस उद्देश्य पूर्ति के लिए संपादक मंडल तथा इससे जुड़े सभी लेखक/लेखिका सतत प्रयत्नशील हैं। इसी क्रम में यह पुस्तक प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रपति भवन में भी अपना स्थान बना चुकी है तथा जगह-जगह शिक्षा विभाग से जुड़े प्रतिनिधियों की उपस्थिति में इसका लोकार्पण किया गया तथा इसे अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं। यह पुस्तक सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दूसरे कुछ देशों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुकी है, अपने गौरवशाली इतिहास को जानने की तीव्र उत्कंठा के फलस्वरूप माँग इतनी बढ़ गई कि इस पुस्तक का पहला संस्करण (एडिशन) समाप्त हो चुका तथा दूसरे की तैयारी चल रही है। ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि इस पुस्तक में वर्णित महापुरुषों की जीवनगाथा को पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जा सकता है, जो कि हम सभी के लिए हर्षोल्लास का विषय है। इक्यावन लेखक/लेखिकाओं की साहित्यिक खोज की यज्ञाहुति का प्राकट्य यह महान पुस्तक राष्ट्र निर्माण के विराट यज्ञ में सच्चाई की परम आहुति है जिससे हमारे आने वाले भविष्य के कर्णधार अवश्य प्रेरित होंगे।

मालती मिश्रा 'मयंती'

malti3010@gmail.com


मंगलवार

अधूरी कसमें (कहानी संग्रह) की समीक्षा

 “मैं दूसरी बिंदू नहीं बन सकती, इसलिए जा रही हूँ” -मालती मिश्रा



(पुस्तक समीक्षा)

अधूरी कसमें- मालती मिश्रा (9891616087)                    

ISBN No. : 978-81-909863-0-4                        

प्रकाशक :  नारायणी साहित्य अकादमी                     

संस्करण :  2020                           


यह वर्तमान समय की माँग है अथवा विकसित या विकासशील दृष्टिकोण की पहचान, जिसके चलते सृजनशील व्यक्तित्व का धनी व्यक्ति अपनी सृजनशीलता के माध्यम से बहुआयामी जीवन को दर्शाता है। वह जीवन को एकपक्षीय अथवा एकांगी दृष्टिकोण से नहीं देखता। यदि देखता भी है तो कमोबेश अन्य पक्ष तो वह दर्शाता ही है। कुछ ऐसे ही सृजनशील व्यक्तित्व की धनी हैं मालती मिश्रा। जो बहुत कुछ को एक साथ लेकर चलना पसंद करती हैं। साथ ही अपनी सृजनात्मकता को लेकर उनका मानना है कि “मेरी लेखनी अभी अपरिपक्व है, इसे परिपक्व बनाने और इसे धार देने का प्रयास कर रही हूँ।” यह सोच ही उन्हें निरंतर आगे बढ़ा रही हैं, क्योंकि परिपक्वता जैसी स्थिति मानव जीवन में शायद हो ही नहीं सकती। कितना कुछ जानने एवं समझने के पश्चात् भी बहुत कुछ ऐसा होता है जो अबूझ ही रहता है। प्रवीणता की कोई सीमा नहीं होती, वह असीम है। हर अवस्था में सीखने के लिए कुछ न कुछ शेष रहता ही है। 

इस कहानी संग्रह में संग्रहित 13 कहानियाँ 141 पृष्ठों में फैली हुई हैं। इनमें से पाँच कहानियाँ जैसे आंदोलन, निशि, आखिरी रास्ता, आखिरी इम्तहान एवं लीला भाभी मात्र 17 पृष्ठ ही घेरती हैं। शेष आठ कहानियाँ 124 पृष्ठों का विस्तार लिए हुए हैं। इन्हें आठ नहीं बल्कि सात कहानियाँ कहना ही उचित होगा क्योंकि प्रथम एवं अंतिम कहानी के रूप में अधूरी कसमें ही दो भागों में रखी गई है। इन सात कहानियों का कलेवर अधिक विस्तृत होने पर भी पाठकों की रूचि को बनाए रखता है। पाठकों को बाँधे रखने में सफल है। इसे देख यह भाव मन में अनायास ही घर कर जाता है कि कहानीकार आगे उपन्यास-सृजन की दिशा में अवश्य अग्रसर होगी। 

    कहानी विधा की सभी विशेषताएँ तो इन कहानियों में हैं ही, साथ ही और भी कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं जिन पर चर्चा अपेक्षित है। प्रथम तो ये किसी कहानी आन्दोलन अथवा किसी तथाकथित मानक विचारधारा को लेकर नहीं चलतीं। जीवन को जैसा है वैसा ही देखती हैं उस पर अपने या किसी अन्य दृष्टिकोण का आवरण नहीं चढ़ातीं। कहानी को अपनी ओर से कोई मोड़ देना यहाँ जरूरी नहीं समझा गया। इस दृष्टि से कहानी के पात्र ही नहीं कहानी भी स्वयं अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती है। 

    प्रेम जैसे अमिट, अमर भाव को लेकर कहानीकार ने अधूरी कसमें, वो खाली बेंच, वो कौन थी, सवालों की परिधि जैसी कहानियाँ लिखीं। इन कहानियों के पात्र परिस्थितियों के हाथों विवश भले ही हों किंतु प्रेम भाव को तो उत्कर्ष पर ले ही जाते हैं। इसे ऐसे भी कहा जा सकता हैं कि वे प्रेम करते नहीं बल्कि प्रेम को जीते हैं। अधूरी कसमें के अपरा एवं नीलेश, वो खाली बेंच कहानी का समरकांत, वह कौन थी की पंखी, सवालों की परिधि के किशोर एवं आस्था आदि पात्र हर स्थिति में प्यार को जीते हैं, साथी के साथ न होने पर भी वे इस प्रेम-पुष्प को कुम्हलाने नहीं देते। इनमें भी पंखी तो अनूठी है। जो प्राण जाने के पश्चात् भी इस भाव को जीवित रखती है। 

कहानीकार का सौंदर्यबोध भी गजब का है। वर्तमान समय में जहाँ सौंदर्य बाहरी या कास्मेटिक्स, पाउडर एवं क्रीम आदि के बिना अधूरा लगता है वहीं इन कहानियों में सौंदर्य पूर्णतः नैसर्गिक रूप में उभरा है। स्त्री की देहयाष्टि एवं अंगों से उत्पन्न सौंदर्य, उसके रंग से उत्पन्न सौंदर्य एवं उसके सामान्य पहनावे एवं भाव-भंगिमाओं से उत्पन्न सौंदर्य का वैविध्य यहाँ देखा जा सकता है। रंगों के मिश्रण एवं संयोजन से उत्पन्न सौंदर्य को भी वे सफलतापूर्वक दर्शाती है। प्राकृतिक सौंदर्य भी विशेष रूप से सूर्य के अस्तांचलगामी सिन्दूरी रूप को भी दर्शाने का कोई अवसर वे हाथ से जाने नहीं देतीं। 

मेहमान एक रात की, चुनाव, आंदोलन, आखिरी रास्ता, आखिरी इम्तहान, लीला भाभी एवं बाल विवाह समस्या प्रधान कहानियाँ है। सामान्य से लेकर जीवन की विशेष समस्याओं को यहाँ अच्छे से उठाया गया है। चुनाव कहानी आजादी के बाद से चले आ रहे राजनैतिक परिदृश्य को इस एक वाक्य में सफलता पूर्वक दर्शा जाती है। “अब भइया कोई कितनो हाथ-पाँव मार ले, जीत तो बलवंत चौधरी की होयगी अरे जब से हम होश संभाले हैं न... तब से किसी अउर को तो देखा ही नहीं गाँव का परधान। पहले उसके दादा परधान थे, फिर उनके बाप भए अउर उनके बाद फिर बलवंत चौधरी।” भारतीय राजनीती में फल-फूलकर वटवृक्ष बन चुके वंशवाद को यहाँ दर्शाया गया है। किंतु भारतीय विशेषकर ग्रामीण मतदाताओं के दृष्टिकोण में आ रहे परिवर्तन की ओर भी इसी कहानी की यह पंक्ति इशारा करती है “भइया तुम ई बात तो ठीक कर रहे हो कि आस-पास के अउर गाँव की तरक्की हमारे गाँव से ज्यादा भई है”। अर्थात् वोट अब विकास के नाम पर भी पड़ेंगे।  

स्त्री शिक्षा को लेकर भी कहानीकार सजग है। इसी कहानी का एक पात्र कहता है “चुपकर बेवकूफ! आज के जमाने में भी लड़कियों को अनपढ़ रखने की वकालत कर रहा है”। रामधनी क्रोध में बिफऱ पड़ा”। इसी प्रकार बाल विवाह कहानी भी अपने आप में बेजोड़ है। स्त्री की बदली सोच, एवं एक प्रकार से उसे पूर्ण व्यावहारिक होते हुए यहाँ दर्शाया गया है। वह समस्या को लेकर परेशान होने, रोने-बिलखने तक ही स्वयं को सीमित न रखकर उसका समाधान करने की दिशा में भी अग्रसर है एवं समाधान को धरातल पर लाने में भी सफल होती है। इसे इस पंक्ति के माध्यम से जाना जा सकता है “मैं दूसरी बिंदू नहीं बन सकती, इसलिए जा रही हूँ”। पढ़ी-लिखी पत्नी के होने पर पति में उपजी कुण्ठा आदि भी यहाँ दिखती है। 

स्त्री से जुड़ी अन्य महत्वपूर्ण समस्याओं को भी यह कहानी सफलतापूर्वक दर्शाती है। परिवार में जहाँ एक ओर बहू के लिए घूँघट की अनिवार्यता आज भी कुछ क्षेत्रों में कमोबेश बनी हुई है वही उसे शौचालय के लिए बाहर खुले में ही जाना पड़ता है। इस समस्या के अन्य पक्षों की ओर भी यह कहानी संकेत कर जाती है। 

अपने परिवेश से पूर्णतः संबद्ध कहानीकार वर्तमान को साथ लेकर चलती हैं। विकृत राजनीति से प्रेरित घटनाक्रम से स्वयं को अछूता नहीं रखतीं। आन्दोलन कहानी तथाकथित किसान आन्दोलन की पोल खोल कर रख देती है। जब उसका प्रमुख पात्र कहता है “हम बर्बाद होई गए हरि की माँ, ई किसान आन्दोलन ही हम किसानों के जान की दुश्मन हो गई, अरे हमें का लेना देना ई सबसे लेकिन नहीं, ई नेता लोगन अपने-अपने गुण्डा छोड़ रक्खे हैं, जबरजस्ती हम लोगन के सब्जी, फल सब छीन के सड़क पर फेंक रहे हैं, और हमें धमका के मारपीट के भेज दिये।" हरखू कहते-कहते बिलख कर रोने लगा। उसे अपनी सारी जरूरतें और सपने किसान आन्दोलन की भेंट चढ़ते दिखाई दे रहे थे। भाषा-शैली को लेकर भी कहानीकार पूर्णतः सजग है। भाषा का प्रवाहमान एवं पात्रानुकूल रूप यहाँ देखने को मिलता है। 

अंततः यह कहा जा सकता है कि जो पाठक जीवन के विविध आयामों को एक साथ देखना पसंद करते हैं, वर्तमान परिवेश को गहराई से जानना चाहते हैं, सौंदर्य को वास्तविक रूप में देखना जिनकी प्राथमिकता है उन्हें आगे आकर इस ‘अधूरी कसमें’ कहानी संग्रह को हाथों-हाथ लेकर कहानीकार को आगे भी सृजन जारी रखने के लिए प्रेरित करना चाहिए।  


समीक्षक

डॉ. पवन कुमार पाण्डे

असिस्टेंट प्रोफेसर ऑफ हिन्दी

गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज भैंसा, निर्मल

पता H.No. 7-1-372

Godown road Nizamabad

Telangana state

Pin code 503001

9848781540

pandeypavan67@gmail.com

समीक्षा- 'वो खाली बेंच'

समीक्षा- 'वो खाली बेंच'


कहानी संग्रह   *वो खाली बेंच*

लेखिका- मालती मिश्रा 

समीक्षा- रतनलाल मेनारिया 'नीर'


मालती मिश्रा जी की कहानी संग्रह की चर्चा करने से पहले इनके परिचय के बारे जानना आवश्यक है। वैसे मालती जी का परिचय देने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इनका परिचय खुद इनकी कहानियाँ देती हैं। आदरणीय मालती मिश्रा जी दिल्ली की युवा साहित्यकारा हैं। कई पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित हो चुके हैं व कई साहित्यिक सम्मानों से नवाजी गई हैं। इनका यह दूसरा कहानी संग्रह है तथा एक और  कहानी संग्रह प्रकाशित होने वाली है। 

मालती मिश्रा का बहुचर्चित कहानी संग्रह *वो खाली बेंच* पढ़ा तो मैं पढ़ता चला गया इस कहानी संग्रह  में कुल 12 कहानियाँ हैं। हर कहानी में एक सस्पेन्स दिया है व हर कहानी एक अनोखी छाप छोड़ती है। इनकी कहानियों की भाषा शैली पाठकों के दिल को छू जाती है। इस कहानी-संग्रह की पहली कहानी *वो खाली बेंच* पढ़ी इस कहानी की रूप रेखा से ऐसा लगता है कि प्रेमी व प्रेमिका  कश्मीर की वादियों की सैर कर रहे हैं। यह एक प्रेम कथा है। समरकांत व रत्ना एक दूसरे  से बहुत प्यार करते हैं,  उनकी पहली मुलाकात भी उस बेंच से ही हुई थी। लेकिन एक ऐसा तूफान आया कि रत्ना कभी नहीं मिली हमेशा के लिए यह दुनिया छोड़ दी। कई वर्ष बीत गये समरकान्त आज भी उस बेंच को देखते रहते हैं लेकिन रत्ना कभी लौट कर नही आई।

इस कहानी का कथानक कमज़ोर रहा है पात्र कम होते हुए भी कहानी को बेवजह लंबा खींचा गया। यह कह सकते हैं। यह एक अधूरा प्यार है फिर भी कहानी की भाषा पाठकों के मन को छू जाती है।  दूसरी कहानी *जिम्मेदार कौन* कहानी में आज की परिस्थिति में आज की शिक्षा प्रणाली का दोष है या अभिभावकों का लेकिन आज की परिस्थिति में दोष तो दोनों का है,  न अभिभावक पहले जैसे रहे न स्कूल की शिक्षा प्रणाली पहले जैसी रही। बेवजह एक शिक्षक को 50000 हजार रुपये भरने पड़े जो अभिभावकों पर एक प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। बिना  जानकारी के शिक्षक को दोषी ठहराना  बहुत ग़लत है।  हमारे शास्त्रों में माता-पिता के बाद गुरु का दर्जा होता है। सबसे ऊँचा दर्जा दिया है। अगर शिक्षक के साथ ही अभिभावक शोषण करते हैं तो बहुत शर्मनाक बात है। इस कहानी का जिस तरह से अन्त हुआ बहुत चौंकाने वाला था। लेकिन एक तरह  से आज की शिक्षा बाजारवाद की गुलाम हो गई है यह इस कहानी में बखूबी दर्शाया गया है।

*माँ बिन मायका* कहानी दिल की गहराइयों को छू गई हर बेटी  के लिए मायका बहुत महत्वपूर्ण होता है अगर माता-पिता के नहीं होने के बाद बेटी का मायके में कोई सम्मान नहीं होता है तो हर बेटी  को बहुत दुख होता है वह चाह कर भी किसी के सामने मायके की बुराई नहीं करेगी बल्कि श्रेष्ठ ही बताएगी ।

*आत्मग्लानि* कहानी में मुख्य पात्र शिखर से अनजाने में पाप हो जाता है, बाद में वह प्रायश्चित  भी करता है तथा उस पाप की कीमत भी चुकाता है। उसे बहुत आत्मग्लानि होती है शिखर ने समय रहते उस पाप का पश्चाताप कर लिया जो अच्छा किया। *पुरुस्कार* कहानी में कई जगह बहुत लचीलापन है कहानी की रफ्तार बहुत धीमी है । फिर नंदनी के साथ अच्छा न्याय नहीं हो सका नंदनी एक ईमानदार शिक्षिका के साथ एक मेहनती शिक्षिका है, उसे स्कूल का डायरेक्टर बुरी तरह अपमानित करके स्कूल से निष्काषित कर करता है जो बहुत ही अन्याय पूर्ण बात है। उसको अच्छे पुरस्कार के बदले अपमान मिला।  *सौतेली माँ* एक ऐसा शब्द है जो हर औरत को बुरा बनाता है जो बहुत गलत है। तरु उसकी सगी बेटी नहीं फिर भी उसे बहुत प्यार देती है, बहुत स्नेह देती है लेकिन वह हमेशा अपने ससुराल वालों के सामने सोतेली माँ ही नजर आती है। एक बार उर्मिला को स्वयं को अपने परिवार के सामने सच्ची माँ साबित करने का समय आ गया और एक घटना से सौतेली माँ का तमगा हमेशा-हमेशा के लिए हट गया और वह सबकी नजरों में एक अच्छी व सच्ची माँ बन गई।

*पिता* कहानी में पिता को उसकी बेटियों के प्रति अथाह प्यार रहता है लेकिन परिवार के घरेलू झगड़े व पति-पत्नी के बीच तालमेल नही होने से व मन मुटाव के कारण दोनों के बीच तलाक हो जाता है और न चाहते हुए भी दोनों बच्चियों को पिता के प्यार से वंचित रहना पड़ा। पिता व बेटियों की एक भावनात्मक कहानी है। *डायन* कहानी  एक भावनात्मक कहानी है। कबीर की माँ एक अन्धविश्वासी औरत थी, एक  बाबा की वज़ह से  बेचारे कबीर का घर तबाह हो गया और उसकी माँ मरते मरते अपनी बहू पर ऐसा कलंक लगा कर चली गई कि बेचारी मंगला का जीवन नरक बन गया। गाँव वाले उसे डायन समझने लगे। जबकि हकीकत में मंगला बहुत ही समझदार औरत है। कहानी पढ़कर लगता है कि आज भी हम किस दुनिया में जी रहें हैं, बेचारी मंगला को कुछ लोग डायन  मानकर बुरी तरह पीटते हैं, एक निहत्थी औरत पर हमला करना इस दकियानूसी लोगों की सोच पर कई प्रकार के प्रश्न खड़ा करता है।

*चाय का ढाबा* कहानी में बाल मजदूरी पर प्रहार किया है साथ ही कहानी के मुख्य पात्र के बेटे को भी हकीकत का अहसास कराया है। 

*चाय पर चर्चा* पर दादा व पोते के बीच अनोखे प्यार को दर्शाया है। व *पुनर्जन्म* कहानी पूरी तरह काल्पनिक होकर एक सस्पेन्स टाइप कहानी है। कहानी को इस तरह खत्म करना ऐसा लगता है कहानी और बड़ी होती तो अच्छा रहता।

कुल मिलाकर मालती जी की सभी कहानियाँ पाठकों को पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं और सभी कहानियों में ऐसा प्रतीत होता है कि ये सभी लेखिका के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं। इन कहानियों मे आदरणीय मालती जी ने कुछ हकीकत व कुछ कल्पनाओं का सहारा लेकर जिदंगी से रुबरू कराने की कोशिश की है। इस कहानी संग्रह में लेखिका ने औरत की करुणा, संवेदनाएँ, माँ का  वात्सल्य, पिता के प्रति निस्वार्थ भाव से प्रेम कई जगह कथाकार ने सामाजिक कुरीतियों पर भी कुठाराघात किया है।

मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि इनके कहानी संग्रह *वो खाली बेंच* को सभी पाठकों  को पढ़ना चाहिए। मुझे ऐसा विश्वास है यह कहानी संग्रह व्यापक रूप् में चर्चित होगा।

शुभकामनाओं सहित-----


समीक्षक- रतनलाल मेनारिया 'नीर'


पुस्तक प्रकाशक के साथ-साथ फ्लिपकार्ट और अमेज़न पर भी उपलब्ध है। इच्छुक पाठक नीचे दिए गए लिंक से पुस्तक मँगवा सकते हैं...👇🏽


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बुधवार

समीक्षा- वो खाली बेंच


 

कहानी संग्रह   *वो खाली बेंच*
लेखिका- मालती मिश्रा 
समीक्षा- रतनलाल मेनारिया 'नीर'

मालती मिश्रा जी की कहानी संग्रह की चर्चा करने से पहले इनके परिचय के बारे जानना आवश्यक है। वैसे मालती जी का परिचय देने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इनका परिचय खुद इनकी कहानियाँ देती हैं। आदरणीय मालती मिश्रा जी दिल्ली की युवा साहित्यकारा हैं। कई पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित हो चुके हैं व कई साहित्यिक सम्मानों से नवाजी गई हैं। इनका यह दूसरा कहानी संग्रह है तथा एक और  कहानी संग्रह प्रकाशित होने वाली है। 
मालती मिश्रा का बहुचर्चित कहानी संग्रह *वो खाली बेंच* पढ़ा तो मैं पढ़ता चला गया इस कहानी संग्रह  में कुल 12 कहानियाँ हैं। हर कहानी में एक सस्पेन्स दिया है व हर कहानी एक अनोखी छाप छोड़ती है। इनकी कहानियों की भाषा शैली पाठकों के दिल को छू जाती है। इस कहानी-संग्रह की पहली कहानी *वो खाली बेंच* पढ़ी इस कहानी की रूप रेखा से ऐसा लगता है कि प्रेमी व प्रेमिका  कश्मीर की वादियों की सैर कर रहे हैं। यह एक प्रेम कथा है। समरकांत व रत्ना एक दूसरे  से बहुत प्यार करते हैं,  उनकी पहली मुलाकात भी उस बेंच से ही हुई थी। लेकिन एक ऐसा तूफान आया कि रत्ना कभी नहीं मिली हमेशा के लिए यह दुनिया छोड़ दी। कई वर्ष बीत गये समरकान्त आज भी उस बेंच को देखते रहते हैं लेकिन रत्ना कभी लौट कर नही आई।
 कहानी की भाषा पाठकों के मन को छू जाती है।  दूसरी कहानी *जिम्मेदार कौन* कहानी में आज की परिस्थिति में आज की शिक्षा प्रणाली का दोष है या अभिभावकों का लेकिन आज की परिस्थिति में दोष तो दोनों का है,  न अभिभावक पहले जैसे रहे न स्कूल की शिक्षा प्रणाली पहले जैसी रही। बेवजह एक शिक्षक को 50000 हजार रुपये भरने पड़े जो अभिभावकों पर एक प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। बिना  जानकारी के शिक्षक को दोषी ठहराना  बहुत ग़लत है।  हमारे शास्त्रों में माता-पिता के बाद गुरु का दर्जा होता है। सबसे ऊँचा दर्जा दिया है। अगर शिक्षक के साथ ही अभिभावक शोषण करते हैं तो बहुत शर्मनाक बात है। इस कहानी का जिस तरह से अन्त हुआ बहुत चौंकाने वाला था। लेकिन एक तरह  से आज की शिक्षा बाजारवाद की गुलाम हो गई है यह इस कहानी में बखूबी दर्शाया गया है।
*माँ बिन मायका* कहानी दिल की गहराइयों को छू गई हर बेटी  के लिए मायका बहुत महत्वपूर्ण होता है अगर माता-पिता के नहीं होने के बाद बेटी का मायके में कोई सम्मान नहीं होता है तो हर बेटी  को बहुत दुख होता है वह चाह कर भी किसी के सामने मायके की बुराई नहीं करेगी बल्कि श्रेष्ठ ही बताएगी ।
*आत्मग्लानि* कहानी में मुख्य पात्र शिखर से अनजाने में पाप हो जाता है, बाद में वह प्रायश्चित  भी करता है तथा उस पाप की कीमत भी चुकाता है। उसे बहुत आत्मग्लानि होती है शिखर ने समय रहते उस पाप का पश्चाताप कर लिया जो अच्छा किया। *पुरुस्कार* कहानी में कई जगह बहुत लचीलापन है कहानी की रफ्तार बहुत धीमी है । फिर नंदनी के साथ अच्छा न्याय नहीं हो सका नंदनी एक ईमानदार शिक्षिका के साथ एक मेहनती शिक्षिका है, उसे स्कूल का डायरेक्टर बुरी तरह अपमानित करके स्कूल से निष्काषित कर करता है जो बहुत ही अन्याय पूर्ण बात है। उसको अच्छे पुरस्कार के बदले अपमान मिला।  *सौतेली माँ* एक ऐसा शब्द है जो हर औरत को बुरा बनाता है जो बहुत गलत है। तरु उसकी सगी बेटी नहीं फिर भी उसे बहुत प्यार देती है, बहुत स्नेह देती है लेकिन वह हमेशा अपने ससुराल वालों के सामने सोतेली माँ ही नजर आती है। एक बार उर्मिला को स्वयं को अपने परिवार के सामने सच्ची माँ साबित करने का समय आ गया और एक घटना से सौतेली माँ का तमगा हमेशा-हमेशा के लिए हट गया और वह सबकी नजरों में एक अच्छी व सच्ची माँ बन गई।
*पिता* कहानी में पिता को उसकी बेटियों के प्रति अथाह प्यार रहता है लेकिन परिवार के घरेलू झगड़े व पति-पत्नी के बीच तालमेल नही होने से व मन मुटाव के कारण दोनों के बीच तलाक हो जाता है और न चाहते हुए भी दोनों बच्चियों को पिता के प्यार से वंचित रहना पड़ा। पिता व बेटियों की एक भावनात्मक कहानी है। *डायन* कहानी  एक भावनात्मक कहानी है। कबीर की माँ एक अन्धविश्वासी औरत थी, एक  बाबा की वज़ह से  बेचारे कबीर का घर तबाह हो गया और उसकी माँ मरते मरते अपनी बहू पर ऐसा कलंक लगा कर चली गई कि बेचारी मंगला का जीवन नरक बन गया। गाँव वाले उसे डायन समझने लगे। जबकि हकीकत में मंगला बहुत ही समझदार औरत है। कहानी पढ़कर लगता है कि आज भी हम किस दुनिया में जी रहें हैं, बेचारी मंगला को कुछ लोग डायन  मानकर बुरी तरह पीटते हैं, एक निहत्थी औरत पर हमला करना इस दकियानूसी लोगों की सोच पर कई प्रकार के प्रश्न खड़ा करता है।
*चाय का ढाबा* कहानी में बाल मजदूरी पर प्रहार किया है साथ ही कहानी के मुख्य पात्र के बेटे को भी हकीकत का अहसास कराया है। 
*चाय पर चर्चा* पर दादा व पोते के बीच अनोखे प्यार को दर्शाया है। व *पुनर्जन्म* कहानी पूरी तरह काल्पनिक होकर एक सस्पेन्स टाइप कहानी है। कहानी को इस तरह खत्म करना ऐसा लगता है कहानी और बड़ी होती तो अच्छा रहता।
कुल मिलाकर मालती जी की सभी कहानियाँ पाठकों को पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं और सभी कहानियों में ऐसा प्रतीत होता है कि ये सभी लेखिका के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं। इन कहानियों मे आदरणीय मालती जी ने कुछ हकीकत व कुछ कल्पनाओं का सहारा लेकर जिदंगी से रुबरू कराने की कोशिश की है। इस कहानी संग्रह में लेखिका ने औरत की करुणा, संवेदनाएँ, माँ का  वात्सल्य, पिता के प्रति निस्वार्थ भाव से प्रेम कई जगह कथाकार ने सामाजिक कुरीतियों पर भी कुठाराघात किया है।
मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि इनके कहानी संग्रह *वो खाली बेंच* को सभी पाठकों  को पढ़ना चाहिए। मुझे ऐसा विश्वास है यह कहानी संग्रह व्यापक रूप् में चर्चित होगा।
शुभकामनाओं सहित-----

समीक्षक- रतनलाल मेनारिया 'नीर'

पुस्तक प्रकाशक के साथ-साथ फ्लिपकार्ट और अमेज़न पर भी उपलब्ध है। इच्छुक पाठक नीचे दिए गए लिंक से पुस्तक मँगवा सकते हैं...👇🏽

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सोमवार

पुस्तक समीक्षा : 'अन्तर्ध्वनि' (काव्य संग्रह)

मालती मिश्रा मयंती
अंतर्ध्वनि
मालती मिश्रा मयंती
अंतर्ध्वनि

पुस्तक समीक्षा : अन्तर्ध्वनि

समीक्षक : अवधेश कुमार 'अवध'
मनुष्यों में पाँचों इन्द्रियाँ कमोबेश सक्रिय होती हैं जो अपने अनुभवों के समन्वित मिश्रण को मन के धरातल पर रोपती हैं जहाँ से समवेत ध्वनि का आभास होता है, यही आभास अन्तर्ध्वनि है। जब अन्तर्ध्वनि को शब्द रूपी शरीर मिल जाता है तो काव्य बन जाता है। सार्थक एवं प्रभावी काव्य वही होता है जो कवि के हृदय से निकलकर पाठक के हृदय में बिना क्षय के जगह पा सके और कवि - हृदय का हूबहू आभास करा सके।
नवोदित कवयित्री सुश्री मालती मिश्रा जी ने शिक्षण के दौरान अन्त: चक्षु से 'नारी' को नज़दीक से देखा। नर का अस्तित्व है नारी, किन्तु वह नर के कारण अस्तित्व विहीन हो जाती है। शक्तिस्वरूपा, सबला और समर्थ नारी संवेदना हीन पुरुष - सत्ता के चंगुल में फँसकर अबला हो जाती है। बहुधा जब वह विद्रोह करती है तो  अलग - थलग, अकेली व असमर्थित और भी दयनीय होकर लौट आती है। प्रकृति का मानवीकरण करके कवयित्री स्त्री के साथ साम्य दिखलाने की कोशिश की है और इस प्रयास में वह छायावाद के काफी निकट होती है। नैतिक अवमूल्यन से कवयित्री आहत है फिर भी राष्ट्रीयता की भावना बलवती है तथा सामाजिक उथल- पुथल के प्रति संवेदनशील भी।
यद्यपि स्त्री विमर्श, सौन्दर्य बोध, प्रकृति चित्रण, सामाजिक परिवेश, सांस्कृतिक समन्वय, पारिवारिक परिमिति सुश्री मालती मिश्रा की लेखनी की विषय वस्तु है तथापि केन्द्र में नारी ही है। बहत्तर कविताओं से लैस अन्तर्ध्वनि कवयित्री की पहली पुस्तक है । भाव के धरातल पर कवयित्री की अन्तर्ध्वनि पाठक तक निर्बाध और अक्षय पहुँचती है । कविताओं की क्रमोत्तर संख्या के साथ रचनाकार व्यष्टि से समष्टि की ओर अग्रसर देखी जा सकती है। अन्तर्ध्वनि शुरुआती कविताओं में आत्म केन्द्रित है जो धीरे - धीरे समग्रता में लीन होती जाती है। स्वयं की पीड़ा जन साधारण की पीड़ा हो जाती है तो अपने दर्द का आभास कम हो जाता है।
कुछ कविताओं का आकार काफी बड़ा है फिर भी भाव विन्यास में तनाव या विखराव नहीं है अतएव श्रेयस्कर हैं । न्यून अतुकान्त संग सर्वाधिक तुकान्त कविताओं में गीत, गीतिका और मुक्तक लिखने की चेष्टा परिलक्षित है, जिसमें छंद की अपरिपक्वता स्पष्ट एवं अनावृत है किन्तु फिर भी भावपक्ष की मजबूती और गेय - गुण अन्तर्ध्वनि को स्तरीय बनाने हेतु पर्याप्य है। अन्तर्ध्वनि की कविता 'प्रार्थना खग की' द्रष्टव्य है जिसमें खग मानव से वृक्ष न काटने हेतु प्रार्थना करता है -
"करबद्ध प्रार्थना इंसानों से,
करते हम खग स्वीकार करो।
छीनों न हमारे घर हमसे,
हम पर तुम उपकार करो ।।"
' बेटी को पराया कहने वालों' कविता में कवयित्री एक बेटी की बदलती भूमिका को उसके विशेषण से सम्बद्ध करते हुए कहती है -
"जान सके इसके अन्तर्मन को
ऐसा न कोई बुद्धिशाली है
भार्या यह अति कामुक सी
सुता बन यह सुकुमारी है
स्नेह छलकता भ्राता पर है
पत्नी बन सब कुछ वारी है।"
उन्वान प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मात्र रुपये 150 की 'अन्तर्ध्वनि' में 'मजदूर', 'अंधविश्वास', 'तलाश', 'प्रतिस्पर्धा' और 'आ रहा स्वर्णिम विहान' जैसी कविताएँ बेहद प्रासंगिक हैं। एक ओर जहाँ शिल्प में दोष से इन्कार नहीं किया सकता वहीं रस के आधिक्य में पाठक - हृदय का निमग्न होना अवश्यम्भावी है। माता - पिता को समर्पित सुश्री मालती मिश्रा की अन्तर्ध्वनि को आइए हम अपनी अन्तर्ध्वनि बनाकर स्नेह से अभिसिंचित करें।
समीक्षक एवं लेखक
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अवधेश कुमार 'अवध'
मेघालय 9862744237