रविवार

बहुत करीब से देखा है तुम्हें..



बहुत करीब से देखा है तुम्हें
दूर जाते हुए…
इतना पास
कि तुम्हारे बदलते लहज़े
मैंने सबसे पहले महसूस किए।
तुम्हारे चुप हो जाने से पहले
मैंने खुद को
ज़्यादा बोलते पाया।
तुम्हारा जाना
अचानक नहीं था,
मैं रोज़
थोड़ा-थोड़ा छूटती रही।
मैंने तुम्हें
पीठ फेरते नहीं देखा,
मैंने तुम्हें
मेरे भीतर से
खिसकते हुए देखा है।
स्त्रियाँ
दूरी कदमों से नहीं नापतीं,
हम दूरी
बदलते स्पर्शों से पहचानती हैं।
बहुत करीब से देखा है तुम्हें
दूर जाते हुए…
इसलिए
आज भी
तुम्हारी गैरमौजूदगी
मेरे साथ रहती है।
मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️ 



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