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Monday, 9 December 2019

पुराना फर्नीचर

पुराना फर्नीचर

धूल झाड़ते हुए सुहासिनी देवी के हाथ एकाएक रुक गए जिस फर्नीचर पर अभी वह जोर-जोर से कपड़ा मार रही थीं, उनके हाथ अब उसी फर्नीचर को बड़े प्यार से सहला रहे थे। ये वही  फर्नीचर थे जिसे उन्होंने अपने कड़की के दिनों में भी एक-एक पैसा जोड़कर खरीदा था। उस समय इन्हीं फर्नीचर्स की वजह से घर की शोभा कितनी बढ़ गई थी। वो खुद भी तो तब इस घर की शान हुआ करती थीं पर अब...सोचते हुए वह अतीत की गहराइयों में डूबती चली गईं......
जब रवींद्र और सुहासिनी अपने जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए संघर्ष कर रहे थे।  रवींद्र की दस वर्षीय बेटी आयुषी और छः साल का बेटा सनी के साथ चार लोगों का परिवार था इनका। वह घर से एक किलोमीटर से भी कम की दूरी पर ही एक छोटी सी कुरियर कंपनी में नौकरी करता था।
कमरे का किराया और बच्चों की स्कूल फीस तथा घर-गृहस्थी के अन्य खर्चों को सुचारू रूप से चलाने के लिए अकेले रवीन्द्र का वेतन पर्याप्त नहीं था, इसलिए सुहासिनी ने भी एक छोटे से स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया लेकिन स्कूल की बहुत थोड़ी सी तनख्वाह और रवींद्र की तनख्वाह मिलाकर भी परिवार का निर्वाह हो पाना मुश्किल हो रहा था। सुहासिनी से यह परेशानी देखी नहीं जाती, उसे हमेशा यही डर सताता कि कहीं रवींद्र बच्चों की पढ़ाई न छुड़वा दे। बहुत सोचने के बाद उसने कहीं और नौकरी करने का निर्णय लिया। फिर रवींद्र के साथ जाकर वह किसी रिटेल कंपनी में इंटरव्यू देकर आई और वहाँ उसका चयन हो गया।
उसको सुबह नौ बजे आउटलेट पर पहुँचना होता था और शाम को छ: बजे छुट्टी होती थी परंतु शाम के उस समय ग्राहकों की भीड़ अधिक होने के कारण कभी सात तो कभी आठ भी बज जाते थे निकलने में। किन्तु इसके बावजूद आर्थिक तंगी की विवशता के कारण उसे यह नौकरी तो करनी ही थी। सवेरे ही बच्चों को नाश्ता करवाकर उनका लंच देकर स्कूल भेज देती और पूरे दिन के लिए उनके तथा रवींद्र के लिए खाना बनाकर रसोई में ढँक कर रख देती। घर की साफ-सफाई करके अपना लंच लेकर वह आठ बजे काम पर निकल जाती थी। रवींद्र उसके जाने के बाद नौ बजे तक सोकर उठता और नहा-धोकर तैयार होता तथा रसोई में रखा नाश्ता खाता और पौने दस बजे वह भी अपनी नौकरी पर चला जाता। दोपहर को जब बच्चे घर आते तभी वह भी घर आता। आयुषी से खाना गर्म करवाता और फिर बच्चों के साथ ही लंच करता और एक-डेढ़ घंटे आराम करके फिर काम पर चला जाता। बच्चे शाम को रवींद्र के आने तक घर में अकेले रहते थे। दस साल की छोटी सी आयुषी ही छ: साल के सनी को संभालती। वह छोटी होने के बावजूद इतनी समझदार थी कि न तो खुद घर से बाहर जाती थी और न ही सनी को जाने देती दोनों घर में ही खेलते रहते या सो जाते।
सुहासिनी शाम को आने के बाद सबके कपड़े धोती खाना बनाती, बच्चों को पढ़ाती और सबको खाना खिलाकर बर्तन और रसोई साफ करके सबेरे के लिए सब्जी काटती, बच्चों के स्कूल यूनिफॉर्म प्रेस करके तब रात के ग्यारह-बारह बजे तक सोने जाती। उसकी पूरी दिनचर्या मशीनी हो गई थी। जब-तब वह खीझती थी, बच्चों को समय न दे पाने की वजह से खुद को अपराधी महसूस करती थी पर कुछ न कर पाने के कारण बेबसी से भीतर ही भीतर छटपटाती थी। वह रवींद्र को कहीं और नौकरी ढूँढ़ने के लिए कहती पर हमेशा ही उसे निराशा हाथ लगती। रवींद्र के सपने बड़े थे परंतु न जाने क्यों वह यह नौकरी छोड़ना नहीं चाहता था। वह जानता था कि कहीं और नौकरी ढूँढ़ेगा तो शायद इतने आराम की नौकरी नहीं मिलेगी। यहाँ पैसे भले ही कम थे पर आराम बहुत था और इसीलिए वह सुहासिनी को तरह-तरह से जवाब देकर चुप करवा देता पर कहीं और नौकरी नहीं ढूँढ़ता।
इसी तरह लगभग एक साल होने को आए, परंतु उनके घर की आर्थिक स्थिति ज्यों की त्यों बनी रही। सुहासिनी नौकरी छोड़ना चाहते हुए भी नहीं छोड़ सकती थी क्योंकि रवींद्र की आय अब भी उतनी ही थी परंतु शायद भगवान ने सुहासिनी की प्रार्थना सुन ली और वह कुरियर कंपनी बंद हो गई। अब रवींद्र के लिए दूसरी नौकरी ढूँढ़ना आवश्यक हो गया। परंतु उसे कोई जल्दी नहीं थी आखिर पत्नी का सहारा तो था ही। वह नौकरी तो खोज रहा था परंतु बड़े आराम से, उसका अधिकांश समय घर पर ही बीतता लेकिन इससे भी सुहासिनी को कोई आराम नहीं था। वह पहले की ही भाँति सारे कामों का बोझ अकेले कंधों पर उठाए रही।
वह तो पूरा दिन आउटलेट पर होती इधर रवींद्र घर पर आयुषी से कभी खाना तो कभी पानी माँगता परंतु कभी नहीं सोचा कि बच्ची छोटी है तो अपने कार्य उसे स्वयं कर लेने चाहिए। जब बच्चों के खेलने का समय होता तो उन्हें बैठाकर समझाता रहता। समय धीरे-धीरे बीतता रहा रवीन्द्र की नौकरी बदली और समय भी पर बच्चों के बड़े होने के साथ-साथ आवश्यकताएँ भी बढ़ती गईं। आवश्यकताओं को देखते हुए सुहासिनी कभी नौकरी नहीं छोड़ पाई। ऐसा नहीं कि उसने कोशिश न की हो, उसने बच्चों की देखभाल के लिए नौकरी छोड़ी भी लेकिन फिर आर्थिक तंगी के कारण पुन: करनी पड़ी। जिस समय माँ को घर पर रहकर बच्चों के साथ समय बिताना चाहिए उनसे बातें करनी चाहिए उस समय वह घर से बाहर होती, हाँ कई बार रवींद्र जरूर घर पर जल्दी होता और ऐसे में उसके चाय पानी खाने की सारी जरूरतें आयुषी देखती। सुहासिनी को जब-तब दुख होता कि उसकी बच्ची बेचारी अपना बचपन नहीं जी पाई, इतनी छोटी सी उम्र में ही वह घर के अधिकतर काम संभालती है, पर वह विवश हो जाती। जब ऑफिस का इतना काम होता कि उसे घर पर भी करना पड़ता और वह समय नहीं निकाल पाती, तब बेचारी बच्ची को ही घर संभालना पड़ता। वह जब भी अपनी इस मशीनी जिंदगी से हताश होती तो बस यही सोचकर अपने-आप को समझा लेती कि बस कुछ सालों की ही बात है, आयुषी की पढ़ाई पूरी होते ही वह भी कोई जॉब करने लगेगी तब उनकी सारी परेशानी खत्म हो जाएगी और वह नौकरी छोड़कर घर में रहने लगेगी और इसी उम्मीद में बच्चों का भविष्य बनाने के लिए वह शारीरिक शक्ति सीमा को भूल सशक्त मनोबल के सहारे सदैव एक कमाऊ पत्नी और कमाऊ माँ बनी रही।

वह आर्थिक रुप से आत्मनिर्भर और सशक्त महिला तो बन गई पर घर की गृहलक्ष्मी मात्र नाम के लिए रह गई।
अब तो रवींद्र की ज़बान पर हमेशा आयुषी का ही नाम होता, खाना चाहिए तो आयुषी, चाय चाहिए तो आयुषी, कपड़े चाहिए तो आयुषी। साप्ताहिक छुट्टी के दिन सुहासिनी घर पर होती फिरभी रवींद्र को कुछ भी चाहिए होता तो आयुषी को ही आवाज लगाता, फिर वह चाहे पढ़ रही हो या अभी-अभी काम करके थोड़ा आराम कर रही हो पर उसकी आवाज सुन उसे सब छोड़कर भागना ही पड़ता। सुहासिनी की उपस्थिति और अनुपस्थिति अब रवींद्र के लिए मायने नहीं रखती थी। उसको देख-देखकर सनी भी अपनी हर जरूरत के लिए आयुषी पर निर्भर हो गया। धीरे-धीरे समय बीतता रहा बच्चे बड़े हो गए और आयुषी पढ़ाई के साथ-साथ घर के कामों में भी दक्ष हो गई। सुहासिनी भी उसपर निर्भर हो चुकी थी। परंतु उसे सबका आयुषी पर निर्भर होना अच्छा नहीं लगता। उसे अपनी नगण्यता चुभने लगी, आखिर है तो वह घर की मालकिन ही न! पर मालकिन जैसा रहा क्या उसके जीवन में! वह चाहती थी कि काश पति और बच्चों के जीवन में वह फिर से अपना वही स्थान बना पाती! पर जानती थी कि यह इतना आसान नहीं और शायद संभव ही नहीं। अपनी गृहस्थी की गाड़ी को पटरी पर लाने की कोशिश में उसके रिश्ते हाथ से फिसल गए। रवींद्र अब अच्छा-खासा कमाने लगा है तो अब आर्थिक समस्या तो है नहीं, इसलिए अब अपने रिश्ते ही संभालने का प्रयास करती हूँ, ऐसा सोचकर उसने नौकरी छोड़ दी और घर पर रहने लगी। शुरू के एक-दो हफ्ते तो सुकून का अहसास हुआ, लंबे अरसे के बाद बेफिक्र होकर सोना और सुबह बेफिक्र होकर उठना अच्छा लगा परंतु धीरे-धीरे अपनी आत्मनिर्भरता की कमी खलने लगी। जब छोटी-छोटी जरूरतों के लिए रवींद्र से पैसे माँगने पड़ते तब ऐसा महसूस होता जैसे उसका खर्च भारी पड़ रहा है। वर्षों से आत्मनिर्भरता के कारण माँगने की आदत भी तो नहीं रही, इसलिए जो अन्य पत्नियों के लिए शायद साधारण सी बात हो, वही सुहासिनी के लिए असहनीय लग रही थी, फिरभी उसने तय कर लिया कि चाहे जो भी हो, अब वह घर पर ही रहेगी।
शाम को जब सुहासिनी रसोई में थी तब बेटे-बेटी और पिता के बीच न जाने किस बात को लेकर सलाह मशविरा चल रहा था, सुहासिनी सुनना चाहती थी कि वो क्या बात कर रहे हैं परंतु उसने सोचा अगर वे उसे बताना ही चाहते तो ड्राइंग-रूम में बैठकर उसके सामने बात करते पर उसने कई बार महसूस किया है कि जब वह ड्रॉइंग रूम में होती है तो वो तीनों बेडरूम में होते हैं और जब वह बेडरूम में होती है तब वे सब ड्रॉइंग रूम में होते हैं। वह बहुत दुखी होती है पर फिर खुद को ही समझा लेती है कि सालों से उन लोगों को उसके बिना एक साथ रहने की आदत पड़ गई है तो अब इतनी जल्दी नहीं छूटेगी। अत: उनके बीच जाकर बातें न सुनकर रवींद्र के बाहर चले जाने के बाद सुहासिनी ने बेटी से पूछ ही लिया "क्या बात हो रही थी पापा से?"
"अरे कुछ नहीं ममा वो पापा को अपने दोस्त के बेटे के लिए उपहार देना है बस उसी के बारे में बात हो रही थी।"
"ओह अच्छा।" कहती हुई सुहासिनी मायूस सी दूसरे कमरे में चली गई। अब वह इस काबिल भी नहीं कि किसी काम में उससे सलाह मशविरा किया जाय। सोचते हुए वह धम्म से सोफे पर बैठ गई। थोड़ी देर बाद रवींद्र घर वापस आया और कहीं जाने की तैयारी करते हुए बोला- "आयुषी मेरा रूमाल दे दे।" सुहासिनी आयुषी की ओर देखने लगी।  "हाँ देती हूँ" कहकर आयुषी उठकर चली गई। रुमाल पकड़ते हुए रवींद्र ने पूछा- "मेरे कपड़े तैयार कर दिए?"
"अभी कर दूँगी।" आयुषी बोली।
"कपड़े! क्यों कहीं जाना है क्या?" सुहासिनी ने चौंककर पूछा।
"कल पापा को कोलकाता जाना है।" आयुषी बोली। सुहासिनी को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके गाल पर जोर का तमाचा मारा हो। वह उठकर अपने कमरे में चली गई।
"ये ले पैसे संभालकर रख दे और ये घर खर्च के लिए।" रवींद्र आयुषी की ओर पैसे बढ़ाते हुए बोले। वहीं पास बैठी सुहासिनी कनखियों से आयुषी के हाथ में पकड़े पैसों को देखती है फिर उसके चेहरे की ओर देखती है।
"दीदी मुझे कल पिकनिक जाना है कुछ पैसों की जरूरत है।" सनी ने कहा।
"मैं दे देती हूँ, सुहासिनी ने कहना चाहा पर न जाने क्या सोचकर रुक गई।
उसे ऐसा लग रहा था कि शायद अब इस घर में उसकी कोई जरूरत नहीं है।
कभी-कभी वह सोचती कि रवींद्र की जिंदगी में अब क्या अस्तित्व है मेरा? घर के किसी कोने में अनचाहे सामान की तरह पड़ी रहती हूँ।

अब तो उसने घर के किसी भी अहम् कार्य में उससे पूछना भी बंद कर दिया है और अगर वह खुद कुछ बोलती है तो उसपर भड़क जाता है, बच्चों के सामने ही उसपर चीखता है। यह भी नहीं सोचता कि उसके ऐसे व्यवहार से वह कितनी आहत होती होगी। घर से जुड़ा काम हो या बिजनेस से, उसकी राय या उसका होना न होना कोई मायने नहीं रखता।
आज रवींद्र के बिजनेस से जुड़े कुछ लोग आ रहे हैं घर पर, उसने आयुषी से बैठक वाले कमरे को साफ करने के लिए कहा। तो वह उस पुराने फर्नीचर पर पड़े कपड़े, अखबार और बैग आदि हटाने लगी तो सुहासिनी ने पूछा- क्या हुआ कोई आ रहा है क्या?
"हाँ, कुछ क्लाइंट्स हैं।" उसने कहा।
"ठीक है तू जाकर और काम देख ले, मैं साफ करती हूँ, ये कवर लेती जा और दूसरे कवर दे जा।" कहकर सुहासिनी सोफे को झाड़ने लगीं।
तभी रवींद्र आया और बोला- "कैसी बनी घूम रही हो, कपड़े बदल लो, थोड़ा हुलिया सुधार लो हमारे क्लाइंट आ रहे हैं और तुम्हें हस्ताक्षर करने आना होगा, तो ऐसे आओगी क्या?"
सुहासिनी अविश्वसनीय नजरों से रवींद्र की ओर देखने लगी, फिर थोड़ी संयत हुई और पुराने फर्नीचर को देखा और मुस्कुराते हुए उसे सहलाते हुए बुदबुदाईं, "आज हमारे भी दिन फिर गए, चलो आज हम दोनों ही कपड़े बदल लेते हैं।"

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

Friday, 29 November 2019

संविधान या परिधान

संविधान या परिधान!

संविधान!
क्या हो तुम
तुम्हारा औचित्य क्या है?
मैंने पूछा संविधान से..

मैं!
मैं संविधान हूँ,
अर्थात्..... सम+विधान
सबके लिए समान कानून।
बड़े गर्व से बताया संविधान ने

समान कानून!
कहाँ है यह समान कानून?
हमारे यहाँ तो जहाँ सुनो
संविधान की चर्चा है
पर समान कानून का तो
बड़ा टंटा है।
मैंने कहा..

हमारे देश में कानून
सबके लिए समान है
संविधान ही तो इस देश की जान है...
गर्व से कहा संविधान ने..

सही कहा..
तभी तो हमारे देश की व्यवस्था की
सांसें उखड़ी रहती हैं
संविधान! तू खुद जो बीमार है,
यदि कानून होता समान
तो समान अपराध करने वाला
सजा भी पाता समान
घृणित कुकर्म करने वाले
निर्भया के अपराधी को
सिलाई मशीन और रुपए
ईनाम देकर न छोड़ा जाता
समान होता कानून..
तो अपराधियों को
अपने को निर्दोष सिद्ध करने का
अवसर न दिया जाता,
संविधान! तू दोषपूर्ण है....
अन्यथा कुछ घंटों में
निर्भया के शरीर का
चीर-फाड़ करने वालों को
सालों तक
सरकारी मेहमान बनाकर
न रखा जाता
कैसा है तू संविधान...
जो धर्म देखकर
रंग बदल देता है,
पैसा देखकर ढंग
बदल देता है,
जो गरीब बेकसूर को सजा
और अमीर अपराधी को
गिरफ्तारी से पहले ही
बेल दे देता है।
वाह रे संविधान!
तू देश को गालियाँ देने का
अधिकार भी देता है
और परिवारवाद की
सरपरस्ती भी करता है
कैसा है तू!
जो एक धर्म पर
बंदिशें लगाता है
तो दूसरे धर्म के लिए
अलग न्यायालय खुलवाता है..
वाह!
कैसा संविधान है तू!
जो एक वर्ग विशेष की
संतानों की
संख्या निर्धारित करता है
तो दूसरे वर्ग विशेष को
असीमित संतानों का
वरदान देता है!
क्या यही है...
तेरा सम+विधान?
यदि हाँ.....
तो नहीं चाहिए ऐसा संविधान!
बदल दो ऐसे संविधान को
जैसे...
विवाहोपरांत लड़की का
उपनाम बदल दिया जाता है,
खत्म करो ऐसे संविधान को!
जैसे बालविवाह, सतीप्रथा
जैसी कुरीतियों को
खत्म कर दिया,
खत्म करो
ऐसे संविधान को
जैसे..
अन्य रूढ़ियों को खत्म किया,
वैसे ही खत्म करो..
या संशोधन करो
संविधान को सम विधान बनाओ
परिधान नहीं....

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

Thursday, 21 November 2019

नीली डायरी 'वो खाली बेंच' से आगे


1
आज कई दिनों के बाद सूरज की स्वर्णिम चमक आँखों को चुभती सी प्रतीत हो रही थी लेकिन शरीर को इस धूप की मीठी गरमाहट बहुत भली लग रही थी। पूरे हफ्ते सूर्य देव ने दर्शन नहीं दिया न! इसीलिए आँखों को तेज धूप की आदत ही छूट गई है। पेड़-पौधे भी मानो झूम-झूमकर अपनी खुशी दर्शा रहे हैं। समरकांत ने रजाई एक ओर हटाई और गर्म बिस्तर से बाहर निकलकर कमरे की खिड़की के पास आकर खड़े हो गए। खिड़की से बाहर का मनोहारी दृश्य आँखों से दिल में उतरने को आतुर था, दूर पहाड़ों की चोटी पर पड़ती सुबह की चमकीली धूप से मानों पर्वत शिखर ने स्वर्ण जड़ित मुकुट धारण कर लिया और ऊँचे-ऊँचे ताड़, देवदार, सागौन आदि के वृक्ष चाकर की भाँति झूम-झूमकर चाँवर डुला रहे हैं। दूर तक जाती पगडंडी के दोनों किनारों पर झाड़ियाँ, छोटे-बड़े पौधे, घास आदि हवा की लहर से एक ही दिशा में झुक कर भागते हुए से प्रतीत हो रहे हैं तथा कहीं-कहीं इन्हीं झाड़ियों के बीच पड़े छोटे-बड़े पत्थर दुबके हुए बच्चों का भ्रम उत्पन्न कर रहे हैं। समरकांत बाहर का यह लुभावना दृश्य देखते हुए कुछ पल के लिए उसमें खो से गए। तभी किसी के पैरों की आहट से चौंक पड़े। 
"बड़े पापा आप कब जागे? बता दिया होता तो अब तक चाय बन गई होती।" खिड़की के पास खड़े समरकांत को देखकर रजत बोला। 
रजत समरकांत के छोटे भाई रविकांत का बेटा था। 
"आज मौसम साफ है और अभी बदलने के कोई आसार भी नहीं हैं, मैं सोच रहा हूँ शहर चला जाता हूँ, शाम तक वापस आ जाऊँगा।" समरकांत यथावत् बाहर देखते हुए गंभीर मुद्रा में बोले।
"जैसी आपकी इच्छा, मैं रश्मि को बोल देता हूँ कि आपके लिए नाश्ता तैयार कर देगी और आपको कुछ चाहिए तो वो भी बता दीजिए।" रजत बोला।
"कुछ नहीं, सोच रहा हूँ कि आश्रम और अस्पताल भी चला जाऊँ, इसके लिए मुझे जो भी आवश्यकता होगी, मैं वहीं से ले लूँगा।"  समरकांत बोले। वह हर महीने शहर में वृद्धाश्रम और सरकारी अस्पताल जाया करते थे, वृद्धाश्रम में वह वहाँ रहने वाले वृद्धों के साथ अपना समय बिताते उनकी आवश्यकताएँ सुनते और उन्हें पूरा करते। अस्पताल का भी एक चक्कर अवश्य लगाते यदि कोई असहाय जरूरत मंद होता तो उसकी यथासंभव मदद करते। एक बार उनके भाई समान मदनलाल ने पूछ लिया था कि वह ये सब क्यों करते हैं, वृद्धाश्रम में दानपुण्य तो समझ आता है पर अस्पताल में क्यों? जबकि अस्पताल में वो हमेशा दान नहीं करते जब कोई बेसहारा होता है उसी की जिम्मेदारी लेते हैं। 
तब उन्होंने गंभीर मुद्रा में किंतु एक हल्की मुस्कान के साथ बस इतना ही कहा कि "ऐसा करके वह किसी और समर की सहायता करने का प्रयास करते हैं।"
रजत ने अपनी पत्नी रश्मि को उनके लिए नाश्ता तैयार करने के लिए कहकर स्वयं उनके कपड़े आदि तैयार करने लगा। 
समरकांत नाश्ता आदि दैनिक प्रक्रिया पूर्ण करके ज्यों ही शहर जाने के लिए निकलने लगे तभी रजत बोला- "बड़े पापा रुकिए, मैं आपको बस स्टैंड तक छोड़ देता हूँ।"
"ठीक है बेटा चलो, अच्छा है जल्दी पहुँच जाऊँगा तो नौ बजे की बस मिल जाएगी।" कहते हुए समरकांत गेट पर ही खड़े हो गए। 
पोर्टिको से गाड़ी निकालकर रजत गेट पर लाया और समरकांत को बैठाकर गंतव्य की ओर बढ़ चला। उसके मस्तिष्क में न जाने क्या चल रहा था और न जाने क्यों वह जब-तब मन ही मन मुस्कुरा पड़ता। गाड़ी पथरीली किंतु ऊँची-नीची पगडंडी को छोड़कर सड़क पर आ गई थी। सड़क के इस रास्ते की दूरी बगीचे के रास्ते से अधिक है किंतु समतल और चारपहिया गाड़ियों के लिए यही उचित है। बस-अड्डे से जिसे पैदल गाँव तक आना होता है, वह बगीचे वाले छोटे रास्ते से आता है लेकिन गाड़ी और मोटर साइकिल से आने वाले सड़क वाला लंबा रास्ता ही प्रयोग करते हैं। क्योंकि वह सुगम और समतल है। 

समरकांत कुछ ही महीनों में पूरे पचपन वर्ष के हो जाएँगे, उन्होंने शादी नहीं की। रजत उनके छोटे भाई का बेटा है परंतु उन्हें अपने पिता से अधिक सम्मान देता है। जहाँ बात दोनों में से किसी एक को पहले महत्व देने की होती, वहाँ वह पहले अपने बड़े पापा यानि समरकांत को ही महत्व देता। उसकी इस भावना को देखकर समरकांत के छोटे भाई रविकांत को भी बहुत खुशी होती। 
रजत की यह भावना मात्र संयोग नहीं है बल्कि वह मानता है कि उसके जीवन की सबसे बड़ी खुशी उसे समरकांत के ही कारण मिली है।और वैसे भी रजत और रविकांत के अलावा उनका अपना और है ही कौन। वह एक पल के लिए भी नहीं भूलता जब वह हॉस्टल से वापस आया था तब उसके विवाह के लिए रिश्ते आने लगे थे, लेकिन वह अभी विवाह नहीं करना चाहता था इसलिए उसने अपने पापा जी से अभी एक-दो साल रुकने के लिए कहा। वह चाहता था कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो जाए उसके बाद ही शादी की जिम्मेदारी को उठाए। परंतु रविकांत और उनके पिताजी रजत की इस इच्छा को मानकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहते थे। उन्हें भय था कि यदि उन्होंने उसकी बात मान ली तो हो सकता है कि एक-दो साल के बाद रजत भी अपने बड़े पापा समरकांत की भाँति काम और तरक्की के जुनून में शादी ही न करे। समरकांत ने भी तो कई वर्षों के लिए अपना घर-परिवार और गाँव सब छोड़ दिया था और शहर में अपनी कंपनी के दिए फ्लैट में रहने लगे थे। अब रविकांत अपने इकलौते बेटे रजत को ऐसा कोई अवसर नहीं देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने साफ-साफ शब्दों में कह दिया था कि योग्य लड़की मिलते ही उसे शादी करनी पड़ेगी। करियर का क्या है! वो यहाँ रहते हुए शादी के बाद भी बनाया जा सकता है, कुछ नहीं हुआ तो घर का बिजनेस तो है ही। अब रजत को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? उसने बहुत प्रयास किया, कभी पापा को मनाने की कोशिश की तो कभी दादा जी को पर उसे निराशा ही हाथ लगी। दादा जी अपने जीते जी पोते की शादी देखना चाहते थे तो पापा जी को रजत के दूर होने का और दादा जी की इच्छा अधूरी रह जाने का भय था। अतः उसने बड़े पापा से मदद की गुहार लगाई, पर पता नहीं कैसे बड़े पापा को शक हो गया कि शादी से मना करने की वजह कुछ और है। तब उन्होंने कहा था- "शादी न करने के जो कारण तुम बता रहे हो बेटा वो तो नहीं है, अगर तुम्हारा करियर ही अभी शादी न करने की वजह होता तो रवि जो सुझाव दे रहा है, वही ठीक है। तुम शादी के बाद भी करियर बना सकते हो, लेकिन जैसा मैं समझ रहा हूँ कि कारण कुछ और है तो जाकर रवि को सही कारण बता दो, सारी समस्या का समाधान हो जाएगा।" ऐसा कहकर ही समरकांत उठकर कहीं चले गए।
रजत को कुछ समझ नहीं आ रहा था, वह तो हर ओर से निराश हो चुका था। अब उसे बड़े पापा की ही बात उचित लगी और जब संध्या समय उसके रिश्ते के लिए बात करने कोई आए थे तो वह अपने पापा को हाथ पकड़कर भीतर ले गया और बोला, "पापा आप समझिए मैं ये शादी नहीं कर सकता।"
"क्यों नहीं कर सकते? तुम्हें बता दिया है कि शादी तुम्हें करनी ही है।"
"क्योंकि मैं किसी और लड़की से प्यार करता हूँ।" कोई और रास्ता न देखकर रजत को बोलना पड़ा।
"क्या!...कौन है वो लड़की?" पापा के चेहरे पर क्रोध मिश्रित आश्चर्य दिखाई दे रहा था।
"वो मेरे साथ कॉलेज में पढ़ती थी, रश्मि देसाई नाम है उसका, उसके नाना जी वहाँ के बड़े अस्पताल में सीनियर डॉक्टर हैं, उसके पापा जी नहीं हैं इसलिए वह नाना जी के साथ रहती है।" 
रजत को डर था कि कहीं पापा जाति या क्षेत्र के फेर में न पड़ जाएँ कि ये राजपूत और वो देसाई और उसका भय सिर्फ भय नहीं बल्कि  सत्य निकला। रविकांत ने पहले तो सभी मेहमानों को स्वागत-सत्कार करके विदा किया। तत्पश्चात् रजत से बात की, बिरादरी से बाहर वो भी शहर की आधुनिक लड़की! गाँव में कैसे रह पाएगी? और यदि तालमेल न बिठा पाई तो उनके इकलौते बेटे को भी शहर ले जाएगी, इसलिए वो इस शादी के लिए तैयार नहीं हुए। 

रजत क्रोध में पैर पटकता घर से बाहर चला गया। जब देर रात तक वह नहीं लौटा तब समरकांत उसे ढूँढ़ते हुए घर से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर खाई के किनारे वाले बाग में पहुँचे और वहीं बाग के छोर पर ही रखे लोहे के बेंच पर रजत लेटा हुआ था। 
समरकांत वहीं उसके पैर के पास बैठ गए और बोले- "पूरा गाँव खोज डाला मैंने तब किसी से पता चला कि तू यहाँ है। चल, अब घर चल।"

"बड़े पापा प्लीज़ मुझे अभी एक-दो घंटे यहीं अकेला छोड़ दीजिए।" रजत बोला।

"क्या हुआ? कुछ बताएगा भी!" 

"आपके कहने से मैंने रश्मि की बात पापा को बता दी, परिणाम क्या हुआ! नामंजूर। जैसे किसी को मेरी खुशियों से कोई मतलब ही नहीं है, बस वो गाँव में कैसे रहेगी, वो सबके साथ निभा पाएगी या नहीं, बिरादरी से बाहर शादी किया तो लोग क्या कहेंगे..कहीं उनके बेटे को उनसे अलग न कर दे और ऐसे न जाने कितने दकियानूसी बातें। आप ही बताइए बड़े पापा इसमें मेरी खुशी के बारे में किसने और क्या सोचा?" रजत ने आवेश में कहा।

"तो क्या इस समस्या से भागकर तुझे कोई समाधान मिला?" समरकांत ने कहा।
"तो क्या करूँ? वहाँ किसी को उनका बेटा या पोता नहीं अपनी जाति बिरादरी की बहू लाने के लिए एक माध्यम चाहिए, जो मैं कतई नहीं बनना चाहता।"

"तो इसके लिए तू घर छोड़ देगा? पूरे परिवार से अलग हो जाएगा? तुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा जब लोग उस लड़की पर ये आरोप लगाएँगे कि उसने उनसे उनका बेटा छीन लिया?" 
रजत चुप रहा।

"फर्क तुझे भी पड़ेगा बेटा इसीलिए कह रहा हूँ कि घर चल, फिर सोचते हैं कि क्या करना चाहिए। मैं पिता जी से बात करता हूँ, तू अभी चल।" समरकांत बोले।

उनके बहुत समझाने और आश्वासन देने के बाद रजत घर वापस आने के लिए तैयार हुआ। रात हो चुकी थी, साफ नीले आसमान में जगमग करते तारे ऐसे लग रहे थे जैसे रजनी के आँचल में अनगिनत हीरे जड़ दिए हों और वह संध्या सुंदरी पर विजय का उल्लास लिए मस्ती से झूमती इठलाती, अपना आँचल लहराती हुई चली जा रही है। मंद-मंद शीतल पवन शरीर में सिहरन उत्पन्न कर रही थी। समरकांत रजत को समझाते हुए धीमी गति से घर की ओर बढ़ रहे थे और रजत... वह तो आसमान के असंख्य तारों में खुद को खोजता उन्हीं में लुप्त होता जा रहा था। उसके पैर समरकांत के पैरों की दिशा का अनुसरण कर रहे थे किंतु मस्तिष्क न जाने कहाँ शून्य में भटक रहा था।

घर पहुँच कर रजत सीधा अपने कमरे में चला गया। माँ ने, दादा जी ने और रविकांत ने भी उसे खाना खाने के लिए मनाने की खूब कोशिश की पर वह नहीं माना, तब समरकांत ने उससे कहा- "तुम पहले हमारे साथ खाना खा लो, खाने के बाद मैं पिताजी और रवि से बात करता हूँ।" 
तब रजत खाने के लिए तैयार हुआ और हाथ-मुँह धोकर सभी के साथ खाना खाने लगा। पर उसका ध्यान खाने में कहाँ था, उसे तो बस खाने को शर्त मान कर इस शर्त को जीतने के लिए खाना था ताकि समरकांत इसी समय रश्मि से उसकी शादी की बात कर सकें। जब सभी भोजन आदि के बाद अपने-अपने कमरों में जाने लगे तभी समरकांत ने उन्हें कहा कि उन्हें सबसे कुछ बात करनी है। सब रुक गए तब समरकांत रजत की शादी रश्मि से करने की पैरवी करते हुए बोले- "अगर रश्मि के माता-पिता अपनी बेटी की शादी हमारे बेटे से करने को तैयार हो जाएँ तो हमें क्या समस्या है, हम क्यों मना कर रहे हैं?"
"बात सिर्फ तैयार होने की नहीं है, बात बिरादरी और भविष्य में निबाह की भी है।" रविकांत बोले।
"बिरादरी! अगर आपका बेटा आपकी जिद के कारण कोई गलत कदम उठा ले, तब क्या आपकी बिरादरी आपको कुछ नहीं कहेगी, या उस गलत को सही कर देगी?" समर बोले।

"लेकिन अगर एक शहरी लड़की जिसने कभी गाँव की शक्ल ही नहीं देखी, वो न निभा पाई तो?" पिताजी बोले।

"आने वाले समय में क्या होगा..क्या नहीं? ये किसे पता है पिता जी। गाँव की लड़की को एक नयी जगह जाकर निभाने में कोई परेशानी नहीं होती, ये किसने कहा? कभी-कभी हम भविष्य के छोटे से अनिश्चित संघर्ष से भयभीत होकर उससे बचने के लिए अपना वर्तमान इतना बिगाड़ लेते हैं कि हर सकारात्मक परिस्थिति नकारात्मक दिखाई देने लगती है। उस दशा में अपना भविष्य निःसंदेह कष्टदायी बना लेते हैं।
जबकि यदि वर्तमान के उचित-अनुचित, लाभ-हानि का ध्यान रखते हुए कार्य करें तो संभव है कि भविष्य में वो संघर्ष करना ही न पड़े जिसकी हमने कल्पना की थी।"
समरकांत बेहद गंभीर मुद्रा में बोले।

"तो आप चाहते हैं कि रजत की शादी उसकी पसंद की लड़की से होनी चाहिए?" रविकांत बोले।

"हम कर देंगे, पर रजत को हमसे एक वादा करना होगा।" पिताजी बोल पड़े।

"कैसा वादा?" अब तक चुप बैठे रजत को जैसे ही उम्मीद की किरण नजर आई वह बोल पड़ा।"

"यही कि तुम कभी भी किसी भी दशा में अपना यह घर छोड़कर नहीं जाओगे।" दादा जी बोले।

रजत अपनी खुशी की अधिकता को रोक नहीं सका और तुरंत दादा जी के पास जाकर उनसे लिपट गया। 
"मैं अपने दादा जी को छोड़कर अब कहीं नहीं जाने वाला, नौकरी के लिए भी नहीं, किसी भी कारण से नहीं।" दादी जी को अपनी बाहों में भरकर रजत भावुक होकर बोला। 

कुछ देर पहले तक जिस घर में सन्नाटा छाया हुआ था, सभी उदास होकर एक-दूसरे से नजरें चुराते हुए कन्नी काट रहे थे, वहाँ अब फिर से खुशियों की खिलखिलाहट गूँज रही थी।
समरकांत ने रश्मि के पापा डॉक्टर देसाई को भी समझाकर शादी के लिए मना लिया था। और धूमधाम से दोनों का विवाह संपन्न हुआ। रश्मि के आने से घर में रौनक आ गई थी। उसने  अपने मधुर व्यवहार और सेवा भाव से सभी का दिल जीत लिया था।

"बस बेटा गाड़ी यहीं रोक दो, वो सामने बस खड़ी है।" समरकांत की आवाज सुनकर रजत की तंद्रा भंग हुई। उसने गाड़ी किनारे पर रोककर उन्हें गाड़ी से उतारा और बस में बैठाया और ध्यान से जाने की हिदायत देकर वापस अपनी गाड़ी में बैठा और घर की ओर चल दिया।
रजत को घर पहुँचकर समरकांत की अनुपस्थिति में अभी एक जरूरी काम करना था। उसकी आत्मा इस काम के लिए गवाही नहीं दे रही थी पर मदन काका ने उसे बहुत समझाया था कि शायद इसमें समरकांत की भलाई छिपी हो सकती है। अपने बड़े पापा की भलाई की बात सुन रजत तैयार हो गया था पर न जाने क्यों मन व्याकुल हो रहा था। 
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2
बस शहर की ओर दौड़ी जा रही थी। जंगल नदियाँ, नाले पहाड़ों को पार करती कभी हिचकोले खाती तो कभी अपनी गोद में उछालती, कभी बड़ी ही नर्मी से झूला झुलाती हुई अपने गंतव्य की ओर अग्रसर थी। समरकांत ख्यालों में डूबे आगे के कार्यों की योजना बना रहे थे कि उन्हें शहर पहुँच कर क्या-क्या करना है। पहले वह वृद्धाश्रम जाएँगे और वहाँ रहने वाले सभी वृद्ध और वृद्धाओं के साथ समय बिताएँगे, उनकी जरूरतें जानेंगे ताकि अगली बार उन सामानों के साथ आ सकें। फिर वह सिटी हॉस्पिटल जाएँगे और वहाँ जानेंगे कि कोई ऐसा मरीज तो नहीं जिसको उनकी आवश्यकता हो। पिछले पाँच वर्षों में वह  दो ऐसे लोगों को उनके परिवारों से मिला चुके हैं, जो एक्सीडेंट के बाद अपनी याददाश्त खो चुके थे। याददाश्त खो जाने के कारण कोई व्यक्ति जीवित रहते हुए भी किस प्रकार अपनों की नजर में ही अस्तित्वहीन हो जाता है, इसका अनुभव वह बेहद नजदीक से कर चुके हैं। इसीलिए ऐसे लोगों की सहायता करके वह उन्हें इस कष्ट से बचाना चाहते हैं। 
अस्पताल के बाद यदि समय बचा तो वह डॉ० देसाई के घर...सोचते ही समरकांत का दिल जोर से धड़क उठा। समय बचे न बचे वह तो समय निकाल ही लेंगे, ऐसा कैसे हो सकता है कि समधी के इतने नजदीक होकर उनसे मिलने न जाएँ! खैर...पहले पहुँच जाऊँ फिर सोचूँगा..अभी से इतनी रस्साकशी क्यों....

"चलिए भाई साहब उतरना नहीं है क्या बस स्टेशन आ गया।" अपनी बगल में बैठे यात्री की आवाज सुनकर उनकी तंद्रा भंग हुई। 
वह चौंककर बाहर की ओर देखने लगे, बस रुकी हुई थी। भीतर के सभी यात्री कोई अटैची लिए तो कोई बैग और कुछ महिलाएँ बच्चों का हाथ पकड़े जल्द उतरने के लिए जद्दोजहद कर रही थीं। वह उठे और आगे के यात्रियों के उतर जाने का इंतजार करने लगे।

रजत घर पहुँचकर कार पार्क करके मदनलाल के कहे अनुसार सीधे समरकांत के कमरे में गया और उनकी अलमारी में रखे संदूक को देखा। उसपर एक छोटा सा ताला लटक रहा है। रजत ताले को हाथ में पकड़कर उसे ध्यान से देखने लगा। 
"इतना छोटा सा है तू, पर मदन काका कहते हैं कि तूने अपने संरक्षण में पूरे एक जीवन को छिपा रखा है...विश्वास नहीं होता, पर जब बात मेरे बड़े पापा की है...तो अवश्य देखूँगा।"
रजत मन ही मन बड़बड़ाया।

पर क्या यह उचित होगा? बिना किसी की अनुमति के उसके व्यक्तिगत चीजों की छानबीन करना! अगर बड़े पापा को पता चला तो उनको कितना दुख होगा? नहीं...नहीं.. मैं ऐसा नहीं कर सकता.... सोचते ही रजत के हाथ से ताला छूट गया। 
'पर सोच अगर कोई ऐसी बात पता चले, जिससे उनकी जिन्दगी में खुशियाँ आ जाएँ तो कितना अच्छा रहेगा!...थोड़ा रिस्क लेना भी पड़े तो कोई बात नहीं, पर ताला तो खोलना ही है।' सोचते ही रजत के चेहरे पर दृढ़ निश्चय के भाव नजर आए और वह ताले को छोड़कर उसकी चाबी खोजने लगा। अलमारी में, संदूक के नीचे, कपड़ों के पीछे, तकिया के नीचे, सिरहाने पर गद्दे के नीचे। उसने ऐसी हर जगह जहाँ चाबी के मिलने की उम्मीद थी, ढूँढ़ लिया,  पर चाबी नहीं मिली। जब वह ढूँढकर थक गया तो सभी सामानों को यथावत् रखकर बाहर निकला और मदन काका के घर की ओर चल पड़ा। 
वहाँ पहुँचकर रजत ने मदनलाल को बताया कि उसे वह चाबी नहीं मिली तब मदन ने उसे दूसरा उपाय बताया जो कि रजत समरकांत की उपस्थिति में ही कर सकता था। अब मदनलाल अपने भाई समान मित्र के दिल में दफन राज को भी खोदकर निकाल लेना चाहते थे। ऐसा करने से वह समरकांत के लिए कुछ कर पाएँगे या नहीं ये तो वह नहीं जानते पर कोशिश तो कर ही सकते हैं, इसीलिए उन्होंने इस स्वघोषित पावन कार्य के लिए रजत को अपने साथ मिला लिया। अब रजत को समरकांत की वापसी का बेसब्री से इंतजार था।
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3
समरकांत 'अपना घर' वृद्धाश्रम के बाहर खड़े होकर उसके गेट को टकटकी बाँधे देख रहे थे। उनके कानों में पिताजी की आवाज कहीं दूर से आती सुनाई पड़ रही थी, "तू अभी शादी के लिए नहीं मान रहा है, जवान खून है न! तो अभी तुझे किसी की जरूरत महसूस नहीं होती तो तू सोचता है कभी नहीं होगी, पर बेटा जब शरीर थक जाएगा, काया बूढ़ी हो जाएगी, तब तुझे किसी के सहारे की जरूरत पड़ेगी और उस समय तेरे आस-पास कोई नहीं होगा।"

"जो लोग शादी करके घर बसा लेते हैं, परिवार में बेटे-बेटी सभी होते हैं, फिर वो क्यों वृद्धावस्था में अकेले और बेसहारा हो जाते हैं।" समरकांत ने तैश में आकर कहा था। 
"पिताजी! कल किसने देखा है? शादी कर लेने से ही जिंदगी की सारी समस्याएँ हल हो जातीं तो कोई भी शादीशुदा व्यक्ति कभी परेशानी नहीं उठाता। शादी करके मैं सिर्फ अपने घर-परिवार से बँधकर रह जाऊँगा, जबकि मैं बेसहारा वृद्धों की सेवा तथा और भी जैसे हो सके समाज की सेवा करना चाहता हूँ।"

समरकांत ने अपनी भावनाओं को नियंत्रित करके अपने पिताजी को समझाते हुए कहा था।
न चाहते हुए भी पिताजी को सहमत होना पड़ा था।  समरकांत ने धीरे-धीरे स्वयं को समाजसेवा के कार्यों में इसप्रकार डुबा दिया कि उन्हें न खाने का होश होता न सोने का। दफ्तर से जो समय बचता वह बेसहारों का सहारा बनने में निकल जाता। फिर धीरे-धीरे एक बार रेलवे स्टेशन से किसी बेसहारा वृद्धा को लेकर इस 'अपना घर' वृद्धाश्रम में आए और यहाँ अपनों के इंतजार में टकटकी बाँधे सूनी आँखों में ऐसे खोए कि यहाँ का मोह न तोड़ सके और नियमित रूप से यहाँ आना शुरू कर दिया।

"अरे साहब आप बाहर क्यों खड़े हैं आइए न!" गेट पर खड़े वॉचमैन ने समरकांत को देखते ही हाथ जोड़कर कहा।

"कैसे हो दिवाकर! सब ठीक-ठाक है?" समरकांत ने कहा।
"सब ठीक है साहब, वो लाजवंती दीदी हैं न! पिछले हफ्ते उनकी तबीयत खराब हो गई थी तब उन्हें अस्पताल ले गए थे। अब वो आ गई हैं, ठीक हैं लेकिन बहुत कमजोर हो गई हैं। दिन भर बेचारी इंतजार करती रहती हैं कि उनका बेटा उनकी खराब तबियत की बात सुनकर आएगा। उनका दिल मानने को तैयार ही नहीं है कि अगर उसे आना होता तो छोड़कर ही क्यों जाता।" 
दिवाकर समरकांत को देखकर अपनी ही रौ में बोलता गया। समरकांत हर महीने कभी-कभी तो महीने में दो बार यहाँ आते थे, इसलिए आश्रम का हर व्यक्ति उनसे न सिर्फ भलीभाँति परिचित बल्कि उनसे परिवार के सदस्य की भाँति घुलमिल गया था फिर चाहे वो वॉचमैन हो या अधिकारी।
"अरे दिवाकर, सारी जिंदगी जिसे अपने कलेजे का टुकड़ा मान, आँखों का नूर समझकर पाला हो, बुढ़ापे में आँखें उसको नहीं खोजेंगीं तो किसे खोजेंगीं। हर व्यक्ति का पूरा परिवार और जीवन भर की जमापूँजी उसकी संतान ही होती है। इस उम्र में जब अपनी जीवनभर की जमापूँजी को अपनी हथेलियों में जकड़ लेना चाहता है, जब वह अपने अपनों से हर समय घिरा रहना चाहता है, तब वह एकदम से अकेला हो जाता है, फिर उसका इंतज़ार तो स्वाभाविक ही है न दिवाकर।"

"आप सही कह रहे हो साहब पर आजकल की औलादें कहाँ समझती हैं बुढ़ापे की इस ज़रूरत को! सब मतलब के यार हैं। आजकल तो रिश्तों को भी व्यापार की तरह चलाया जाता है साहब। जब तक किसी रिश्ते से फायदा है, तब तक वह  रिश्ता जुड़ा हुआ है, घाटे का रिश्ता कोई नहीं रखना चाहता। बस मां-बाप ही हैं जो अपना पूरा जीवन लगा देते हैं औलाद का जीवन बनाने में, बिना घाटा-नफा की परवाह किए पर औलादें व्यापारी बनकर पहला व्यापार उन्हीं से कर बैठती हैं और....."

तभी गेट पर किसी अन्य आगंतुक को देखकर दिवाकर अपनी बात अधूरी छोड़ देता है और उसकी ओर बढ़ जाता है। समरकांत आश्रम के दफ्तर की ओर चल देते हैं।
दफ्तर में समरकांत ने मैनेजर से कुछ देर बातें कीं और फिर लाजवंती तथा अन्य वृद्धों से मिलने के लिए उनके हॉलनुमा कमरे की ओर चल पड़े। समरकांत को देखकर वहाँ उपस्थित सभी वृद्ध-वृद्धाएँ बहुत प्रसन्न हुए। समर को यहाँ से कहीं और भी जाना था इसलिए वह जल्द ही सभी से मिलकर निकल जाना चाहते थे। उन्होंने सभी से उनका हालचाल पूछा तकरीबन सभी को बिना चिंता किए स्वास्थ्यवर्धक भोजन खाने और रोज सुबह टहलने की सलाह देकर उनकी जरूरतों की लिस्ट तैयार किया ताकि अगली बार उन सामानों के साथ आएँ और अपने अगले गंतव्य की ओर चल दिए। 
समरकांत के दिलो-दिमाग पर इस समय एक ही चेहरा न चाहते हुए भी हावी था। वह चाहते थे जल्द से जल्द वहाँ पहुँच जाएँ ताकि उस चेहरे का दीदार कर सकें जिसे देखने के लिए वह न जाने कितने बहाने बनाकर यहाँ आया करते हैं। 

अस्पताल के कॉरीडोर में आते ही फिनायल की तीखी गंध से समरकांत की नाक भर गई। उन्होंने कॉरीडोर में पोछा लगाते हुए लड़के से मुस्कुरा कर कहा- "अरे भई फिनायल कीटाणुओं को मारने के लिए होता न कि इंसानों को।"
"नमस्ते सा'ब, अभी थोड़ी देर में गंध उड़ जाएगी।" लड़के ने नकली हँसी हँसते हुए दाँत चमकाते हुए कहा।
समरकांत सिर हिलाकर उसका अभिवादन स्वीकारते हुए डॉ० देसाई के केबिन की ओर बढ़ गए। 
"आइए-आइए समरकांत जी इस बार तो काफी लंबी छुट्टी ले ली आपने अस्पताल से, मैं आज आपको फोन करने ही वाला था कि यहाँ किसी को आपका इंतजार है।" बड़े से मेज के पीछे रखी अपनी बड़ी सी कुर्सी से उठकर गर्मजोशी से समरकांत से हाथ मिलाते हुए डॉ० देसाई ने कहा। अस्सी-पिच्चासी की उम्र में भी अपनी उम्र को मात देते हुए साठ साल से ज्यादा के नहीं लगते डॉ० देसाई।

"क्या बात कर रहे हैं डॉ० साहब क्या फिर कोई किस्मत का मारा अपने अपनों से बिछड़ गया?"  समरकांत मेज के सामने रखी कुर्सी पर बैठते हुए बोले।

"आप मुझे डॉ० साहब कहना नहीं छोड़ेंगे।" डॉ० देसाई शिकायती लहजे में बोले।

"वो तो आदत हो चुकी है, फिर जिसे भगवान का दूत बनकर लोगों की जान बचाने के लिए जद्दोजहद करते देखता हूँ उसका ओहदा कैसे भूल जाऊँ।" समरकांत मुस्कुराते हुए बोले।

"आपसे तो मैं बातों में जीत ही नहीं सकता, मेरे बेटे की उम्र के हैं पर बातें मुझसे भी बड़ी उम्र वालों की करते हैं। खैर, वो पेशेंट अपनी याददाश्त भूल चुकी है पर आपके होते हुए वो किस्मत की मारी नहीं हो सकती।" डॉ० देसाई के होठों पर हल्की सी मुस्कुराहट सजी हुई है।

"अच्छा तो चलिए मिलते हैं उस पेशेंट से फिर शुरू करते हैं अपनी खोजबीन।" समरकांत बोले।
"पहले कुछ चाय-पानी तो हो जाए फिर मिलवाता हूँ।" डॉ० देसाई बोले।

समरकांत ने मेज पर रखे पानी के गिलास को उठाकर एक ही साँस में खाली कर दिया और मुस्कुराते हुए बोले, "पानी तो हो गया, चाय का अभी मन नहीं, अब चलें।"

डॉ० देसाई समरकांत की इस जल्दबाजी पर  हँसते हुए खड़े हो गए। दोनों बातें करते हुए जनरल वार्ड के आगे से गुजरते हुए आई.सी.यू. में पहुँचे। वहाँ डॉ० देसाई ने समरकांत को एक महिला पेशेंट को (जिसे नींद का इंजेक्शन देकर सुलाया गया था) दिखाते हुए कुछ बताया। समरकांत ने अपने मोबाइल से उसकी फोटो खींची और डॉ० से उसका मेडिकल रिपोर्ट तथा ब्लड ग्रुप आदि देने के लिए कहा। 
दोनों पुनः बातें करते हुए वापस आ गए। 
डॉ० देसाई समरकांत को आग्रहपूर्वक भोजन के लिए अपने घर ले गए। 

गाड़ी बड़े से गेड के सामने रुकी, चौकीदार ने अभिवादन करते हुए जल्दी से गेट खोला और गाड़ी अंदर प्रवेश करती हुई बाँयी ओर मुड़कर पोर्टिको में जाकर रुकी। डॉ० देसाई और समरकांत गाड़ी से उतर कर बंगले के मुख्यद्वार की ओर बढ़े। 
समरकांत का दिल न जाने क्यों जोर-जोर से धड़क रहा था, वैसे तो वह यहाँ अक्सर ही आते रहते हैं किंतु जब भी आते हैं हमेशा ही व्यग्रता और बेचैनी बढ़-सी जाती है।
आधुनिक तरीके से सुसज्जित बड़े से हॉल में सोफे पर बैठे हुए समरकांत की नजरें चारों ओर किसी को खोज रही थीं, बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी। डॉ० देसाई दो मिनट के लिए भीतर किसी काम से चले गए थे। इस दो मिनट में समरकांत न जाने क्या देखने का प्रयास कर रहे थे और असफलता के अंदेशे से उनका मनोबल टूटता जा रहा था। न चाहते हुए भी निराशा की परछाई चेहरे पर नजर आने लगी थी। 
क्या मेरा इतनी दूर आना व्यर्थ हो जाएगा.... क्या एक झलक देख भी नहीं पाऊँगा....मैं....मैं कुछ गलत तो नहीं कर रहा?...पर इसमें क्या गलत है???? ऐसे ही न जाने कितने सवालों के भँवर में घिरे समरकांत बेचैन होकर खड़े हो गए और इधर-उधर चहलकदमी करने लगे। 

"क्या हुआ समर बाबू आप खड़े क्यों हो गए?" भीतर से आते हुए डॉ० देसाई बोले।

"क्कुछ नहीं डॉ० साहब बस थोड़ी सी बेचैनी महसूस हो रही थी, पर अब बिल्कुल ठीक हूँ।" समरकांत बैठते हुए बोले।

"क्या बात कर रहे हैं, बेचैनी! इसे इतना हल्के में भी मत लीजिए, चलिए मैं चेक करता हूँ।" खड़े होते हुए डॉ० देसाई बोले।

"अरे बैठिए आप भी, कहाँ हर जगह अपना मरीज ढूँढ़ लेते हैं। मैं बिल्कुल ठीक हूँ। अभी कुछ नहीं होने वाला है मुझे, बूढ़ा दिखता हूँगा पर हूँ नहीं।" समरकांत डॉ० देसाई का हाथ पकड़कर उन्हें सोफे पर बैठाते हुए बोले। 

नौकरानी मेज पर ट्रे में कुछ मिठाइयाँ और पानी का जग व गिलास रखकर चली गई।

"आज आप घर में अकेले हैं?" आखिर समर से रहा न गया और उन्होंने पूछ ही लिया। 

"जी नहीं समधी जी मैं भी हूँ, नमस्कार।" भीतर से आती हुई डॉ० देसाई की बेटी रागिनी हाथ जोड़कर बोली।
आवाज सुनते ही समरकांत का दिल इतनी जोर से धड़क उठा मानो सीने से टकराकर बाहर आ जाएगा। गोरा दूधिया रंग जैसे दूध में एक चुटकी सिंदूर मिला दिया गया हो, बड़ी-बड़ी नीली कजरारी आँखें घनी पलकों का आवरण पड़ते ही जैसे बादलों ने नीला आकाश ढँक लिया हो। पतले मांसल गुलाबी होंठ हरपल ऐसे लगते मानो बोल पड़ेंगे। सुराहीदार पतली गर्दन में मोतियों की माला अपने भाग्य पर इतराती हुई प्रतीत हो रही थी। शिफॉन और शिमर मिक्स कपड़े की हल्के नीले रंग की प्लेन साड़ी में सुनहरा पतला बार्डर ऐसा लग रहा था जैसे सोने के तारों की भिन्न-भिन्न कलाकृतियों को पिरोकर साड़ी में टाँक दिया हो और रागिनी की छरहरी सुडौल काया पर सजकर तो साड़ी का सौंदर्य निखर गया। रागिनी की उम्र वैसे तो पचास वर्ष के आसपास है पर देखने में पैंतीस से ज्यादा नहीं लगती। 

समरकांत एकटक रागिनी को देख रहे थे, वह भूल गए कि वह कहाँ और किसके साथ बैठे हैं।  "क्या हुआ, मैं कुछ अजीब लग रही हूँ क्या?" रागिनी उन्हें इस प्रकार घूरते देख अचकचाकर बोली।
समरकांत को अपनी गलती का अहसास हुआ, वह संभलते हुए बोले- "नहीं आप अजीब नहीं मैं गरीब लग रहा हूँ।" और तीनों हँस पड़े। 

डॉ० देसाई समरकांत को अर्थपूर्ण नजरों से देखते हैं जैसे कुछ कहना चाहते हों, लेकिन जैसे ही समर उनकी ओर देखते हैं वह दूसरी ओर देखने लगते हैं। 
तीनों में बहुत देर तक घर-परिवार और समरकांत की समाजसेवा से संबंधित बातें होती हैं, बीच-बीच में हल्के-फुल्के मजाक से माहौल रोचक बना हुआ था। समरकांत मन ही मन सोच रहे थे काश समय यहीं ठहर जाय....
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4
दिन भर की यात्रा से थका माँदा सूरज अपनी किरणों को समेटते हुए उदासीन-सा पश्चिम दिशा में फैले पर्वत श्रृंखलाओं के पीछे अस्त होता हुआ विश्राम को आतुर प्रतीत हो रहा था। घर के बाहर लॉन में बैठे रजत की आँखें बार-बार गेट का मुआयना कर आतीं। उसे समरकांत का बेसब्री से इंतजार था, न जाने क्यों बार-बार उसे इस बात का डर सता रहा था कि कहीं वह आज शहर में ही रुक गए तो? कभी वह सोचता कि क्यों न गाड़ी लेकर स्टेशन ही चला जाए! फिर दूसरे ही पल ख्याल आता कि अगर वह गाड़ी से बस स्टेशन जाएगा और वह दूसरे रास्ते आ गए तो उसका जाना व्यर्थ हो जाएगा। अचानक वह खुशी से उछल पड़ा और अपने ही माथे पर एक धौल जमाता हुआ बोला- "कितना बेवकूफ हूँ मैं, अब तक मेरे दिमाग में क्यों नहीं आया!" और बोलते हुए उसने अपनी जेब से मोबाइल निकालकर समरकांत का नंबर डायल किया, बात करते हुए उसके चेहरे से खुशी झलक रही थी, उसे देख अंदाजा लगाया जा सकता था कि उसके मन की मुराद पूरी हो गई। वह शीघ्रता से पार्किंग में गया, गाड़ी निकाली और सड़क की ओर दौड़ा दिया।
समरकांत हमेशा ही महीने में कम से कम एक बार तो शहर जाते ही हैं, पर रजत को इतनी बेचैनी से उनके वापस आने का इंतजार कभी नहीं हुआ, जितनी बेचैनी से आज हो रहा था।

बैठक में समरकांत और रजत नें प्रवेश किया तो रश्मि और रविकांत को अपने इंतजार में बैठे पाया। 
"आज तो बड़ी देर लगा दी भैया आपने! कहाँ रह गए थे?" उन्हें देखते ही रविकांत खड़े होते हुए बोले।
"अरे भई तुम लोग तो नाहक ही परेशान हो जाते हो, पता तो है न अस्पताल जाता हूँ तो रश्मि बिटिया के नाना जी कभी घर ले जाए बिना मानते ही नहीं।" समरकांत बैठते हुए बोले। 
"आप वहाँ गए थे! कैसे हैं नाना जी और मम्मी जी?" पास ही खड़ी रश्मि बोली पड़ी, खुशी उसके चेहरे से झलक रही थी।
"सब ठीक हैं, मजे में हैं। तुम्हारे नाना जी और मम्मी तो पता नहीं क्या खाते हैं बूढ़े ही नहीं होते।" समरकांत मजाकिया लहजे में बोले। 
आज उनके चेहरे पर नई ऊर्जा झलक रही थी। उन्हें देखकर लगता ही नहीं था कि वह पूरे दिन के सफर से वापस आए हैं। मन रह-रहकर उल्लसित हो उठता। उनका मन कर रहा था कि खुश होकर ज़ोर से चिल्लाएँ, पर वो ऐसा नहीं कर सकते थे। उनका मन पंछी बन उड़कर अपनी पसंदीदा जगह पर पहुँच जाना चाहता था, पर रात हो गई थी। इतने सर्द मौसम में कोई उन्हें कहीं जाने भी नहीं देगा। खुशी के साथ-साथ उन्हें बेचैनी भी थी कि कब जल्दी से सुबह हो और वह वहाँ जा सकें जहाँ वह अपने दिल का हाल खुलकर कह सकते हैं। वो जगह जहाँ का कण-कण, पत्ता-पत्ता उनके हर सुख-दुख का साथी है। 
समरकांत अलाव के सामने बैठे चाय पीते हुए मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे तभी अंदर आते हुए मदनलाल उन्हें देखते ही बोल पड़े-
"क्या बात है भाई साहब आप तो अकेले-अकेले ही मुस्कुरा रहे हैं, आज कोई कश्मीर की कली मिल गई क्या?"
"अरे आओ..आओ मदनलाल, इस सूखते दरख्त को कौन सी कश्मीर की कली मिलने वाली है भई, वो तो आज डॉ० साहब की कोई बात याद आ गई बस हँसी आ गई। तुम बताओ कैसे हो? कई दिनों के बाद दिखाई दिए हो।" 

"क्या करूँ भाई साहब बूढ़े दरख़्त की हरियाली ढूँढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ।" मदनलाल के मुँह से बेसाख्ता ही निकल गया। 

"क्या मतलब" समरकांत न जाने क्यूँ हड़बड़ा उठे।
"म मेरा मतलब अपनी बूढ़ी हड्डियों का इलाज करवाने के लिए शहर के चक्कर लगा रहा हूँ।" वह बात को संभालते हुए बोले और दूसरी ओर मुँह करके एक लंबी साँस छोड़ी जैसे अपना झूठ पकड़े जाने का सारा भय साँस के जरिए बाहर निकाल देना चाहते हैं।

"तो ऐसे बोलो न, पहेलियाँ क्यों बुझा रहे हो!" समरकांत मुस्कुराते हुए बोले।

"आपकी संगत का कुछ भी असर न हुआ तो इतने सालों की संगति पर सवालिया निशान न लग जाएगा? आपको तो अपने समाज सेवा के सिवा कुछ और दिखता ही नहीं तो मुझे ही इस विषय में कुछ करना पड़ेगा।" मदनलाल अपनी कॉलर ऊँची करते हुए ऐसे बोले जैसे कितना महान काम करके वापस आए हों। उनकी ऐसी हरकत देख समरकांत हँस पड़े। 
उनकी ऐसी ही नोक-झोंक, सराहना-उलाहना में रात के साढ़े-दस कब बज गए पता ही नहीं चला। 
समरकांत रोज रात को चाय पीकर सोने चले जाते हैं और सोने से पहले अपनी नीली डायरी में कुछ वर्तमान का अनुभव उतारते हैं तो कुछ भूत के अहसासों को ताजा करते हैं और ऐसा करते-करते जब निद्रा स्वयं उन्हें अपने आगोश में समाने को व्यग्र हो उठती है, तभी वो अपनी डायरी को तकिये के नीचे रखकर सो जाते हैं। कभी-कभी तो पढ़ते-पढ़ते अपने सीने पर रख यूँ ही सो जाते हैं। 
आज वह चाय पी चुके, पर मदनलाल से बातों में ऐसे उलझे कि समय का पता ही न चला। परंतु आज उनके सोने की शीघ्रता उनसे अधिक रजत को थी, इसलिए जब उसने समरकांत को वहाँ से उठते नहीं देखा तो स्वयं भीतर आ गया और बोला- 

"बड़े पापा आज आप पूरे दिन बाहर रहे हैं, जरा भी आराम नहीं किया, अब सो जाइए नहीं तो आपकी तबियत बिगड़ सकती है।"

"अरे हाँ..हाँ भाई साहब मैं तो आपसे बातों में ऐसा उलझा कि समय का ध्यान ही नहीं रहा। जाइए सो जाइए नहीं तो बूढ़ी हड्डियाँ नाराज हो जाएँगीं।" मदनलाल हँसते हुए बोले और उठकर बाहर की ओर चल दिए।

"हाँ..हाँ मदन सही कह रहे हो, तुम्हारी तो नाराज हो ही चुकी हैं न! अनुभवी हो गए हो।" समरकांत हँसते हुए कहते हैं और अपने कमरे की ओर चल दिए।
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5
रजत की आँखों में दूर-दूर तक नींद का नामोनिशान तक नहीं था, उसके दिमाग में विचारों का द्वंद्व चल रहा था, वह बार-बार करवटें बदलता कभी उठकर वॉशरूम तक जाता और फिर वापस आकर लेट जाता। एक ओर वह सोचता कि 'क्या वह जो करने जा रहा है वह सही है?. किसी की व्यक्तिगत चीज को चोरी से लेना गलत है.... कहीं उन्हें पता चल गया तो क्या इस विश्वासघात को वह कभी माफ कर पाएँगे? तो दूसरी ओर वह तुरंत सोचता..तो क्या हुआ!..ये चोरी भी तो उन्हीं के फायदे के लिए है....अगर जैसा हम सोच रहे हैं, हमें उनके विषय में कुछ पता चल जाए तो शायद हम उनके लिए कुछ अच्छा कर सकें।' इसी उधेड़-बुन में उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उसने मोबाइल में समय देखा रात के एक बज चुके थे, 'अब तक तो बड़े पापा शायद सो चुके होंगे।' सोचकर वह उठ बैठा, रश्मि के चेहरे को ध्यान से देखा, खिड़की से छनकर आती दूधिया चाँदनी की रोशनी से नहाया उसका चेहरा किसी सोते हुए मासूम बच्चे सा लग रहा था। वह आश्वस्त होकर धीरे से बिस्तर से उतरा और समरकांत के कमरे की ओर चल दिया। इस बीच वह अपना मोबाइल लेना नहीं भूला। 

कमरे के दरवाजे को धीरे से धकेलकर खोला और दबे पाँव भीतर आया। समरकांत खिड़की के पास अपने पलंग पर सो रहे थे। चेहरे पर बेहद शांति और सुकून के भाव थे। खुली हुई डायरी सीने पर पूरे अधिकार से अपने पन्नों को बाँहों का घेरा बना लिपटी हुई पड़ी थी। एक हथेली डायरी के ऊपर थी मानों सीने से अलग न करना चाहते हों। रजत दो मिनट तक खड़ा होकर उन्हें देखते हुए कुछ सोचता रहा, शायद साहस जुटा रहा था डायरी को समरकांत से जुदा करने का। फिर उसने अपना मोबाइल वहीं रखा और धीरे से एक हाथ से उनका हाथ पकड़कर हल्का सा उठाया और दूसरे हाथ से डायरी पकड़कर सरका लिया। अब डायरी उसके हाथ में थी। 
उसने अपना दाहिना हाथ सीने पर रखकर एक लंबी सी साँस ली और अपना मोबाइल और डायरी लेकर तेजी से किन्तु दबे पाँव बाहर आ गया।

दूसरे कमरे में आकर रजत ने उस डायरी को बड़े गौर से देखा, उसे महसूस हुआ जैसे उस नीले रंग की डायरी में बड़े पापा का जीवन सिमटा हुआ है। उसे याद आया जब एक बार उसने समरकांत से पूछा था, 
"बड़े पापा! ऐसा क्या है इस डायरी में, जो इसके बिना कभी आपका दिन पूरा नहीं होता? आप इसी में लिखते हो और इसे ही पढ़ते हो।"
तब उन्होंने कहा था-
"बेटा, ये मेरा जीवन है, मैं इसे पढ़ता नहीं, इसमें अपना जीवन जीता हूँ, और लिखता इसलिए हूँ ताकि जीने के लिए साँसें मिलती रहें।"

रजत एक ओर रखी कुर्सी पर बैठ गया और उसने अपने मोबाइल का फ्लैशलाइट ऑन किया और डायरी के सभी पन्नों की एक-एक करके फोटो खींची और फिर समरकांत के कमरे में जाकर डायरी को उनके सीने पर यथावत् रखकर बाहर आ गया। 

धवल चाँदनी में नहाई हुई यामिनी अपनी पूर्ण यौवनावस्था में थी, खिड़की से बाहर का मनोहारी दृश्य चक्षुद्वय को अपने आकर्षण में बाँधे रखने के लिए सक्षम था। रजत कुछ पल तो बाहर हवा से झूमते-लहराते पेड़ों व झाड़ियों को देखता रहा। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी, बड़े पापा अपनी नीली डायरी को बेहद प्यार करते हैं, उसे अपनी जान की तरह संभाल कर रखते हैं। उसमें लिखते तो रोज नहीं देखा पर पढ़ते जरूर रोज हैं। आखिर ऐसा क्या लिखा है इस डायरी में जो वो अपने जीते जी किसी को नहीं बताना चाहते पर अपनी मृत्यु के उपरांत छिपाना भी नहीं चाहते। क्यों न अभी पढ़ूँ! सोचकर रजत अपना फोन लेकर खींची गई फोटो में डायरी के पन्ने देखता है और सोचता है इतनी मोटी, न जाने कितने वर्षों से लिखी गई डायरी इसे पूरी पढ़ने की आवश्यकता है क्या? क्यों न सिर्फ वो पन्ने पढ़े जाएँ जो जानना महत्वपूर्ण हों! पर कैसे पता चलेंगे कि कौन से पन्ने महत्वपूर्ण हैं? सोचकर फोन रख देता है, इसे पढ़ने के लिए समय चाहिए अभी सो जाऊँ कल दिन में पढ़ूँगा...पर...अभी क्यों नहीं? वह फिर फोन में डायरी का पहला पन्ना खोल लेता है और उसे सरसरी निगाह से देखते हुए पन्ने-दर-पन्ने पलटता जाता है और एक पन्ने पर रुक जाता है। वह पढ़ना शुरू करता है....

"तुम देख रही हो रत्ना! पिताजी और सभी लोग कितना पीछे पड़े हुए हैं कि मैं शादी कर लूँ, मैं कैसे समझाऊँ उन्हें कि मैं तो कब का शादी कर चुका हूं....तुम्हारी यादों से। तुमसे किए सारे वादे आखिरी साँस तक निभाऊँगा। उन्हें नहीं समझा सकता कि तुम हमेशा मेरे साथ होती हो, मैं तुम्हारे सिवा किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकता। तुम पिताजी और चाचाजी की नजर में मुझे छोड़कर हमेशा-हमेशा के लिए जा चुकी हो, इसीलिए वो चाहते हैं कि मैं अपने जीवन में तुम्हारी जगह किसी और को दे दूँ, पर इसके लिए वो जगह खाली भी तो होनी चाहिए! तुम मेरे दिल में ही नहीं आत्मा में बसती हो। उन्हें कहाँ पता है कि जिस दिन मेरे दिल में तुम नहीं होंगी, उस दिन इस दुनिया में मैं नहीं हूँगा। तुम्हें तो पता है न! मैं अब भी हर शनिवार तुम्हारे पसंदीदा फूल...अरे वही..जिसके लिए तुम मुझे छोड़कर गई थीं, हाँ..मैं हमेशा वहीं रख कर आता हूँ। जानता हूँ कि अब तुम्हारा दायरा सिर्फ उस 'खाली बेंच' तक नहीं है बल्कि अब तुम मेरी साँसों में घुलमिल कर मेरी आत्मा बनकर हरपल मेरे साथ रहती हो, फिरभी न जाने क्यों मुझे अच्छा लगता है। बहुत सुकून मिलता है रजनीगंधा के उन पुष्पों को वहाँ रखकर। मेरी दुनिया तो अब सिर्फ तुम और तुमसे जुड़ी हर चीज है। तुम्हारे बाद अगर सबसे ज्यादा प्यारा मुझे कुछ है तो वो 'खाली बेंच'। याद है न! हम दोनों की पूरी दुनिया उस खाली बेंच के इर्द-गिर्द ही घूमती थी, फिर एक दिन तुम रजनीगंधा न लाने के कारण मुझसे रूठ गईं और ऐसे गईं कि आज तक न लौटीं। रत्ना मुझे पता होता कि वो फूल तुम्हारे लिए इतने जरूरी हैं, तो मैं दुनिया के किसी भी कोने से लाता पर बिना फूल लिए नहीं आता। 
रत्ना! मुझे हर वो चीज प्यारी है जो तुम्हें पसंद है, इसीलिए तो ये फूल मैंने अपने घर के बगीचे में भी लगा लिए हैं, मैं जानता हूँ अब तुम इनकी खुशबू के साथ मेरे पूरे घर में यहाँ के कोने-कोने में समाई हुई हो। अब ऐसे में किसी और के लिए जगह कहाँ है। पर इन सबको कैसे समझाऊँ? लेकिन... तुम डरना मत तुम्हारा समर सिर्फ तुम्हारा है, इसीलिए तो मैंने खुद को समाजसेवा में लगा दिया और एक वृद्धाश्रम की पूरी जिम्मेदारी ले ली है। अब मैंने पिताजी को साफ-साफ कह दिया है कि मैं वृद्धों की सेवा करना चाहता हूँ और शादी तो वो रविकांत की कर दें और पिताजी शायद समझ चुके हैं, इसीलिए तो वो अब रवि के लिए लड़की देख रहे हैं।
डायरी पढ़ते-पढ़ते रजत मानों खुद ही उन लम्हों को जीने लगा, उसके बड़े पापा का अतीत उसकी आँखों के समक्ष चलचित्र की भाँति चल रहा था। अब वह पलंग पर..फोन उसके हाथ में था..आँखें फोन की गैलरी में डायरी के पन्ने पर..और वह समरकांत के अतीत में एक फिल्म की मानिंद सबकुछ देख रहा था....
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6
समरकांत जीवन के पचास बसंत देख चुके हैं, कानों के पास इक्का-दुक्का बाल सफेद होने लगे हैं और दाढ़ी...दाढ़ी के बाल भला उम्र की दौड़ में पीछे क्यों रहते! वहाँ भी कहीं-कहीं सफेदी आने लगी है। रिटायरमेंट की उम्र हो आई है, अगले महीने के आखिर में रिटायर हो जाएँगे। रविकांत का इकलौता बेटा अपनी पढ़ाई पूरी करके हॉस्टल से वापस आ चुका है।अब घर में सभी की इच्छा है कि जल्द से जल्द उसकी शादी कर दी जाए। उसके लिए लड़कियाँ देखना शुरू करते हैं पर उसे जिस भी लड़की की फोटो दिखाई जाती है, वह उसे मना कर देता है। समरकांत को समझते देर नहीं लगती कि शायद कोई और लड़की उसके जीवन में है, इसलिए उन्होंने उससे पूछ ही लिया और रजत ने भी उनसे कुछ नहीं छिपाया। रविकांत और उनके पिताजी के मना करने के बाद समरकांत के समझाने से सभी इस शादी के लिए तैयार हो गए। 
आज पच्चीस सालों के बाद घर में खुशियों की शहनाई बज रही है। रविकांत रजत के पिता अवश्य हैं पर बड़े होने के नाते पिता की सारी रश्में समरकांत को ही पूरी करनी थीं। 

बड़ी ही धूमधाम से रजत की बारात निकली, समरकांत इतने व्यस्त थे कि वह एक पल अगर यहाँ हैं तो अगले ही पल कहाँ होंगे पता नहीं। दो बसों में बारात डॉ० देसाई के बंगले पर पहुँची। डॉ० देसाई मुख्य द्वार पर ही खड़े थे। उन्होंने ने पुष्पों की माला पहनाकर सभी का स्वागत किया। विवाह की सभी रस्में बिना किसी विघ्न बाधा के आगे बढ़ती रहीं, रजत की पसंद से विवाह हो रहा था तो किसी प्रकार की शिकायत या मन-मुटाव का तो प्रश्न ही नहीं उठता। कन्यादान का समय हुआ। लड़की के पिता नहीं थे अतः तय हुआ कि नाना ही कन्यादान करेंगे।

तभी लड़की की माँ श्रीमती रजनी देसाई ने हाथों में थाल लिए मंडप में प्रवेश किया, हल्के संतरी रंग की सुनहरी जरी के काम वाली सिल्क की साड़ी और कानों में बड़े-बड़े टॉप्स और उन्हीं से मैच करता गले में सोने की चेन में लटका पेंडेंट, एक हाथ में सोने का कंगन और दूसरे हाथ में घड़ी। लंबे घने बालों को पीछे समेटकर बड़ा सा जूड़ा बनाया था और उसमें लगा‌ इकलौता गुलाब का फूल अपनी किस्मत पर इतरा रहा था। 
लड़की की माँ मिसेज रागिनी देसाई को देखते ही रविकांत झटके से खड़े हो गए और उनके मुँह से अनायास ही निकला- 
"य्य्ये ल..लड़की की माँ हैं!!.."
उनकी आश्चर्यमिश्रित आवाज सुनकर समरकांत की गर्दन उधर ही मुड़ गई जिधर रविकांत की नजरें स्थिर हो गई थीं। 
समरकांत अपने स्थान पर जड़वत् हो एकटक होने वाली समधन को देख रहे थे। वह यह भी भूल चुके थे कि उन्हें इस तरह घूरते देख लोग क्या सोचेंगे? या शायद वह स्वयं कुछ भी सोचने की स्थिति में थे ही नहीं। 
"भ भाई साहब! भाई साहब!" रविकांत ने समरकांत का कंधा पकड़कर उसे झिंझोड़ते हुए पुकारा। 
ह्हं हाँ.. समरकांत को मानों होश आया और वह बिना कुछ बोले उठकर मंडप से बाहर की ओर चले गए।
"अ..अरे समर बेटा! कहाँ चल दिए? अभी तो तुम्हें..."
"पिता जी! अभी आ जाएँगे भाई साहब। वो उन्हें बाहर कुछ काम है।" रविकांत पिता जी की  बात बीच में ही काटकर बोल पड़े। 
वह बार-बार अपनी समधन की ओर बड़े गौर से देखते जैसे कि कुछ पहचानने का प्रयास कर रहे हों या कुछ अविश्वसनीय देख कर उस पर विश्वास करना चाहते हों। न जाने क्या सोचकर वह उठे और उधर ही चल दिए जिधर समरकांत गए थे। मंडप से बाहर आकर उन्होंने समरकांत को देखने के लिए इधर-उधर गर्दन घुमाया, करीब सौ मीटर की दूरी पर बिजली के खंभे के नीचे कोई साया नजर आया। रविकांत उधर ही चल दिए।
"भाई साहब!" उन्होंने नजदीक पहुँचकर पुकारा। 
एक झटके से पलटकर समरकांत ने रविकांत के दोनों कंधों पर हाथ रखकर झिंझोड़ते हुए कहा- "रवि! तूने देखा न! व वो वही है न? त तू तो मिल चुका है, तू पहचानता है न? व वही है न मेरे भाई..वही है न? म मेरी..मेरी आँखें धोखा नहीं खा सकतीं….वो..वो वही है..वही है वो, पर...पर क्यों..क्यों वो मेरे पास नहीं आई..क्क्यों मुझसे दूर य्यहाँ.….मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा रवि..जब तक मुझे सब पता नहीं चल जाता मैं...मैं जी नहीं पाऊँगा यार.." 

"भाई साहब..भाई साहब सुनिए..सुनिए मेरी बात, वो जिन्हें हमने अभी देखा है वो मिसेज रागिनी देसाई हैं। हाँ वो लगती जरूर उनकी तरह हैं पर वो नहीं हैं। चलिए भीतर चलें, जो भी दुविधा होगी वहीं दूर हो जाएगी।" समरकांत की बात बीच में ही काटकर रविकांत बोले। 

"नहीं रवि, मैं..मैं कैसे विश्वास कर लूँ कि ये वो नहीं! ऐसा कर, तू जा। जब तुझे विश्वास हो जाए तब आना मेरे पास। अगर वो वही हुई तो भी आकर बताना, फिर मैं उससे पूछूँगा कि उसने ऐसा क्यों किया मेरे साथ। आखिर क्या गलती हुई थी मुझसे? कौन सी बात थी जो उसको मुझसे इतनी दूर ले आई? और अगर कोई बात थी भी तो मुझसे कहकर तो देखती! तू जा...तू जा मेरे भाई..मैं अभी यहीं हूँ, तेरा इंतजार कर रहा हूँ।"

"पर भाई साहब सब कुछ तो आपको ही देखना है, आपका वहाँ होना जरूरी है। पिताजी भी आपको बुला रहे हैं।" रविकांत अपनी बात पर जोर देते हुए बोले।

"मैं नहीं आ सकता यार बोला ना।" समरकांत की दशा विक्षिप्त-सी हो रही थी।
रविकांत ने आगे कुछ भी कहना उचित नहीं समझा और एक गहरी नजर उन पर डालते हुए मंडप की ओर चल दिए।
विवाह की सभी रस्में एक-एक कर पूरी होती रहीं, श्रीमती रागिनी देसाई बेटी के पास से एक पल को भी नहीं हटीं। रविकांत की नजरें बार-बार न चाहते हुए भी घूम-फिर कर उन्हीं पर टिक जातीं पर उनके सामान्य व्यवहार से एक पल को भी ऐसा नहीं लगा कि वह रविकांत को जानती हैं। आखिर उन्हें यह विश्वास करना ही पड़ा कि उनका संदेह गलत है। वह जाकर बाहर से समरकांत को यह विश्वास दिलाकर मंडप में ले आए कि वह वो नहीं जिसे वह सोच रहे हैं। 
मिसेज रागिनी देसाई जल्दी-जल्दी भीतर की ओर जा रही थीं शायद कुछ लाने तभी पीछे से समरकांत ने आवाज दी- "रत्ना!" "रत्ना सुनो!" 
पर उन्होंने जैसे सुना ही नहीं। तब समरकांत तेज-तेज कदमों से चलते हुए उनके सामने खड़े हो गए और बोले-
"रत्ना एक मिनट, मैं कबसे बुला रहा हूँ कोई जवाब क्यों नहीं देतीं?" 

"रत्ना! कौन रत्ना? मेरा नाम तो रागिनी है , आपको शायद कोई गलतफहमी हुई है।" रागिनी देसाई ने कहा।

"ह् हाँ, भाईसाहब आपको कोई और समझ बैठे, दरअसल आपका चेहरा उनसे काफी मिलता-जुलता है, इसीलिए मैं भी धोखा खा गया था।" रविकांत ने तुरंत आकर बात को संभालते हुए कहा।

"ओह! कोई बात नहीं, ये आपके बड़े भाई साहब हैं?" वह सामान्य होती हुई बोलीं।
"जी..जी हाँ।"

"सॉरी मेरी वजह से आपको तकलीफ़ हुई।" समरकांत ने हाथ जोड़ते हुए कहा।

"अरे नहीं समधी जी आप सॉरी बोलकर मुझे शर्मिंदा न करें, इसमें आपकी कोई गलती थी ही नहीं। कोई भी होता तो ऐसी स्थिति में वही करता जो आपने किया।" मिसेज देसाई मुस्कुराते हुए बोलीं।

उनके इस सामान्य व्यवहार से समरकांत को भी विश्वास हो गया कि वह रत्ना नहीं हैं। अतः वह पुनः मंडप में आकर बैठ गए, परंतु न चाहते हुए भी उनकी नजरें बार-बार उधर ही चली जातीं जिधर श्रीमती रागिनी देसाई बैठी थीं।
वह बार-बार अपने को सामान्य रखने की कोशिश करते, बार-बार खुद से ही वादा करते कि अब उधर नहीं देखेंगे, पर थोड़ी ही देर में अनायास ही अंजाने में ही उनकी नजरें उधर ही उठ जातीं। कभी जब मिसेज देसाई ने उन्हें अपनी ओर देखते हुए देख लिया तो नजरें मिलते ही वह बगलें झाँकने लगते। यह स्थिति जब उनसे ही असह्य होने लगी तो पिताजी से तबियत नासाज होने का बहाना करके जनवासे में आ गए और न चाहते हुए भी सोने का प्रयत्न करने लगे। परंतु सोने की कोशिश में जैसे ही आँखें बंद करते उन्हें वही सूरत दिखाई देने लगती जिससे भागकर वह यहाँ आए थे।
सोने की उनकी कोशिश बदस्तूर जारी थी कि तभी मदनलाल व दो अन्य साथी भी वहाँ आ गए, अब उनके लिए समय काटना आसान हो गया।
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7
घर मेहमानों से भरा हुआ था, पूरे घर में ही नहीं, ऐसा लग रहा था कि पूरे गाँव में चहल-पहल थी । घर में लगातार लोगों का आना-जाना लगा हुआ था। ऐसा लग रहा था कि नई-नवेली दुल्हन समरकांत के घर नहीं, गाँव में आई थी। जिधर भी देखो सब खुश दिखाई दे रहे थे, बाराती बनकर गए हुए सभी युवा-वृद्ध और बच्चों की जुबान पर रजत के ससुराल के वैभव और आवभगत के चर्चे थे और इसीलिए शहर से आई हुई दुल्हन को देखने के लिए गाँव की सभी स्त्रियाँ लालायित थीं। समरकांत घर में अपने कमरे में अकेले बैठना चाहते थे, न जाने क्यों उन्हें यह चहल-पहल अच्छी नहीं लग रही थी। वह शांति चाहते थे, दिल में मचे हुए तूफान से और घर में होने वाले शोर से। किन्तु उन्हें न तो अपने भीतर के तूफान से छुटकारा मिल रहा था और न ही बाहरी शोर से। उनकी बेचैनी बढ़ने लगी तो वह उठे और गाँव से बाहर की ओर चल दिए।
सूरज का ताप उन्नति से अवनति की ओर था, धीरे-धीरे यह ताप शरीर को सुखद प्रतीत होने लगा था, इसकी गरमाहट में नरमी आ रही थी। सूरज जैसे-जैसे अपने अस्तांचल की ओर बढ़ रहा था वैसे-वैसे समरकांत अपने सदन से दूर अपने उस स्थल की ओर बढ़ रहे थे जो उनके लिए अपने घर से भी अधिक सुखद अनुभूतियों का कारण था। आज उनकी चाल में एक अलग ही ऊर्जा नजर आ रही थी, तेज-तेज डग भरते हुए आने के बाद भी आज उनकी साँस नहीं फूली। वह अपने गंतव्य पर पहुँचकर ही रुके। उनके पहुँचते ही ठंडी हवा के झोंके ने उनका स्वागत किया। पेड़ों ने झूम-झूमकर अपनी पत्तियों से करतल ध्वनि करते हुए उनकी अगवानी की, वह खाली पड़ी बेंच मानो दोनों बाँहें पसार उन्हें अपने अंक में समा लेने को व्याकुल दिखाई दे रही थी। समरकांत बेंच को बड़े प्यार से सहलाते हुए उस पर बैठ गए। दुनिया जहान की आत्मीयता और सुकून इस समय उनके चेहरे पर नजर आ रही थी। जिस प्रकार एक बच्चे को अपनी माँ की गोद में आकर एक प्रेमी को अपनी प्रेयसी की बाँहों में आकर असीम सुख की अनुभूति होती है, उसी प्रकार, वैसी ही अनुभूति की परछाई इस समय समरकांत के चेहरे पर दृश्यमान हो रही थी। 
वह कुछ देर तक बेंच को ऐसे सहलाते रहे जैसे सदियों के विछोह के उपरांत अपने किसी प्रियतम से मिले हों। जहाँ उनके चेहरे पर तृप्ति के भाव थे वहीं उनकी आँखों में गहरी उदासी थी। रह-रहकर उनकी आँखों के समक्ष श्रीमती देसाई की मुस्कुराती छवि तैर जाती और उनकी बेचैनी बढ़ जाती। 

"रत्ना...रत्ना...क्यों हो रहा है मेरे साथ ऐसा? क्या मैं सिर्फ तुम्हारी सुंदरता से प्यार करता था? नहीं न! मैं...मैं तो तुम्हारी आत्मा से, तुम्हारी हर आदत से, हर अच्छाई-बुराई से प्यार करता था...नहीं! आज भी करता हूँ, फिर... क्यों तुम्हारे जैसी शक्लो-सूरत की दूसरी किसी स्त्री को देखकर मैं इतना बेचैन हो रहा हूँ? क्यों मैं उसे भूल नहीं पा रहा? इतने वर्षों तक जिस पवित्र प्रेम को अपनी आत्मा में बसाए मैं जीता रहा हूँ, क्यों वह कलंकित होने की कगार पर है? मुझे...मुझे तुम्हारे होने का अहसास दूर से ही हो जाता था, फिर क्यों आज मैं स्वयं को इतना कमजोर पा रहा हूँ कि तुममें और तुम्हारी हमशक्ल में अंतर नहीं कर पा रहा? प्लीज़ रत्ना! मुझ पर मेहरबानी करो, मेरी जीवन भर की तपस्या को कलंकित मत होने दो। मैं...मैं जानता हूँ तुम जहाँ भी हो, मुझे सुन रही हो, तुम...तुम हमेशा मेरे आसपास ही रहती हो। तो जब भी रजत की सास मेरे आसपास हों, तो तुम मेरे और करीब आ जाया करो ताकि मेरे मनोमस्तिष्क पर तुम्हारी ही खुमारी रहे और मैं उन्हें बिल्कुल महसूस ही न कर सकूँ। करोगी न ऐसा?" 

समरकांत अपने आप से ही इसप्रकार बातें करने लगे जैसे उनके समक्ष कोई और भी है। उन्हें इस प्रकार बातें करते देख कोई भी उन्हें विक्षिप्त समझने की भूल कर बैठता। काफी देर तक वहाँ बैठने के उपरांत वह उठे और बगीचे के दूसरी ओर गाँव की विपरीत दिशा में चल दिए। बगीचा पार करके शहर जाने वाली पगडंडीनुमा रास्ते पर आ गए, जिसकी एक ओर पहाड़ियाँ तो दूसरी और गहरी खाई थी। वह थोड़ी दूर चलकर रास्ते के किनारे खाई के पास रुक गए और खाई की गहराई देखने लगे। कुछ दस-बारह फीट नीचे एक मोटा तना और उसमें से निकली टहनियाँ मस्ती में झूमती नजर आईं। यही तना कई साल पहले एक पतली सी टहनी हुआ करता था। समरकांत को उस तने से लटकती रत्ना की छवि ताजा हो गई और वह झटके से पीछे हो गए। वह फिर मुड़े और गाँव की दिशा में चल दिए। 
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8
रजत की माँ और बुआ ने मिलकर तरह-तरह के पकवान बनाए हैं, रश्मि रसोई में उनके पास ही खड़ी होकर उन्हें सब बनाते हुए देखती है। उसकी सासू माँ ने उसे जाकर आराम करने के लिए कहा पर उसने यह कहते हुए मना कर दिया कि "मुझे खाने में कुछ चीजें ही बनानी आती हैं, इसलिए मैं आपको बनाते हुए देखना चाहती हूँ ताकि सीख सकूँ।" 
उसके भोलेपन को देखकर बुआ जी हँस पड़ीं और बोलीं "सिर्फ देखने से नहीं सीख पाओगी बहू, साथ में मदद भी करवानी पड़ेगी तभी सीख पाओगी।"

"जी जरूर, बताइए मैं क्या करूँ?" उसने बड़ी ही मासूमियत से कहा। 
और फिर बुआ जी उससे जो-जो कहतीं वह करती गई।

"बहू अब जाकर तैयार हो जाओ, तुम्हारे मायके से लोग आते ही होंगे।" उसकी सासू माँ बोलीं। 

"जी।" कहकर वह अपने कमरे की ओर चली गई और रजत की माँ और बुआ जी रसोई में फैले सामान को समेटते हुए रसोई साफ करने लगीं। व्यंजनों की खुशबू समरकांत की नासिका में प्रवेश करते ही वह अपने मनपसंद खाने के लिए लालायित हो उठे। वह खाने की फरमाइश करने ही वाले थे कि तभी डॉ० देसाई और श्रीमती देसाई की आवाज सुनाई पड़ी, "प्रणाम" और वह झटके से मुड़े। हॉल के मुख्य द्वार पर हाथ जोड़े खड़े थे डॉक्टर देसाई और उनकी सुपुत्री श्रीमती रागिनी देसाई। 
समरकांत के पिताजी अपनी जगह पर खड़े-खड़े ही बोले, "आइए..आइए डॉक्टर साहब स्वागत है आपका।"
समरकांत अपनी सुध-बुध खोकर एकटक  रागिनी देसाई को देखते हुए रत्ना और उनमें तुलना कर रहे थे। एक तिल भर भी अंतर नहीं था दोनों में और...और आवाज भी बिल्कुल रत्ना की तरह, जो कानों में शहद घोल दे। क्या दो व्यक्तियों में इतनी समानता हो सकती है? बिल्कुल नहीं। पर यहाँ तो है। पर अब वो मेरी समधन हैं।
दोनों भीतर आकर औपचारिक अभिवादन के बाद सोफे पर बैठ गए। समरकांत अब भी मिसेज देसाई को एकटक देख रहे थे, तभी दोनों की नजरें आपस में टकराईं और वह अचकचाकर संभलते हुए सीधे बैठ गए। श्रीमती देसाई उन्हें देखकर मुस्कुरा भर दीं और अपने पिताजी और समरकांत के पिताजी के मध्य होने वाली बात में खुद को भी शामिल कर लिया। समरकांत के दिमाग में फिर एक नया तूफान छिड़ गया कि सत्य को आवरणहीन कैसे किया जाए? अचानक उन्हें एक तरकीब सूझी और वह उठकर बाहर की ओर चल दिए।

"कहाँ जा रहे हो समर, कुछ देर अतिथियों के साथ बैठो, रवि को आ जाने दो फिर चले जाना।" उन्हें बाहर जाते देख पिताजी बोल पड़े।

"मैं बस पाँच मिनट में आता हूँ पिताजी, यहीं लॉन तक जा रहा हूँ।" कहते हुए समरकांत जवाब का इंतज़ार किए बिना ही तेजी से निकल गए। 
लॉन में आकर समरकांत ने रजनीगंधा के पौधे से टहनियों समेत कुछ फूल इस तरह तोड़े कि उन्हें फूलदान में लगाया जा सके। फूल लेकर वह हॉल में आ गए।
हॉल में आकर समरकांत अपनी जगह पर बैठ गए और मेज पर रखे फूलदान में पड़े फूलों को निकालकर उसमें रजनीगंधा के फूल सजाने लगे। मिसेज देसाई उन्हें ऐसा करते हुए पूरी एकाग्रता से देख रही थीं।

"क्या हुआ समधन जी फूल आपको पसंद नहीं आए?" उन्हें इस तरह लगातार देखते देख  समरकांत बोल पड़े।

"अरे नहीं, मैं सोच रही थी कि ये जो फूल आप निकालकर अलग कर रहे हैं, वो भी तो ताजे ही लग रहे हैं।" वह बोलीं।

"जी, पर मुझे लगा कि शायद आपको ये वाले फूल ज्यादा पसंद आएँगे।" समरकांत बोले।

"अच्छा! आपको कैसे पता कि मुझे रजनीगंधा बहुत पसंद हैं? मिसेज देसाई के चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे।

"अच्छा तो सचमुच आपको पसंद हैं! मैंने तो बस यूँ ही इन्हें बदला, दरअसल मुझे बहुत पसंद हैं।" 
कहते-कहते समरकांत के चेहरे पर मुस्कान की जगह गंभीरता ने ले ली। उन्हें ऐसा महसूस होने लगा था कि यही उनकी रत्ना है, परंतु ऐसा कैसे हो सकता है? उसके पड़ोसियों ने तो बताया था कि वे पिता-पुत्री दोनों ही नहीं बचे थे। फिर यह कैसे संभव हो सकता है? और अगर ये रत्ना होती तो क्या उन्हें पहचानती नहीं? 
लेकिन इसे भी रजनीगंधा के फूल बहुत पसंद हैं।
तो क्या किसी और को पसंद नहीं हो सकते? 
समरकांत के दिमाग और दिल के मध्य द्वंद्व छिड़ गया। 

"आपको पता है समधन जी कि हमारी पुरानी जान पहचान है।" समरकांत प्रत्यक्ष में मिसेज देसाई से बोले।

"अच्छा! पर मैं तो आपको अपनी बेटी की शादी वाले दिन से ही जानती हूँ।" वह आश्चर्यचकित होती हुई बोलीं। 

"व..वो भाईसाहब को मजाक करने की आदत है।" अचानक ही रविकांत बोल पड़े, उन्होंने हॉल में प्रवेश करते हुए समरकांत की बात सुन ली थी और बात संभालने के लिए बोल पड़े।

समरकांत को भी अहसास हुआ कि वो गलती करने जा रहे थे, इसलिए न चाहते हुए भी मुस्कुराकर चुप हो गए। 
थोड़ी देर तक औपचारिक बातचीत करने के उपरांत वह वहाँ से चले गए और संध्या तक रश्मि भी अपनी माँ और दादा जी डॉ० देसाई के साथ अपने मायके चली गई। 
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वीरान से पड़े ऊबड़-खाबड़ पथरीले रास्ते पर छड़ी की ठक-ठक गूँजती सी प्रतीत हो रही थी, रास्ते के दोनों ओर ऊँची-नीची, कहीं सूखी तो कहीं हरी-भरी झाड़ियाँ जब-तब हवा के तेज झोंके से आपस में लड़ती-झगड़ती डरावनी आवाज के साथ झूम उठतीं। वैसे तो पक्की सड़कें भी बन गई हैं जिससे एक गाँव से दूसरे गाँव को जाने में पहले की अपेक्षा अब बेहद आसानी हो गई है, किन्तु वह रास्ता लंबा है और वहाँ से गाड़ी से ही जाया जा सकता है जबकि समरकांत वहाँ शीघ्र ही पहुँचना चाहते थे और किसी को बताना भी नहीं चाहते थे, इसीलिए इस शॉर्टकट रास्ते से चलकर जल्द से जल्द रायपुरा गाँव पहुँच जाना चाहते थे। रास्ता कम प्रयोग किए जाने के कारण अधिक पथरीला और ऊबड़-खाबड़ होगा, यही सोचकर समरकांत छड़ी लेकर आए थे, जबकि वह छड़ी कभी प्रयोग नहीं करते। वह पूरे पच्चीस वर्षों के उपरांत वहाँ जा रहे थे जबकि रत्ना के उस घर को उन्होंने पहले की भाँति ही बनवाकर छोड़ दिया था, किन्तु बनवाने के बाद वहाँ कभी नहीं गए। जब से रजत की सासू माँ को देखा है, तभी से वह अजीब कशमकश में उलझे हुए हैं। वह खुद को बार-बार विश्वास दिलाना चाहते हैं कि दुनिया में हमशक्ल हुआ करते हैं परंतु जितना ही उस विषय में सोचते हैं उतना ही उलझते जाते हैं। सूरज धीरे-धीरे सिर पर चढ़ आया था। कोई और समय होता तो यह मीठी-मीठी गर्माहट तन को बहुत सुखद लगती लेकिन इस समय बेहद वीरान और ऊबड़-खाबड़ रास्ता बहुत ही डरावना लग रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे यहाँ कभी कोई नहीं आता, साथ ही तेज-तेज चलने और मन में उठे हुए तूफान के कारण उन्हें अत्यधिक गर्मी का भी अहसास हो रहा था। परंतु वह बिना रुके शीघ्र ही वहाँ पहुँचकर सत्य को पुन: जानना चाहते थे। मिसेज देसाई को देखने के बाद न जाने क्यों उनका मन एक अंजाने व्यक्ति के जाने-पहचाने अहसास से भर गया था। उनके मन के किसी कोने में उम्मीद की एक ऐसी किरण का प्रस्फुटन हो रहा था, जिसे मन स्वयं नकारता आ रहा था। पर वह बार-बार न चाहते हुए भी उसी अहसास से दो-चार हो रहा था, जिसके न होने का उसे स्वयं विश्वास था। न जाने कैसा अहसास था जो समरकांत के मन पर हावी हो रहा था। अपनत्व का अभाव होने पर अपनों के दिलों में भी दूरियाँ आ जाती हैं, परंतु यहाँ तो न वह अपनी हैं, न अपनत्व दर्शाती हैं परंतु उनके आसपास होने भर से समरकांत स्वयं को उनके वश में पाते हैं। उनका दिल उनके वश में नहीं रहता और यही वजह है कि आज उनका अन्तर्मन उस सत्य पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है, जिसे वह अब तक जीते आए हैं, रत्ना के पंचतत्व में विलीन हो जाने का सत्य। 

ख्यालों में खोए समरकांत गाँव में प्रवेश कर चुके थे। पहले की अपेक्षा गाँव में काफी परिवर्तन आ चुका था, उन्हें ऐसा लग रहा था कि वह किसी गाँव में नहीं कस्बे में आ गए हैं परंतु कुछ एक निशानियाँ हैं जो अभी भी पूर्ववत् है। जैसे- गाँव के बाहर ही पश्चिम में  बरगद का वो बेहद पुराना पेड़ तथा उससे थोड़ा हटकर पीपल का पेड़। दोनों ही दो बुज़ुर्गों की भाँति गाँव के प्रहरी बने सदैव रक्षा में तत्पर हैं। 
समरकांत थके होने के बावजूद धीरे-धीरे अपने उस अधूरे ख्वाब की ओर बढ़ रहे थे जो मंजिल तक आते-आते टूट गया था। राह में लोग उन्हें अजनबियों की भाँति देख रहे थे। पच्चीस वर्षों का अंतराल एक पीढ़ी बदल देता है, समरकांत भी इस समय नई पीढ़ी की उत्सुक निगाहें अपने ऊपर टिकी हुई महसूस कर रहे थे। वह बिना रुके बिना भूले उसी जगह, उसी घर के बाहर खड़े थे और एकटक उस छोटे से घर को निहार रहे थे, उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे अभी रत्ना आकर दरवाजा खोलेगी और कहेगी आखिर तुमने मुझे ढूँढ़ ही लिया। 

"अरे समरकांत जी हैं क्या?" पीछे से एक बुजुर्ग की आवाज़ सुनकर चौंक पड़े समरकांत।
वह मुड़े, सामने एक बेहद बुजुर्ग व्यक्ति लाठी के सहारे खड़ा था, कमर झुक चुकी थी पैर काँप रहे थे, शरीर पर मानो हड्डियों पर बस खाल ही चिपकी रह गई थी, वह भी ढीली होकर लटक रही थी। समरकांत ने बड़े गौर से उन्हें देखा तथा कुछ पल मस्तिष्क पर जोर देने के बाद उन्हें पहचान पाए और आश्चर्यचकित होते हुए बोले। 
"ह हाँ काका। आपने पहचान लिया!" 

"अरे हाँ बेटा कैसे नहीं पहचानेंगे! यहाँ इस घर में आपके सिवा आने वाला और है ही कौन! लेकिन आप भी घर पहले की तरह बनवा तो दिए पर वीरान छोड़ दिए, हम सोचे थे कि कभी-कभार तो आओगे ही इसीलिए बनवा रहे हो पर....." 
बुजुर्ग ने बात अधूरी छोड़ दी।

"क्या करें काका सोचा तो हमने भी यही था पर आसान नहीं होता प्रश्नसूचक निगाहों का हरपल सामना करना। किस-किसको अपने यहाँ आने का कारण बताता? यहाँ तो ठीक है सबको पता था पर हमारे घर तक ये बात पहुँचने में समय नहीं लगता, अपनी तकलीफों में औरों को तकलीफ देना उचित नहीं, इसीलिए हमने यहाँ आना छोड़ दिया था।" 
समरकांत खोए हुए से ऐसे बोले जैसे स्वयं से बातें कर रहे हों।

"अब आज कैसे याद आ गई इस घर की बेटा।" उन्होंने कहा। 
इस बीच एक युवक ने समरकांत और उस बुजुर्ग व्यक्ति के बैठने के लिए कुर्सी रख दी थी और उन्हें पानी लाकर दिया। 

"काका! अच्छा हुआ कि आप ही मिल गए, आज मुझे एक बात बिल्कुल सच-सच बताइएगा।" समरकांत बोले।

"पूछो बेटा, ऐसा क्या जानना चाहते हो जो तुम तब नहीं जान पाए थे, जब ये घर बनवाया था।" काका ने कहा। 

समरकांत की यहाँ आसपास रहने वालों से उस समय जान-पहचान हो गई थी जब वह इस घर को बनवा रहे थे और उस समय वह यहाँ अक्सर ही आया करते थे।

"काका! जब उस तूफान में ये घर गिरा था तब मेरी रत्ना और उसके बाबा को यहाँ से निकालकर आप लोगों ने उनका अंतिम संस्कार कहाँ किया था।" 
पूछते हुए समरकांत को अपनी ही आवाज किसी गहरे कुएँ से आती हुई प्रतीत हो रही थी।

उनकी यह दशा काका की अनुभवी आँखों से छिप न सकी। उन्होंने बिना कुछ बोले समरकांत के कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना दिया। और एक गहरी साँस लेकर बोले- 
"अंतिम संस्कार! कहाँ बेटा..मेरे दोस्त को वो भी नसीब नहीं हुआ। पुलिस ले गई थी दोनों के शरीर और कोई रिश्तेदार नहीं पहुँचा वहाँ तो उन लोगों ने सरकारी तौर-तरीके से खुद ही सब कर दिया।" 

"म..मतलब किसी ने उनका अंतिम संस्कार होते देखा ही नहीं!" समरकांत बड़बड़ाए।

"हाँ, पर आप अब क्यों पूछ रहे हैं?" काका बोले। 

"आ..आप मुझे वो पुलिस स्टेशन बताइए, जहाँ उन्हें ले जाया गया था।" समरकांत ने व्याकुल होकर पूछा। काका के बताने पर वह "फिर आऊँगा काका।" कहकर पुलिस स्टेशन की ओर चल दिए। वहाँ से उस दिन उन्हें निराशा हाथ लगी, पर उन्होंने हार नहीं मानी।
अंततः अपनी आर्थिक और सामाजिक शक्तियों का प्रयोग करके वह अपने मकसद में कामयाब हो ही गए। उन्होंने उसी सन् की उस दिन की फाइल निकलवा कर पूरी जानकारी हासिल की और तब जो जानकारी उन्हें मिली उससे उनके होश उड़ गए। 
फाइल के अनुसार पिता-पुत्री दोनों के शरीर अस्पताल ले जाए गए जहाँ पता चला कि बूढ़े पिता का शरीर तो मृत था किन्तु पुत्री अर्थात् रत्ना की धड़कन चल रही थी। अतः रिश्तेदारों के अभाव में पुलिसवालों के द्वारा पिता का दाह संस्कार कर दिया गया और पुत्री का इलाज चलता रहा। 
समरकांत को स्वयं की स्थिति समझ नहीं आ रही थी, उनकी आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा, हाथ काँपने लगे, वह भाव शून्य से, फाइल हाथ में पकड़े-पकड़े निश्चेष्ट हो बैठे रहे। हवलदार उनकी यह स्थिति कुछ क्षण देखता रहा फिर उसने उनका कंधा पकड़ कर झिंझोड़ते हुए कहा- "क्या हुआ सर?"

उनके हाथ से फाइल छूटकर गिर गई। वह सचेत होते हुए स्वयं से ही बड़बड़ा उठे' 
"ये कैसी गलती हो गई मुझसे..उसी समय मैंने क्यों ये जानने की कोशिश नहीं की कि उनको कहाँ ले जाया गया था....अगर मैंने तभी पूछ लिया होता तो मुझे आज तक अपनी रत्ना के बिना नहीं रहना पड़ता। मुझे अपना होश नहीं खोना चाहिए था। बिना पूरी बात जाने ही मैंने सबके आधे-अधूरे सच को ही पूरा मान लिया...क्यों किया ऐसा...क्यों...तो क्या मिसेज देसाई ही मेरी रत्ना हैं...पर वो इस तरह अंजानों की तरह व्यवहार क्यों कर रही हैं...."

"क्या हुआ सर, आप जो जानना चाहते थे सब मिल गया? इसके अलावा और कोई फाइल नहीं है सर।" हवलदार ने बिना जवाब का इंतजार किए अपनी बात पूरी की।

"उन्हें किस अस्पताल में ले जाया गया था?" उन्होंने हवलदार की बातों को अनसुना करते हुए पूछा।
हवलदार ने उन्हें बताया कि एक ही सरकारी अस्पताल है जहाँ सालों से शव और दुर्घटनाग्रस्त मरीजों को भेजा जाता है। समरकांत तुरंत वहाँ से अस्पताल के लिए चल दिए। रात का धुँधलका वातावरण को अपने आगोश में लेने लगा था। परंतु समरकांत को होश कहाँ था, अब तो उनका शक व उनका अहसास सब उन्हें सच लगने लगा था। रह-रहकर मस्तिष्क में यही बात गूँजती कि अब तो चाहे कोई कितना भी मना कर ले पर मैं नहीं मान सकता। इसमें कोई शक नहीं है कि रश्मि की माँ ही रत्ना हैं। 
उन्हें पता था कि इतने वर्ष पुराना रिकॉर्ड निकलवाना आसान नहीं था, अतः अस्पताल पहुँच कर वह रातभर इधर से उधर घूम-घूमकर जायजा लेते रहे कि किसकी कहाँ क्या ड्यूटी होती है, यही काम उन्होंने दूसरे दिन भी किया। शाम होने से पहले ही उन्होंने वहाँ काम करने वाले किसी चपरासी को अच्छी-खासी रकम देकर पूरा रिकॉर्ड निकलवा लिया, जिससे उन्हें पता चला कि रत्ना कोमा में चली गई थी। सुविधाओं के अभाव को देखते हुए एक महीने बाद उसे शहर के अस्पताल भेज दिया गया था।
अस्पताल का नाम पता सब निकालकर वह अपने घर वापस आ गए।  

अगले दिन सुबह-सुबह समरकांत शहर के लिए रवाना हो गए थे, किसी को उनकी मंशा ज्ञात नहीं थी। वहाँ पहुँचकर वह किससे मिलेंगे, उन्हें कुछ पता नहीं था। 
समरकांत अस्पताल के बरामदे में खड़े होकर सोच ही रहे थे कि किससे मिलें! तभी उनकी नजर बाहर गाड़ी से उतरते हुए डॉक्टर देसाई पर पड़ी। 
एक पल के लिए उन्हें समझ में नहीं आया कि क्या करें, इसलिए उन्हें देखते ही वह दीवार की ओट में खिसक गए। फिर अचानक आत्मविश्वास की चमक उनके चेहरे पर नजर आई और वह ओट से निकलकर कॉरिडोर में अपने बाँयीं ओर की सीढ़ियों की ओर इस प्रकार चल पड़े कि डॉ० देसाई की नजर उन पर पड़ना अवश्यंभावी था। उन्होंने पहली सीढ़ी पर ही पैर रखा था कि उन्हें अपने कंधे पर हाथ के स्पर्श के साथ ही आवाज सुनाई दी "समरकांत जी!"
वह ठिठक गए और पीछे मुड़कर डॉ० देसाई को देखकर ऐसे चौंके जैसे कि पहली बार देखा हो, 
"अरे! डॉ० साहब आप यहाँ! अच्छा आप इसी अस्पताल में हैं!" 

"हाँ भई हम तो यहीं हैं, पर इतना तो हम जानते हैं कि आप यहाँ हमसे मिलने तो नहीं आए हैं, आपके यहाँ आने का अवश्य ही कोई विशेष कारण होगा।" डॉ० देसाई बोले।

"जी हाँ डॉ० साहब कारण तो विशेष ही है पर पता नहीं हो पाएगा या नहीं! वैसे आपको देखकर उम्मीद तो जागी है।" समरकांत ने सीधे न पूछते हुए बात को घुमाकर जानने की कोशिश की।

"क्यों नहीं! चलिए केबिन में बैठकर बात करते हैं।" डॉ० एक छोटे से ऑफिसनुमा कमरे में प्रवेश करते हुए बोले। 
उन्होंने समरकांत की ओर कुर्सी सरकाई और स्वयं मेज के दूसरी ओर बैठ गए। पानी का गिलास समरकांत की ओर बढ़ाते हुए डॉ० देसाई बोले- "बोलिए समर बाबू, कौन सा जरूरी काम था।"

"डॉ० साहब मुझे कुछ साल पहले का एक पुराना रिकॉर्ड निकलवाना है, मैं जानता हूँ कि यह इतना आसान नहीं है पर यदि आपका सहयोग होगा तो इतना मुश्किल भी नहीं होगा।"

डॉ० देसाई कुछ देर खामोश रहे, उनके चेहरे के भावों को देखकर कुछ भी अंदाजा लगाना मुश्किल था। थोड़ी देर कुछ सोचने के बाद बोले- "किस तरह का रिकॉर्ड?"

"बस यूँ समझ लीजिए कि किसी के जन्म व मृत्यु से संबंधित है।" समरकांत बोले।
डॉ० देसाई पूछना तो सबकुछ चाहते थे, पर उनकी अनुभवी आँखें भाँप गई थीं कि समरकांत पूरी बात खुलकर नहीं बताना चाहते हैं।
कुछ देर वह चुपचाप बैठे रहे, समरकांत को अपने ही दिल के धड़कने की आवाज सुनाई पड़ रही थी। तभी डॉ० देसाई ने घंटी बजाकर वार्डब्वाय  को बुलाया और बोले, "साहब को रिकॉर्ड-रूम ले जाइए और ये जिस सन् की जो भी फाइल माँगें, निकालकर दे दीजिए।" समरकांत ने गहरी साँस ली, जैसे कितनी ही देर से साँस रोके बैठे थे फिर प्रत्यक्ष में बोले, "धन्यवाद डॉ० साहब, आप नहीं जानते कि आपने मेरी कितनी बड़ी मुश्किल हल कर दी।"

"धन्यवाद ऐसे नहीं स्वीकार करूँगा समरकांत जी, काम होने के बाद घर चलकर साथ में लंच कीजिएगा तब स्वीकार होगा।" डॉ० देसाई मुस्कुराते हुए बोले।

"जी जी जरूर।" कहते हुए समरकांत वार्ड ब्वाय के साथ आगे बढ़ गए, उनके होंठों पर मंद-मंद मुस्कान थी। दोहरी खुशी जो मिली थी उन्हें। बिना किसी ज़द्दोज़हद के रिकॉर्ड ढूँढ़ने में मदद तथा मिसेज देसाई से मुलाकात, दोनों ही अमूल्य संयोग जो बन आया था, इसलिए खुशी से उनका दिल बल्लियों उछल रहा था।

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10
सर्जरी पूरे एक घंटे तक चली। डॉ० देसाई सर्जरी करके तेज-तेज कदमों से अपने केबिन की ओर बढ़ रहे थे, उन्हें पता था कि समरकांत उनका इंतजार कर रहे होंगे। इमर्जेंसी आ जाने के कारण उन्हें जाना पड़ा था पर वह वहाँ उपस्थित नर्स व वार्डब्वाय दोनों को ताकीद करके गए थे कि उनके आने तक समरकांत जी को जाने न दें। वह उनकी पोती के बड़े श्वसुर हैं, आखिर बिना खातिरदारी किए कैसे जाने दे सकते थे, इसीलिए वह उन्हें घर ले जाना चाहते थे। उन्होंने अपने केबिन में प्रवेश किया पर यह क्या! यहाँ केबिन के बाहर मरीजों की भीड़ तो थी पर भीतर कोई नहीं, तो क्या समरकांत अब तक रिकॉर्ड-रूम में ही हैं! उन्होंने वार्ड ब्वाय को बुलाकर पूछा तब उसने बताया कि कहकर गए हैं कि थोड़ी देर में वापस आ जाएँगे। 

समरकांत वृद्धाश्रम से लगे पार्क में बेंच पर बैठे स्वयं को सामान्य रखने के प्रयास में स्वयं से ही जूझ रहे थे। कभी उनका मन कहता कि अभी जाकर मिसेज देसाई से पूछें कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया उनके साथ, तो कभी मन में आता कि डॉ० देसाई से सवाल करें। फिर स्वयं को ही समझाते कि वो बेटे की सास हैं, उनके किसी भी व्यवहार से रिश्तों में कड़वाहट आ सकती है। अब उन्हें इस नए रिश्ते को ही चुपचाप जहर की भाँति घूँट-घूँट कर पीना होगा। स्वयं से लड़ते-लड़ते मानों वह अब हार की कगार पर खड़े थे, जो कुछ भी वह वर्षों पहले खोकर टूटकर बिखरे और फिर बड़ी मुश्किलों से खुद को फिर से मजबूती से खड़ा किया था, आज वही सब फिर से खोना उनसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे रत्ना उनके समक्ष खड़ी है और उसके होंठों पर कुटिल मुस्कान थिरक रही है, तो कभी उनके मस्तिष्क में खाई में लटकी हुई बेबस रत्ना की छवि उभर आती। कभी रजनीगंधा के फूलों के लिए रूठकर जाती हुई तो कभी दुनिया भर का प्यार आँखों में समेटे उनको एकटक निहारती हुई। भीतर ही भीतर अपने आप से लड़ते-लड़ते कुछ ही पलों में समरकांत बीमार से प्रतीत होने लगे थे।‌ अब उन्हें क्या करना चाहिए? क्या चुपचाप अपने घर वापस चले जाना चाहिए? या डॉ० देसाई के पास जाना चाहिए! वह इन्हीं सवालों में निर्णय-अनिर्णय की स्थिति में और न जाने कितनी देर फँसे रहते यदि उनका फोन न बज उठा होता। उन्होंने फोन उठाया डॉ० देसाई ने बताया कि वह उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। 
वह उठे और अस्पताल की ओर चल दिए, उनके चेहरे पर दृढ़ निश्चय के भाव झलक रहे थे। 

डॉ० देसाई ने जैसा कि फोन पर ही समरकांत को बता दिया था, वह अस्पताल की पार्किंग में ही अपनी गाड़ी में समरकांत का इंतजार कर रहे थे। जैसे ही समरकांत अस्पताल के गेट पर पहुँचे वहाँ खड़े वॉचमैन ने ड्राइवर को बता दिया और ड्राइवर गाड़ी लेकर पार्किंग से बाहर आ गया। समरकांत गाड़ी में बैठे और गाड़ी डॉ० के बंगले की ओर चल पड़ी। 

"लगता है बिना मिले वापस जाने का इरादा था आपका समरकांत जी।" डॉ० देसाई बोले।

"सवाल ही नहीं उठता डॉक्टर साहब, मुझे तो अभी आपसे बहुत सारी बातें जाननी हैं। चला जाता तो चैन नहीं मिलता।" समरकांत बोले। 

"अच्छा इतनी जरूरी बातें हैं?" डॉ० देसाई के चेहरे पर प्रश्न की रेखाओं ने उम्र की रेखाओं को और गहरा कर दिया। 

"जी डॉक्टर साहब हैं तो बेहद जरूरी।"
"ठीक है, फिर देर किस बात की, पूछिए!"
"इस विषय पर मैं आपसे एकांत में ही बात करना चाहूँगा, तो शायद आपके घर पर ही बेहतर होगा।" 

"अजी बेटा मेरा घर क्यों वो तो आपका भी घर है, उसे मेरा घर कहकर पराया मत कीजिए। वैसे भी आप 'डॉक्टर साहब-डॉक्टर साहब' कहते रहते हैं, क्यों नहीं रवि बाबू की तरह बाबूजी कहा करते। ऐसा लगता है जैसे आजतक आप हमें पराया ही समझते हैं।" 

"ऐसा नहीं है डॉ० साहब, पर पता नहीं क्यों मुझे बाबूजी से अधिक अपनापन और सम्मान डॉक्टर साहब कहने में महसूस होता है।" कहते हुए समरकांत के मस्तिष्क में रत्ना के बाबूजी की छवि उभर आई। समरकांत के दिल ने उन्हें ही बाबूजी माना था और उनके बाद आज तक वह किसी अन्य को बाबूजी नहीं कह सके।

"कोई बात नहीं, आपको जिससे खुशी मिले वही कीजिए, हमारी खुशी तो आप सब की खुशी में ही है।" 

बातें करते हुए कब रास्ता कट गया पता ही न चला। गाड़ी बँगले के बड़े से गेट के सामने खड़ी थी। चौकीदार के गेट खोलते ही गाड़ी अंदर प्रवेश हुई और बाँयीं ओर मुड़कर पोर्टिको में रुक गई। ड्राइवर ने उतरकर गाड़ी का दरवाजा खोला, समरकांत और डॉक्टर देसाई उतरकर बँगले के मुख्य द्वार की ओर चल दिए। 

बैठक में प्रवेश करते ही समरकांत की नजरें मिसेज रागिनी देसाई को ढूँढ़ने लगीं। तभी पीछे से रागिनी की आवाज आई, "पापा आज इतनी जल्दी? अरे आप! नमस्कार समधी जी।" समरकांत पर नजर पड़ते ही रागिनी हाथ जोड़कर बोलीं।

"नमस्कार, कैसी हैं आप?" 
"ईश्वर की कृपा है। हमारी बिटिया और घर के सभी सदस्य कैसे हैं?" रागिनी ने सोफे की ओर बैठने का संकेत करते हुए कहा।

"सब स्वस्थ और कुशल हैं, आप कभी रायपुरा जाती है?" न चाहते हुए भी समरकांत स्वयं को रोक नहीं पाए।

"रायपुरा! ये कहाँ है?" रागिनी विस्मित होते हुए बोलीं।
डॉ० देसाई को भी आश्चर्य हुआ। 

"खैर छोड़िए, वो सब मैं बाद में बताऊँगा।" समरकांत समझ नहीं पा रहे थे कि क्यों वह अंजान बन रही हैं। 
आवभगत की औपचारिकताओं के उपरांत डॉक्टर देसाई ने पूछा, "समर बाबू क्या अब मैं जान सकता हूँ कि आप मुझसे एकांत में क्या बात करना चाहते थे? दरअसल अब मुझसे धैर्य नहीं रखा जा रहा, आखिर बेटी वाला हूँ भई।" 

"डॉक्टर साहब पहले तो आप बेटी वाले हैं इसलिए आपको डरना चाहिए, ये सोच अपने दिल से निकाल दीजिए। रश्मि अब हमारी बेटी है, उससे हमें कोई शिकायत होगी तो हमारी बच्ची है हम ही संभालेंगे। आपका तो बस धन्यवाद ही कर सकते हैं इतनी प्यारी बच्ची देने के लिए।" समरकांत मुस्कुराते हुए बोले।

"आपकी यही बातें तो हमें बेफिक्र कर देती हैं। काश सभी बेटियों को ऐसी ही ससुराल मिले। अच्छा फिर वो बात क्या थी, उस रिकॉर्ड से संबंधित थी क्या जो आप ढूँढ़ रहे थे?" 
डॉक्टर देसाई बोले।

"जी हाँ डॉक्टर साहब" कहते हुए समरकांत ने अपने मोबाइल में खींची गई उस फ़ाइल की फोटो उन्हें दिखाई।
डॉक्टर देसाई को मानों काटों तो खून नहीं, उन्हें अपने पैरों के नीचे की धरती खिसकती हुई महसूस हुई। उनके चेहरे के बदलते रंग समर की नजरों से छिप न सके। 

"समर बाबू, क्या जरूरी है गड़े मुर्दे उखाड़ना?" डॉक्टर साहब को अपनी ही आवाज किसी गहरी खाई से आती हुई प्रतीत हो रही थी।

"डॉक्टर साहब! शायद आपके लिए न हो, पर हो सकता है किसी और के लिए हो।"

"क्या आप जानते हैं कि अब वो पेशेंट कहाँ है, कौन है?" उन्होंने समर के चेहरे पर नजरें गड़ा दीं।

"हाँ, इसीलिए पूरी बात जानना और भी अधिक जरूरी हो गया है।" समर तटस्थ भाव से बोले।

"आइए हमारे कमरे में चलकर बात करते हैं।" डॉ० देसाई उठते हुए बोले।
समरकांत बिना कुछ बोले उनके साथ चल दिए। कमरे में पहुँच कर डॉक्टर साहब ने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और समरकांत को कुर्सी पर बैठने का संकेत करके खुद दूसरी कुर्सी पर बैठ गए। फिर एक लंबी गहरी साँस लेकर बोलना शुरू किया-
"समर बाबू ये जो फाइल आप मुझे दिखा रहे हैं,  ये आज से लगभग २४-२५ वर्ष पहले की है। हमारे पास एक पेशेंट लाई गई जो लगभग एक महीने से कोमा में थी। उसकी उम्र लगभग बीस-बाइस साल थी। दूर-दराज के किस गाँव की थी, मुझे पता नहीं चल पाया सही पूछो तो मैंने कोशिश भी नहीं की, दरअसल मेरा मानना था कि ये काम पुलिस का है, हम डॉक्टर्स का काम मरीज को स्वस्थ करना है इसलिए मैं अपने काम में शिद्दत से लगा था। फिर भी बीच में एक-दो बार पुलिस से जानने की कोशिश की तो पता चला कि उसका कोई भी नहीं, उसके पिता और वो, दोनों पुलिस के द्वारा अस्पताल में भर्ती करवाए गए थे, पिता की मृत्यु हो गई थी और उनका शव लेने भी कोई नहीं आया था वो लड़की भी लगभग एक महीना वहाँ अस्पताल में रही पर किसी ने उसके विषय में जानने की कोशिश तक नहीं की थी। अब इससे आगे जानने की मैंने जरूरत ही नहीं समझी।"

समरकांत शून्य में घूरते हुए न जाने किन ख्यालों में डूब चुके थे, डॉक्टर देसाई ने उन्हें भावशून्य देखा तो उनके कंधे पर हाथ रखते हुए बोले- "क्या सोचने लगे समर बाबू?"

"यही कि कितने बदनसीब होते हैं वो लोग जिनका कोई अपना कहीं बेबस लावारिस पड़ा होता है और उन्हें अहसास तक नहीं होता, इतना ही नहीं उसके अपने के मृत शरीर का लावारिस की भाँति दाह-संस्कार कर दिया जाता है और उसे तनिक भी अहसास नहीं होता।"

"ये सब नसीब की बात है समर बाबू, पर एक बात मैं बहुत देर से जानना चाह रहा था.."
"यही कि मैं इस केस में इतनी रुचि क्यों ले रहा हूँ?" समरकांत डॉक्टर देसाई की बात पूरी होने से पहले ही बोल पड़े।

"जी हाँ, ये प्रश्न तो स्वाभाविक ही है न कि जिस पेशेंट की किसी ने इतने सालों तक खोज नहीं की अचानक ही आप उसके बारे में इतनी गहन छानबीन करने लगे। मैं समझ सकता हूँ कि हमारे अस्पताल के रिकॉर्ड रूम तक पहुँचने से पहले ही आप को कितना संघर्ष करना पड़ा होगा। आखिर ये सब क्यों?" डॉक्टर देसाई बोले।
"मैं सबकुछ बताऊँगा डॉक्टर साहब, पर पहले मुझे आप पूरी बात बताइए, आगे क्या हुआ? वो रत्ना से रा..." कहते हुए अचानक समरकांत चुप हो गए। 
"क्या? रत्ना? कौन रत्ना?" डॉक्टर देसाई ने पूछा।
"क कुछ नहीं आप पूरी बात बताइए न प्लीज।" समरकांत का धैर्य जवाब देने लगा था।

"समर बाबू मुझे लगता है कि आप उस लड़की को जानते हैं पर आप कुछ बताना नहीं चाहते।"

"जी हाँ मैं जानता हूँ और मैं सब बताऊँगा भी, पर पहले मैं जो जानने आया हूँ उसे तो जान लूँ, पहले मैं खुद जिन सवालों में उलझा हुआ हूँ, उनका जवाब मिल जाए उसके बाद मैं आपके हर प्रश्न का उत्तर दूँगा।" समरकांत की आवाज से बेचैनी साफ-साफ झलक रही थी।

"ठीक है तो सुनिए, वह लड़की कोमा में थी और उसके ठीक होने के आसार भी नजर नहीं आ रहे थे। कभी-कभी इंसान कोमा में होने के बाद भी बाहरी दुनिया की आवाजें सुन सकता है बस रिएक्ट नहीं कर पाता, पर उसके साथ ऐसा नहीं था। ऐसा प्रतीत होता था कि वह धीरे-धीरे और गहरी निद्रा में जा रही है। मैं..मैं बहुत ही बेचैन होता उसे देखकर, ऐसा लगता कि काश मैं इसे बचा पाता, कभी-कभी सोचता काश इसका कोई अपना होता यहाँ तो शायद यह उसके अपनत्व भरे स्पर्श को महसूस कर पाती, पर यही तो नहीं कर पा रहा था मैं, इसलिए खुद को  बहुत बेबस महसूस करता था।" कहते हुए डॉक्टर देसाई की आँखों से आँसुओं की दो बूँदें ढुलक कर गालों पर आ गईं और जब उन्होंने अपने आँसू पोछते हुए समरकांत की ओर देखा तो उनकी आँखों से भी अश्रु बूँदे मुक्त होकर गालों पर ढुलक आई थीं।

"आप ठीक तो हैं समर बाबू?" उन्होंने पानी का गिलास उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा।
"जी, मैं ठीक हूँ।" कहते हुए समरकांत ने पानी का गिलास पकड़ा। 
डॉक्टर देसाई ने स्वयं भी पानी पिया और फिर बोलना शुरू किया।
"मेरी उस अंजान व प्रिय मरीज को इसी अवस्था में एक साल हो गया था। उसका चेहरा, उसकी नाक और होंठ मेरी बेटी रागिनी से काफी कुछ मिलते जुलते थे, शायद इसीलिए मेरा उससे लगाव भी दूसरे मरीजों से कुछ अधिक ही था। लेकिन इस बार की जांँच में पता चला कि उसके दिल की हालत भी नाजुक होने लगी थी, जो धड़कनें अब तक सामान्य बनी रहकर उम्मीद की किरण जगाए हुए थीं, वही अब धीरे-धीरे सुस्त होती जा रही थीं, उसका हृदय दिन-प्रतिदिन मृत होता जा रहा था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि कैसे उसे बचाऊँ, मैं देश के दूसरे बड़े शहरों के डॉक्टर्स से मिला और उसकी रिपोर्ट दिखाकर सलाह ली पर कहीं कोई आशा की किरण नहीं जागी। 
मैंने भी हार मान ली थी। न जाने क्यों बार-बार मन में यही ख्याल आता कि इसके दिल ने अब तक किसी अपने का इंतजार किया और अब निराश होकर मृत्यु की ओर बढ़ने लगा है।"

अपनी आँखों को फिर से पोंछ कर डॉक्टर देसाई ने पानी पिया और आगे कहना शुरू किया- "इसी बीच मेरी बेटी रागिनी अपने पति और एक वर्षीय बच्ची रश्मि के साथ रोहतांग के लिए गई और...." कहते हुए डॉक्टर देसाई अपनी सिसकी न रोक सके और रो पड़े। 

समरकांत अवाक् से उनकी स्थिति देखते रहे। फिर उन्होंने डॉक्टर देसाई के कंधे पर हाथ रखकर हल्के से थपकी दी तो वह संभलकर बैठते हुए बोले,
"मेरी बेटी और दामाद एक्सीडेंट में मुझे हमेशा के लिए अकेला छोड़ गए। ईश्वर की कृपा थी कि उस भयानक एक्सीडेंट में भी मेरी बच्ची रश्मि बिल्कुल सुरक्षित थी, उसे खरोंच तक नहीं आई थी।" डॉक्टर देसाई ने ऊपर देखते हुए गहरी साँस ली और मन ही मन ईश्वर का धन्यवाद किया।

"ओह, बड़ा बुरा हुआ, पर आपकी बेटी तो सही-सलामत हैं न!" समरकांत जान-बूझकर अंजान बनते हुए बोले। 

"ह..हाँ..इस एक्सीडेंट ने जहाँ एक ओर मुझे तोड़कर रख दिया, वहीं दूसरी ओर अपनी बेटी की उपस्थिति के अहसास से जुड़े रहने का ख्याल भी समय रहते मेरे दिमाग में आया। मैंने अपनी बेटी का दिल उस पेशेंट को ट्रांसप्लांट कर दिया।" 

"क..क्या! दिल बदल दिया!" समरकांत के मुख से अनायास ही निकला। 
"शायद इसीलिए वो मुझे नहीं पहचानती!"  उनके दिल ने कहा। 
"नहीं ऐसा नहीं होता, दिल बदल गया तो क्या, दिमाग तो वही है।" दिमाग ने तर्क दिया।

"मेरी बेटी और दामाद तो मुझे छोड़कर जा चुके थे, पर एक नन्हीं सी जान की परवरिश की जिम्मेदारी मुझे सौंपकर गए थे। उसे आया की निगरानी में छोड़कर मैं रोज अस्पताल इस उम्मीद में जाता कि शायद मेरी बेटी का दिल मेरे स्पर्श को महसूस करे और वह लड़की होश में आ जाए। पर रोज ही निराश होकर घर लौटता।   भगवान से रोज यही माँगता कि वह लड़की ठीक हो जाए तो मुझे ऐसा लगेगा कि मैंने अपनी बच्ची को बचा लिया। उससे लगाव तो था ही पर रागिनी का दिल लगाने के बाद तो वह मुझे मेरी बेटी ही लगने लगी थी।"

"फिर... फिर क्या हुआ, कब होश आया उसे?" समरकांत अनायास ही बोल पड़े।

"समर बाबू हम डॉक्टर्स ईश्वर से ज्यादा विज्ञान में विश्वास करते हैं, पर उस समय मुझे हार्ट ट्रांस्प्लांट के बाद सिर्फ भगवान पर विश्वास रह गया था। मैं रोज भगवान से चमत्कार की प्रार्थना करता। ऐसा करते हुए पूरे छ: महीने हो गए। उस बच्ची को कोमा में गए दो साल हो गए थे, सबने मुझसे कहना शुरू कर दिया था कि अब तो आप चमत्कार की उम्मीद छोड़ दीजिए। पर पता है समर बाबू! मुझे लगता था कि अगर इस बच्ची को जाना होता तो हार्ट ट्रांस्प्लांट के समय ही चली जाती और उस समय नहीं गई, तो अब भी नहीं जाएगी। उस बच्ची का दिल निराश होकर मृत्यु को चुन चुका था, पर मेरी बेटी का दिल एक माँ का और एक बेटी का भी दिल था, वो कैसे निराश हो सकता है! और एक दिन रात को एक बजे फोन आया कि डॉक्टर तुरंत अस्पताल आ जाइए।"

डॉक्टर देसाई ने गहरी साँस लेते हुए पास ही रखे रूमाल से अपने आँसुओं से भरे चेहरे को साफ किया और मेज पर रखे गिलास को उठाकर पानी पिया। समरकांत चुपचाप उनको ऐसा करते हुए देख रहे थे, उनके खुद की आँखों में आँसू न जाने कितनी बार आकर कभी गालों पर ढुलक कर तो कभी आँखों में ही सूख चुके थे।

डॉक्टर देसाई ने फिर कहना शुरू किया- "मैं तुरंत अस्पताल गया और वहाँ देखा कि डॉक्टर उस लड़की को एक्ज़ामिन कर रहे थे। मुझे देखते ही नर्स ने बताया कि उसे होश आ चुका है, उसने हाथ हिलाया था तथा पलकें झपकाई थीं। मैं बता नहीं सकता समर बाबू कि उस समय मुझे उतनी ही खुशी हुई जितनी कि एक पिता को अपनी औलाद को पुन: जीवनदान पाते देखकर होती। उसके बाद उसका दो महीने तक उपचार चला, एक महीना अस्पताल में और एक महीना मेरे घर आने के बाद। क्योंकि उसे कुछ भी याद नहीं था, इसलिए मैंने उसे अपनी बेटी रागिनी की जगह दे दी और उसे कभी नहीं बताया कि वह मेरी बेटी नहीं।"

डॉक्टर देसाई चुप हो गए उनकी नजरें दीवार पर लगी रागिनी और रश्मि की उस फोटो पर टिकी थीं, जिसमें पाँच-छ: साल की रश्मि को रागिनी ने बाँहों में भर रखा था। 

समरकांत का मस्तिष्क मानो सुन्न हो चुका था, वह समझ नहीं पा रहे थे कि अब उन्हें क्या करना चाहिए? क्या सच बताकर एक बूढ़े बाप से उसके बुढ़ापे का सहारा और एक बेटी से उसकी माँ को छीन लेना उचित होगा? क्या ऐसा करके वह अपराध नहीं करेंगे? क्या फिर कभी खुश रह पाएँगे? उनके दिल से आवाज आई।
लेकिन न बताकर फिर वह अपनी रत्ना को खो देंगे... भगवान ने शायद उन पर तरस खाकर उन्हें यह अवसर दुबारा दिया, अब फिर वह रत्ना को नहीं खो सकते। उनके दिमाग ने कहा।
वह उसे तो वर्षों पहले खो चुके हैं, उसे कुछ याद नहीं, अब उसे कुछ भी बताने का मतलब है इस परिवार के और रत्ना के साथ-साथ अपने परिवार को भी दुख देना। क्या मैं इतना स्वार्थी हूँ कि अपनी खुशी के लिए सबको दुखी कर दूँ और उसे भी दुख दूँ जिसको पाने के लिए यह सब संघर्ष कर रहा हूँ। नहीं मैं इतना स्वार्थी नहीं हो सकता। अब कम से कम रत्ना जीवित मेरी आँखों के सामने तो है, मैं उसे कभी-कभी देख लिया करूँगा, मेरे जीने के लिए इतनी खुशी ही काफी है। दिल की इस आवाज से समरकांत के चेहरे पर सुकून के भाव नजर आए। 

"क्या सोचने लगे समर बाबू?" अचानक ही आई डॉक्टर देसाई की आवाज ने मानों उन्हें सचेत कर दिया। 

"कुछ नहीं डॉक्टर साहब, बस यही सोच रहा था कि जिसका कोई नहीं होता उसका ऊपर वाला होता है।"

"वो तो है पर आप बताने वाले थे कि आपने इतनी खोजबीन क्यों की?" डॉक्टर देसाई बोले।

"अब इसका कोई औचित्य नहीं रह जाता डॉक्टर साहब, पर फिर भी बता देता हूँ, जब मैंने मिसेज देसाई को शादी में पहली बार देखा तब मैं उन्हें पहचान गया कि वो रायपुरा गाँव की रहने वाली रत्ना जी हैं, परंतु आप लोगों के आपसी प्रेम भाव को देखकर मैं बार-बार भ्रमित हो जाता था कि मैं ग़लत तो नहीं! इसीलिए सच जानने के लिए मैंने ये सारी छानबीन की।" समरकांत ने सच न बताना ही उचित समझा और एक नई कहानी सुना दी।

"इसका मतलब उसका नाम रत्ना है, कोई और है उसके परिवार में?" डॉक्टर देसाई ने पूछा, वह भीतर ही भीतर डर गए थे कि कोई रागिनी को उनसे दूर न कर दे।

"नहीं, कोई भी नहीं है।" समरकांत को अपनी ही आवाज गहराई से आती हुई महसूस हुई। वह उठकर खिड़की के पास खड़े हो गए और बाहर कहीं दूर क्षितिज में समाते धधकते लाल अग्नि के गोले को देखते हुए अपने जलते आँसुओं को भीतर ही ज़ब्त करने का प्रयास करने लगे
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11
"ब.बड़े पापा.." अनायास रजत के मुँह से निकला। उसे महसूस हुआ कि उसकी आँखों से बहते हुए आँसुओं से उसकी कॉलर गीली हो चुकी थी। उसे ऐसा लगा कि समरकांत की आँखों में जो आँसू ज़ब्त हो गए होंगे वो उसकी आँखों से बह रहे हैं। अब वह समझ चुका था कि समरकांत बार-बार शहर क्यों जाते हैं। उसने मोबाइल में समय देखा सुबह के सवा चार बज रहे थे। उसे बेसब्री से इंतजार था कि कब उजाला हो और वह मदन लाल चाचा से जाकर सब बताए और पूछे कि अब क्या करना चाहिए। 
"पर क्या उन्हें बताना चाहिए?" उसके दिमाग में प्रश्न कौंधा।

"क्यों नहीं एक वही तो हैं जिन्होंने बड़े पापा की खुशी के बारे में सोचा।" उसने स्वत: जवाब दिया।
'अब जैसे भी हो मैं बड़े पापा को अकेले नहीं रहने दूँगा।' सोचकर रजत अपने कमरे की ओर चला गया। वहाँ जाकर उसने रश्मि पर एक नजर डाली। नीले बल्ब की मद्धिम सी रोशनी में  वह बेसुध सी सोती हुई मासूम बच्चे सी लग रही थी। रजत चुपचाप लेट गया, पर नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। रह-रहकर उसकी आँखों के सामने कभी रत्ना की तो कभी समरकांत की छवि उभरती। रत्ना की विस्मृत हो चुके जीवन की कल्पना करके उसे अपने और रश्मि के विवाह से पहले का समय याद आने लगा, जब वह रश्मि से अलग होने की कल्पना भी नहीं कर पाता था। समरकांत ने तो पूरा जीवन रत्ना से अलग रहकर काट दिया, पहले वह मजबूरी थी और अब त्याग! नहीं अब और नहीं! सोचते हुए वह उठ बैठा और न जाने क्या सोचते हुए उसने कपड़े बदले और गाड़ी की चाबी लेकर बाहर आ गया।

सुबह के छः बज रहे थे लेकिन चारों ओर घुप्प अँधेरा था, बर्फीली हवा अपने चरम पर प्रतीत हो रही थी। सड़क के दोनों ओर झूमते शाल, देवदार के वृक्ष भयावह लग रहे थे। ऐसे बर्फीली ठंड के मौसम में रजत की कार सुनसान सड़क पर दौड़ती जा रही थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह उगने वाले सूरज से होड़ लगा रहा है कि वह उसके उगने से पहले ही अपनी ससुराल पहुँचेगा। 
कहते हैं न कि जब मन में परोपकार और निस्वार्थ भाव लेकर कोई कार्य किया जाए, तो ईश्वर भी साथ देता। यही हुआ रजत के साथ। वह सूर्योदय के साथ ही अपनी ससुराल पहुँच गया। उसे इस प्रकार सुबह-सुबह आया देख डॉक्टर देसाई और रागिनी परेशान हो गए। आवभगत की औपचारिकता के उपरांत रजत ने एकांत में डॉक्टर देसाई को रत्ना की पहचान, समरकांत से उनके संबंध और अपने निर्णय के विषय में बताया। डॉक्टर देसाई कुछ देर तक तो नि:शब्द हो सोचते रहे, फिर बोले, 
"मुझे लग तो रहा था कि समरकांत जी कुछ तो छिपा रहे हैं, पर जबरन कुछ पूछ भी नहीं सकता था और जिस तरह से उन्होंने बताया तो विश्वास भी करना पड़ा। उन्होंने सचमुच बहुत बड़ा त्याग किया है। पर बेटा रागिनी को कुछ भी याद नहीं, तो ऐसे में उसे समझा पाना तुम्हें नहीं लगता कि बहुत मुश्किल होगा? आखिर उसने रश्मि को माँ बनकर पाला है, वह अपनी ममता कैसे भूल जाएगी? और रश्मि को कैसे समझाओगे?" 

"दादा जी रश्मि को मैं समझा लूँगा और रही मम्मी जी की बात तो उन्हें कुछ नहीं समझाऊँगा, बस याद दिलाने की कोशिश करूँगा, अगर याद आ गया तो बहुत अच्छा, नहीं आया तो फिर जैसे जी रही हैं, वैसे ही आगे भी जीती रहेंगीं।"

"ठीक है, लेकिन कैसे याद दिलाओगे?" डॉक्टर देसाई बोले।

"मैं उन्हें अपने साथ ले जाने आया हूँ, उनके घर लेकर जाना चाहता हूँ। विश्वास कीजिए मेरा मैं उन्हें जबरन कुछ भी याद दिलाने की कोशिश नहीं करूँगा, पर हो सकता है अपना घर देखकर कुछ याद आ जाए। एक कोशिश करना चाहता हूँ।" रजत ने विनम्रतापूर्वक कहा।

"ठीक है कर लो बात ले जाओ। बस बेटा ध्यान रखना कि किसी भी स्थिति में उसकी तबियत प्रभावित नहीं होनी चाहिए। वो बेटी है मेरी, हर हाल में खुश रहनी चाहिए बस यही चाहता हूँ मैं।"  डॉक्टर देसाई ने कहा।

रश्मि की तबियत इन दिनों ठीक नहीं रहती और वह अपनी मम्मी को बहुत याद कर रही है इसीलिए वह उन्हें लेने आ गया। ऐसी बातें बताकर उसने मिसेज देसाई को अपने साथ गाँव चलने के लिए मना लिया। इस कार्य में डॉक्टर देसाई ने भी उसका साथ दिया। रजत रागिनी को लेकर अपने घर आ गया, रश्मि उन्हें देखकर बहुत खुश हुई। वह उनके लिए चाय बनाने रसोई में गई तो रजत भी पीछे से वहाँ आ गया और बोला, "रश्मि मम्मी जी तुम्हें बहुत याद करती हैं और उदास रहती हैं लेकिन नाना जी को अकेले छोड़कर यहाँ आना नहीं चाहती थीं, इसीलिए नाना जी ने कहा कि मैं उन्हें किसी बहाने यहाँ ले आऊँ। फिर मैं उन्हें तुम्हारी तबियत का बहाना बनाकर ले आया, पर प्लीज उन्हें बताना मत।"

"नहीं बताऊँगी, मुझे बहुत खुशी हुई कि तुम मेरी मम्मी का इतना ध्यान रखते हो।" रश्मि हँसती हुई बोली।

रजत इधर से आश्वस्त होकर मदनलाल जी के घर गया और उन्हें सबकुछ बताकर रत्ना के पुराने घर के बारे में जानकारी माँगी, परंतु मदनलाल को रत्ना के विषय में कुछ भी पता नहीं था। 
"फिर अब क्या करें?" रजत के चेहरे पर परेशानी घिर आई।
"रवि से पूछें?" मदनलाल कुछ सोचते हुए बोले।
"उन्हें पता होगा?" रजत बोला
"पूछ के ही देखते हैं, पूछने में क्या जाता है?"
"ठीक है काका, मैं बुला कर आता हूँ, वो अभी घर पर ही हैं।" कहकर रजत घर की ओर चल दिया।

थोड़ी ही देर में रविकांत, मदनलाल और रजत एक साथ थे। मदनलाल ने रविकांत को सारी बात बताई और रजत और अपनी योजना बताते हुए उनसे सहयोग माँगा।
यह सब सुनकर रविकांत स्तब्ध रह गए। वह किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो चुपचाप बैठे रहे।
"क्या सोच रहे हो रवि, तुम्हारे भाई ने इतना बड़ा दर्द अपने सीने में दबाए पूरा जीवन अकेले गुजार दिया, और तो और जब उन्हें सारी सच्चाई पता चली तब भी उन्होंने सबकी भलाई के लिए इस सच्चाई को अपने तक ही सीमित रखा। इस बात को भी लगभग पाँच साल हो गए। तुम्हारे भाई साहब रत्ना जी को सिर्फ देखने के लिए हर महीने शहर जाते हैं, समझ सकते हो उनका अकेलापन? क्या अब भी, जब भगवान ने हमें एक मौका दिया है, तब भी हमें यह नेक काम करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए?"

"ऐसा नहीं है मदनलाल भाई साहब, मैं तो शादी वाले दिन से ही भाई साहब की हालत जानता हूँ, पर अफसोस हो रहा है कि मैंने क्यों नहीं यह सच जानने की कोशिश की।" रविकांत गंभीर मुद्रा में बोले।
"खैर! मैं अब अपनी गलती सुधारूँगा।" ठंडी साँस लेते हुए रविकांत पुन: बोले। 

"तो तुमने रत्ना जी का घर देखा है?" मदनलाल ने पूछा।
"हाँ देखा है, मैं बताता हूँ और रजत तुम ही उन्हें वहाँ लेकर जाना।" 

"हाँ और समरकांत भाई साहब जिस बेंच पर रोज जाकर बैठा करते हैं, शायद उससे भी उनका कोई संबंध है। वहाँ भी लेकर जाना।" मदनलाल बोले। 

"ठीक है मैं आज से ही शुरू कर देता हूँ।" कहते हुए रजत वहाँ से चला गया।

बैठक में प्रवेश करते ही समरकांत के पैर जहाँ थे वहीं ठिठक गए। सामने रागिनी देसाई को बैठी देख उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। उन्होंने अपने दाएँ हाथ की तर्जनी उंगली और अंगूठे से अपनी आँखों को हल्के से मला और पुन: देखा तो सामने वही थीं। अच्छा है उन्हें रागिनी ने आँखें मलते नहीं देखा, ऐसा सोचते हुए वह भीतर आए। 
आज तो घर बैठे ही उनके मन की मुराद पूरी हो गई थी, सोचते हुए वह मेज के दूसरी ओर रखे सोफे पर बैठते हुए बोले, "नमस्कार समधन जी, आज तो हमारा घर धन्य हो गया आपके चरणों का स्पर्श पाकर।" 

"नमस्कार समधी जी, पहले बताते तो मैं हर महीने आपके घर को धन्य करती रहती।" रागिनी हाथ जोड़कर मुस्कराते हुए बोलीं।

"अच्छी बात है आज बता दिया अब देखते हैं कितना आती हैं आप, वैसे आने-जाने की जरूरत भी क्या है, मैं तो कहता हूँ कि आप यहीं रह जाएँ।" समरकांत भी मुस्कराते हुए बोले। 

"ख्याल तो नेक है, विचार किया जा सकता है।" कहते हुए रागिनी हँस पड़ीं।

"मम्मी जी! मैं आज आपको अपना गाँव दिखाना चाहता हूँ, चलेंगी आप?" बाहर से आता हुआ रजत बोला और समरकांत के पास ही बैठ गया।

"क्यों नहीं, अब तुम्हारे घर आई हूँ जहाँ घुमाना चाहो घुमा लो। चलो कहाँ चलना है।" समरकांत की ओर देखते हुए रागिनी बोलीं।

"जी खाना-वाना खा लीजिए फिर चलते हैं।" कहते हुए रजत उठा और अपने कमरे की ओर चला गया। 'हे भगवान आज सबकुछ वैसा ही हो जाए जैसा मैंने सोचा है।' वह भगवान से मन ही मन प्रार्थना कर रहा था। 

समरकांत को रागिनी की नजरें कुछ कहती हुई लगीं, पर क्या? उनकी आँखों में अजीब सी उदासी देखी उन्होंने।
"क्या आप कहीं नहीं घुमाएँगे मुझे।" वह समरकांत की ओर देखती हुई बोलीं। 
आज वो आँखें उन्हें जानी-पहचानी लग रही थीं, उनमें कुछ था जिससे समरकांत भली-भाँति परिचित थे। आँखों में छिपा यह भाव, यह परिचय उन्हें भीतर ही भीतर उद्वेलित कर रहा था। उन्होंने बड़ी मुश्किल से खुद को मजबूत किया है, अब दुबारा कमजोर नहीं पड़ना चाहते, इसलिए अभी यहाँ से जाना ही उचित होगा ऐसा सोचकर वह उठे और तभी रागिनी बोल पड़ीं- "आपने जवाब नहीं दिया, आप नहीं घुमाएँगे मुझे?"

"जी जरूर, पहले आप रजत के साथ घूम लीजिए, कोई जगह बच गई तो मैं घुमा लाऊँगा।" गंभीर हो चले समरकांत कहते हुए अपने कमरे की ओर चले गए।
रागिनी देसाई उन्हें जाते हुए तब तक देखती रहीं, जब तक कि वो पहली मंजिल पर जाने वाली सीढ़ियों पर नजर आते रहे।

रजत रश्मि और रागिनी के साथ ऊँचे-नीचे पथरीले रास्तों से होते हुए उस बगीचे की ओर बढ़ रहा था, जो उसके गाँव से लगभग डेढ़-दो किलोमीटर दूर है। पगडंडी के दोनों ओर कहीं कँटीली तो कहीं जंगली फूलों की बड़ी-बड़ी झाड़ियाँ रागिनी को अपनी ओर आकर्षित कर रही थीं। वह कभी-कभी फूलों से लदी झाड़ियों को प्यार से सहलातीं तो कभी हाथ हटाए बिना दूर तक छूते हुए चलतीं। रश्मि रागिनी के पेड़-पौधों व फूलों के प्रति इस तरह के लगाव को पहली बार देख रही थी। 
"आपको पता है मम्मी जी! ये रास्ता बस स्टैंड तक जाने का शॉर्ट कट है। बड़े पापा तो अब भी कई बार इसी रास्ते से जाते हैं। उन्हें तो इस रास्ते से विशेष लगाव है।"

"अच्छा! वो क्यों?" रश्मि बोली पड़ी।
"ये तो वही जानें, पर अपनी सर्विस के दौरान वर्षों तक वो इसी रास्ते से आते-जाते थे, तो हो सकता है कि कोई विशेष याद जुड़ी हो यहाँ से।" उसने कहते हुए रागिनी की ओर देखा। वह एकटक उस बगीचे को देख रही थी जो उन्हें थोड़ी दूरी पर नजर आ रहा था। रागिनी तेज-तेज कदम बढ़ाती हुए वहाँ रखे उस बेंच तक पहुँची और ठिठक गईं। वह उसे बड़े गौर से देख रही थीं, जैसे पहचानने की कोशिश कर रही हों। उसे इस प्रकार छू रही थीं जैसे उसे महसूस करने की कोशिश कर रही हों। उसे सहलाते हुए उनके हाथ कंपकंपाने लगे। 

रश्मि ने उन्हें इस प्रकार देखा तो आगे बढ़कर कुछ बोलना चाहती थी पर तभी रजत ने उसका हाथ पकड़ लिया और इशारे से उसे चुप रहने के लिए कहा।

रागिनी के दिमाग में बर्फ से ढँकी हुई बेंच की धुंधली सी छवि उभरती है, कभी खाई में लटकी किसी लड़की की धुंधली सी छवि उभरती है। वह अपना सिर पकड़कर उसी बेंच पर बैठ जाती हैं, तभी उसे अपने बगल में बैठे मुस्कुराते हुए समरकांत दिखाई दिए और वह झटके से खड़ी हो गईं। 
"क्या हुआ माँ?" रश्मि खुद को रोक न सकी और रजत से हाथ छुड़ा कर रागिनी के कंधे पकड़कर बोली।

"क..कुछ नहीं.. कुछ नहीं।" कहती हुई रागिनी फिर उसी बेंच पर बैठ गईं और हाथ से बेंच को सहलाते हुए कहीं खोई हुई सी इधर-उधर देखने लगीं। 
रश्मि और रजत भी उसके साथ ही बैठ गए।
"मम्मी जी आप ठीक तो हैं? घर वापस चलें क्या?" रजत ने चिंतित होते हुए कहा। हालांकि उसे समझ आ रहा था कि शायद रागिनी को कुछ याद आ रहा है।

"नहीं, मैं ठीक हूँ, मुझे यह बगीचा बहुत अच्छा लग रहा है, ऐसा लगता है मेरा इससे बहुत पुराना रिश्ता है। यहाँ से उठने का मन ही नहीं कर रहा, जैसे यह बेंच मेरे दिल के बहुत करीब हो। पर तुम मुझे और कहाँ ले जाना चाहते हो, ले चलो। बाद में आकर मैं फिर यहीं बैठना चाहूँगी।" रागिनी बोलीं। वह सामान्य न होते हुए भी स्वयं को सामान्य दिखाने की कोशिश कर रही थीं परंतु रजत उनकी मन:स्थिति को बखूबी समझ रहा था। लेकिन यही तो चाहता था वह कि उन्हें सब याद आ जाए। 
"चलिए।" रजत खड़े होते हुए बोला।

"हाँ चलो।" रागिनी खड़ी हुईं और रजत के कुछ बोलने से पहले ही झाड़ियों में लगभग छिपी हुई सी उस पगडंडी की ओर बढ़ गईं जो रायपुरा गाँव की ओर जाती है।
रजत अवाक् सा अपनी जगह खड़ा रह गया, उसे रुका देख रश्मि भी वहीं रुक गई। थोड़ा आगे जाकर रागिनी रुकीं और पीछे किसी को आते न देखकर बोलीं- "क्या हुआ, तुम दोनों रुक क्यों गए?"

"आ आपको कैसे पता कि हमें उधर ही जाना है?" रजत उनकी ओर बढ़ते हुए बोला। पीछे-पीछे रश्मि भी चलने लगी।
"अरे हाँ! मुझे कैसे पता? सचमुच मुझे नहीं पता लेकिन यूँ ही इधर को आ गई, इधर तो शायद कोई रास्ता भी नहीं है।" रागिनी खुद भी आश्चर्यचकित हो रही थीं। 

"नहीं रास्ता तो है, ये आगे की ऊँची झाड़ियों की वजह से दिखाई नहीं पड़ रहा, वो देखिए।" रजत ने आगे बढ़ते हुए उंगली से रास्ते की ओर संकेत किया।

"ये तो सचमुच सोचने की बात है कि जो रास्ता दिखाई भी नहीं पड़ रहा था, मम्मी उस रास्ते की ओर बिना किसी के बताए ऐसे चल पड़ीं जैसे उन्हें पहले से सब पता है।" रश्मि आगे बढ़ती हुई बोली।

"रजत! क्या इधर कोई रायपुरा गाँव भी है क्या?" रजत चौंककर ठिठक गया।

"आपको कैसे पता?" उसने पूछा।
"कुछ साल पहले मैंने ये नाम तुम्हारे बड़े पापा जी से सुना था, तबसे यह नाम मैं भूल ही नहीं पाई। अब सोच रही हूँ कि अगर इधर कहीं है तो क्यों न वहाँ भी घूम आएँ।" रागिनी उसी गंभीर मुद्रा में बोली।

"जी जरूर चलेंगे।" रजत ने कहा। वह सोच रहा था की शायद वह अपने उद्देश्य में सफलता के बहुत पास है। 
तीनों बातें करते, पूछते बताते रायपुरा गाँव पहुंँच गए। हालांकि पहले की अपेक्षा अब गाँव में बहुत कुछ बदल चुका था फिर भी गाँव में प्रवेश करते ही रागिनी को अपनेपन का अहसास हुआ। वह इधर-उधर देखती हुई रजत के पीछे-पीछे चल रही थी और गाँव के बच्चे, स्त्रियाँ और युवा उन्हें ऐसे ही देख रहे थे, जैसे किसी अजनबी को वहाँ से गुजरते देखते होंगे।
रजत अपने पापा रविकांत के द्वारा दिए दिशा-निर्देश के आधार पर आगे बढ़ रहा था। 
"रजत बेटा!" रागिनी ने पुकारा।
"ज..जी मम्मी जी।"
"ये रायपुरा गाँव है न?" 

"क्या! आपको कैसे पता?" चौंकने की बारी रश्मि की थी क्योंकि वो रजत के मंतव्य और अपनी माँ यानि रागिनी के व्यक्तिगत जीवन से सर्वथा अनभिज्ञ थी।

"मम्मी जी यही है रायपुरा, और रश्मि अभी थोड़ी देर पहले ही तो मम्मी जी ने यहाँ आने की इच्छा जाहिर की थी यार, तुम बहुत जल्दी भूल जाती हो।" रजत ने रश्मि को समझाने की कोशिश की।

तभी थोड़ी दूरी पर खड़े एक बुजुर्ग दूसरे बुजुर्ग को आवाज देते हुए उत्तेजित होकर बोले, "अरे माखन जल्दी आ, देख वो रत्ना ही है न?" उस बुजुर्ग से थोड़ा आगे आ चुके रजत ने पीछे मुड़कर देखा तो वे दोनों बुजुर्ग रागिनी को देखकर बातें कर रहे थे। रजत लंबे-लंबे कदमों से उनके पास पहुँचा और बोला- 
"दादा जी राम-राम। वो रत्ना जी का घर किधर को है बता देंगे? मैं समरकांत जी का भतीजा हूँ, उन्होंने किसी काम से भेजा है।"

"समरकांत जी ने भेजा है? वो नहीं आए? और ये साथ में रत्ना जैसी दिखने वाली महिला कौन हैं?" उनमें से एक बजुर्ग बोले।

"ये मेरी सासू माँ हैं"

"अच्छा! ये तो बिल्कुल रत्ना जैसी दिखती हैं, हम तो समझे थे कि रत्ना कैसे आ गई।" दूसरे बुजुर्ग ने कहा। 

रश्मि और रागिनी खड़ी होकर रजत का इंतजार कर रही थीं।
उन्होंने ने देखा कि बुजुर्ग ने दाँयीं ओर संकेत करके कुछ बताया और फिर रजत वापस उन दोनों के पास आता हुआ दिखाई दिया।
रागिनी इधर-उधर देखती हुई न जाने क्या पहचानने की कोशिश कर रही थी। रजत आकर एक ओर चल दिया और वे दोनों भी उसके पीछे-पीछे चल दीं।
कुछ मिनटों में ही दोनों एक छोटे से घर के बाहर खड़े थे। 

रागिनी घर को बाहर से ही देखकर स्तब्ध थी, वह धीरे-धीरे चलती हुई द्वार पर गई और दरवाजे को बड़ी ही कोमलता से प्यार से सहलाने लगी। फिर उसने कुंडी खोली और अंदर पैर रखते ही चौंक गई, उसे अपनी ही परछाई घर के भीतर नजर आई और लुप्त हो गई। एक बुजुर्ग खाँसते हुए बाँयी ओर चारपाई पर बैठे हुए जैसे उसे आवाज दे रहे हैं, "रत्ना!"

"आ..आई बाबा..कहकर वह उधर ही भागी और वहीं पड़ी हुई एक लकड़ी में पैर फँसा और वह लड़खड़ा पड़ी, पर तब तक रजत ने उसे संभाल लिया। 
रागिनी ने देखा वहाँ तो खाट पर कोई नहीं था। फिर वो क्या था? वो बुजुर्ग! मैं उन्हें बाबा कह रही थी। सोचते हुए रागिनी दूसरे कमरे में आ गई, कमरे में पैर रखते ही उसे सामने लकड़ी के फट्टे से बनें आले पर रखे फूलदान और उसमें रजनीगंधा के फूलों की धुंधली सी छवि दिखाई दी। उसे चक्कर आने लगे। उसने इधर-उधर गर्दन घुमाया तो खिड़की से बाहर पहाड़ियाँ जैसे बाँहे फैलाए उसे अपनी ओर बुलाती हुई सी लगीं और अगले ही पल वही पहाड़ियाँ बर्फ से ढँकी हुई दिखाई दीं। अब उसे कभी समर हाथ में रजनीगंधा लिए तो कभी बाबा खाँसते हुए, कभी वह खाई में लटकी हुई तो कभी समर के साथ बेंच पर बैठी हुई, कभी धुंधली तो कभी साफ होती छवि दिखाई देती। अचानक उसे ऐसा लगा जैसे घर हिलने लगा और तेज आँधी के साथ पूरा घर भर-भराकर उसके और बाबा के ऊपर गिर गया। बाबा....वह चीखकर बेहोश हो गई।

रागिनी को होश आया तो उसने खुद को रविकांत, रश्मि, रजत, मदनलाल और दो अन्य बुजुर्गों से घिरा पाया, वह अस्पताल में थी। "बाबा..बाबा..मेरे बाबा कहाँ हैं?" वह चीख पड़ी। डॉक्टर ने उसे समझाया रिलैक्स आप शांत हो जाइए, आपके सारे सवालों के जवाब मिलेंगे आपको। 
"बिटिया पहचाना हमें?" एक बुजुर्ग बोले।
"ह..हाँ काका, मेरे बाबा कहाँ हैं?" तभी उसकी नज़र रविकांत पर पड़ी।
"भैया, समर कहाँ हैं?" उन्होंने रविकांत से पूछा। किन्तु वह रश्मि और रजत की ओर ऐसे देखतीं जैसे वे उनके लिए अजनबी हों। 
"मम्मी!.." आप..आप ठीक तो हैं?" रश्मि खुद को रोक न सकी और रागिनी का हाथ पकड़कर बोल पड़ी।

"मम्मी!" रागिनी विस्मित सी बोली।
"डॉक्टर, ये मुझे पहचान नहीं रही हैं, देखिए न क्या हुआ इन्हें?" रश्मि रोती हुई बोली।

"मिसेज रागिनी आप यहाँ सबको पहचान रही हैं?" डॉक्टर ने पूछा।

"मिसेज रागिनी! डॉक्टर मैं रत्ना हूँ रागिनी नहीं, और मेरे बाबा कहाँ हैं? आप लोग बताते क्यों नहीं?" रत्ना चीख कर बोली।

"बिटिया तुम्हारे बाबा को गए हुए तो 25-26 साल हो गए..." कहते हुए बुजुर्ग माखन लाल ने उसे सब कुछ बता दिया। वह रोती हुई फिर बेहोश हो गई। 

"क्यों रजत क्यों किया ऐसा? अगर मेरी मम्मी को कुछ हुआ तो मैं तुम्हें कभी माफ नहीं कर पाऊँगी।" रश्मि ने सिसकते हुए रजत के कंधे पकड़कर झिंझोड़ते हुए कहा। 

"परेशान मत हो बेटा सब ठीक हो जाएगा।" रविकांत ने रश्मि को समझाते हुए कहा।
रश्मि ने फोन करके डॉक्टर देसाई को सारी स्थिति बताई और आने के लिए कहा। 
सभी अस्पताल के कॉरिडोर में रत्ना के होश में आने का इंतजार कर रहे थे और भीतर डॉक्टर उसके होश में आने का इंतजार तथा उसके मस्तिष्क की जाँच कर रहे थे। लगभग एक घंटे की जद्दोजहद के बाद रत्ना को होश आया। होश में आते ही उसने समर से मिलना चाहा पर रविकांत ने बताया कि समरकांत से बात नहीं हो पाई वह घर पर ही मिलेंगे। 
रश्मि चुपचाप उसके पैरों के पास खड़ी आँसू बहा रही थी पर कुछ बोली नहीं, उसे डर था कि कहीं फिर नहीं पहचानीं और बेहोश हो गईं तो वह खुद को अपराधी समझेगी।

"रश्मि! यहाँ आओ बेटा, इतनी दूर क्यों खड़ी हो?" रत्ना ने उसे रोते देख बुलाया।
"आप...आप मुझे पहचान रही हैं?" रश्मि खुशी से दौड़कर उसके गले लगकर फफक पड़ी।

"अरे मैं ठीक हूँ और तुझे और रजत सभी को पहचान रही हूँ।" रत्ना ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

"तो अब आपको अपना पिछला और वर्तमान जीवन सब याद आ गया?" मदनलाल बोले।

"हाँ भाई साहब, सब याद आ गया।" रत्ना की आँखों में आँसू झिलमिला रहे थे।

सभी खुश थे, फोन पर पूरी बात सुनकर डॉक्टर देसाई भी खुश हुए। सब वापस घर आने लगे तो रत्ना गाड़ी से उसी मोड़ पर उतर गई, जो मोड़ बगीचे की ओर जाता था।

"पर अंधेरा हो रहा है आप इस समय पैदल कैसे जाएँगीं?" रविकांत बोले।

"कोई बात नहीं, रजत चलेगा मेरे साथ, क्यों रजत चलोगे न?" रत्ना बोलीं।

"जी ठीक है, कहते हुए रजत भी गाड़ी से उतर गया।

"मैं भी आपके साथ आती हूँ।"  कहते हुए रश्मि भी उतरने लगी।

"मुझ पर भरोसा रखो रश्मि, मैं मम्मी जी को सही सलामत ले आऊँगा, तुम गाड़ी से जाओ और स्वागत की अच्छी सी तैयार करो। नाना जी भी आने वाले होंगे।" रजत ने रश्मि को रोकते हुए कहा।

गाड़ी आगे बढ़ गई और रजत और रत्ना पगडंडी पर थोड़ा आगे जाकर बाँयीं ओर मुड़कर बगीचे की ओर मुड़ गए। 
चाँद अपने पूरे शबाब पर संपूर्ण वातावरण को अपनी दूधिया चाँदनी से नहला रहा था। तेज हवा के थपेड़ों से जूझती हुई झाड़ियाँ दूधिया चाँदनी में भी डरावनी लग रही थीं। दोनों बगीचे के पश्चिमी (पिछले) छोर पर थे। पगडंडी के दाँयीं ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और झाड़ियाँ थे तो बाँयीं ओर गहरी भयावह खाई थी। 

"तुम जानते हो रजत मैं तुम्हारे बड़े पापा से पहली बार यहीं इसी खाई में लटकी हुई मिली थी।" रत्ना ने खाई की ओर इशारा करते हुए कहा। 

"अच्छा! घर पहुँचते ही मैं आपसे पूरी कहानी सुनूँगा।" रजत आश्चर्यचकित होता हुआ बोला।

दोनों बगीचे में प्रवेश कर चुके थे। बाहर की अपेक्षा बगीचे में अंधेरा अधिक था। रत्ना और रजत दोनों की नजर एक साथ बेंच पर पड़ी, वहाँ कोई मानवाकृति नजर आई।
रत्ना दाँयीं ओर बेंच की ओर मुड़ गई।
"तुम आ गईं रत्ना! देखो इस बार मैं तुमसे पहले आ गया। और तुमने मुझे बहुत लंबा इंतजार करवाया।" 
खड़े होते हुए समरकांत बोले।
रत्ना अवाक् सी उन्हें देखती रही और उसके होंठ बुदबुदा उठे..."स..म..र.."
समर ने बाँहें खोल दीं, आज सारे जहान की खुशी उनकी बाँहों में थी।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️