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Friday, 21 June 2019

योग का महत्व

 योग का महत्व

योग एक आध्यात्मिक प्रकिया है जिसके अंतर्गत शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने का काम होता है अर्थात् योग के द्वारा एकाग्रचित्त होकर तन और मन को आत्मा से जोड़ते हैं। गीता में श्रीकृष्ण ने एक स्थल पर कहा है 'योगः कर्मसु कौशलम्‌' अर्थात् योग से कर्मो में कुशलता आती है। हमारे देश का प्राचीन इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है, हमारा देश ऋषि-मुनियों का देश रहा है और उस समय ऋषि-मुनि नित्य योग क्रिया करते थे, कदाचित् इसीलिए वर्तमान समय में बहुत से लोग इसे धर्म से जोड़कर देखते हैं और इसका विरोध करते हैं किन्तु इसे धर्म से जोड़ना सर्वथा गलत ही है और धर्म से जोड़कर इसे न अपनाने के सिर्फ दो ही कारण हो सकते हैं, एक तो अज्ञानता और दूसरा राजनीतिक कारण। यदि इन दो कारणों को छोड़ दिया जाए तो योग का विरोध करने या इसे न अपनाने का कोई औचित्य नहीं।
वर्तमान समय में रोजमर्रा के भागमभाग भरे जीवन, प्रदूषण से युक्त वातावरण, अशुद्ध और अनियमित आहार, अनियमित जीवनशैली के कारण लोग मानसिक तनाव, शारीरक व मानसिक अस्वस्थता जैसी कई समस्याओं से जूझ रहे हैं, हर दस में से छः व्यक्ति मोटापे का शिकार दिखाई देता है। ऐसी परेशानियों से आराम पाने के लिए वो दवाइयाँ लेना प्रारंभ करते हैं और धीरे-धीरे उनका जीवन ही दवाइयों पर निर्भर हो जाता है। साथ ही लोग मोटापे से राहत पाने के लिए व्यायाम करते हैं, बहुधा लोग दिन में कई- कई घंटे व्यायामशाला में व्यतीत करते हैं और कोच की सलाह पर तरह-तरह के हेल्थ पाउडर आदि पर पैसा पानी की तरह बहाते हैं। योग इन सारी समस्याओं का एकमात्र उपाय है। योग करने से हमारे मस्तिष्क को शांति मिलती है, ध्यान केंद्रित करने में आसानी होती है, तनाव से मुक्ति मिलती है, कार्य करने में मन लगता है, यह न सिर्फ हमारे मस्तिष्क को ताकत पहुँचाता है बल्कि हमारी आत्मा को भी शुद्ध करता है। शरीर की अलग-अलग समस्याओं के लिए अलग-अलग योगासन होते हैं। जो व्यक्ति नियमित रूप से योग करते हैं वो शारीरिक व मानसिक व्याधियों से दूर रहते हैं। अतः योग को दैनिक जीवन में नियमित रूप से अपनाना चाहिए ताकि बीमारियों, कुंठाओं से दूर रहकर एक स्वस्थ, सकारात्मक और सार्थक जीवन का लाभ उठाया जा सके।
प्रात: काल का समय, योग करने के लिए सर्वथा उपयुक्त होता है। सुबह के समय वातावरण स्वच्छ होता है और ऐसे वातावरण में
योग करने से व्‍यक्‍ति के मस्‍तिष्‍क तथा शरीर की सभी इंद्रियाँकी गतिमान होती हैं, जिससे व्‍यक्‍ति का मन एकाग्र होकर कार्य करता है। योग रूपी साधना का जीवन में होना आवश्यक  है। यह एक ऐसी दवा है, जो बगैर खर्च के रोगियों का इलाज करने में सक्षम है। वहीं यह शरीर को ऊर्जावान बनाए रखता है। यही कारण हैं कि युवाओं द्वारा बड़े पैमाने पर जिम और एरो‍बि‍क्‍स को छोड़कर योग अपनाया जा रहा है।
योग हमारी संस्कृति का एक अभिन्न अंग है और वर्तमान समय में १७७ से भी अधिक देशों ने इसकी महत्ता को समझा और अपनाया है।
अंग्रेजी दवाइयों के आदी हो चुके नई पीढ़ी के लोगों में जब विभिन्न संस्थाओं द्वारा योग के प्रति जागृति लाने का प्रयास किया गया तथा इन्होंने विदेशों में भी योग के प्रति रुझान को जाना तब अपनी संस्कृति की ओर इनका भी रुझान हुआ। हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री ने २७ सितंबर २०१४ को संयुक्त राष्ट्र महासभा में योग की विशेषताओं पर भाषण देकर इसके महत्व को बताया जिसके फलस्वरूप १९९ सदस्यों की इस संस्था में से १७७ देशों ने २१ जून को अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्य किया और तब से प्रत्येक वर्ष साल के सबसे बड़े दिन २१ जून को विश्व स्तर पर योगदिवस मनाया जाने लगा। साथ ही स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के सहयोग से योग को सम्पूर्ण विश्व में प्रसारित कर मानव कल्याण हेतु निरन्तर प्रयास किए जा रहे हैं। एक नए भारत के अभ्युदय हेतु आचार्यकुलम् की भी स्थापना की गई, जिससे यहाँ से प्रशिक्षण प्राप्त कर निकले विद्यार्थी भविष्य में भी भारतीय संस्कृति के वाहक बनें और योग को आगे ले जाने का स्रोत बने।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

Thursday, 6 June 2019

गुरु दक्षिणा की अद्भुत मिसाल 'राष्ट्रीय हिन्दी विकास सम्मेलन'


 

'पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी शिलांग' के तत्वावधान में आयोजित त्रिदिवसीय हिन्दी विकास सम्मेलन अद्भुत, चिरस्मरणीय और अनुकरणीय रहा। 24 से 26 मई 2019 के यह तीन दिन कार्यक्रम में पधारे साहित्यकारों के साहित्यिक जीवन में नवीन ऊर्जा का स्रोत और प्रेरणास्रोत के रूप में चिरस्थाई सिद्ध होंगे। देश भर से कई राज्यों से पधारे साहित्यसेवियों ने अनवरत दो दिन तक साहित्यामृत का अमृत पान करते हुए अपनी लेखनी को सशक्त किया तथा एक ही स्थान पर एक साथ भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के लेखकों-कवियों का संगम निश्चय ही साहित्यिक कुंभ में स्नान करने जैसा रहा। एक ही स्थान पर विभिन्न विचारधाराओं, विभिन्न संस्कृतियों से परिचित होने का सुअवसर प्राप्त हुआ। शिविरार्थी रचनाकारों का आपसी सहयोग, सौहार्दपूर्ण मेल-मिलाप और सांस्कृतिक समन्वय अनूठा रहा। शिविरार्थियों के ठहरने की व्यवस्था गोल्फ पाइन गेस्ट हाउस में की गई थी तथा समारोह आयोजन स्थल 11 वीं वाहिनी सैक्टर मुख्यालय सीमा सुरक्षा बल मौपट शिलांग में रखा गया था। आवासीय स्थल और समारोह स्थल के दूर-दूर होने से आयोजक मंडल को निःसंदेह दुश्वारियों का सामना करना पड़ा किन्तु समारोह स्थल का बी.एस.एफ. कैन्ट में होना हमारे लिए फौजी भाइयों के सानिध्य का अद्भुत और गौरवशाली अनुभव रहा। कार्यक्रम स्थल पर पहुँचने पर सभी साहित्यकारों का भारतीय परंपरानुसार 'अतिथि देवो भव' के भाव को सर्वोपरि रखते हुए तिलक लगाकर, हाथ में मंगल कामना सूत्र बाँधकर तथा अंग वस्त्र स्वरूप दुपट्टा डालकर स्वागत करना हृदयतल को छू गया।
श्रीमती उर्मि कृष्ण (शुभ तारिका अंबाला छावनी) के निर्देशन तथा अकादमी के अध्यक्ष डॉ. विमल बजाज की अध्यक्षता में यह साहित्यिक अनुष्ठान संपन्न हुआ।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि मौपट सेक्टर मुख्यालय के उप महानिरीक्षक श्री अवतार सिंह शाही थे तथा विशिष्ट अतिथि श्री शंकरलाल गोयंका (जीवनराम मुंगी देवी गोयंका चैरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टी प्रभारी), सीसुब मौपट के समादेष्टा कुलदीप सिंह और समाजसेवी श्री पुरुषोत्तम दास चोखानी का हिन्दी भाषा के प्रति समर्पण और योगदान देखकर मन स्वतः कृतज्ञ भाव से अभिभूत हो जाता है।
कार्यक्रम का श्री गणेश दीप प्रज्ज्वलन, सरस्वती वंदना,स्वागत-गीत व डॉ.महाराज कृष्ण जैन की प्रतिमा पर पुष्पांजलि से हुआ। ज्ञात हुआ कि प्रति वर्ष इस प्रकार के भव्य आयोजन के द्वारा हिन्दी भाषा के विकास व प्रोन्नयन का कार्य डॉ० अकेला भाई का अपने गुरु डॉ० महाराज कृष्ण जैन के प्रति गुरु दक्षिणा है। गुरु दक्षिणा का यह स्वरूप भाषा के क्षेत्र में किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण और अनुकरणीय है। इसकी उपयोगिता और उपलब्धियों को शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता।
इसके अलावा एक अन्य चीज ने मुझे बेहद आकर्षित किया वो था समयनिष्ठ होना। सम्पूर्ण कार्यक्रम पूर्वनिर्धारित समय के अनुसार हुआ, इसका श्रेय निःसंदेह कार्यक्रम के आधार स्तंभ डॉ० अकेला भाई को जाता है क्योंकि उन्होंने इसकी नीव तो तभी रख दी थी जब यह कार्यक्रम पूर्वनिर्धारित समय पर होना असंभव प्रतीत हो रहा था तब भी उन विषम परिस्थितियों में भी यह सम्मेलन पूर्वनियोजित समय पर ही करवाकर एक मिसाल कायम किया और समय की यह पाबंदी वहीं से प्रारंभ होकर अंत तक बनी रही, जो हमारे लिए अनुकरणीय है।
श्रीमती जयमति जी का सरस्वती वंदना तथा स्वागत गान और ज्योति जी के तबला वादन ने संपूर्ण वातावरण को संगीतमय बना दिया। अरुणा उपाध्याय जी का कुशल मंच संचालन प्रशंसनीय था, विभिन्न प्रातों से आए सभी कवियों के द्वारा मधुर कंठ से सरस काव्य पाठ अवर्णनीय था। पुस्तकों का लोकार्पण अद्वितीय था। पूर्वोत्तर राज्यों में हिंदी के विकास हेतु विद्वानों द्वारा शोधपरक आलेख भी बेहद संतुलन और रोचकता के साथ प्रस्तुत किए गए। सभी साहित्यकारों का सम्मान और मुख्य अतिथि तथा अध्यक्ष का वक्तव्य सभी कुछ एक संतुलन में किसी माला में पिरोये मोतियों की भाँति संतुलित रूप से गतिमान रहा। समारोह के सांस्कृतिक पड़ाव के रूप में सांस्कृतिक संध्या का आयोजन बड़ा भव्य रहा जिसमें असमियाँ लोकनृत्य, बिहू, राजस्थानी, हरियाणवीं, भोजपुरी लोकनृत्य व लोकगीत की प्रस्तुति प्रांतों की संस्कृतियों से परिचित कराने का रोचक और प्रशंसनीय माध्यम बना।
आयोजन का अंतिम पड़ाव शिविरार्थियों को पर्यटन के द्वारा मेघालय के प्राकृतिक व दर्शनीय स्थलों पर भ्रमण के द्वारा वहाँ की संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य से परिचित करवाना था। फौजी भाइयों की सुरक्षा और सानिध्य में शिलांग का एलीफेंटा फॉल, चेरापूंजी के मावसमाई केव, अत्यंत रोमांचकारी अनुभव रहा। थांगखरांग पार्क में सहभोज एक अनूठा अनुभव था। बांगला देश की सीमा का अवलोकन, सेवेन सिस्टर्स फॉल के  मनोहर दृश्य व मेघालय के खासी हिल्स का वह प्राकृतिक सौंदर्य तथा ईको पार्क का वह मनोरम दृश्य हमारे मन को गुदगुदाने लगे। बादलों का बार-बार धरती पर उतरना और फिर लुप्त हो जाना मानों हमारा स्वागत करने को तत्पर हों।
साहित्यिक आयोजन के इस तीसरे दिवस ने पूरे कार्यक्रम में चार चाँद लगा दिया। विगत दो दिवसों में जिन लोगों से हमारा परिचय आधा-अधूरा रह गया था बस में गन्तव्य तक जाते हुए वह परिचय न सिर्फ पूर्ण हुआ बल्कि अंत्याक्षरी जैसे खेल के द्वारा बेहद मनोरंजक भी रहा।
फौजी भाइयों का सानिध्य उनका समर्पण व सेवा भाव को शब्दों में बाँधना संभव नहीं। हिन्दी भाषा के विकास हेतु इस आयोजन को सम्पन्न कराने में डॉ० अकेला भाई व उनके सभी सहयोगियों की कर्मठता अवर्णनीय है। साथ ही संपूर्ण कार्यक्रम के प्रत्येक पहलू से पूरे मेघालय को परिचित करवाने यानि संपूर्ण मीडिया कवरेज के दक्षतापूर्ण निर्वहन का उल्लेख न करूँ तो यह वर्णन अधूरा रहेगा दैनिक पूर्वोदय के पत्रकार योगेश दुबे जी ने जिस दक्षता के साथ संपूर्ण कार्यक्रम को कवरेज देकर अपने समाचार पत्र द्वारा आम जनता तक पहुँचाया वह काबिले तारीफ है।
परम आदरणीया उर्मि कृष्ण दीदी, आ० डॉ० अकेला भाई और उनके सभी सहयोगियों तथा हमारे देश के गौरव हमारे सैनिक भाइयों को नमन करते हुए यही कामना करती हूँ कि 'पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी' हिन्दी के विकास के लिए इसी प्रकार अनवरत क्रियाशील रहे।

मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️
दिल्ली- 53
9891616087

200 वर्षों तक अंग्रेजों की गुलामी करते-करते हम मानसिक रूप से गुलाम बनकर रह गए हैं। पहले अंग्रेजों की गुलामी करते थे, अब अंग्रेजी की गुलामी करते हैं।
मालती मिश्रा

Monday, 3 June 2019

पुस्तक समीक्षा : 'अन्तर्ध्वनि' (काव्य संग्रह)


पुस्तक समीक्षा : अन्तर्ध्वनि
       समीक्षक : अवधेश कुमार 'अवध'
मनुष्यों में पाँचों इन्द्रियाँ कमोबेश सक्रिय होती हैं जो अपने अनुभवों के समन्वित मिश्रण को मन के धरातल पर रोपती हैं जहाँ से समवेत ध्वनि का आभास होता है, यही आभास अन्तर्ध्वनि है। जब अन्तर्ध्वनि को शब्द रूपी शरीर मिल जाता है तो काव्य बन जाता है। सार्थक एवं प्रभावी काव्य वही होता है जो कवि के हृदय से निकलकर पाठक के हृदय में बिना क्षय के जगह पा सके और कवि - हृदय का हूबहू आभास करा सके।
नवोदित कवयित्री सुश्री मालती मिश्रा जी ने शिक्षण के दौरान अन्त: चक्षु से 'नारी' को नज़दीक से देखा। नर का अस्तित्व है नारी, किन्तु वह नर के कारण अस्तित्व विहीन हो जाती है। शक्तिस्वरूपा, सबला और समर्थ नारी संवेदना हीन पुरुष - सत्ता के चंगुल में फँसकर अबला हो जाती है। बहुधा जब वह विद्रोह करती है तो  अलग - थलग, अकेली व असमर्थित और भी दयनीय होकर लौट आती है। प्रकृति का मानवीकरण करके कवयित्री स्त्री के साथ साम्य दिखलाने की कोशिश की है और इस प्रयास में वह छायावाद के काफी निकट होती है। नैतिक अवमूल्यन से कवयित्री आहत है फिर भी राष्ट्रीयता की भावना बलवती है तथा सामाजिक उथल- पुथल के प्रति संवेदनशील भी।
यद्यपि स्त्री विमर्श, सौन्दर्य बोध, प्रकृति चित्रण, सामाजिक परिवेश, सांस्कृतिक समन्वय, पारिवारिक परिमिति सुश्री मालती मिश्रा की लेखनी की विषय वस्तु है तथापि केन्द्र में नारी ही है। बहत्तर कविताओं से लैस अन्तर्ध्वनि कवयित्री की पहली पुस्तक है । भाव के धरातल पर कवयित्री की अन्तर्ध्वनि पाठक तक निर्बाध और अक्षय पहुँचती है । कविताओं की क्रमोत्तर संख्या के साथ रचनाकार व्यष्टि से समष्टि की ओर अग्रसर देखी जा सकती है। अन्तर्ध्वनि शुरुआती कविताओं में आत्म केन्द्रित है जो धीरे - धीरे समग्रता में लीन होती जाती है। स्वयं की पीड़ा जन साधारण की पीड़ा हो जाती है तो अपने दर्द का आभास कम हो जाता है।
कुछ कविताओं का आकार काफी बड़ा है फिर भी भाव विन्यास में तनाव या विखराव नहीं है अतएव श्रेयस्कर हैं । न्यून अतुकान्त संग सर्वाधिक तुकान्त कविताओं में गीत, गीतिका और मुक्तक लिखने की चेष्टा परिलक्षित है, जिसमें छंद की अपरिपक्वता स्पष्ट एवं अनावृत है किन्तु फिर भी भावपक्ष की मजबूती और गेय - गुण अन्तर्ध्वनि को स्तरीय बनाने हेतु पर्याप्य है। अन्तर्ध्वनि की कविता 'प्रार्थना खग की' द्रष्टव्य है जिसमें खग मानव से वृक्ष न काटने हेतु प्रार्थना करता है -
"करबद्ध प्रार्थना इंसानों से,
करते हम खग स्वीकार करो।
छीनों न हमारे घर हमसे,
हम पर तुम उपकार करो ।।"
' बेटी को पराया कहने वालों' कविता में कवयित्री एक बेटी की बदलती भूमिका को उसके विशेषण से सम्बद्ध करते हुए कहती है -
"जान सके इसके अन्तर्मन को
ऐसा न कोई बुद्धिशाली है
भार्या यह अति कामुक सी
सुता बन यह सुकुमारी है
स्नेह छलकता भ्राता पर है
पत्नी बन सब कुछ वारी है।"
उन्वान प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मात्र रुपये 150 की 'अन्तर्ध्वनि' में 'मजदूर', 'अंधविश्वास', 'तलाश', 'प्रतिस्पर्धा' और 'आ रहा स्वर्णिम विहान' जैसी कविताएँ बेहद प्रासंगिक हैं। एक ओर जहाँ शिल्प में दोष से इन्कार नहीं किया सकता वहीं रस के आधिक्य में पाठक - हृदय का निमग्न होना अवश्यम्भावी है। माता - पिता को समर्पित सुश्री मालती मिश्रा की अन्तर्ध्वनि को आइए हम अपनी अन्तर्ध्वनि बनाकर स्नेह से अभिसिंचित करें।
अवधेश कुमार 'अवध'
मेघालय 9862744237
awadhesh.gvil@gmail.com

Wednesday, 29 May 2019

पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी शिलांग द्वारा सम्मानित मालती मिश्रा 'मयंती'


विगत 24-26 मई 2019 को मुझे  'पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी शिलांग' द्वारा आयोजित साहित्यिक सम्मेलन में हिस्सा लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। दिल्ली से लगभग 2224 किलोमीटर दूर शिलांग जाकर इस सम्मेलन में हिस्सा लेना मेरे लिए बेहद रोचक, ज्ञानवर्धक व यादगार रहा। वहाँ मुझे (मालती मिश्रा 'मयंती') 'डॉ० महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान' से सम्मानित किया गया।
हिन्दी भाषा के विकास की दिशा में अग्रसर 'पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी शिलांग' द्वारा मौपट स्थित सीमा सुरक्षा बल (सीसुब) की 11 वीं वाहिनी के सेक्टर मुख्यालय के हॉल में  आयोजित अखिल भारतीय स्तर का 23 वाँ त्रिदिवसीय 'राष्ट्रीय हिन्दी विकास सम्मेलन' 24 मई 2019 से प्रारंभ होकर 26 मई 2019 को संपन्न हुआ। इस त्रिदिवसीय कार्यक्रम की समस्त व्यवस्था अकादमी के सचिव डॉ० अकेला भाई के नेतृत्व में किया गया, जिसमें देश के लगभग 18 से 20 राज्यों से लगभग 100 से 120 हिन्दी साहित्यसेवियों, लेखकों, कवियों ने हिस्सा लिया। श्रीमती उर्मि कृष्ण (शुभ तारिका अंबाला छावनी) के निर्देशन तथा अकादमी के अध्यक्ष डॉ. विमल बजाज की अध्यक्षता में इसका सफल आयोजन संपन्न हुआ। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि मौपट सेक्टर मुख्यालय के उप महानिरीक्षक श्री अवतार सिंह शाही थे तथा विशिष्ट अतिथि श्री शंकरलाल गोयंका (जीवनराम मुंगी देवी गोयंका चैरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टी प्रभारी), सीसुब मौपट के समादेष्टा कुलदीप सिंह और समाजसेवी श्री पुरुषोत्तम दास चोखानी की उपस्थिति में तीन दिनों का यह साहित्यिक और पर्यटन का भव्य आयोजन हुआ।
प्रथम दिवस आयोजन हॉल के द्वार पर सभी प्रतिभागियों का वहाँ की परंपरा के अनुसार टीका लगाकर, हाथ में पारंपरिक धागा बाँधकर व पटका (पारंपरिक दुपट्टा) डालकर स्वागत किया गया। अपराह्न तीन बजे दीप प्रज्ज्वलन तथा सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। मुख्य अतिथि श्री अवतार सिंह शाही ने उपस्थित साहित्यकारों को संबोधित करते हुए कहा कि "जवान मातृभूमि की रक्षा तथा साहित्यकार मातृभाषा व राष्ट्रभाषा के संरक्षण व विकास का कार्य करता है। गैर हिन्दी भाषी क्षेत्र में आयोजित इस सम्मेलन में अगले दो दिनों तक हिन्दी भाषा के विकास के लिए जो मंथन चलने वाला है निश्चय उससे अमृत निकलेगा जो हिन्दी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेगा।" उन्होंने देशभर से आए हिन्दी सेवियों के बीच हिस्सा लेने का अवसर प्रदान करने के लिए आभार व्यक्त किया तथा अपनी ओर से पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। अकादमी के अध्यक्ष बजाज जी ने बताया कि उनकी संस्था विगत 29 वर्षों से हिन्दी भाषा के विकास के लिए कार्य कर रही है और इस क्षेत्र में उन्हें काफी सफलता मिली है। कार्यक्रम के दौरान कई पुस्तकों का लोकार्पण किया गया तथा साहित्यकारों को असमिया शॉल, जापी, प्रशस्तिपत्र तथा मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया। देश के विभिन्न क्षेत्रों में हिन्दी भाषा की स्थिति तथा विकास हेतु क्या किया जाना चाहिए इस विषय पर चर्चाएँ तथा देर रात तक विभिन्न क्षेत्रों से आए कवियों का काव्यपाठ हुआ। दूसरे दिन भी कार्यक्रम के दौरान परिचर्चाएँ, काव्यपाठ, साहित्यकारों का सम्मान सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ जिसमें विभिन्न प्रदेशों के पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किए गए। तीसरे दिन (रविवार) को पर्यटन शिविर का आयोजन हुआ जिसमें देश भर से आए साहित्यकारों को शिलोंग के एलीफैंट फॉल्स तथा चेरापूंजी के मावसमाई केव, थारखरांग पार्क व ईको पार्क जैसे विभिन्न पर्यटन स्थलों का अवलोकन कराया गया। मेघालय के खासी हिल्स की प्राकृतिक सौंदर्य ने सभी को आकर्षित किया। इस पर्यटन का मुख्य उद्देश्य देश के विभिन्न राज्यों के साहित्यकारों को मेघालय की प्राकृतिक उपलब्धियों और यहाँ की संस्कृति व परंपराओं से परिचित कराना था। कुछ साहित्यकारों ने स्थानीय निवासियों से बातचीत की तथा उनकी दैनिक क्रियाओं, रहन-सहन, खान-पान व परंपराओं की जानकारी प्राप्त की। अकादमी हिन्दी भाषा के विकास के लिए पूरे समर्पण के साथ अग्रसर है, अकादमी के सचिव डॉ० अकेला भाई के अनुसार आयोजन का यह तीसरा दिवस एक प्रदेश के लोगों को दूसरे प्रदेश के लोगों से परिचित करवाता है जिससे दूर-दराज तक पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति की पहचान बनती है।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️ 

Saturday, 18 May 2019

थैंक यु, मि. गोडसे...

( ले० डॉ. शंकर शरण )

नाथूराम गोडसे के नाम और उनके एक काम के अतिरिक्त लोग उन के बारे में कुछ नहीं जानते। एक लोकतांत्रिक देश में यह कुछ रहस्यमय बात है। रहस्य का आरंभ 8 नवंबर 1948 को ही हो गया था, जब गाँधीजी की हत्या के लिए चले मुकदमे में गोडसे द्वारा दिए गए बयान को प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। गोडसे का बयान लोग जानें, इस पर प्रतिबंध क्यों लगा?

इस का कुछ अनुमान जस्टिस जी.डी. खोसला, जो गोडसे मुकदमे की सुनवाई के एक जज थे, की टिप्पणी से मिल सकता है। अदालत में गोडसे ने अपनी बात पाँच घंटे लंबे वक्तव्य के रूप में रखी थी, जो 90 पृष्ठों का था। जब गोडसे ने बोलना समाप्त किया तब का दृश्य जस्टिस खोसला के शब्दों में... “सुनने वाले स्तब्ध और विचलित थे। एक गहरा सन्नाटा था, जब उसने बोलना बंद किया। महिलाओं की आँखों में आँसू थे और पुरुष भी खाँसते हुए रुमाल ढूँढ रहे थे।… मुझे कोई संदेह नहीं है, कि यदि उस दिन अदालत में उपस्थित लोगों की जूरी बनाई जाती और गोडसे पर फैसला देने कहा जाता तो उन्होंने भारी बहुमत से गोडसे के ‘निर्दोष’ होने का फैसला दिया होता।” ("द मर्डर ऑफ महात्मा एन्ड अदर केसेज फ्रॉम ए जजेस नोटबुक, पृ. 305-06)

यही नहीं, तब देश के कानून मंत्री डॉ. अंबेडकर थे। उन्होंने गोडसे के वकील को संदेश भेजा कि यदि गोडसे चाहें तो वे उन की सजा आजीवन कारावास में बदलवा सकते हैं। गाँधीजी वाली अहिंसा दलील के सहारे यह करवाना सरल था। किंतु गोडसे ने आग्रह पूर्वक मना कर, उलटे डॉ. अंबेदकर को लौटती संदेश यह दिया, “कृपया सुनिश्चित करें कि मुझ पर कोई दया न की जाए। मैं अपने माध्यम से यह दिखाना चाहता हूँ कि गाँधी की अहिंसा को फाँसी पर लटकाया जा रहा है।”

गोडसे का यह कथन कितना लोमहर्षक सच साबित हुआ, यह भी यहाँ इतने निकट इतिहास का एक छिपाया गया तथ्य है!

गाँधीजी की हत्या के बाद गाँधी समर्थकों ने बड़े पैमाने पर गोडसे की जाति-समुदाय की हत्याएं की। गाँधी पर लिखी, छपी सैकड़ों जीवनियों में कहीं यह तथ्य नहीं मिलता कि कितने चितपावन ब्राह्मणों को गाँधीवीदियों ने मार डाला था।

31 दिसंबर 1948 के "न्यूयॉर्क टाइम्स" में प्रकाशित समाचार के अनुसार, केवल बंबई में गाँधीजी की हत्या वाले एक दिन में ही 15 लोगों को मार डाला गया था। पुणे के स्थानीय लोग आज भी जानते हैं कि वहाँ उस दिन कम से कम 50 लोगों को मार डाला गया था। कई जगह हिंदू महासभा के दफ्तरों को आग लगाई गई। चितपावन ब्राह्मणों पर शोध करने वाली अमेरिकी अध्येता मौरीन पैटरसन ने लिखा है कि सबसे अधिक हिंसा बंबई, पुणे, नागपुर आदि नहीं, बल्कि सतारा, बेलगाम और कोल्हापुर में हुई। तब भी सामुदायिक हिंसा की रिपोर्टिंग पर कड़ा नियंत्रण था। अतः, मौरीन के अनुसार, उन हत्याओं के दशकों बीत जाने बाद भी उन्हें उन पुलिस फाइलों को देखने नहीं दिया गया, जो 30 जनवरी 1948 के बाद चितपावन ब्राह्मणों की हत्याओं से संबंधित थीं।

इस प्रकार, उस ‘गाँधीवादी हिंसा’ का कोई हिसाब अब तक सामने नहीं आने दिया गया है, जिस में असंख्य निर्दोष चितपावन ब्राह्मणों को इसलिए मार डाला गया था क्योंकि गोडसे उसी जाति के थे। निस्संदेह, राजनीतिक जीवन में गाँधीजी के कथित अहिंसा सिद्धांत के भोंडेपन का यह एक व्यंग्यात्मक प्रमाण था! चाहे, कांग्रेसी शासन और वामपंथी बौद्धिकों ने इन तथ्यों को छिपाकर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा किया।

कडवा सच तो यह है कि गोडसे ने गाँधीजी की हत्या करके उन्हें वह महानता प्रदान करने में केंद्रीय भूमिका निभाई, जो सामान्य मृत्यु से उन्हें मिलने वाली नहीं थी। स्वतंत्रता से ठीक पूर्व और बाद देश में गाँधी का आदर कितना कम हो गया था, यह 1946-48 के अखबारों के पन्नों को पलट कर सरलता से देख सकते हैं। नोआखली में गाँधी के रास्ते में पर लोगों ने टूटे काँच बिछा दिए थे। ऐसी वितृष्णा अकारण न थी। देश विभाजन रोकने के लिए गाँधी ने अनशन नहीं किया, और अपना वचन (‘विभाजन मेरी लाश पर होगा’) तोड़ा, यह तो केवल एक बात थी।

पश्चिमी पंजाब से आने वाले हजारों हिंदू-सिखों को उलटे जली-कटी सुनाकर गाँधी उनके घावों पर नमक छिड़कते रहते थे। दिल्ली की दैनिक प्रार्थना-सभा में गाँधी उन अभागों को ताने देते थे, कि वे जान बचाकर यहाँ क्यों चले आये, वहीं रहकर मर जाते तो अहिंसा की विजय होती, आदि। फिर, विभाजन रोकने या पाकिस्तान में हिंदू-सिखों की जान को तो गाँधीजी ने अनशन नहीं किया; किन्तु भारत पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपये दे, इसके लिए गाँधीजी ने जनवरी 1948 में अनशन किया था! तब कश्मीर पर पाकिस्तानी हमला जारी था, और गाँधीजी के अनशन से झुककर भारत सरकार ने वह रकम पाकिस्तान को दी। यह विश्व-इतिहास में पहली घटना थी जब किसी आक्रमित देश ने आक्रमणकारी को, यानी अपने ही विरुद्ध युद्ध को वित्तीय सहायता दी!

गोडसे द्वारा गाँधीजी को दंड देने के निश्चय में उस अनशन ने निर्णायक भूमिका अदा की। तब देश में लाखों लोग गाँधीजी को नित्य कोस रहे थे। पाकिस्तान से जान बचाकर भागे हिन्दू-सिख गाँधी से घृणा करते थे। वही स्थिति कश्मीरी और बंगाली हिन्दुओं की थी। ‘हिंद पॉकेट बुक्स’ के यशस्वी संस्थापक दीनानाथ मल्होत्रा ने अपनी संस्मरण पुस्तक ‘भूली नहीं जो यादें’ (पृ. 168) में उल्लेख किया है कि जब गाँधीजी की हत्या की पहली खबर आई, तो सब ने स्वतः मान लिया कि किसी पंजाबी ने ही उन्हें मारा।

फिर, उन लाखों बेघरों, शरणार्थियों के सिवा पाकिस्तान में हिन्दुओ का जो कत्लेआम हुआ, और जबरन धर्मांतरण कराए गए, उस पर भारत में दुःख, आक्रोश और सहज सहानुभूति थी। यह सब गाँधीजी के प्रति क्षोभ में भी व्यक्त होता था। विशेषकर तब, जब वे पंजाबी हिन्दुओं, सिखों को सामूहिक रूप से मर जाने का उपदेश देते हुए यहाँ मुसलमानों (जो वैसे भी असंगठित, अरक्षित, भयाक्रांत नहीं थे जैसे पाकिस्तान में हिन्दू थे। नहीं तो वे यहीं रह न सके होते) और उनकी संपत्ति की रक्षा के लिए सरकार पर कठोर दबाव बनाए हुए थे।

इस तरह, दुर्बल को अपने हाल पर छोड़ कर गाँधी सबल की रक्षा में व्यस्त थे! यह पूरे देश के सामने तब आइने की तरह स्पष्ट था। अतः उस समय की संपूर्ण परिस्थिति का अवलोकन करते हुए यह बात वृथा नहीं कि, यदि गाँधीजी प्राकृतिक मृत्यु पाते, तो आज उन का स्थान भारतीय लोकस्मृति में बालगंगाधार तिलक, जयप्रकाश नारायण, आदि महापुरुषों जैसा ही कुछ रहा होता। तीन दशक तक गाँधी की भारतीय राजनीति में अनगिनत बड़ी-बड़ी विफलताएं जमा हो चुकी थीं। खलीफत-समर्थन से लेकर देश-विभाजन तक, मुस्लिमों को ‘ब्लैंक चेक’ देने जैसे नियमित सामुदायिक पक्षपात और अपने सत्य-अहिंसा-ब्रह्मचर्य सिद्धांतों के विचित्र, हैरत भरे, यहाँ तक कि अनेक निकट जनों को धक्का पहुँचाने वाले कार्यान्वयन से बड़ी संख्या में लोग गाँधीजी से वितृष्ण हो चुके थे। लेकिन गोडसे की गोली ने सब कुछ बदल कर रख दिया। इसलिए भक्त गाँधीवादियों को तो गोडसे का धन्यवाद करते हुए, बतर्ज अनिल बर्वे, “थैंक यू, मिस्टर गोडसे!” जैसी भावना रखनी चाहिए।

गोडसे ने चाहे गाँधी को दंड देने का लिए गोली मारी, लेकिन वस्तुतः उसी नाटकीय अवसान से गाँधीजी को वह महानता मिल सकी, जो वैसे संभवतः न मिली होती। भारत में नेहरूवादी और मार्क्सवादी इतिहासकारों द्वारा घोर इतिहास-मिथ्याकरण का एक अध्याय यह भी है कि लोग गोडसे के बारे में कुछ नहीं जानते! यहाँ तक कि गाँधी-आलोचकों की लिस्ट में भी गोडसे का उल्लेख नहीं होता। इसी विषय पर लिखी इतिहासकार बी. आर. नंदा की पुस्तक, "गाँधी एन्ड हिज क्रिटिक्स" (1985) में भी गोडसे का नाम नहीं, जबकि गोडसे का 90 पृष्ठों का वक्तव्य, जो 1977 के बाद पुस्तिका के रूप में प्रकाशित होता रहा है, गाँधीजी के सिद्धांतों और कार्यों की एक सधी आलोचना है। लेकिन 67 वर्ष बीत गए, गोडसे की उस आलोचना का किसी भारतीय ने उत्तर नहीं दिया। न उस की कोई समीक्षा की गई। यदि गोडसे की बातें प्रलाप, मूर्खतापूर्ण, अनर्गल, आदि होतीं, तो उन्हें प्रकाशित करने पर प्रतिबंध नहीं लगा होता! लोग उसे स्वयं देखते, समझते कि गाँधीजी की हत्या करने वाला कितना मूढ़, जुनूनी या सांप्रदायिक था। पर स्थिति यह है कि विगत 38 वर्ष से गोडसे का वक्तव्य उपलब्ध रहने पर भी एक यूरोपीय विद्वान (कोएनराड एल्स्ट, "गांधी एंड गोडसेः ए रिव्यू एंड ए क्रिटीक" 2001) के अतिरिक्त किसी भारतीय ने उस की समीक्षा नहीं की है। क्यों?

संभवतः इसीलिए, क्योंकि उसे उपेक्षित तहखाने में दबे रहना ही प्रभावी राजनीति के लिए सुविधाजनक था। गोडसे की अनेक बातें संपूर्ण समकालीन सेक्यूलर भारतीय राजनीति की भी आलोचना हो जाती है। इस अर्थ में वह आज भी प्रासंगिक है। यह भी कारण है कि यहाँ राजनीतिक रूप से प्रभावी इतिहासकारों, बुद्धिजीवियों ने उसे मौन की सेंसरशिप से अस्तित्वहीन-सा बनाए रखा है। अन्यथा कोई कारण नहीं कि एक ऐतिहासिक दस्तावेज का कहीं उल्लेख न हो। न इतिहास, न राजनीति में उस का अध्ययन, विश्लेषण किया जाए। यह चुप्पी सहज नहीं है। यह न्याय नहीं है।

इस सायास चुप्पी का कारण यही प्रतीत होता है कि किसी भी बहाने यदि गोडसे के वक्तव्य को नई पीढ़ी पढ़े, और परखे, तो आज भी भारी बहुमत से लोगों का निर्णय वही होगा, जो जस्टिस खोसला ने तब अदालत में उपस्थित नर-नारियों का पाया था। तब गोडसे को ‘हिन्दू सांप्रदायिक’ या ‘जुनूनी हत्यारा’ कहना संभव नहीं रह जाएगा।

वस्तुतः नाथूराम गोडसे के जीवन, चरित्र और विचारों का समग्र मूल्यांकन करने से उन का स्थान भगत सिंह और ऊधम सिंह की पंक्ति में चला जाएगा। तीनों देश-भक्त थे। तीनों को राजनीतिक हत्याओं के लिए फाँसी हुई। तीनों ने अपने-अपने शिकारों को करनी का ‘दंड’ दिया, जिस से सहमति रखना जरूरी नहीं। मगर तीनों की दृष्टि में एक समानता तो है ही। भगत सिंह ने पुलिस की लाठी से लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए 17 दिसंबर 1928 को अंग्रेज पुलिस अधीक्षक जॉन साउंडर्स की हत्या की। ऊधम सिंह ने जलियाँवाला नरसंहार करने वाले कर्नल माइकल डायर को 13 मार्च 1940 को गोली मार दी। उसी तरह, नाथूराम गोडसे ने भी गाँधी को देश का विभाजन, लाखों हिन्दुओं-सिखों के साथ विश्वासघात, उन के संहार व विध्वंस तथा हानिकारक सामुदायिक राजनीति करने का कारण मानकर उन्हें 30 जनवरी 1948 को गोली मारी थी।

आगे की तुलना में भी, जैसे अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह और ऊधम सिंह को हत्या का दोषी मानकर उन्हें फाँसी दी, उसी तरह भारत सरकार ने भी नाथूराम गोडसे को फाँसी दी। तीनों के कर्म, तीनों की भावनाएं, तीनों का जीवन-चरित्र मूलतः एक जैसा है। इस सचाई को छिपाया नहीं जाना चाहिए।

उक्त निष्कर्ष डॉ. लोहिया के विचारों से भी पुष्ट होता है। देश का विभाजन होने पर लाखों लोग मरेंगे, यह गाँधीजी जानते थे, फिर भी उन्होंने उसे नहीं रोका। बल्कि नेहरू की मदद करने के लिए खुद कांग्रेस कार्य-समिति को विभाजन स्वीकार करने पर विवश किया जो उस के लिए तैयार नहीं थी। इसे लोहिया ने गाँधी का ‘अक्षम्य’ अपराध माना है। तब इस अपराध का क्या दंड होता?

संभवतः सब से अच्छा दंड गाँधी को सामाजिक, राजनीतिक रूप से उपेक्षित करना, और अपनी सहज मृत्यु पाने देना होता। पर, अफसोस!

डॉ. लोहिया के शब्दों पर गंभीरता से विचार करें – विभाजन से दंगे होंगे, ऐसा तो गाँधीजी ने समझ लिया था, लेकिन “जिस जबर्दस्त पैमाने पर दंगे वास्तव में हुए, उसका उन्हें अनुमान न था, इस में मुझे शक है। अगर ऐसा था, तब तो उन का दोष अक्षम्य हो जाता है। दरअसल उन का दोष अभी भी अक्षम्य है। अगर बँटवारे के फलस्वरूप हुए हत्याकांड के विशाल पैमाने का अन्दाज उन्हें सचमुच था, तब तो उन के आचरण के लिए कुछ अन्य शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ेगा।” ("गाँधीजी के दोष")

ध्यान दें, सौजन्यवश लोहिया ने गाँधी के प्रति उन शब्दों का प्रयोग नहीं किया जो उन के मन में आए होंगे। किंतु वह शब्द छल, अज्ञान, हिन्दुओं के प्रति विश्वासघात, बुद्धि का दिवालियापन, जैसे ही कुछ हो सकते हैं। इसलिए, जिस भावनावश गोडसे ने गाँधीजी को दंडित किया वह उसी श्रेणी का है जो भगतसिंह और ऊधम सिंह का था। इस कड़वे सत्य को भी लोहिया के सहारे वहीं देख सकते हैं। लोहिया के अनुसार, “देश का विभाजन और गाँधीजी की हत्या एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक पहलू की जाँच किए बिना दूसरे की जाँच करना समय की मूर्खतापूर्ण बर्बादी है।” यह कथन क्या दर्शाता है? यही, कि वैसा न करके क्षुद्र राजनीतिक चतुराई की गई। तभी तो जिस किसी को ‘गाँधी के हत्यारे’ कहकर निंदित किया जाता है, जबकि विभाजन की विभीषिका से उस हत्या के संबंध की कभी जाँच नहीं होती। क्योंकि जैसे ही यह जाँच होगी, जिसे लोहिया ने जरूरी माना था, वैसे ही गोडसे का वही रूप सामने होगा जो उन्हें भगत सिंह और ऊधम सिंह के सिवा और किसी श्रेणी में रखने नहीं देगा। इस निष्कर्ष से गाँधी-नेहरूवादी तथा दूसरे भी मतभेद रख सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे असंख्य अंग्रेज लोग भगत सिंह और ऊधम सिंह से रखते ही रहे हैं। आखिर वे तो हमारे भगत सिंह और ऊधम सिंह को पूज्य नहीं मानते! लेकिन वे दोनों ही भारतवासियों के लिए पूज्य हैं। ठीक उसी तरह, यदि हिंदू महासभा या कोई भी हिन्दू नाथूराम गोडसे को सम्मान से देखता है और उन्हें सम्मानित करना चाहता है तो इसे सहजता से लेना चाहिए।

आखिर, भगत सिंह या ऊधम सिंह के प्रति भी हमारा सम्मान उन के द्वारा की गई हत्याओं का सम्मान नहीं है। वह एक भावना का सम्मान है, जो सम्मानजनक थी। अतः नाथूराम गोडसे के प्रति किसी का आदर भी देश-भक्ति, राष्ट्रीय आत्मसम्मान और न्याय भावना का ही आदर भी हो सकता है। जिन्हें इस संभावना पर संदेह हो, वे गोडसे का वक्तव्य एक बार आद्योपांत पढ़ने का कष्ट करें।

अभिव्यक्ति का अधिकार

अभिव्यक्ति का अधिकार
स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक होने के नाते हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी प्राप्त है और सभी इस स्वतंत्रता का अपने-अपने ढंग से भरपूर लाभ भी उठाते हैं। स्वतंत्रता केवल मनुष्य मात्र के लिए नहीं अपितु समस्त जीवधारियों के लिए वरदान समान है, फिर चाहे वह विचाराभिव्यक्ति की हो या जीवन जीने की। परतंत्रता कब किसी को रास आई है चाहे वह मनुष्य हों या पशु-पक्षी। जैसा कि शिवमंगल सिंह 'सुमन' जी ने अपनी कविता में भी लिखा है कि..
"हम पंछी उन्मुक्त गगन के,
पिंजरबद्ध न गा पाएँगे।
कनक तीलियों से टकराकर,
पुलकित पंख टूट जाएँगे।"

परतंत्रता के व्यंजनों में वह स्वाद कहाँ जो स्वतंत्रता की रूखी-सूखी रोटी में है। हर प्राणी अपने हिस्से की आजादी और अधिकार चाहता है और वह तभी सुखी व प्रसन्न रह पाता है जब वह अपने अधिकारों का भरपूर प्रयोग करता है, जब किसी क्षेत्र में वह अपने अधिकार बंदिश में  महसूस करता है तो व्यक्ति को अपना जीवन दुरुह प्रतीत होने लगता है। ऐसा तभी होता है जब एक व्यक्ति या वर्ग के अधिकारों पर दूसरे व्यक्ति या वर्ग का वर्चस्व हावी होने लगता है। छोटे-छोटे कीट-पतंगे हों या सर्व शक्ति सम्पन्न मानव सभी अपने से कमजोर पर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहते हैं इसीलिए अनुशासन बनाए रखने हेतु नियम व कानून बनते हैं ताकि किसी एक की आजादी दूसरे के लिए अभिशाप न बने और सभी को समान अधिकार प्राप्त हो सके किन्तु आजकल अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर प्राप्त अधिकारों का इतना अधिक दुरुपयोग हो रहा है कि अधिकतर इसका विकृत रूप ही दृश्यमान होता है। अभिव्यक्ति के नाम पर देश विरोधी नारे लगाना, देश के द्वितीय सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति को निम्नतम स्तर तक जाकर गालियाँ देना, कहाँ तक उचित है? क्या ऐसी अभिव्यक्ति को आजादी मिलनी चाहिए। फिर देश की आम जनता को कष्ट तब होता है जब आम नागरिक की छोटी सी गलती के लिए उसे वही कानून सजा देता है जो कानून देश विरोधी नारों और कृत्यों के लिए उनकी अभिव्यक्ति की आजादी बताकर उन्हें छोड़ देता है। मुझे आज भी याद है जब कुछ वर्ष पहले महाराष्ट्र में एक लड़की और उसकी मित्र को इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया था क्योंकि उसने वहाँ के जाने-माने नेता के लिए घोषित अवकाश के विरोध में सोशल मीडिया में कुछ लिखा था और उसकी मित्र ने समर्थन स्वरूप लाइक किया था। तब वहाँ की पुलिस ने जबरन उन्हें गिरफ्तार कर लिया था और अब हमारे देश की राजधानी दिल्ली में देश के खिलाफ नारे लगाए जाते हैं पर पुलिस चार्जशीट तक तैयार नहीं कर पाती क्योंकि अभिव्यक्ति का अधिकार बताकर राज्य सरकार उसको अनुमति नहीं देती। विरोधी पार्टियों के नेता प्रधानमंत्री को गालियाँ देते हैं क्योंकि उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी है परंतु कानून उनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठा सकता क्योंकि गालियाँ देने वाले आम नागरिक नहीं हैं तो क्या संविधान ओहदा, रुतबा व खानदान देखकर परिवर्तित होता रहता है? अभी चंद वर्ष पूर्व अखलाक नामक एक विशेष धर्म के व्यक्ति की हत्या किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति के द्वारा कर दी जाती है तो संविधान के पूजकों द्वारा, कुछ कलम के पुजारियों द्वारा और कुछ अन्य बुद्धिजीवियों तथा मीडिया के द्वारा सिर्फ अपने ही देश में नहीं बल्कि अन्य दूसरे देशों में भी हमारे देश को असहिष्णु घोषित कर दिया गया जबकि अभी कुछ दिन पहले ही उसी विशेष संरक्षण प्राप्त वर्ग के लोगों के द्वारा पहले तो एक लड़की को उसके ही घर के पास छेड़ा जाता है फिर पिता के द्वारा अपनी पुत्री की सुरक्षा की कोशिश में पिता और भाई को चाकुओं से निर्ममता पूर्वक गोद दिया जाता है जिसमें पिता की मृत्यु हो जाती है। ...अब सभी शांति हैं.. न मीडिया चीख रही, न बुद्धिजीवियों की बुद्धि जागी, न साहित्यकारों के पास वापसी के लिए कोई अवॉर्ड बचे, न ही उनकी कलमों में स्याही बची...।।।आखिर क्यों????
क्योंकि इस बार पीड़ित आपके चहेते आपके द्वारा सुरक्षित वर्ग का नहीं या फिर इसलिए क्योंकि अपराधी आपके द्वारा सुरक्षित वर्ग के हैं???
कारण जो भी हो पर सवाल यही उठता है कि संविधान कहाँ है? किसके लिए है?
अभी आज ही टी.वी. पर समाचार देखा कि पश्चिम बंगाल के एस.आई.टी. अधिकारी राजीव को शारदा चिटफंड घोटाले के मामले में सी.बी.आई. गिरफ्तार करना चाहती थी तो वहाँ की मुख्यमंत्री ही गिरफ्तारी के विरोध में धरने पर बैठ गईं और उनकी माँग पर संविधान की रक्षक न्यायालय ने न सिर्फ गिरफ्तारी पर रोक लगाई बल्कि उसे सुरक्षा भी प्रदान किया। एक ऐसा व्यक्ति जो शक के घेरे में हो उसको बचाने के लिए मुख्यमंत्री खुलेआम धरना-आंदोलन आदि करने लगे तो इससे क्या यह विश्वास नहीं हो जाता कि असली गुनहगार कौन है! खैर जब सुनवाई के दौरान सुप्रीमकोर्ट को राजीव की गिरफ्तारी आवश्यक लगी तब भी इसी सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा उसे सात दिन का अवसर दिया जाता है कि वह अग्रिम जमानत ले ले ताकि उसकी गिरफ्तारी न हो सके...यदि यहाँ राजीव की जगह कोई आम नागरिक होता तो देश का यह सर्वोच्च न्यायालय उस आम नागरिक को भी यह अवसर देता कि वह अपने लिए अग्रिम जमानत ले ले... नहीं, तब हमारा संविधान कुछ और कहता। कई निरपराधों को सिर्फ शिकायत के बाद कई दिनों तक हवालात में घुटते देखा है। परंतु ये ओहदे व रसूखदारों का संविधान भी गिरगिट की तरह रंग बदलता है।
पश्चिम बंगाल में ही अभी हाल ही में चुनावों की गहमागहमी में किसी भाजपा कार्यकर्ता के द्वारा वहाँ की मुख्यमंत्री का चेहरा प्रियंका चोपड़ा के चेहरे की जगह लगाकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया जाता है जिसके लिए उस कार्यकर्ता को गिरफ्तार करवा दिया जाता है जबकि वही मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री को न जाने कितने अपशब्द कहती हैं जो उनके पद की गरिमा को धूमिल करते हैं पर उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होती क्योंकि उनका ओहदा उस कार्यकर्ता के ओहदे से बड़ा है..!! इसलिए अभिव्यक्ति की आजादी उन्हें ज्यादा है..!!! अपने देश में जब संविधान के रक्षक न्यायालय का ये दुहरा रवैया देखने को मिलता है तब मन खिन्न हो जाता है और संविधान व न्यायपालिका रसूखवालों के हाथ की कठपुतली मात्र नजर आता है।
जाने-माने लेखक श्री यशपाल जी द्वारा लिखित 'दुख का अधिकार' में जिस तरह उन्होंने दर्शाया है कि दुख मनाने का अधिकार भी उसी के पास है जो रसूखवाला है, निर्धन तो किसी अपने को खोने का दुख भी नहीं मना सकता। उसी प्रकार संविधान भी इतना लचर है कि यह रसूख देख रंग बदलता है या यूँ कहें कि संविधान स्वतंत्र नहीं बल्कि रसूख वालों के हाथ की कठपुतली है, तो गलत न होगा, जहाँ जिसका आधिपत्य होगा वहाँ उसी के अनुसार कानून चलेगा।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

Tuesday, 14 May 2019

जोकर


तुम सब जैसा मानव मैं पर,
अपनी कोई पहचान नहीं।
जोकर बन सभी हँसाता हूँ,
अपने भावों को दबा कहीं।

दिल में बहता गम का सागर,
होंठों पर हँसी जरूरी है।
तन्हा छिप-छिपकर रोते हैं,
बाहर हँसना मजबूरी है।

जोकर बन खुशियाँ बाँटी हैं,
दुहरा जीवन हम जीते हैं।
यूँ बूँद-बूँद रिसते गम को,
हम घूँट-घूँट कर पीते हैं।

पहना चेहरे पर चेहरा,
अपना चेहरा छिपाते हैं।
हिय दर्द भरा घन उमड़े जब,
हम नव खुशियाँ बरसाते हैं।

चित्र साभार.. गूगल से
©मालती मिश्रा 'मयंती'✍️


Sunday, 12 May 2019

माँ तू कितनी प्यारी है

माँ तू कितनी प्यारी है

हे मात तुझे शत-शत वंदन,
शब्दों से करती अभिनंदन।
गर पा जाऊँ एक अवसर मैं,
कर दूँ तुझ पर जीवन अर्पण।
अपनी सारी ममता माँ ने,
निज बच्चों पर वारी है।
माँ तू कितनी भोली है,
माँ तू कितनी प्यारी है।

बच्चों का बचपन माँ से है,
गोद में दुनिया समाई है।
हर मुश्किल में खड़ी रही,
माँ तू बनकर परछाई है।
इस कच्चे मन के अंतस को,
देकर संस्कार सजाया है।
इंसानों की भीड़ में मुझको,
मुझसे परिचित करवाया है।
माँ तेरी ही ममता से तो,
खुशियों की किलकारी है।
माँ तू कितनी भोली है,
माँ तू कितनी प्यारी है।

देती है हरपल ज्ञान हमें,
हर अच्छा-बुरा बताती है।
बनकर पहली गुरु बच्चों की,
जीवन का पाठ पढ़ाती है।
शीत में मीठी धूप है माँ,
खुशियों की फुलवारी है।
माँ तू कितनी भोली है,
माँ तू कितनी प्यारी है।

उँगली पकड़ चलना सीखा,
निज पैरों पर मैं खड़ी हुई।
तेरी ममता की छाया में,
मैं ना जाने कब बड़ी हुई।
अच्छी हूँ या कि बुरी हूँ माँ,
हूँ झूठी या फिर सच्ची हूँ।
दुनिया की नजर में बड़ी हुई,
पर आज भी तेरी बच्ची हूँ।
मेरे सब स्वप्न सजाने को,
अपनी नींदें वारी है।
माँ तू कितनी भोली है,
माँ तू कितनी प्यारी है।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

Saturday, 11 May 2019

माँ

माँ...
आज तुम्हारी बहुत
याद आ रही है
अपने इस सूने
जीवन में
तुम्हारी कमी
बहुत सता रही है
क्या खता थी मेरी
आखिर
मैं भी तो तुम्हारी
जाई थी
क्यों बेटे तो अपने
लेकिन बेटी पराई थी
चलो छोड़ो
वो दुनिया की रीत थी
ये मानकर हमने निभा लिया
पर क्यों बेटों ने
तुम पर भी
अपना आधिपत्य जमा लिया
जिस आँगन में खनकती
थी हँसी मेरी
आधा जीवन बीता था
उस आँगन से मेरी
तुलसी भी माँ
क्यों बेटों ने तेरे हटा दिया
जब तक थीं तुम
मैं आती थी
झूठा ही सही
पर थोड़ा तो
अपना अधिकार जताती थी
पर तुम भी निष्ठुर हो गईं
मुझसे मुख अपना मोड़ लिया
निर्दय दुनिया में क्यों माँ
अकेली मुझको छोड़ दिया
सच कहूँ तो अब लगता है
कि वह घर पराया
हो गया
जन्म जहाँ पाया मैंने
वो अंजाना साया हो गया।

मालती मिश्रा 'मयंती'

Tuesday, 7 May 2019

राजनीति का गिरता स्तर

राजनीति का गिरता स्तर

चुनावी दौर में पक्ष और विपक्ष की राजनीतिक पार्टियों के द्वारा एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना अकल्पनीय नहीं है बल्कि यह एक सहज प्रक्रिया है कि अपने प्रतिद्वंदी की कमियों उसके नकारात्मक कार्यों को जनता के समक्ष लाना और अपने सकारात्मक विचारों और समाज और देश के हितार्थ योजनाओं को जनता के समक्ष रखना उसके पश्चात् निर्णय को जनता पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि वह  किसको अपना नेता चुनना चाहे या किस पार्टी के हाथ पाँच वर्ष तक देश चलाने का उत्तरदायित्व सौंपे, यही उत्तरदायित्व है राजनीतिक पार्टियों का। परंतु आजकल की राजनीति धर्मयुद्ध या कर्मयुद्ध न होकर केवल सत्तायुद्ध बनकर रह गई है। आजकल न वाणी की मर्यादा रही न ही कर्मों की मर्यादा बची बस यदि कुछ शेष है तो स्वार्थ लोलुपता और विलासिता। राजनीतिक पार्टियों में न व्यक्ति के लिए सम्मान है न व्यक्तित्व के लिए और न ही पद की गरिमा के प्रति। वर्तमान में चलने वाले चुनावी प्रचार-प्रसार को देखकर तो मन क्षुब्ध हो जाता है कि ऐसे लोगों के हाथ यदि सत्ता की बागडोर आ जाएगी तो क्या देश का अस्तित्व खतरे में नहीं आ जाएगा जो खुलेआम देशद्रोह को बढ़ावा देने के पक्ष में हों जो देश के रक्षकों का कोई मानवाधिकार न मानते हुए आतंकवादियों के मानवाधिकार के लिए लड़ते हों। जो प्रधानमंत्री के पद की गरिमा को विस्मृत कर उन्हें सरेआम गालियाँ दें, क्या ऐसे लोग इस पद पर आसीन होकर पद की गरिमा को धूमिल न कर देंगे। परंतु इससे भी अधिक सोचनीय स्थिति तब उत्पन्न होती है जब ये पार्टियाँ शत्रु देश का पक्ष सिर्फ इसलिए लेती हैं ताकि अपने देश की सरकार की छवि अपने देश के साथ-साथ विदेशी स्तर पर खराब कर सकें। उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि अपने देश की सरकार की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खराब करके अपनी छवि को सुधार लेंगे परंतु यह विचारणीय है कि जो व्यक्ति अपने देश को सम्मान नहीं दे सकता, सिर्फ सत्ता प्राप्ति के प्रयास में एक व्यक्ति विशेष का विरोध करते-करते देश के सम्मान और सुरक्षा से खेलने लगता है, क्या उसके हाथों में देश सुरक्षित होगा? एक-दूसरे को हराने के लिए हर संभव प्रयास करना गलत नहीं है परंतु यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इस प्रयास में कहीं देश की गरिमा तो धूमिल नहीं हो रही है? आजकल सत्ता का लालच इतना प्रबल हो चुका है कि इसे पाने के लिए आज सभी विपक्षी जो कभी एक-दूसरे के कट्टर शत्रु हुआ करते थे, वो आज एकमत होकर बस एक ही व्यक्ति को हराने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

चुनाव में हर राजनीतिक पार्टी के पास देश के प्रति सकारात्मक मुद्दा होना आवश्यक है ताकि वो जनता को बता सकें कि उस क्षेत्र विशेष के लिए वो क्या योजना लाए हैं किंतु वर्तमान में पार्टियों के पास यदि कुछ है तो वो है विरोधी पार्टी के लिए गालियाँ। वो जितना अधिक अपमानजनक बातें कह सकें स्वयं को उतना ही श्रेष्ठ समझते हैं। ऐसी परिस्थितियों में जनता को ही विश्लेषण करना होगा कि किस पार्टी से देश व समाज का हित हुआ है, किसने देश के प्रति कितना सम्मान दर्शाया है और स्वविवेक से ही चुनाव करना होगा। देश की जनता को ही तय करना होगा कि लालच में आकर दिल्ली की जनता की तरह फिर पाँच वर्ष पछताना है या समझदारी का परिचय देना है। 
आजकल कुछ लोग नोटा के प्रति भी रुझान दर्शा कर स्वयं को योद्धा समझने लगते हैं, कोई प्रत्याशी पसंद नहीं तो नोटा दबा दिया परंतु कभी चिंतन नहीं करते कि नोटा का बटन दबाकर किसका हित किया? जबकि समझदारी तब होती कि जब प्रत्याशी पसंद नहीं आता तो दोनों या जितने भी हैं उनका तुलनात्मक विश्लेषण कर लें और जो सबसे कम बुरा हो उसका चयन करना चाहिए, क्योंकि ये नोटा कभी-कभी सबसे अनुपयुक्त प्रत्याशी को विजेता बनाकर नोटा वालों पर ही शासन करने का अधिकार दे देता है। अतः यह जनता के ही कर्तव्य क्षेत्र में आता है कि वह समाज व देश को कैसा नेता दे? हमें अपने निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर देश के हित के विषय में सोचना होगा तभी हमारा निर्णय निष्पक्ष हो सकता है और तभी हम स्वार्थ लोलुपता में घिरे नेताओं को सही सबक सिखा सकते हैं। जनता को ही यह दिखाना होगा कि उसे मुफ्तखोरी नहीं परिश्रम और स्वाभिमान पसंद है, जनता को ही दिखाना होगा कि वह  जाति-धर्म के आधार पर नेता नहीं चुन सकती। जिस दिन हमारे देश की जनता इन सब भावनाओं से ऊपर उठकर सिर्फ देशभक्ति को सर्वोपरि रखते हुए जाति-धर्म के नाम पर तथा व्यक्तिगत लाभ के नाम पर वोट देना बंद कर देगी, उस दिन ये नेतागण भी समाज व देशहित की बातें करना सीख जाएँगे। तभी देश उन्नतिशील होगा और उन्नत देश का नागरिक स्वतः सुखी व सम्पन्न होगा, क्योंकि देश को विकसित करने के लिए नागरिकों का विकास आवश्यक है और ऐसा तभी संभव है जब जाति-धर्म, वंशवाद और स्वार्थी प्रवृत्तियों का अंत हो जाए।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

Saturday, 4 May 2019

जनता सब पहचान रही

रात दिवा जिन जिन बातों का
खुलकर विरोध करते थे,
उनकी विदेश-यात्राओं पर
तुम तंज कसा करते थे।
परिणाम मिला जब आज सुखद
सब विदेश-यात्राओं का,
विश्व आतंकी घोषित हुआ
चैन उड़ा आकाओं का।
पहले तो तुम उछले-कूदे
मन ही मन बस रोए हो,
कलपे तड़पे सिर धुन-धुनकर
चिल्लाए पछताए हो।
नहीं बनी जब बात कहीं तो
नया स्वांग रचाने लगे,
लुटेरों के पंद्रह साल की
कोशिश ये बताने लगे।
कितना ही स्वांग रचो अब तुम
जनता को भरमाने को,
जनता सब पहचान रही है
तुम्हारे ताने-बाने को।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

Tuesday, 30 April 2019


आओ बच्चों तुम्हें बताएं मजदूर दिवस की बातें खास।
श्रमिक दिवस कहते क्यों इसको आओ हम जानें इतिहास।।
एक मई सन 1886 की जानो तुम बात।
अंतर्राष्ट्रीय तौर पर मजदूर दिवस की हुई शुरुआत।।

10 से 16 घंटों तक तब काम कराया जाता था।
उस अवसर पर नहीं इन्हें मानव भी समझा जाता था।।
चोटें खाकर लहूलुहान तक हो जाते थे इनके गात।
महिला, पुरुष, और बच्चों की मृत्यु का बढ़ता अनुपात।।

लिया गया तब अधिकारों के हनन रोकने का संकल्प।
मजदूर संघ ने हड़तालों को माना था तब मात्र विकल्प।।
शुरू किया विरोध प्रदर्शन करेंगे हम कितना काम,
आठ घंटे तय हों केवल काम के और उचित हों दाम।।

घटित हुई थी दुर्भाग्यपूर्ण घटना एक उस दौरान।
बम फोड़ गया शिकागो में कोई मानव रूपी श्वान।।
तैनात पुलिस थी पहले से ही लगी चलाने गोली,
मजदूर मासूमों के खून से उसने खेली होली।

इस नरसंहारक घटना को सब भूल भला कैसे जाते।
याद में उन निर्दोषों की हम सब श्रमिक दिवस मनाते।।
तीन वर्ष फिर बीत गए पर नहीं बुझी यह आग।
इस संहारक घटना से फिर  मानवता गई जाग।।

सत्र 1889 के समय में जागा फिर से जोश।
समाजवादी सम्मेलन में फिर हुआ एक उद्घोष।।
श्रमिकों का संहारक दिवस अब श्रमिक दिवस कहलाएगा।
सब अधिकारों के साथ श्रमिक इस दिन अवकाश मनाएगा।

दुनिया के 80 देशों ने सहर्ष इसे स्वीकार किया।
तब नवीन रूपों में सबने इस दिन को सँवार दिया।।
यूरोप में तो इसको बसंत का पर्व भी माना जाता है।
आज के दिन हर श्रमिक सभी से उच्च सम्मान को पाता है।।

आओ बच्चों आज मनाएँ श्रमिक दिवस हम शान से।
उनके दिवस को खास करेंगे हम उनके सम्मान से।।
कर्तव्यों को निभाता है वह पूरे जी और जान से।
फिर क्यों वह वंचित रह जाए उचित मान-सम्मान से।।

चित्र- साभार गूगल से
मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️

Thursday, 18 April 2019

'आप पुराने जमाने के आधुनिक पिता थे।'

जिस उम्र में बेटियाँ किसी को नमस्ते कहते हुए शर्मा कर माँ के आँचल के पीछे दुबक जाया करती थीं, उस उम्र में मैं आपकी उँगली पकड़ आपके पीछे दुबका करती थी। ऐसा नहीं है कि मुझे अम्मा की कमी नहीं महसूस होती थी लेकिन अम्मा के साथ होने पर भी मुझे संबल आपसे ही मिलता था। मैं तो अम्मा की याद आने पर आपसे दुबक कर सो जाया करती इस बात से अंजान कि हमारा भविष्य बनाने के लिए आप कितना बड़ा त्याग कर रहे थे। आज सोचती हूँ तो लगता है कि कितनी अंजान थी मैं, मेरे दामन में आकाश भर खुशियाँ थीं पर शायद मैं उनको जी भरकर जी नहीं पाई। बाबूजी, पता नहीं कभी आपने भी इस बात को महसूस किया होगा या नहीं कि दुनिया की अन्य बेटियों की तरह मुझपर मेरी माँ की आदतों का असर बहुत कम या शायद नगण्य था, मेरे आदर्श तो आप थे इसलिए मुझपर तो सदा से आपकी आदतों और विचारों का ही वर्चस्व रहा, आज भी है। आपको कभी बता न सकी कि जब कभी आप किसी के सामने मेरा समर्थन करते थे न! तो उस समय मैं इतना गौरवान्वित महसूस करती थी जैसे मुझे कोई मैडल मिल गया हो या शायद कोई मैडल भी मुझे उतनी संतुष्टि, उतनी खुशी नहीं दे सकता था। मेरे लिए तो आपकी मुस्कुराहट ही किसी तमगे से कम न थी। सभी बेटियाँ खाना बनाना, घर-गृहस्थी के अन्य काम अपनी माँ से सीखती हैं पर मुझे तो आपने सिखाया था, इसलिए जब तक आपसे अपने काम की तारीफ नहीं सुन लेती तब तक खुद को उसमें पास नहीं समझती थी। मुझे आज भी याद है जब गाँव से अम्मा के आने के बाद खाना खाते हुए बची हुई रोटियाँ देखकर आपने कहा था कि "तुमसे ज्यादा अंदाजा तो इसे है, उतना ही आटा माड़ती है कि न एक रोटी ज्यादा होती है न कम।" उस समय अपनी तारीफ सुन मेरा मन बल्लियों उछलने लगा था। 'आप पुराने जमाने के आधुनिक पिता थे।' काश मैं कभी आपसे कह पाती। जिस समय हमारे गाँव के लोग लड़कियों को सबके सामने चारपाई पर नहीं बैठने देते थे, उस समय आपने मुझे पूरी छूट दे रखी थी कि जहाँ मन हो जाओ, जिससे मन बात करो, कहीं बैठो-उठो कोई रोक-टोक नहीं। कितने ही लोगों को मुझसे जलन होती थी पर आपके कारण किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि वो मुझे कुछ कह सकें। आपसे प्रेरणा लेकर गाँव में और दो-तीन लोगों ने अपनी बेटियों को पढ़ाया था, वो अलग बात है कि दसवीं से आगे नहीं पढ़ा सके। हर कोई मेरे बाबूजी जैसा तो नहीं हो सकता। आप किस मिट्टी से बने थे कभी समझ नहीं पाई, इतने सख्त कि बड़े-छोटे किसी की हिम्मत नहीं होती थी आपके खिलाफ बोलने की, जबकि आपको कभी किसी से झगड़ते भी नहीं देखा पर कभी-कभी कुछ ऐसा कर जाना या कह जाना जिससे लगता कि आप इतने कोमल हृदय हो हम तो नाहक ही डर रहे थे, परंतु इसके बाद भी आपके समक्ष गलत बोलने या गलत करने का साहस कोई न कर सका। अपने बच्चों को सुनहरा भविष्य देने की कामना तो हर पिता की होती है, आपकी भी थी, इसीलिए तो आपने उस समय के अन्य पुरुषों की भाँति अपने बच्चों को माँ के पास नहीं छोड़ा बल्कि नौकरी करते हुए अपने साथ रखा और हमारे खाने-पीने से लेकर छोटी-बड़ी हर जरूरत का ध्यान उसी तरह रखते जैसे माँ रखती है। हमें अपने हाथों से नहलाना कपड़े धोना, खाना बनाना घर की सफाई-बरतन धोना और अपनी नौकरी भी करना। आज सोचती हूँ तो आश्चर्य होता है कि कैसे करते थे आप? आज अगर मैं बाहर नौकरी करती हूँ तो घर के कार्य कुछ-कुछ तो रोज ही रह जाते हैं, पर आपने तो सब कुछ बहीं ही कुशलता से वहन किया। आपको देखकर कभी नहीं लगा कि कोई मुश्किल आपको कभी हिला भी सकती है। साल में आठ महीने तो आप हम बच्चों के साथ अम्मा से दूर रहते थे शायद इसीलिए हमारे मन में कहीं न कहीं यह विचार पनप गया था कि अम्मा के साथ आपका रिश्ता तो सामान्य पति-पत्नी जैसा है पर वह असीम प्रेम नहीं है, जैसा अन्य लोगों में होता है। परंतु मुझे कुछ धुंधला सा याद है जब एक बार अम्मा बहुत बीमार थीं और वह बेहोश हो गईं तब आप बिलख-बिलखकर रो पड़े थे। खैर वो तो पुरानी बात हो गई उतना ही प्यार अब भी हो यह आवश्यक नहीं लेकिन अम्मा के चले जाने के बाद जब मैं आपसे मिली तब आपका फिर से वैसे ही बिलख-बिलख कर रोना मुझसे देखा नहीं जा रहा था। तब कहाँ जानती थी मैं कि आप अम्मा के बिना एक साल ही बमुश्किल निकाल पाएँगे। कहाँ जानती थी मैं कि मैं आपसे आखिरी बार मिल रही हूँ।
पहले अम्मा गईं फिर आप भी मुझे छोड़कर चले गए, अब तो मेरी मातृभूमि ही पराई हो गई, अब वो घर पराया और बेजान लगता है जिसमें कभी खुशियाँ खिलखिलाती थीं। अब भी मैं वहाँ जाकर उस घर में आपके और अम्मा के प्यार और दुलार को महसूस करना चाहती हूँ, पर वो अपनापन आप साथ ले गए जिसके सहारे मैं वहाँ एक/दो दिन रुक सकती थी। आपने अपने जीवन में सब सही किया बस एक और काम आप कर गए होते तो मैं आप दोनों को महसूस करने से वंचित नहीं होती, काश मुझे भी अपने बेटों की तरह अपनी विरासत का हकदार बनाया होता तो मैं भी उस मिट्टी की खुशबू से वंचित न होती।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

Wednesday, 17 April 2019

समीक्षा- 'कवच'



 वर्तमान परिवेश के धरातल पर रची गई काल्पनिक सत्य है 'कवच'

मानव का परिपक्व मन समाज की, परिवार की हर छोटी-बड़ी घटना से प्रभावित होता है और एक साहित्यकार तो हर शय में कहानी ढूँढ़ लेता है। आम व्यक्ति जिस बात या घटना को दैनिक प्रक्रिया में होने वाली मात्र एक साधारण घटना मान कर अनदेखा कर देते हैं या बहुत ही सामान्य प्रतिक्रिया देकर अपने मानस-पटल से विस्मृत कर देते हैं, उसी घटना की वेदना या रस को एक साहित्यिक हृदय बेहद संवेदनशीलता से महसूस करता है और फिर उसे जब वह शिल्प सौंदर्य के साथ कलमबद्ध करता है तो वही लोगों के लिए प्रेरक और संदेशप्रद कहानी बन जाती है। एक कहानीकार की कहानी कोरी काल्पनिक होते हुए भी अपने भीतर सच्चाई छिपाए रहती है, वह एक संदेश को लोगों के समक्ष रोचकता के साथ प्रकट करती है और चिंतन को विवश करती है। एक कहानीकार पाठक को मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक दायित्वों के लिए जागरूक भी बनाता है। एक साहित्यकार अपने साहित्य से समाज के उत्थान या पतन दोनों की दिशा सुनिश्चित कर सकता है और साहित्य की विधाओं में कहानी अति प्रभावी होती है। इसमें लोगों को बाँधे रखने के साथ-साथ सकारात्मक या नकारात्मक सोच को जन्म देने की गुणवत्ता होती है।  कहानीकार दिलबाग 'विर्क' जी ने अपने संकलन 'कवच' में ऐसी ही इक्कीस संदेशप्रद कहानियों को संकलित किया है, जो वर्तमान समाज का आईना हैं। वर्तमान समाज की हर सकारात्मक, नकारात्मक पहलू पर उनकी लेखनी चली है। उनकी लेखनी से निकला हर शब्द कहानी की आत्मा प्रतीत होता है।
इसका कथानक रिश्तों की कशमकश, बेरोजगारी, रूढ़िवादिता, आधुनिकता की फिसलन, पारिवारिक बंधन की छटपटाहट आदि को अपने भीतर समेटे हुए है।
कथोपकथन को पात्रों के अनुकूल रखने का प्रयास किया है।
घर-गृहस्थी की चक्की में पिसता आज का युवा
घर-परिवार के बंधनों से कुछ देर की मुक्ति हासिल कर मानों स्वयं को खुले आकाश का पंछी समझ लेता है और उसका चंचल मन कल्पनाओं के पंख लगा बंधन मुक्त स्वच्छंद होकर खुले आकाश में उड़ान भरना चाहता है और उसकी इस कल्पना की चिंगारी को हवा देने का काम आजकल सोशल मीडिया के द्वारा बखूबी कर दिया जाता है। कभी-कभी तो व्यक्ति मात्र क्षणिक हँसी-मजाक समझकर की गई बातों की श्रृंखलाओं में ऐसा उलझता जाता है कि उसे ज्ञात ही नहीं होता कि वह कितनी दूर निकल आया और जो वह कर रहा है वह गलत है या सही, किंतु किसी अपने के ऐसी परिस्थिति में होने की आशंका मात्र से सजग हो उठता है, 'खूँटे से बँधे लोग' कहानी के माध्यम से लेखक ने बेहद सजीवता से इसका चित्रण किया है। इसके एक-एक संवाद बेहद सहज आम बोलचाल की भाषा में लिखे गए हैं जो हिन्दी-अंग्रेजी के बंधनों से सर्वथा स्वतंत्र हैं।
कहानी के संवाद पात्रों और घटनाओं को सजीवता प्रदान करते हैं।
दृष्टव्य है- कहानी का मुख्य पात्र अपनी सोशल मीडिया की महिला मित्र के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहता है-
"नहीं-नहीं, हम खूँटे से बँधे लोग क्या सहेली बनाएँगे।"
"खूँटे?"
"घर गृहस्थी खूँटे ही तो हैं।"- "हा हा हा" कहकर रमेश ने अपनी इस गंभीर बात को मजाक का रंग देने की कोशिश की।
"हम्म, कभी-कभी छूट तो मिल ही जाती होगी?" उसने आँख मारती स्माइली के साथ मैसेज भेजा।
"छूट तो कहाँ मिलती है, बस खूँटे पर बँधे थोड़ा उछल-कूद कर लेते हैं।" रमेश ने भी उसी स्माइली के साथ रिप्लाई किया।
पुस्तक की प्रतिनिधि कहानी 'कवच' के माध्यम से लेखक निश्चित समय पर कार्य न कर पाने की स्थिति में बहानों का कवच तैयार करने के प्रयास करता है जो एक मानव मन की सहज प्रक्रिया होती है और मस्तिष्क पर यही दबाव लेकर सो जाने से स्वप्न में वही सब देखता है कि महाभारत के पात्रों ने भी किस प्रकार स्वयं को  निर्दोष दिखाने के लिए कवच ओढ़ रखा है।  महाभारत के पात्रों के माध्यम से पौराणिकता में पत्रकार रंजन जैसे आधुनिक पात्रों को सम्मिलित करके लेखक ने कहानी को वर्तमान धरातल पर सार्थक कर दिया है। वहीं 'सुहागरात' जैसी कहानी समाज में व्याप्त रिश्तों के विकृत पहलू को नग्न करती है।
कवच की सभी कहानियाँ वर्तमान परिवेश के धरातल पर रची गई काल्पनिक सत्य हैं। सभी कहानियों को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि ये पात्र तो हमारे जाने-पहचाने से हैं, शायद ये कहानी हम अक्सर अपने आसपास देखते हैं। जब किसी कहानी को पढ़ते हुए पाठक स्वयं को उस कहानी का पात्र महसूस करने लगे तो वह कहानी कहानी नहीं जीवन प्रतीत होने लगती है, कुछ ऐसी ही हैं कवच की जीवंत कहानियाँ।

संबल जैसी कहानी जहाँ आजकल लड़कियों का संबल बनाए रखने हेतु और बुराई से सामना करने के लिए माता-पिता को बेटियों के साथ मित्रवत् व्यवहार करने की सीख देती है, वहीं कार्यक्षेत्र में महिला सहकर्मियों को लेकर पुरुष वर्ग द्वारा बनाई जाने वाली बातें तथा किंवदंतियों की भी बड़ी खूबसूरती से 'चर्चा' कहानी में चर्चा की गई है।
जहाँ एक ओर जाति-पाँति, धर्म-गोत्र में उलझे समाज के स्याह पहलू में विलीन बेटियों की व्यथा को दर्शाते हुए माता-पिता के बलिदान के द्वारा इस रूढ़िवादिता के तिमिर से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने का प्रयास 'बलिदान' कहानी का मूल विषय है, तो वहीं पुत्र और पति के रिश्तों में पिसते एक ऐसे पुरुष वर्ग की दास्तां सोचने पर विवश कर देती है कि वास्तव में दोष किसका है? साधारण नौकरीपेशा उस पुत्र का जो अपनी माँ को संतुष्ट रखने के प्रयास में पत्नी की दृष्टि में उपेक्षित होता है या उस पति का जो पत्नी के साथ सामंजस्य बिठाने के प्रयास में माँ की उलाहनों का शिकार होता है, और अंततः माँ और पत्नी इन 'दो पाटन के बीच' पिसता हुआ उस अपराध का सजाभोगी बनता है, जो उसने किया ही नहीं।
कार्यालयी परिवेश में साथ काम करते हुए विवाहेतर आकर्षण का सजीव चित्रण 'च्युइंगम' के माध्यम से किया है तो बढ़ती महात्वाकांक्षाओं को पूरा करने और दिखावे के अधीन होकर खर्चे पर नियंत्रण न करके कर्ज के बोझ में दबकर आत्महत्या करने की घटना का बेहद सजीव चित्रण कहानी 'सुक्खा' के माध्यम से किया गया है।
एकबार यदि किसी के माथे सजायाफ्ता का कलंक लग जाए तो वह कभी पीछा नहीं छोड़ता और व्यक्ति निराशा के दलदल में धँसता जाता, इसका उदाहरण है कहानी 'दलदल'।
कॉलेज के दिनों में दोस्ती के महत्व तथा प्यार के इज़हार न कर पाने की कशमकश का चित्र 'इजहार' में जीवंत हो उठा तथा रोज़गार की आड़ में उसूलों और अनुचित कार्यों के मध्य जद्दोज़हद कहानी 'रोज़गार' में परिलक्षित है।
देश के प्रति उदासीन रवैया दर्शाती कहानी 'गर्लफ्रैंड जैसी कोई चीज' तथा भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, लाचारी, गरीबी और बेरोजगारी पर प्रहार है 'कीमत' कहानी।
कलुषित मानसिकता, चारित्रिक पतन और  समाज की विद्रूपताओं का आईना है 'प्रदूषण' तो दिल और दिमाग के अन्तर्द्वन्द्व में मानवता और नैतिकता का ह्रास दर्शाती कहानी 'गुनहगार' जो पाठक को झकझोर कर रख देने की क्षमता रखती है।
लेखक ने समाज के हर पहलू को पाठक के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

अंजुमन प्रकाशन से प्रकाशित 152 पृष्ठ की 'कवच' का मूल्य मात्र 150/ है।
मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि 'कवच' की कहानियाँ पाठक को बाँधे रखने में पूर्णतः सक्षम हैं तथा इसके प्रत्येक पात्र को आप अपने आसपास महसूस कर पाएँगे। लेखक अपनी कहानियों के माध्यम से जो संदेश पाठक तक पहुँचाना चाहते हैं उसमें पूर्णतः सफल हुए हैं।

मालती मिश्रा 'मयंती'
समीक्षक, कहानीकार व लेखिका
बी-20, गली नं०- 4, भजनपुरा, दिल्ली-110053
मो. 9891616087

Friday, 12 April 2019

जब से तुम आए सत्ता में (व्यंग्य)

जब से तुम आए सत्ता में
एक भला न काम किया
क्यों न तुम्हारी करें खिलाफत
हर दिशा में हलचल मचा दिया
आराम पसंद तबके को भी
काम में तुमने लगा दिया
चैन की बंसी जहाँ थी बजती
मचा वहाँ कोहराम दिया

क्या कहने सरकारी दफ्तर के
आजादी से सब जीते थे
बिना काम ही चाय समोसे
ऐश में जीवन बीते थे
उनकी खुशियों में खलल डालकर
चाय समोसे बंद किया
वो क्यों न तुम्हारी करें खिलाफत
जिन्हें समय का पाबंद किया
चैन की बंसी जहाँ थी बजती..
मचा वहाँ कोहराम दिया..

बहला-फुसलाकर लोगों को
अपनी जागीर बनाई थी
पर सेवा के नाम पर
विदेशों से करी कमाई थी
उनकी सब जागीरों पर
ताला तुमने लगा दिया
वो क्यों न तुम्हारी करें खिलाफत
जिनकी जागीरें मिटा दिया
चैन की बंसी........
मचा........

बड़े-बड़े घोटाले करके
भरी तिजोरी घरों में थी
स्विस बैंक में भरा खजाना
जिन पर किसी की नजर न थी
बदल रुपैया सारे नोटों को
रद्दी तुमने बना दिया
क्यों न तुम्हारी करें खिलाफत
ख़जानों में सेंध लगा दिया
चैन की......
मचा .........

ऊपर से नीचे तक सबके
निडर दुकानें चलती थीं
बिना टैक्स के सजी दुकानें
नोटें छापा करती थीं
ऐसी सजी दुकानों का
शटर तुमने गिरा दिया
क्यों न तुम्हारी करें खिलाफत
टैक्स सभी से भरा दिया
चैन की बंसी........
मचा वहाँ........

बिन मेहनत रेवड़ियों की जगह
नए आइडिया तुमने बांटी है
बड़े रसूख वालों की भी
जेबें तुमने काटी हैं
राजा हो या रंक देश का
सबको लाइन में खड़ा किया
वो क्यों न तुम्हारी करें खिलाफत
धूल सड़कों की जिन्हें चटा दिया
चैन की बंसी.......
मचा वहाँ.........

क्यों न तुम्हारी करें खिलाफत
ऐसा क्या तुमने काम किया
चैन की बंसी जहाँ थी बजती..
मचा वहाँ कोहराम दिया..

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

चयन का अधिकार

व्यथित हृदय मेरा होता था
देख के बार-बार,
राष्ट्रवाद को जब जहाँ मैं
पाती थी लाचार।

संविधान ने हमें दिया है
चयन हेतु अधिकार,
राष्ट्रहित के लिए बता दो
किसकी हो सरकार।

लालच की विष बेल बो रहे
करके खस्ता हाल,
जयचंदों को आज बता दो
नहीं गलेगी दाल।

चयन हमारा ऐसा जिससे
बढ़े देश का मान,
विश्वगुरु फिर कहलाएँ और
भारत बने महान ।।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

Wednesday, 10 April 2019

अधिकार और कर्तव्य

अधिकार और कर्तव्य
अपने बीते हुए समय पर विचार करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि समय की गति कितनी तीव्र है। आज से बस कुछ दशक पहले के लोग और उनके विचारों की तुलना वर्तमान से करें तो देखेंगे कि पहले लोग कर्म तो करते थे परंतु अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नही थे और इसी कारण अक्सर सामाजिक और आर्थिक हानि उठाते थे परंतु वर्तमान में परिस्थिति बिल्कुल विपरीत हो गई है, आजकल लोग अधिकारों से अधिक और कर्तव्यों से कम परिचित हैं। एक शिशु जब जन्म लेता है तब से ही नहीं बल्कि गर्भ में आने के साथ ही उसके अधिकार निश्चित हो जाते हैं, जन्म के पश्चात् अधिकारों के वट वृक्ष के नीचे वह पोषित होता है। जैसे-जैसे उसका शारीरिक व मानसिक विकास होता जाता है उसके दायित्वों का जन्म होने लगता है। अब वह अधिकारों की उँगली थाम दायित्वों के निर्वहन की ओर बढ़ता है। माता की ममता पिता की सुरक्षा परिजनों के प्यार-दुलार के अधिकारों की छाँव में पुत्र/पुत्री, भाई/बहन, पोता/पोती आदि के दायित्वों को सीखता है। पहले इनका संतुलन बखूबी देखने को मिलता था, व्यक्ति परिवार के प्रति, समाज के प्रति और देश के प्रति उत्तरदायी होता था किन्तु आज पुत्र अपने माता-पिता की संपत्ति पर तो पूरा अधिकार जताता है किन्तु कर्तव्य पालन का समय आता है तो परिवार से महरूम कर उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ देता है। विचारणीय है कि जो व्यक्ति अपने पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन नहीं कर सकता वह सामाजिक व राष्ट्रीय दायित्वों का निर्वहन कैसे करेगा!
वर्तमान समय में सभी को स्वच्छ और सुरक्षित परिवेश चाहिए परंतु वह सिर्फ दूसरों से चाहिए। जब रास्ते चलते हुए कागज फेंकते हैं, केले खाकर उसका छिलका फेंकते हैं, गुटखा, पान, तंबाकू खाकर जगह-जगह थूकते हैं, तब यह विचार मस्तिष्क में नहीं आता कि आसपास के क्षेत्रों को साफ रखना हमारा कर्तव्य। स्थिति हास्यास्पद और दुखद तब हो जाती है जब गंदगी फैलाकर कहते हैं सरकार प्रचार के लिए सफाई अभियान का ढोंग करती है। अस्वच्छता के लिए दूसरों पर उँगली उठाने वाले स्वयं ही गंदगी फैलाते हैं क्योंकि दायित्वों को निभाने में लगने वाली थोड़ी मेहनत वो नहीं करना चाहते। कौन ढूँढ़े कूड़ेदान....कौन ढूँढ़े शौचालय...जहाँ तन वहीं विसर्जन।
अपने गंतव्य पर जाते हुए सड़क पर कोई दुर्घटना का शिकार घायल पड़ा तड़प रहा होता है तो लोग पास खड़े होकर तमाशा देखते हैं, सहानुभूति जताते हैं किन्तु मानवता का धर्म निभाते हुए कोई उसकी मदद नहीं करता, फिर चाहे वह घायल तड़पते हुए दम ही तोड़ दे किन्तु वहीं जब पीड़ित कोई अपना होता है तो दूसरों को कोसते हैं, सिस्टम को कोसते हैं।
ऐसी कितनी ही दुर्घटनाओं को टाला जा सकता है यदि चालक अपने दायित्व का ध्यान रखकर वाहन चलाएँ और दुर्घटना के पश्चात् यदि लोग मूकदर्शक बनने के बजाय एक मानव का दायित्व निभाएँ या जिम्मेदार नागरिक होने का दायित्व निभाएँ तो कितनी ही जानें बचाई जा सकती है।
हमें सड़क पर स्वच्छंद होकर चलने का अधिकार चाहिए परंतु वही सड़क सभी के लिए सुरक्षित हो सके इसके लिए अपनी स्वच्छंदता पर थोड़ा अंकुश लगाने को तैयार नहीं। अधिकतर देखा जाता है कि जब हम किसी दफ़्तर में अपना कोई काम करवाने जाते हैं तो हमारा कार्य शीघ्रातिशीघ्र बिना दौड़-भाग के हो जाए इसके लिए चपरासी से लेकर अफसर तक को टेबल के नीचे से रिश्वत देते हैं फिर कहते हैं चारों ओर भ्रष्टाचार व्याप्त है। छोटे से लेकर बड़े व्यापारी तक सरकार को टैक्स देकर अपना नागरिक होने का उत्तरदायित्व नहीं निभाना चाहते और सुविधाएँ अमेरिका, स्विट्ज़रलैंड वाली चाहते हैं।
आज भी हमारे देश की जनता का एक बड़ा भाग मुफ्त की मलाई चाहते हैं, वह कर्म करने के दायित्व का निर्वहन भी नहीं करना चाहते और उम्मीद करते हैं कि सरकार उन्हें बिना कर्म ही रुपए या अन्य आवश्यक वस्तुएँ प्रदान करे और इसीलिए स्वार्थ के वशीभूत होकर सही या गलत को जाँचे बगैर ऐसा निर्णय ले लेते हैं कि अधिकारों की माँग रखने वाले ही भविष्य में अपने न जाने कितने अधिकारों से हाथ धो बैठते हैं। ऐसे लोग अधिकारों के नाम पर भ्रमित होते हैं और निर्णय नहीं कर पाते कि वास्तव में अधिकार का सही स्वरूप है क्या। सभी को नौकरियों में उच्च पद चाहिए परंतु शिक्षा ग्रहण करने के दायित्व का निर्वहन करने के बजाय आरक्षण की ढाल ओढ़कर सब हासिल करने का प्रयास करते समय हम यह नहीं सोचते कि जो परिश्रम से योग्यता प्राप्त करते हैं हम उनके अधिकारों का हनन कल रहे हैं।
वह स्थिति अति दुखद प्रतीत होती है जब एक जघन्य अपराध करने वाला अपराधी भी न्यायालय में मानवाधिकार की दुहाई देकर सजा से बचना चाहता है परंतु न्यायालय को यह कहते नहीं सुना जाता कि उसने जिसकी हत्या या बलात्कार का अपराध किया क्या उसका कोई मानवाधिकार नहीं था? उस समय मन और अधिक कुंठित हो उठता है जब आतंकवादियों के लिए भी मानवाधिकार की दुहाई दी जाती है, क्या उसने मानव होने का दायित्व निभाया? नहीं, तो मानव होने का अधिकार क्यों?
अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे के साथ चलते हैं, एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं जिस दिन व्यक्ति को यह समझ आ जाएगा उस दिन वह स्वार्थ से मुक्त हो एक आदर्श नागरिक की श्रेणी में आ जाएगा।
मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

Wednesday, 3 April 2019

गरीबों की नाव पर राजनीति की सवारी


सत्ता के इस महासंग्राम में कुछ राजनीतिक पार्टियों द्वारा गरीब को सदैव सारथी बनाया जाता है। जो कि अपने गरीबी के रथ पर बैठाकर अमीरी की ओर बढ़ती इन राजनीतिक पार्टियों को इस महा संग्राम के चुनावी रणक्षेत्र से बाहर विजयी बनाकर निकालता है। हमेशा इन्हीं गरीब सारथियों के सहारे चुनाव का रणक्षेत्र पार करके उसे फिर उसी प्रकार गरीबी की मँझधार में डूबने-उतराने के लिए छोड़ दिया जाता है। इसके बावजूद, इतने दशकों तक छले जाते रहने के बाद भी आज भी गरीब छले जाने के लिए तैयार हैं, ऐसा मानना है राजनीतिक दलों का, और क्यों न हो, जब तक ऐसा सोचने वालों को माकूल ज़वाब नहीं मिलता, तब तक तो उनकी धारणा यही रहेगी क्योंकि आज तक का उनका अनुभव उनका हौसला बढ़ाता है।

गरीबी यूँ तो अभिशाप है, गरीबी का दर्द क्या होता है ये गरीब के अलावा और कोई नहीं समझ सकता, लेकिन गरीब स्वार्थी ही हो यह आवश्यक नहीं, आवश्यक नहीं कि जो इंसान गरीब पैदा हो वह आजीवन गरीब ही रहे। किसी ने सत्य ही कहा है कि 'इंसान गरीब पैदा हो, इसमें उसका कोई दोष नहीं, किन्तु गरीब ही मर जाए तो वह दोषी ही नहीं अपराधी है। क्योंकि जन्म कहाँ किस परिवार में होना है ये हमारे वश में नहीं किन्तु ईश्वर प्रदत्त  शारीरिक अवयवों की सक्षमता के बाद भी यदि हम राजनीति द्वारा पोषित गरीबी के शिकार बने रहें तो यह हमारी अकर्मण्यता ही है। बहुधा देखा जाता है कि गरीबी व्यक्ति को निरीह व दया का पात्र बना देती है परंतु कुछ ऐसे उदाहरण भी दृष्टव्य हैं कि परिश्रमी व्यक्ति गरीबी से हारकर भी अपना स्वाभिमान नहीं छोड़ता। वह मुश्किलों से घबराकर परिश्रम करना नहीं छोड़ता और अंततः गरीबी के दलदल से बाहर भी निकल आता है। परिस्थितियाँ सदैव हमारे अनुकूल नहीं होतीं तो सदैव प्रतिकूल भी नहीं होतीं, आवश्यकता होती है सदैव चैतन्य अवस्था में रहते हुए उन्हें पहचानने और सही दिशा में कर्म करने की। जिस प्रकार दिवस और रात्रि प्रकृति का नियमित चक्र है उसी प्रकार सुख-दुख, अच्छा-बुरा भी नियमित चक्र है किन्तु यह तभी संभव है जब हम सदैव सकारात्मक सोच के साथ क्रियाशील रहेंगे। यदि धारणा ही ऐसी बना ली जाय की गरीब पैदा हुए हैं इसलिए गरीब ही मरेंगे, तो निश्चित ही यही होगा। कहा भी गया है कि- 'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।' और सत्य यही है कि "व्यक्ति तब तक नहीं हारता जब तक वह हार न मान ले।" इसलिए कैसी भी परिस्थिति हो पर हार मान कर नहीं बैठना चाहिए बल्कि संघर्षरत रहना चाहिए।
आजकल चुनावी माहौल में गरीबों को लोक-लुभावने सब्ज़बाग दिखाकर उनका वोट हासिल करने का प्रयास हो रहा है। योजनाओं तक तो बात ठीक थी माना जा सकता है कि सरकार का काम है देश की जनता के हितार्थ काम करना किन्तु अब तो मुफ्त में पैसे देकर गरीबों का भला करने के वादे किए जाते हैं। ऐसा नहीं है कि ये पहली बार है, ऐसी तरह-तरह की योजनाएँ दशकों से चलती रही है, कभी किसी पार्टी के द्वारा मुफ्त में साइकिल वितरण किया गया तो कभी लैपटॉप वितरण हुआ। कभी प्रैशर कुकर बाँटा गया तो कभी साड़ी बाँटी गई, कहीं मुफ्त खाने के लिए भोजनालय खुलवा दिए गए तो कहीं मुफ्त पानी, वाई-फाई का वादा करके सत्तारूढ़ हुए। परंतु प्रश्न यह उठता है कि इतनी सारी मुफ़्त वस्तुओं के वितरण के पश्चात भी क्या गरीबी में अंश मात्र की भी कमी आई? बल्कि गरीबों की संख्या बढ़ी है, आत्महत्या की घटनाएँ बढ़ी हैं तथा सरकार पर निर्भरता बढ़ी है। कहते हैं कि 'बैठे मिले खाने को तो कौन जाए कमाने को' यह सूक्ति चरितार्थ होती नजर आती है। आम जनता में अधिकांश की धारणा बन गई है कि गरीबी उन्मूलन सरकार का काम है किन्तु यह नहीं समझ सके कि यदि मुफ्त वितरण से आर्थिक समानता आती तो हमारे देश से गरीबी कब की मिट चुकी होती। राजनीतिक पार्टियाँ जनता के इस सोच से या यूँ कहा जाए कि इस कमजोरी से भली भाँति परिचित हैं इसीलिए जब चुनाव आता है तब कर्ज़ माफी, रुपए वितरण जैसे लोक-लुभावने वादे किए जाते हैं और अकर्मण्यता के शिकार लोग लालच में आकर सिर्फ अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर ऐसी पार्टियों को वोट दे देते हैं। वो यह नहीं समझते कि ऐसे लालच देकर ये नेता उन्हें लालची और आलसी बना रहे हैं ताकि वे कभी आगे न बढ़ें और अगले चुनाव में भी उनका इसी प्रकार प्रयोग किया जा सके। परिणामस्वरूप मुफ्त का लालच देने वाली पार्टी सत्ता में आ जाती है। सोचने की बात है कि जो मुफ्त पैसे बाँटने को तैयार हो, वह ऐसा अपने स्वार्थपूर्ति के लिए ही तो करेगी, न कि गरीबों के लिए और इसीलिए सत्ता में आते ही गरीब और गरीबी भूलकर भ्रष्टाचार घोटाले आदि से अपना ख़जाना भरना प्रारंभ कर देती है और घोषित राशि कुछ दस-पाँच प्रतिशत लोगों तक पहुँचा कर दिखावे की राजनीति भी हो जाती है। परिणामस्वरूप गरीब गरीब ही रह जाते हैं और अगले आने वाले चुनाव का चारा बनने को तैयार होते हैं। यदि गरीब अपने स्वाभिमान को जगाए रखे और परिश्रम से ही आजीविका तलाशे तो कदाचित स्वयं वह अपनी नकारात्मक परिस्थितियों ने निकल सकता है और मुफ्त के लालच का शिकार बनकर देश को गलत हाथों में सौंपने के अपराध से भी बच जाएगा। हर व्यक्ति को सदैव अपने कर्मों पर भरोसा रखना चाहिए क्यों 'दैव-दैव' पुकारना आलसी का काम है। इसीलिए तो कहा गया है 'दैव-दैव आलसी पुकारा' कर्मयोगी के लिए तो 'अपना हाथ जगन्नाथ' होता है।

मालती मिश्रा 'मयंती'

Tuesday, 26 March 2019

सौतेली..



चाय की ट्रे लेकर जाती हुई उर्मिला के पाँव एकाएक जहाँ थे वहीं ठिठक गए, जब उसके कानों में पड़ोस की प्रभावती ताई की आवाज पड़ी, जो उसकी माँ से कह रही थीं, "अरे नंदा कब तक घर में बैठा कर रखेगी जवान विधवा बेटी को? अभी तो उसकी पूरी जिंदगी पड़ी है सामने। जब तक तू और भागीरथ भाई सा'ब हैं तब तक तो जैसे-तैसे दिन काट लेगी बेचारी, लेकिन माँ-बाप जिंदगी भर थोड़े ही साथ देते हैं, फिर भाई-भाभी का क्या पता! अच्छी भाभियाँ नसीब वालों को ही मिलती हैं और तेरी उर्मी इतनी नसीब वाली होती, तो आज वैधव्य का कलंक न होता उस बेचारी के माथे पर।"
"पर दीदी उस लड़के के एक बेटी है, शादी करते ही मेरी उर्मी पत्नी के साथ-साथ पाँच-छः  साल की बच्ची की माँ बन जाएगी। सबकी नजर मेरी बच्ची पर होगी, वो कैसे इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभा पाएगी?" माँ की दुख और निराशा में डूबी आवाज उर्मी को भी दुखी कर गई।
"नंदा मैं समझती हूँ, कोई माँ नहीं चाहती कि उसकी बेटी को सौतेली माँ बन किसी और के बच्चे की जिम्मेदारी उठानी पड़े, पर जरा शांत दिमाग से सोच.. हमारी उर्मी विधवा है और हमारे समाज में विधवा विवाह अभी आम बात नहीं है। पुरुष तो बुढ़ापे तक भी विवाह कर लेता है, पर यदि स्त्री के माथे पर विधवा की मुहर लग जाए, तो उसे तो इंसान होने के अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाता है। लोग उसे ऐसे देखते हैं, जैसे उसकी उस अवस्था की जिम्मेदार वही है, और तो और कितने ही पुरुषों की नजर बदलते देर नहीं लगती, ऐसे में तू और भाई साहब कब तक उसकी ढाल बने रहोगे? शादी कर दोगे तो वहाँ वह सौतेली ही सही, माँ और पत्नी बनकर सम्मान से जी तो पाएगी। कुछ समय के संघर्ष के बाद वही उस घर की मालकिन होगी। फिर सोच, लड़के में भी कोई कमी नहीं, अभी तीस-बत्तीस साल का जवान ही है। तीन साल पहले पत्नी चल बसी तो लोगों के लाख समझाने पर भी शादी नहीं की, पर अब, जब माँ भी बीमार रहने लगी, तब सबने समझाया कि अब उस घर में किसी स्त्री का होना कितना जरूरी है; तब जाकर माना दूसरी शादी के लिए।"
प्रभावती ताई की आवाज में उसके लिए जो फिक्र झलक रही थी उसकी सत्यता-असत्यता का कोई प्रमाण तो नहीं था पर चाहकर भी उर्मी उनकी बातों से असहमत नहीं हो पा रही थी, और उसकी माँ ने तो मानो ताई के समक्ष हथियार डाल दिया था। पापा को भी माँ और ताई ने मिलकर समझा लिया।
बाल-विधवा उर्मी अब फिर से सुहागन बनने जा रही थी पर मन में उल्लास की जगह भय था, सुहागिन होने का सुख तो उसने भोगा नहीं, पर अब सुहाग के प्रकाश में सौतेली माँ की स्याह परछाई भी साथ-साथ चलेगी। घर में विवाह की तैयारियाँ शुरू हो गईं पर जो चहल-पहल, उमंग उत्साह आम तौर पर ऐसे अवसर पर होता है, वह लुप्त था। सभी तैयारियाँ ऐसे शांतिपूर्वक हो रही थीं जैसे कोई अनैतिक कार्य करने की तैयारी हो रही हो।
जब-तब माँ उर्मी की नजर बचाकर उसकी ओर ऐसे देखतीं, जैसे वह उसे बलि के लिए तैयार कर रही हैं। कभी उन्हें इसप्रकार कातर नजरों से अपनी ओर देखते हुए उर्मी देख लेती, तो वो नजरें चुराकर वहाँ से हट जातीं, पर उनकी आँखों में अपने लिए दया का यह भाव उसे भीतर तक बेध जाता। वह माँ को समझाना चाहती है कि वह उसे दया का पात्र न समझें, उसके पुनर्विवाह को अपराध न समझें पर कह नहीं पाती। कैसे कहती! बचपन से अब तक कभी बड़े-छोटे के अंतराल को खत्म ही नहीं कर पाई, बेटी तो बन गई पर कभी अपने मन के उथल-पुथल को माँ के सामने नहीं कह सकी। माँ भी तो! इतना प्यार करती हैं पर कभी उससे खुलकर बात नहीं करतीं, न जाने क्यों...पर ऐसा ही है उर्मी का रिश्ता उसकी सगी माँ से। अब वह भी माँ बनने जा रही है, उस बच्चे की जो उस घर में उससे पाँच-छः वर्ष पहले से रहती है, जिसे वह जानती नहीं। यूँ तो माँ ही अपने बच्चे को सबकुछ सिखाती है और परवरिश के साथ-साथ धीरे-धीरे उसमें अपने संस्कार और गुणों का रोपण करती है, अपनी ममता, दुलार और देखभाल से उसका पोषण करती है, उस नव पल्लवित कोपल में अपने संस्कारों की सुगंध भरती है, पर उसे तो ये सब करने का अवसर ही नहीं मिला और किसी अन्य के रोपित पौधे की मालिन बनकर उसको वृक्ष बनाना है। कैसे करेगी वह ये सब? भीतर ही भीतर इन्हीं झंझावातों से लड़ती उर्मी अपने मन के उथल-पुथल को अपने आप में समेटे, आँखों में बिना रंगीन सपने सजाए, दुल्हन बन गई और रातों-रात रिश्तों का एक लंबा अंतराल पार कर लिया। कल तक अपने घर में सिर्फ बेटी और बहन के रिश्ते से अलंकृत उर्मी सात फेरे खत्म होते-होते कई रिश्तों की सीढ़ी चढ़ गई। भोर की पहली किरण के निकलने से पहले ही वह पत्नी, बहू, भाभी आदि बनने के साथ माँ की गरिमापूर्ण पदवी से सजा दी गई। किन्तु इस उपलब्धि की खुशी नहीं भय था, साथ ही अपने वैधव्य के दोष को दूर करने के लिए किए गए समझौते का दंश, जो उसके अंतस को कचोट रहा था।
अपने घर की मान मर्यादा को बनाए रखने तथा किसी को शिकायत का अवसर न देने जैसे तमाम सुझावों, सलाहों, आँसुओं और आशीषों के साथ उसकी विदाई हुई।

"बहू, यह घर अब तुम्हीं को संभालना है, मेरा अब क्या ठिकाना कि कब ऊपर से बुलावा आ जाए। सुहास तो दूसरा विवाह ही नहीं करना चाहता था, बहुत समझाया सबने कि दादी पूरी जिंदगी तो रहेगी नहीं, बिन माँ के लड़की को कैसे पालेगा, तब माना है। अब तरु तुम्हारी जिम्मेदारी है। मुझे पूरी आशा है कि तुम इसका पूरा खयाल रखोगी, इसे कोई परेशानी नहीं होने दोगी।" सासू माँ के अपनत्व भरे शब्दों से उर्मी को संबल मिला, उसका मन हुआ कि वह उनसे अपने मन का सारा डर कह दे पर साहस नहीं जुटा सकी, बस स्वीकृति में सिर हिलाकर इतना ही कह सकी- "आपके आशीर्वाद की छाया में मैं पूरी कोशिश करूँगी कि किसी को कोई परेशानी न हो।"
यशोदा देवी बहू की मधुर आवाज सुनकर खुश हो गईं और मन ही मन खुश होती, मुस्कुराती हुई बाहर चली गईं। साँझ की स्याही ज्यों-ज्यों गहराती जा रही थी, उर्मी की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं। उसे पता है कि सुहास भी आते ही सबसे पहले उससे अपनी बेटी तरु का ही जिक्र करेगा और उम्मीद करेगा कि मैं उसे आश्वस्त कर सकूँ, पर कैसे?  'क्या मेरे आश्वासन देने मात्र से उसे विश्वास हो जाएगा? यदि नहीं..तो मेरे कुछ भी कहने का क्या लाभ...क्यों न सब समय पर ही छोड़ दें...समय से बड़ा शिक्षक कोई नहीं होता...समय और परिस्थितियाँ मनुष्य को जिस मजबूती से सिखा सकती हैं, वो कोई व्यक्ति लाख कोशिशों के बाद भी नहीं सिखा सकता।' सोचते-सोचते विवाह की न जाने कितनी ही रस्मों से थकी उर्मी कब नींद की आगोश में समा गई उसे पता ही न चला।

उर्मी अलमारी में कपड़े रखने में तल्लीन थी, तभी उसे अहसास हुआ शायद पीछे कोई है, वह मुड़ी तो देखा दरवाजे पर स्कूल की ड्रेस पहने बाल बिखरे हुए, हाथ में कंघी और रबड़ लिए सहमी-सी तरु खड़ी थी। डरी-डरी सी उसकी ओर देख रही थी, पर न तो अंदर आ रही थी न ही कुछ बोल रही थी। उर्मी ने अलमारी बंद करते हुए कहा- "आओ, अंदर आओ न, वहाँ क्यों रुक गईं।"
वह धीरे-धीरे भीतर आई और बेड के पास चुपचाप खड़ी हो गई। उर्मी समझ गई कि वह बाल बनवाने के लिए आई है परंतु वह देखना चाहती थी कि वह खुद बोलती है या नहीं? इसलिए वह व्यस्त होने का दिखावा करती हुई कभी बिस्तर ठीक करती तो कभी टेबल साफ करने लगती, पर तरु चुपचाप सिर झुकाए खड़ी रही तो उर्मी ही बोली- "आप कुछ बोलो बे..तरु कुछ काम है?" वह बेटा बोलना चाहती थी पर न जाने क्यों अजीब महसूस हुआ और ज़बान अपने-आप ही रुक गई, 'बेटा' शब्द उसके लिए अजनबी जो था इसलिए स्वाभाविक रुप से ज़बान पर न आ सका।
"आंटी, दादी कह रही हैं कि आपसे चोटी बनवा लूँ।" तरु डरती हुई बोली।
"तो ठीक है इसमें डरने की क्या बात है, आओ मैं बना देती हूँ।" उसे पकड़ कर कुर्सी पर बैठाते हुए उर्मी बोली।
चोटी बनाकर उसके कोमल किन्तु खुश्की से रूखे कपोलों को देखकर उर्मी बोली- "चेहरे पर कुछ नहीं लगाया, देखो त्वचा कितनी सूख गई है!" कहकर उसने लोशन निकालकर उसके चेहरे और हाथ पैरों पर अच्छी तरह से लगाया, फिर उसके होठों पर बाम लगाया और पूरी तरह तैयार करके उसे भेज दिया।
उसका यह स्नेहिल अपनापन पाकर तरु मन ही मन खिल गई, परंतु बाल सुलभ संकोच और अनजानेपन के कारण कुछ कह न सकी।
उसके चेहरे के परिवर्तन को सुहास ने भी महसूस किया।
अब रोज ही वह उर्मी के पास आकर चुपचाप खड़ी हो जाया करती, पहले शुरू-शुरू में दरवाजे पर ही तब तक खड़ी रहती, जब तक उर्मी उसे भीतर आने को न कहती। फिर धीरे-धीरे भीतर आने लगी लेकिन तब तक नहीं बोलती, जब तक उससे उर्मी पूछती नहीं।
जब से वह उर्मी से बाल बनवाने लगी है तब से उसकी कोमल त्वचा की भी देखभाल हो जाती है। पहले उसके गाल फटे-फटे से रहते थे, उनमें रूखेपन से  खिंचाव के कारण दर्द भी होता था, कभी-कभी होंठ भी फट जाया करते, परंतु अब ऐसा नहीं होता। कक्षा में उसके जो सहपाठी मित्र उसे पहले चिढ़ाया करते थे उसका मजाक उड़ाते थे, वही अब उसको जिज्ञासु नजरों से देखते हैं, उसमें आए बदलाव का कारण जानना चाहते हैं। अध्यापिका ने भी उसे स्वच्छ और इस्त्री किए ड्रेस पहनकर आने के लिए उसे चॉकलेट दिया, तब उसको अपनी नई आंटी पर गर्व हुआ था। घर आकर उसने खुशी-खुशी दादी को बताया।
अब वह कंघी लेकर कमरे के गेट पर नहीं खड़ी होती, बल्कि सीधे कमरे में आकर उर्मी के हाथ में कंघी दे देती।
उर्मी ने उसका लंचबॉक्स उसके बैग में रखा और रसोई में जाने के लिए मुड़ी ही थी कि तभी वह एक हाथ में कंघी और रबर तथा दूसरे हाथ में जूते लिए उसके सामने आ खड़ी हुई। उर्मी ने एक पल को उसकी ओर देखा, फिर कतरा कर बगल से निकल गई।
"आंटी मेरी चोटी बना दो।" उर्मी को अपनी ओर ध्यान न देते देख तरु साहस करके धीमी आवाज में बोली।
वह रुक गई और पलट कर देखा, उसके मासूम चेहरे को देखकर उसका मन हुआ कि उसको अंक में भर ले पर अपनी भावनाओं को छिपाते हुए सपाट स्वर में बोली- "मेरी एक शर्त है, प्रॉमिस करो मानोगी, तो बनाऊँगी चोटी।"
उर्मी की बात सुन सुहास चौंक गया, अखबार से नजरें हटकर अकस्मात् उर्मी के चेहरे पर टिक गईं, ठाकुर जी को नहलाते हुए सासू माँ के हाथ रुक गए। दोनों के मस्तिष्क में एक साथ खयाल आया, आखिर शुरू कर दिया अपना सौतेलापन दिखाना।
"प्रॉमिस" तभी तरु बोली।
"ओके, तो प्रॉमिस करो कि आज से मुझे आंटी नहीं बोलोगी।" उसके कंधे पर प्यार से हाथ रखते हुए उर्मी बोली।
"ठीक है आंटी जी प्रॉमिस।" तरु इतनी मासूमियत से बोली कि एकसाथ सुहास और सासू माँ की हँसी छूट गई पर दोनों ने अपनी आवाज़ें दबा लीं।
"अच्छा जी! प्रॉमिस भी कर रही हो और आंटी भी बोल रही हो।" उन दोनों से अंजान उर्मी मीठी सी झिड़की देती हुई बोली।
"त् तो क्या बोलूँ?" उसने पूछा।
"मम्मी, मम्मी बोलोगी तभी मैं आपके काम करूँगी। आप ही सोचो न किसी की आंटी क्या रोज-रोज किसी बच्चे को तैयार करती हैं? नहीं न...सबकी मम्मी अपने बच्चों को तैयार करके भेजती हैं, मैं भी वैसे ही भेजती हूँ फिर आप मम्मी क्यों नहीं बोलते?" उसने तरु के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा।
"पर मेरी मम्मी तो भगवान जी के घर गई हैं न? तो मैं आपको कैसे बोलूँ?"
"क्योंकि भगवान जी ने ही तो मुझे आपके पास भेजा है, वो मुझसे कह रहे थे कि तरु को तुम्हारी जरूरत है इसलिए तुम्हें उसके पास होना चाहिए। क्या अब भी आप मुझे आंटी बोलोगी?" उर्मी तरु के मासूम चेहरे पर नजरें गड़ाते हुए बोली।
उसकी इस बात को सुन यशोदा देवी ने ठाकुर जी के चरणों में माथा टेककर धन्यवाद किया, सुहास ने गहरी सांस लेकर कुछ ऐसे निश्वांस छोड़ा मानों अब तक की सारी चिंताओं को बाहर निकाल दिया और मुस्कुराता हुआ पुनः अखबार में नजरें गड़ा दिया।
"फिर तो आज मैं अपने फ्रैंड्स को बताऊँगी कि मेरी मम्मी वापस आ गईं।" तरु खुशी से चहकती हुई बोली।
"अच्छा! तो अब तक आपने क्या बताया था अपने फ्रैंड्स को मेरे बारे में?" उर्मी ने उसके कोमल गालों को प्यार से खींचते हुए पूछा।
तरु ने अपराधी की भाँति सिर झुका दिया।
"कोई बात नहीं आ जाओ आपकी चोटी बनाते हैं।"
"शूज़ भी पॉलिश करने हैं।" तपाक से बोली तरु।
"हाँ..हाँ वो भी हो जाएँगे।" कहते हुए उसका हाथ पकड़े उर्मी कमरे में चली गई।

सुहास और यशोदा देवी की यह चिंता दूर हो गई थी कि नई बहू पता नहीं तरु को प्यार करेगी या नहीं। दोनों ही उर्मी से खुश थे, उसने तरु की पूरी जिम्मेदारी कुशलता से संभाल ली थी। उसे पढ़ाना हो या उसके साथ खेलना, उसकी छोटी-छोटी खुशियों का भी पूरा ख्याल रखती साथ ही सास की सेवा में भी कोई कमी नहीं आने देती। सुहास भी अब उर्मी की खुशियों का  ध्यान रखने लगा था। इस बीच उर्मी अपने मायके भी जाकर आ गई थी। माँ ने सबसे पहले तरु के बारे में ही पूछा था और जब उसने माँ को सब बताया तो वह भी चिंतामुक्त हो गईं।
आज घर में चहल-पहल रोज की अपेक्षा अधिक थी, दो बज चुके हैं उर्मी अभी भी रसोई में व्यस्त है। सुहास की बड़ी बहन मेघा आज अपने दोनों बच्चों के साथ आई हैं, तरु भी स्कूल से आते ही बिना कपड़े बदले पिंकी और अंशुल के साथ खेलने में व्यस्त हो गई। काम में व्यस्त होने के कारण उर्मी ने ध्यान नहीं दिया कि आज किसी ने तरु के हाथ-मुँह धोकर उसके कपड़े नहीं बदलवाए। वह तो सोच रही थी कि मम्मी जी उसे व्यस्त देख खुद ही उसके कपड़े बदल देंगीं वह तो बस भाग-भागकर कभी ननद की कभी उनके बच्चों की तो कभी सासू माँ की फरमाइशें पूरी करने में रत थी, पर तरु को खाना खिलाना नहीं भूली, अतः खाना लेकर यशोदा देवी के कमरे में पहुँची। तरु खेल में खोई हुई थी, मेघा माँ से बातें कर रही थी पर उसे देखते ही चुप हो गई। उर्मी को थोड़ा अजीब जरूर लगा पर उसने उधर ध्यान नहीं दिया बल्कि तरु को स्कूल के कपड़ों में देखकर बोली "तरु आपने अभी तक कपड़े नहीं बदले, चलो आओ पहले हाथ-मुँह धोकर कपड़े बदलो फिर खाना खाने के बाद खेलना।" कहती हुई वह उसका हाथ पकड़कर कर अपने कमरे में लेकर जाने लगी।
"तुम कहना क्या चाहती हो उर्मी वो अपने कपड़े खुद बदलती है..अपने आप ही हाथ-मुँह धोती है? मेरी बेटी उससे एक साल बड़ी है पर आज भी मैं ही उसके सारे काम करती हूँ और तुम...." मेघा ने जानबूझकर बात अधूरी छोड़ दी।
"नहीं दीदी मेरा वो मतलब नहीं था, मुझे लगा कि मम्मी जी ने कर दिया होगा।" वह बोली।
"अब भी मम्मी जी ही करेंगीं....?" मेघा फुँफकारती हुई बोली। उसने जो आधा वाक्य बोला उर्मी के आहत हृदय ने उस वाक्य को पूरा कर लिया..."अब भी मम्मी जी ही करेंगीं...तो तुम क्या करोगी?"

वह बिना रुके तरु को लेकर अपने कमरे में चली गई, उसकी आँखें भर आईं, तरु उसकी आँखों में आँसू न देख ले, इसलिए उसे कमरे में छोड़ वह जल्दी से बाथरूम में चली गई। एकांत का आभास पाकर आहत दिल ने नियंत्रण खो दिया और जबरन रुका आँसुओं का सैलाब पलकों का बंधन तोड़ बह निकला।
"मम्मी जल्दी करो मुझे पिंकी दीदी के साथ खेलना है।" तरु की आवाज सुन उर्मी ने जल्दी से मुँह धोया और तौलिए से पोछती हुई बाथरूम से बाहर आई और उसके कपड़े बदले, हाथ, पैर, मुँह धुलाकर उसे खाना खिलाया।

इंसान को राह चलते यदि किसी पत्थर से ठोकर लग जाए तो वह या तो उस पत्थर को वहाँ से उखाड़ फेंकता है या उससे बचकर कतरा कर निकलता है, किन्तु रिश्तों में अक्सर ऐसा करना संभव नहीं होता। बहुधा आहत करने वाले, दर्द देने वाले रिश्तों को भी न चाहते हुए भी मुस्कुराते हुए निभाना पड़ता है, उन्हें न तो उखाड़कर फेंका जा सकता है न ही उनसे बचने के लिए दूर हुआ जा सकता है। ऐसी ही स्थिति उर्मी की थी। उसे समझ में आ रहा था कि उसकी ननद अपनी माँ को भड़काने का प्रयास कर रही है, वह अपनी मम्मी के समक्ष यह सिद्ध करना चाह रही थी कि उर्मी तरु के प्रति लापरवाह है, फिरभी उसे हँसते हुए ही सेवा करनी है। परंतु उसे खुशी हुई थी जब मम्मी जी की आवाज कान में पड़ी- "चुप रह मेघा, फ़िजूल की बातें मत कर। वह तरु का बहुत ध्यान रखती है बिल्कुल वैसे ही जैसे तू अपनी बेटी का रखती है। तू तो यहाँ रहती नहीं, फिर कुछ ही घंटों में तूने वो देख लिया जो मेरी अनुभवी आँखें आज तक नहीं देख पाईं।"
उर्मी इतना सुनकर रसोई में चली गई उसे सुहास के लिए चाय बनानी थी और वो अब इससे ज्यादा कुछ सुनना भी नहीं चाहती थी। खुशी के मारे उसका मन मानो हवा में उड़ रहा था, मम्मी जी के लिए उसके मन में सम्मान और बढ़ गया।
मेघा अपने पति और बच्चों के साथ दो दिन रही उर्मी ने उनका खूब सेवा-सत्कार किया, अब उसे मेघा से भी कोई शिकायत न थी, उसने अहसास भी नहीं होने दिया कि उसने कुछ सुना या महसूस किया। जाते समय मेघा और उसके पति ने भी उर्मी की प्रशंसा की और अपने घर आने का निमंत्रण दिया।

"मम्मी मैं भी चलूँगी आपके और पापा के साथ प्लीज़।" उर्मी को सूटकेस में कपड़े रखते देख तरु ने जिद करते हुए कहा।
"बेटा आप नहीं जा सकते, हम काम से जा रहे हैं और जल्दी से वापस आ जाएँगे। अच्छे बच्चे जिद नहीं करते।" कहते हुए सुहास ने तरु को गोद में उठा लिया और कमरे से बाहर की ओर चला गया, जाते हुए तरु उर्मी को उम्मीद भरी नजरों से देखती रही, उसकी मासूम आँखों में झिलमिलाते मोती उर्मी को भीतर तक नम कर गए, उसका रुआंसा उदास सा चेहरा उसकी ममता को झकझोर गया।
तरु को जब से पता चला था कि उसके मम्मी पापा कहीं जा रहे हैं, तब से वह लगातार साथ जाने की जिद कर रही थी। सुहास को ऑफिस के काम से दो दिन के लिए भोपाल जाना था यह सुनते ही मम्मी जी बोल पड़ीं, "बहू को भी ले जा, एकाध हफ्ते के लिए घुमा ला। वैसे भी शादी के बाद तुम दोनों कहीं गए भी नहीं हो, अलग से ज्यादा छुट्टी भी नहीं लेनी पड़ेगी, एक पंथ दो काज हो जाएँगे। सुहास ने भी मम्मी की बात मान कर अपने दो दिन के टूर को एक हफ्ते का कर लिया था। दो दिन में ऑफिस का काम खत्म करके फिर उर्मी के साथ घूमने का कार्यक्रम निर्धारित कर लिया और और उसे अपना सामान रखने को कहा, परंतु यह सुनते ही उर्मी ने कहा था "तरु कैसे रहेगी हमारे बिना! उसे भी ले लेते साथ।"
"उसे मम्मी संभाल लेंगीं, अब तक भी तो वही संभालती रही हैं न, तुम फिक्र मत करो।" कहकर सुहास ने उर्मी को चुप करा दिया। पर अब तरु की वो विनीत आँखें उर्मी की ममता को झकझोरने लगीं, उसे महसूस हुआ जैसे सिर्फ तरु ही नहीं वह भी उसके बिना नहीं रह पाएगी। वह कपड़े ज्यों के त्यों छोड़ कमरे से बाहर आ गई पर हॉल में सुहास नहीं मिला तो मम्मी जी के कमरे में चली गई।
"मम्मी जी आप समझाइए न उन्हें कि तरु को भी ले चलें, वो रो रही है, मैं उसे ऐसे छोड़कर नहीं जा सकती।" कहती हुई उर्मी ने कमरे में प्रवेश किया।
"बच्ची है, अभी तुम्हें देखकर जिद कर रही है क्योंकि उसे उम्मीद है कि उसकी जिद तुम मान लोगी पर तुम्हारे जाने के बाद शांत हो जाएगी, वहाँ भी बच्ची को संभालती रहोगी तो क्या फायदा होगा तुम्हारे जाने का।" यशोदा देवी ने उसे समझाया।
"पर मम्मी जी मेरा भी कहाँ उसके बिना मन लगेगा, दो दिन ये ऑफिस के काम में व्यस्त रहेंगे और मैं अकेली होटल के कमरे में बोर हूँगी, तरु होगी तो उसके साथ घूम-फिर कर मन लग जाएगा। प्लीज आप समझाइए या फिर मना कर दीजिए हम कभी और चले जाएँगे।"
यशोदा देवी समझ गई थीं कि उर्मी तरु के बिना जाना नहीं चाहती, अतः जब सुहास अपनी बेटी को बहलाकर घर वापस आया तब तक तीन लोगों के कपड़े सूटकेस में रखे जा चुके थे।
तरु खुशी से पूरे घर में चहक रही रही थी। सुहास ने मानों दोनों के एकांत में खलल पड़ जाने की प्यार भरी शिकायत आँखों ही आँखों में की हो उर्मी से। तरु की खुशी से पूरे घर में खुशी थिरक रही थी सभी के होठों पर मुस्कान थी।
अचानक रसोई में काम करती उर्मी की इंद्रियाँ सतर्क हो उठीं जैसे ही उसे तरु की आवाज सुनाई पड़ी..
"दादी सौतेली क्या होता है, क्या मेरी मम्मी सौतेली हैं?" तरु हॉल में यशोदा देवी से पूछ रही थी। उस मासूम को कहाँ पता था कि उसके इस शब्द से किसी की ममता छलनी हो सकती है, उसे तो जब उसके दिल में अंकित माँ की छवि पर, उसके अस्तित्व पर यह शब्द प्रहार करता प्रतीत हुआ, तो उसने सही जवाब पाने की उम्मीद में पूछ लिया।
"तुमसे किसने कहा यह, कहाँ से सीखती हो यह सब?" यशोदा देवी झिड़कती हुई बोलीं।
"मैं नहीं सीखती वो अंशुल भैया और पिंकी दीदी कह रहे थे उस दिन।" उसने मासूमियत से सफाई दी।
"क्या कह रहे थे वो?"
"वो कह रहे थे कि मेरी मम्मी सौतेली है, मैंने पूछा सौतेली क्या होती है? तो कहने लगे कि बुरी मम्मी को सौतेली कहते हैं, वो कभी प्यार नहीं करती और हमारी असली मम्मी भी नहीं होती। मेरी मम्मी तो बुरी नहीं है ना दादी, फिर वो तो सौतेली भी नहीं है...है ना?" तरु तो जैसे अपने ही भीतर के द्वंद्व से छुटकारा पाना चाहती थी।
"मेरी गुड़िया तुझे तेरी मम्मी कैसी लगती है?" यशोदा देवी ने पूछा।
"बहुत अच्छी, वो तो मुझे कितना प्यार करती हैं, पापा मना कर रहे थे फिरभी मम्मी मुझे अपने साथ लेकर भी जा रही हैं।" उसने मासूमियत से कहा।
"फिर तू खुद ही सोच वो सौतेली कैसे हो सकती है। जो लोग ऐसा कहें उनसे बोल दिया कर कि मेरी मम्मी तो बहुत अच्छी है, उससे अच्छी मम्मी तो मुझे मिल भी नहीं सकती। अंशुल और पिंकी को तो मैं डाँट लगाऊँगी, फिर ऐसा कहना भूल जाएँगे।" यशोदा देवी ने उसे समझाते हुए कहा।
उर्मी अपने गालों पर ढुलक आए आँसुओं की बूंदों को पोछते हुए लंबी निश्वास छोड़ते हुए अपने-आप से ही बुदबुदाई..."पता नहीं यह कलंकित शब्द जीवन में कभी पीछा छोड़ेगा भी या नहीं।"
घर के खुशनुमा वातावरण में कुछ पल के लिए नीरवता व्याप्त हो गई थी, यशोदा देवी मन ही मन क्रोध से आग-बबूला हुई जा रही थीं कि उनकी बेटी मेघा ही अपने बच्चों के सामने ऐसी बातें करती होगी, तभी तो बच्चे ऐसा कह रहे थे। वह भीतर ही भीतर अपने क्रोध को पीने की कोशिश कर रही थीं और सोच रही थीं कि सुहास उर्मी और तरु के साथ चला जाय, फिर बात करती हूँ मेघा से।
वह घड़ी भी आई उर्मी ने सास के पैर छूकर आशीर्वाद लिया, सुहास ने माँ को अपना खयाल रखने के लिए कहा, तरु ने चहकते हुए खुशी-खुशी दादी को पप्पी देकर बाय किया। यशोदा देवी ने घर की फिक्र भुलाकर हफ्ते भर आनंदपूर्वक बिताने की सलाह देते हुए अपना ध्यान रखने को कहकर उन्हें विदा किया।

खाली घर उन्हें जैसे काटने को दौड़ने लगा, सुहास ने कहा था कि मेघा दीदी को बुला लेना पर बेटी के प्रति उनका क्रोध उन्हें ऐसा करने से रोक रहा था। उन्हें नहीं पता था कि उर्मी के कहने पर सुहास ने पहले ही मेघा को फोन करके माँ के पास रहने के लिए कह दिया था, इसलिए थोड़ी ही देर में मेघा का फोन आया कि वह कल बच्चों के साथ आ रही है।
ये पूरा सप्ताह मेघा अंशुल और पिंकी के साथ खुशी-खुशी बीत गया। यशोदा देवी ने बेटी को प्यार से समझाया भी कि बच्चों के सामने कभी उर्मी के लिए 'सौतेली' शब्द का प्रयोग न करे, अपनी बहू की तारीफ करते हुए उसके लिए मन में किसी भी दुर्भावना को न रखने की सलाह भी दी। "ठीक है बाबा गलती हो गई, अब नहीं कहूँगी तुम्हारी बहू के लिए कुछ भी। वैसे वो है भी अच्छी, ये मैं भी मानती हूँ पहले थोड़ा डर था पर अब नहीं है।" कहते हुए मेघा ने बात खत्म कर दी। सुहास उर्मी और तरु के साथ वापस आ गया। उर्मी सभी के लिए कुछ न कुछ लाई थी। मेघा भी उससे मन ही मन खुश थी पर न जाने क्यों उसके समक्ष उसकी तारीफ करने से उसका अहंकार आहत हो रहा था। सुहास के वापस आने के अगले दिन ही मेघा और बच्चे अपने घर चले गए।

"जल्दी जा बहू स्कूल की छुट्टी हो चुकी होगी वहाँ किसी को न पाकर बच्ची घबरा जाएगी।" यशोदा देवी उर्मी के हाथ से चाय लेते हुए बोलीं।
"जी मम्मी जी जा रही हूँ, मैं रिक्शा ले लूँगी आप चिंता मत कीजिए।" कहती हुई वह जल्दी-जल्दी पैरों में घर की चप्पल डालकर तरु को स्कूल से लाने के लिए चल दी।
आज तरु को लाने के लिए ज्यों ही यशोदा देवी घर से निकल रही थीं तभी पड़ोस की वसुंधरा आंटी और उनकी एक और सखी यशोदा देवी से मिलने आ गईं तो उन्हें रुकना पड़ा, उर्मी उनके लिए चाय बनाने लगी इसलिए वह भी समय से न जा सकी। अब तक तो स्कूल की छुट्टी भी हो चुकी होगी, कम से कम पंद्रह-बीस मिनट का पैदल का रास्ता है, आज तो कोई ऑटो रिक्शा भी नहीं मिल रहा। वह लगभग भागती हुई सी जा रही थी, न जाने क्यों उसे घबराहट होने लगी, तरु रो रही होगी.... छोटी बच्ची है... किसी को वहाँ न पाकर घबरा जाएगी, कहीं अकेली ही न आने लगे....हे भगवान! फिर तो उसे रास्ता भी नहीं पता... खो गई तो... ऐसे न जाने कितने ही उल्टे सीधे खयाल उसके मन में आ रहे थे। वह इतनी तेज-तेज चल रही थी कि हाँफने लगी, जल्दबाजी में मोटरसाइकिल से टक्कर होते-होते बची.."देखकर नहीं चल सकती, मरने के लिए मेरी ही बाइक मिली।" चालक बोला।
स्सॉरी, कहकर वह फिर उसी तेजी से चल पड़ी तभी उसे उसे एक साइकिल रिक्शा वाला दिखाई दिया उसने उसे चलने के लिए पूछा तो उसने उल्टी दिशा में न जाने की इच्छा जाहिर करते हुए दुगना किराया माँगा। मुँहमाँगे पैसे देकर वह रिक्शे से स्कूल पहुँची।
उसे तरु कहीं नजर नहीं आई, लगभग सभी बच्चे जा चुके थे बस दो-चार बच्चे ही खड़े थे वहाँ। दरबान से पूछा तो उसने भी अनभिज्ञता जताई, अध्यापिका को भी कुछ पता नहीं था। उर्मी को रोना आ गया, अब कहाँ ढूढ़ूँ मैं अपनी बच्ची को...कहीं वह अकेली ही तो नहीं चली गई? उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसने सुहास को फोन किया, फिर अपनी सास को रोते-रोते सारी बात बताई। मुहल्ले में यह बात फैल गई, स्कूल से घर तक जाने के सभी रास्ते खोज डाले, पर तरु कहीं नहीं मिली। उर्मी बदहवास सी हो चुकी थी न जाने क्यों स्वयं को अपराधी समझ रही थी, 'काश मैं समय से पहुँच जाती तो मेरी बच्ची नहीं खोती' यही सोच उसकी सिसकियाँ रुकने नहीं दे रहा था। पुलिस में रिपोर्ट दर्ज हो चुकी थी, पूरी रात बीत गई पर उसका कहीं पता नहीं चला। यशोदा देवी की तबियत खराब हो गई, उन्हें संभालने के लिए मेघा हर पल उनके पास थी। सभी नाते-रिश्तेदार घर पर एकत्र हो चुके थे, सब अपने-अपने तरीके से खोज रहे थे पर उसका कहीं पता नहीं चल पा रहा था।
कब रात बीती कब सूरज निकला और कब सुबह के दस बज गए किसी को इसका होश नहीं, अपनी माँ के कहने से उर्मी दवाई लेकर यशोदा देवी के पास गई.."मम्मी जी दवाई ले लीजिए।" उसके इतना बोलते ही मेघा ने हाथ से पानी का गिलास झटके से ले लिया और उसी तेजी से दूसरे हाथ से दवाई ले ली। उसका यह बदला हुआ रवैया और उसे देखकर भी यशोदा देवी का कुछ न कहना उर्मी को भीतर तक हिला गया। उसे अब सभी का बर्ताव बदला-बदला सा लग रहा था। सभी की नजरें उसे शक की निगाह से देख रही थीं, अब उसे महसूस हुआ कि रात से ही सुहास ने भी उससे बात नहीं की है। कल तक उसपर प्यार लुटाने वाला परिवार आज पराया लग रहा था।
वापस कमरे में आकर माँ से लिपट कर वह फूट-फूटकर रो पड़ी।
"चुप हो जा बेटा हिम्मत रख बच्ची मिल जाएगी।" माँ से उसे ढाढ़स बँधाने का प्रयास किया।
"माँ मेरी बच्ची को कुछ हुआ तो मैं मर जाऊँगी, मैं नहीं रह सकती उसके बिना।" रोते हुए उर्मी बोली। किसी के पास कोई जवाब नहीं था, तभी फोन की घंटी बज उठी वह हॉल की ओर दौड़ पड़ी। सभी को इंतजार था कि अगर किसी ने किडनैप किया है तो फोन अवश्य करेगा पर माँ का हृदय न जाने कितनी आशंकाओं से घिरा हुआ था। सब इंस्पेक्टर की ओर देख रहे थे कि फोन उठाएँ या नहीं पर तभी बेतहाशा भागती हुई आई उर्मी ने फोन उठा लिया।
ह् हैलो..
फोन टैप कर रहे इंस्पेक्टर ने उसे देर तक बात करने का संकेत किया।
उधर से आवाज आई "तुम्हारी बेटी मेरे पास है।"
प्लीज मेरी बेटी को छोड़ दो, क्या चाहिए तुम्हें बताओ मैं...मैं...तुम्हें वो सब दूँगी...प्लीज मेरी गुड़िया को छोड़ दो...कहती हुई उर्मी फूट-फूटकर रो पड़ी।
सुहास ने उसके हाथ से फोन ले लिया, हैलो...उसके इतना बोलते ही दूसरी तरफ से फोन कट गया।
"किडनैपर बहुत चालाक है, उसने जल्दी फोट काट दिया ताकि लोकेशन ट्रैक न हो सके।" इंस्पेक्टर ने कहा।
सुहास उर्मी की ओर देखने लगा, फिर न जाने क्या सोचकर उसे पकड़कर अपने कमरे में ले गया और बेड पर बैठाते हुए कहा-
"मम्मी की तबियत पहले ही खराब हो चुकी है, अब तुम अपनी तबियत भी खराब मत कर लेना। संभालो अपने-आपको, सभी कोशिश कर रहे हैं, उम्मीद रखो कुछ नहीं होगा मेरी बेटी को।"
अचानक उर्मी को मानो किसी ने जोर से थप्पड़ मारा हो...."आपकी बेटी....सुहास! क्या वो मेरी बेटी नहीं है?"
"म्मेरा मतलब यही था।" कहकर वह बाहर जाने लगा।
"मुझसे क्या गलती हो गई सुहास, क्यों सबकी नज़रें बदल गईं? मेरी भी तो बेटी किडनैप हुई है।" वह रोते हुए बोली पर सुहास बिना कुछ जवाब दिए चला गया।
अचानक उर्मी की छठी इंद्री जागृत हो उठी, उसके फोन उठाते ही किडनैपर को कैसे पता चला कि उसी की बेटी को उसने किडनैप किया है? उसकी आवाज भी कुछ जानी-पहचानी सी लग रही थी। उर्मी अब कोशिश करने लगी उस आवाज को पहचानने की कि कहाँ सुनी है उसने यह आवाज? पर उसे कुछ याद नहीं आ रहा था।
दिन बीतता जा रहा था पर तरु का कोई पता नहीं चल पा रहा था। एक बार और फोन आया तब किडनैपर ने पचास लाख की माँग की पर जगह बताने से पहले ही फोन रख दिया क्योंकि वह अधिक देर तक बात नहीं करना चाहता था।
शाम के सात बज रहे थे अचानक मेघा की आवाज सुनकर सुहास चौंक पड़ा, वह बोल रही थी "पूरे घर में देख लिया बाथरूम में भी देख लिए पर वो कहीं नहीं है, अब क्या उसे भी ढूढ़ें।"
"कौन नहीं है दीदी, किसकी बात कर रही हो?" सुहास ने पूछा।
"तुम्हारी पत्नी की, उर्मी बिना बताए पता नहीं कहाँ चली गई है, यहाँ तक कि अपनी माँ को भी नहीं बताया।" मेघा बिफरती हुई बोली।
"गई होगी कहीं आ जाएगी।" कहकर सुहास किसी को फोन करने में व्यस्त हो गया, उसे पचास लाख का इंतजाम जो करना था।
सुहास ने फोन काटा तो देखा उर्मी के दो मिसकॉल आए हुए थे। उसने कॉल बैक किया.. हैलो.. दूसरी ओर से किसी पुरुष की आवाज सुनकर सुहास किसी अनहोनी के भय से काँप उठा।
ह्हलो..उसने कहा।
मैं इंस्पेक्टर भुवन सिंह बोल रहा हूँ, क्या मेरी बात सुहास जी से हो रही है?"
"ज् जी मैं सुहास बोल रहा हूँ।"
"मिस्टर आपकी पत्नी उर्मी सिटी हॉस्पिटल में हैं, आप शीघ्र आ जाएँ उनकी हालत गंभीर है।"
सुहास के हाथ से फोन छूट गया, पैर लड़खड़ा गए तो उसके जीजा ने तुरंत उसे संभाल कर सोफे पर बैठाया। उसने अभी फोन पर हुई सारी बात बताई और मेघा और उसके पति को घर पर इंस्पेक्टर के साथ छोड़कर उर्मी के मम्मी-पापा और रिश्ते के भाई के साथ सुहास हॉस्पिटल पहुँचा। आई. सी. यू. की ओर बढ़ते हुए सुहास के पैर काँप रहे थे, अचानक उसके पैर जहाँ के तहाँ जम गए आई. सी. यू. के सामने बेंच पर बैठी तरु सुबक रही थी, उसे देखते ही दौड़कर लिपट गई और जोर-जोर से रोने लगी।
"पापा मम्मी को कुछ होगा तो नहीं..प्लीज डॉक्टर साहब से बोलो उनको जल्दी से ठीक करने को।" सुबकियाँ लेती हुई तरु बोली।
"कुछ नहीं होगा तुम्हारी मम्मी को।" कहते हुए सुहास ने उसे उर्मी की माँ की गोद में दे दिया और इंस्पेक्टर से बात करने लगा। अंदर डॉक्टर ऑपरेशन करके उर्मी का रक्तस्राव रोकने का प्रयास कर रहे थे।
इंस्पेक्टर ने सुहास और उर्मी के माता-पिता को सारा वृत्तांत बताया। उसने बताया कि उर्मी को फोन पर आवाज जानी-पहचानी लगी तो मस्तिष्क पर जोर देने के बाद उसका शक उसके ही पड़ोस में रहने वाली प्रभावती ताई के किराएदार इमरान पर गया, जो उनके मायके का ही था और उन्हें बुआ कहता था। तभी उर्मी चुपचाप बिना किसी को बताए अपने मायके गई पर उसने इंस्पेक्टर भुवन को फोन करके सारी बात बता दी थी और उनसे मदद माँगी। उसका मायका इंस्पेक्टर भुवन के कार्यक्षेत्र में ही आता था अतः उन्होंने भी मदद करने का आश्वासन दिया। उर्मी अपने घर की पहली मंजिल के कमरे की खिड़की से चुपचाप इमरान पर नजर रख रही थी। जब वह घर से बाहर गया तो उसने इंस्पेक्टर भुवन को फोन करके बता दिया और इंस्पेक्टर उसका पीछा करने लगा। इधर उर्मी चुपचाप ताई के घर में गई और इमरान के कमरे के दरवाजे की झिरी से भीतर कमरे में झाँककर देखने लगी पर उसे कुछ नजर नहीं आया, फिर वह ताई के घर के अन्य कमरों में देखने का प्रयास करने लगी, उसने सोचा कि हो सकता है कि उसने तरु को यहाँ छिपाया हो, क्योंकि मम्मी बता रही थीं कि प्रभावती ताई इस समय पूरे परिवार के साथ वैष्णों देवी दर्शन के लिए गई हैं, तभी उसे स्टोर रूम में कुछ खटपट की आवाज आई वह उसी ओर गई, दरवाजे में बाहर से ताला था, अंदर अंधेरा था उसने दरवाजे को धीरे से खटखटाया। अंदर से कोई आवाज नहीं आई वह वापस जाने लगी, तभी कुछ गिरने की आवाज आई वह झटके से मुड़ी और आवाज दी..तरु.. उसे लगा अंदर कोई है। भय के कारण उसके हाथ पैर काँपने लगे। साहस करके उसने इंस्पेक्टर भुवन को फोन करके सब बताकर वहाँ आने के लिए कहा और खुद बाहर से एक ईंट का टुकड़ा लाकर ताला तोड़ने लगी। बहुत कोशिश के बाद वह ताला तोड़ने में कामयाब हुई, जैसे ही दरवाजा खोला उसके पैरों तले धरती खिसक गई। सामने कुर्सी पर तरु बंधी हुई थी, मुँह में कपड़ा ठूँस कर बाँधा हुआ था, दोनों हाथ कुर्सी के हत्थों से तथा पैर कुर्सी के पैरों से बाँधा हुआ था, आँखों से आँसू की धार बह रही थी, पूरा चेहरा ही नहीं बाल भी पसीने से लथपथ हो रहे थे। उसे देखकर छूटने के प्रयास में किए गए उसके संघर्षों का पता चल रहा था, उस नन्हीं सी जान ने कुर्सी समेत खिसक कर सामान गिराकर अपने वहाँ होने की सूचना देने की कोशिश में कितनी जद्दोजहद की होगी, इसका अनुमान उसके आसपास की स्थिति देखकर लगाया जा सकता था।
उसकी दयनीय दशा देख उर्मी का खून खौल उठा, उसने जल्दी-जल्दी उसे खोला और सीने से लगा लिया। रो-रोकर तरु की सिसकियाँ बंध गई थीं। वह कुछ बोल नहीं पा रही थी बस माँ से ऐसे चिपकी हुई थी, जैसे उसे भय हो कि कोई उसे खींचकर अलग न कर दे। तभी उन्हें बाहर बाइक रुकने की आवाज सुनाई दी। उर्मी समझ गई कि इंस्पेक्टर भुवन आ चुके हैं।
वह तरु को लेकर बाहर आई और सामने इमरान को देख उसके पैर जहाँ थे वहीं जम गए, उसके हाथ-पैर कांपने लगे, वह समझ नहीं पा रही थी कि क्यों? क्रोध की अधिकता से या तरु के किसी अहित के भय से।
"ये तूने ठीक नहीं किया उर्मी, इसे यहीं छोड़ दे नहीं तो.."
"नहीं तो क्या?" उर्मी दहाड़ी, अचानक ही उसमें न जाने कहाँ से इतना साहस आ गया था कि उसने सोच लिया कि वह इसे नहीं छोड़ेगी।
उधर इमरान की आवाज सुनती ही तरु ने उर्मी को और जोर से जकड़ लिया।
"देख मुझे सिर्फ पैसे चाहिए, जब तक पैसे नहीं आ जाते मैं तुम दोनों को यहाँ से नहीं जाने दूँगा।" कहते हुए वह उर्मी की ओर बढ़ा।
"वहीं रुक जा इमरान, वर्ना तेरे लिए ठीक नहीं होगा, पैसे तो तू भूल ही जा, अगर खुद को बचाना है तो यहाँ से भाग जा।" उर्मी उसे चेतावनी देकर मुख्य गेट की ओर बढ़ गई पर  वह कहाँ मानने वाला था, उसने वहीं पड़ा लोहे का रॉड उठा कर उर्मी के सिर पर दे मारा, वह चीख कर वहीं गिर गई, वह दुबारा उस पर प्रहार करने जा ही रहा था तभी इंस्पेक्टर भुवन ने गोली चला दी जो उसके कंधे में लगी।
इंस्पेक्टर ने उसे गिरफ्तार करके दोनों को हॉस्पिटल पहुँचाया।
सुहास की आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे, 'भगवान मेरी उर्मी को बचा लो, मेरी बच्ची को दुबारा बिन माँ की मत करना।' ऊपर देखता हुआ मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करने लगा। उर्मी के पापा ने फोन करके घर पर तरु के मिलने की खबर दे दी। यशोदा देवी की तबियत मानों ईश्वरीय चमत्कार से ठीक हो गया, वह अस्पताल पहुँचीं। ऑपरेशन सफल हुआ, उर्मी अब खतरे से बाहर थी। यशोदा देवी, मेघा, सुहास और उर्मी के मम्मी-पापा सभी उसके सामने थे। तरु उसके पास ही खड़ी थी। सबकी आँखों में पश्चाताप के आँसू थे।
"मुझे माफ कर दो उर्मी, मैं शायद कभी तुम्हें मन से अपना ही नहीं पाई थी, हमेशा तुम्हारे कामों में कमियाँ ढूँढ़कर तुम्हें सौतेली साबित करने की कोशिश की, पर तुमने हमेशा मुझे गलत सिद्ध किया। इसबार तो मैंने हद ही कर दी, एक माँ होकर तुम्हारी ममता नहीं समझ सकी।"
"यही क्यों हम सभी तुम्हारे अपराधी हैं बहू, हमने भी तुम्हारा दुख नहीं समझा और तुमसे नजरें फेर लीं।" यशोदा देवी की आँखों से पश्चाताप की दो बूंदें ढुलककर उर्मी के हाथ पर गिरीं तो वह बोल पड़ी, "आप लोग मुझसे बड़े हैं, माफी माँगकर शर्मिंदा न करें।" कहते हुए उसकी नजर सुहास की ओर उठी, वह दोनों हाथों से कान पकड़े किसी मासूम बच्चे सा खड़ा था। उसको ऐसे देख उर्मी को हँसी आ गई। आज उसकी इस हँसी पर सभी निहाल हो रहे थे। सभी के दिलों पर जमी भ्रम की काई आज साफ हो चुकी थी।

© मालती मिश्रा 'मयंती'✍️