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Sunday, 7 February 2016

राजनीति का शस्त्र-'धार्मिक असहिष्णुता'

   
  हमारे देश ने आज विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में बहुत उन्नति हासिल किया है....परंतु इन क्षेत्रों की उपलब्धियाँ लोगों तक पहुँचते-पहुँचते बहुत समय लग जाता है और फिरभी बहुत बड़ी संख्या में लोग इन उपलब्धियों से अनजान ही रह जाते हैं |किंतु भारत में बिना किसी विशेष तकनीकी ज्ञान के एक और बहुत ही प्रभावी और बहुत दूर तक की मारक क्षमता रखने वाले शस्त्र का निर्माण हुआ है, जो है-धार्मिक असहिष्णुता... जी हाँ इस शस्त्र के लिए किसी तकनीकी ज्ञान की नहीं बल्कि लोगों की भावनाओं की और उनकी कमजोरियों को पहचानने की क्षमता होनी चाहिए, एक ही घर के सदस्यों को आपस में लड़ाना आना चाहिए और लोगों की भावनाओं को भड़काने के लिए भीड़ जुटाने की क्षमता होनी चाहिए....और खुशकिस्मती से हमारे देश के राजनीतिज्ञ इन कलाओं में पारंगत हैं उनके पास चाहे तकनीकी ज्ञान का अभाव कम हो या न हो पर भाई को भाई से सास को बहू से पिता को पुत्र से कैसे लड़ाया जाए इसका अनुभव भरपूर है...
यही कारण है कि देश के वो लोग जिन्हें सहिष्णुता अर्थ भी पता नहीं होगा वो भी भीड़ का हिस्सा बनकर धार्मिक असहिष्णुता का राग अलापने लगते हैं.....
पहले इस देश के लोग एक-दूसरे के धर्मों का एक-दूसरे की भावनाओं का आदर करते थे परंतु धीरे-धीरे ये मान्यताएँ दम तोड़ती दिखाई पड़ने लगी हैं, जनता किसी धर्म से बैर नहीं रखती किंतु यदि कहीं आपसी शत्रुता के कारण कोई दुर्घटना हो जाती है तो राजनीतिक पार्टियाँ और उनका समर्थन करने वाले मीडिया चैनल उस दुर्घटना को धर्म-जातीयता का रूप देकर इस प्रकार पेश करते हैं जो देखने-सुनने वालों को ऐसा लगता है कि निःसंदेह दुर्घटना का कारण धार्मिक ही रहा होगा...और राजनीतिक पार्टियाँ ऐसी दुर्घटनाओं को खोज-खोज कर किसी एक ही वर्ग का इतना अधिक समर्थन व सहयोग करती हुई दिखाई देती हैं कि दूसरा वर्ग न चाहते हुए भी स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगे और उस अमुक वर्ग से घृणा करने लगे...तथा अमुक वर्ग भी ऐसा सोचने पर विवश हो जाता है कि शायद सचमुच ही वह निम्न वर्ग या अल्प संख्यक होने के कारण उपेक्षा का शिकार है इसीलिए तो समाज का एक जागरूक और बुद्धिजीवी वर्ग उसके लिए चिंतित है और उसके लिए आंदोलन व धरना आदि कर रहा है| 
परिणामस्वरूप समाज का एक वर्ग दूसरे वर्ग से कट जाता है और दोनों ही वर्गों की सोच एक ही होती है कि अमुक वर्ग के कारण हम उपेक्षित हो रहे हैं, जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल भिन्न होती है उदाहरण के तौर पर अभी हाल ही की घटना रोहित वेमुला के आत्महत्या की ही ले लो....उसने आत्महत्या की उसे किसी ने नहीं मारा, यदि सारे आरोपों को सच भी मान लिया जाए तो भी आत्महत्या का कोई कारण नहीं बनता उसे अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए था... चलिए आत्महत्या भी कर लिया तो भी यह समाज की पहली दुर्घटना नहीं थी ऐसी दुर्घटनाएँ उच्च वर्ग के लोगों के साथ भी होती हैं परंतु उनके लिए कभी इतनी राजनीतिक अफरा-तफरी नहीं देखी.....रोहित वेमुला के पिता उसके दलित होने से इनकार कर रहे हैं और हमारे आदरणीय नेतागण जबरदस्ती उसे दलित बनाकर राजनीति करने आंदोलन करने पर आमादा हैं, परिणाम ये हुआ कि जो समाज रोहित के परिवार से हमदर्दी रखता, उनके दुख में दुखी होता वो समाज राजनीति का शिकार होकर सिर्फ गलत और सही का विश्लेषण करने में व्यस्त हो गया और दुख-सुख महसूस करने का भाव समाप्त हो गया.....जो समाज पहले यह कहता था कि दलित वर्ग हो या अल्प संख्यक सभी को समानता का दर्जा मिलना चाहिए वही समाज आज राजनीति के चलते इन वर्गों से दूरी बनाए रखने में ही अपने वर्ग का सम्मान समझता है | वहीं दूसरी ओर दलित वर्ग या अल्पसंख्यक वर्ग को भी कहीं न कहीं ऐसा लगने लगा है कि उन्हें दलित या अल्प बने रहने में ही फायदा है या उनकी आत्महत्या उन्हें राजनीतिक फायदा दिला सकती है....
इन सबसे जो परिणाम निकल कर सामने आता है वो बस यही कि जो राजनीतिक पार्टियाँ इस प्रकार के हथकंडे अपनाती हैं उनको तो राजनीतिक लाभ मिल जाता है परंतु समाज जिन ऊँच-नीच रूपी धारणाओं से सदियों से लड़ता रहा है उन धारणाओं का विकास पुनः शुरू हो गया है.....बल्कि मुझे कहते हुए खुशी हो रही है कि इस प्रकार की भावनाओं या ये कहूँ की इस प्रकार की राजनीति का असर अभी गाँवों में काफी हद तक कम है और कारण सिर्फ ये है कि गाँवों के लोग बिकाऊ मीडिया चैनलों के प्रभाव से अभी दूर हैं.......
अर्थात् यदि हमें इस धार्मिक असहिष्णुता नामक शस्त्र का तोड़ चाहिए तो हमें स्वयं को जागरूक बनाना होगा तथा आजकल के बिकाऊ मीडिया और स्वार्थी राजनेताओं के प्रभाव से दूर रहना चाहिए....
ऐसी अफवाहों से इनकी जन्मदाता राजनीतिक पार्टियों को तो फायदा पहुँचाया है उनका मकसद तो पूरा हो गया परंतु देश का क्या भला हुआ ? क्या देश फिर से नहीं कई वर्गों-धर्मों में बँटने लगा है? क्या हमनें यही चाहा था? 

साभार.....मालती मिश्रा

10 comments:

  1. सही लिखा आपनें।संकीर्ण भावनायें जब तक हमारे उपर हावी रहेगीं तब तक समाज का सच्चा विकास सम्भव नहीं है।

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  2. सही लिखा आपनें।संकीर्ण भावनायें जब तक हमारे उपर हावी रहेगीं तब तक समाज का सच्चा विकास सम्भव नहीं है।

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  3. धन्यवाद आपका राजेश जी ब्लॉग पर आने और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराने के लिए

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  4. धन्यवाद आपका राजेश जी ब्लॉग पर आने और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराने के लिए

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  5. राजनीतिक पार्टियो को अपना उल्लू सीधा करना होता हैं बस|

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  6. सत्य कहा अजय जी आपने, ब्लॉग पर आने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद

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  7. सत्य कहा अजय जी आपने, ब्लॉग पर आने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद

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  8. राजनीती ने कई हथियार बनाए है
    दुश्मन एक दूजे के,कई यार बनाए है
    एक वाकया नहीं, कई बार बनाए है
    समझते है सब कुछ कर न पाए है
    समय आ गया है की अब न डरे
    जो ज़ख्म मिले है उनमें प्यार भरें
    करें थोडा प्रयास ख़त्म को बकवास
    हम पहले भी एसा कर पाये है
    -----शिवराज----
    मालती जी आप ने बहुत ही सुन्दर और प्रासंगिक लिखाहै
    आप को बहुत बधाई ।

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  9. राजनीती ने कई हथियार बनाए है
    दुश्मन एक दूजे के,कई यार बनाए है
    एक वाकया नहीं, कई बार बनाए है
    समझते है सब कुछ कर न पाए है
    समय आ गया है की अब न डरे
    जो ज़ख्म मिले है उनमें प्यार भरें
    करें थोडा प्रयास ख़त्म को बकवास
    हम पहले भी एसा कर पाये है
    -----शिवराज----
    मालती जी आप ने बहुत ही सुन्दर और प्रासंगिक लिखाहै
    आप को बहुत बधाई ।

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  10. आपकी इस सुंदर प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत आभार शिवराज जी

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