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Tuesday, 31 May 2016

राजनीति के अच्छे दिन

   शहंशाह क्या होता है? कौन होता है? क्या आज के समय में कोई शहंशाह हो सकता है?
ये कोई ऐसे प्रश्न नहीं जिनके जवाब हमें न पता हो, परंतु राजनीति के क्षेत्र में इस शब्द का बार-बार प्रयोग इस प्रकार किया जाना जैसे कि ये जिसे शहंशाह कह देंगे उसे जनता विलेन मानने लगेगी, इनकी संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है। कह भी कौन रहा जिसने स्वयं को हमेशा भारत का सर्वेसर्वा समझा जो आज भी पूरे देश पर अपनी बपौती समझते हैं और कोई उनकी कमजोर नब्ज पर उँगली रख दे तो उन्हें अपना अधिकार खतरे में नजर आने लगता है। जिन्होंने पूरे देश में अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए इमारतों, सड़कों, योजनाओं, पुरस्कारों सब पर अपना आधिपत्य दर्शाने हेतु उन्हें अपना ही नाम दे दिया। 
मोदी जी ने तो कभी नहीं कहा कि वह शहंशाह हैं, वह तो स्वयं को प्रधानमंत्री भी नहीं कहते बल्कि प्रधान सेवक कहते हैं अब यदि उनकी छवि से प्रभावित लोग ही उन्हें शहंशाह का दर्जा दे दें तो वो क्या करें। 
किसी नेता ने गलत बयान दे दिया तो मोदी जी दोषी, कहीं दो लोग आपसी दुश्मनी में लड़ पड़ें और उनमें कोई एक दलित निकला तो मोदी दलित विरोधी, कहीं कोई भी लूट-पाट या अन्य कोई अपराध हो तो मोदी जी क्या कर रहे, आपसी झगड़े या एक्सीडेंटली कोई मुस्लिम को नुकसान पहुँचा तो मोदी जी असहिष्णु, मोदी जी यदि सीमावर्ती देशों के मसले बातचीत से हल करने की कोशिश करें तो वो अपराधी न करें तो अभिमानी। ऐसा प्रतीत होता है कि आज की पूरी राजनीति देशहित के लिए है ही नहीं बल्कि मोदी जी के आस-पास घूम रही है मोदी जी को कैसे घेरें, कैसे दोषारोपण करें, कैसे उनकी छवि धूमिल करें आदि-आदि। 
यदि किसी के अस्तित्व पर दाग लगता है तो उस दाग को साफ करना चाहिए न कि ये देखो कि अपना दाग किसी और के दामन पर कैसे मलें, अभी यही हो रहा है बाड्रा की जाँच की माँग क्या हुई सोनिया गाँधी तिलमिला कर मोदी जी को कहने लगीं कि वो शहंशाह नहीं। जबकि यदि आप बेदाग हैं तो आपको तो जाँच का समर्थन करना चाहिए, आप भी तो यही कह रही हैं कि जाँच करवा लो तो मोदी जी बीच में कहाँ से आ गए उन्होंने बिना जाँच अपना फैसला सुना दिया क्या?
यही हाल दिल्ली सरकार का है इतने समय में आज तक अपने महिमामंडन के अलावा कुछ नहीं किया सिवाय प्रधानमंत्री की कमियाँ गिनवाने के, प्रधानमंत्री की डिग्री को नकली साबित करने में जितनी ऊर्जा लगाई यदि उतनी ही राज्य के हितार्थ कुछ काम करने में लगाते तो दिल्ली का कुछ भला होता। परंतु ऐसा तब होता जब उद्देश्य सकारात्मक होता। ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्यमंत्री बने ही सिर्फ इसलिए हैं कि बार-बार कोर्ट में शिकायतें करें और खुद तो कुछ करना नहीं दूसरों की आलोचना और फिल्मों की समीक्षा कर सकें और हाँ घोटालों मे रिकॉर्ड कायम कर सकें।
कौन कहता राजनीति लोगों को सिर्फ तोड़ती है आज देख लीजिए राजनीति दो विरोधियों को भी मित्र और रिश्तेदार बना रही है, माननीय प्रधानमंत्री को हराने के उद्देश्य से ही सही किंतु सभी विरोधी पार्टियाँ एक-दूसरे की सहयोगी बन गई हैं। अब राजनीति के लिए इससे अच्छे दिन और क्या हो सकते हैं कि जनता के समक्ष  एक साथ सभी के मुखौटों से शराफ़त का नकाब हटेगा। 

मालती मिश्रा

Wednesday, 25 May 2016

बेटी क्यों होती है पराई....

बापू की लाडो मैं थी 
पली बड़ी नाजों में थी
क्यों विधना ने रीत बनाई 
बेटी क्यों होती है पराई
ससुर में देखूँ छवि पिता की
बाबुल तुमने यही समझाया
पिता ससुर ने सालों से 
मुझको परदे में ही छिपाया
क्या मेरी शक्लो-सूरत बुरी है 
जो मेरी किस्मत पल्लू से जुड़ी है 
या मेरी वाणी में कटुता है 
जो मुख खोलने पर प्रतिबंध लगा है 
क्यों मैं स्वेच्छा से हँस नहीं सकती
क्यों स्वतंत्र हो जी नही सकती
बाबुल तुमने कभी न रोका
पर ससुर में वो भाव कभी न देखा
ननद के सिर पर हाथ फेरती
सासू माँ जब भी दिख जाएँ
माँ तेरे आँचल की ममता
उस पल मुझको बहुत रुलाए
कातर अँखियाँ तकती रहती हैं
अनजाने ही आस लगाए,
सासू माँ की ममता की कुछ बूँदें
काश मुझ पर भी बरस जाए।।।
मालती मिश्रा

Monday, 23 May 2016

इतिहास को परदे से निकालो सही आयाम भी दो

'इतिहास को इतिहास ही रहने दो नया आयाम न दो' जी हाँ जिस तरह 'गुड़गाँव' का नाम बदल कर 'गुरुग्राम' और 'औरंगजेब' रोड का नाम बदल कर 'डॉ० कलाम रोड' कर दिया गया तो कुछ लोगों का ऐतराज जताना तो बनता है, भई बड़े प्यार से इन नामों को वर्षों से पोषित किया गया था और अचानक आकर कोई गैर लुटियंस सरकार इन्हें बदल दे!!! घोर अन्याय है, एक तो सत्ता हाथ से जाने का दर्द और उस पर नश्तर चलाने का काम ये नाम परिवर्तन की प्रक्रिया से हो रहा है। 
खैर ये तो रही कटाक्ष की बात अब आते है सत्य पर....
अभी हाल ही में जनरल वी० के० सिंह ने 'अकबर' रोड का नाम बदल कर 'महाराणा प्रताप' रोड करने की माँग की है, इस बात से ही कांग्रेसियों में अच्छी खासी खलबली और विरोध का वातावरण है, फिर ऋषि कपूर के ट्वीट (जिसमें उन्होंने गाँधी परिवार को आइना दिखा दिया है) ने आग में घी डालने का काम किया है, विरोधियों के तोते उड़े हुए हैं उन्हें सबकुछ अपने हाथों से फिसलता हुआ महसूस हो रहा है। सचमुच छोटी-छोटी सी बातों, छोटे-छोटे से कार्यों का भी विरोध प्रदर्शन इतने बड़े स्तर पर होना यह दर्शाता है कि इतने सालों में कांग्रेस ने सत्ता में रहकर सिर्फ अपने चापलूसों की फौज बढ़ाई है जो समय आने पर उसके नमक का कर्ज चुका सकें, विपक्ष में भी कांग्रेस का सिर्फ एक ही मकसद है सरकार के विकासोन्मुख कार्यों को बाधित करना, इससे देश का विकास बाधित हो रहा है इस बात से उन्हें कोई लेना देना नहीं। 
ऋषि कपूर जी ने कहा कि देश की संपत्ति और सड़कों  पर किसी एक परिवार की बपौती नहीं तो क्या गलत कहा? सत्य ही तो है जहाँ देखो वहीं गाँधी परिवार के नाम पर सड़कें, इमारतें, अस्पताल, योजनाएँ, पुरस्कार सभी कुछ है, सवाल करने पर ये जवाब मिलता है कि कांग्रेस ने अर्थात् गाँधी परिवार ने देश के लिए बहुत कुर्बानियाँ दी हैं। इसका तात्पर्य तो ये हुआ कि देश को आजाद अकेले गाँधी परिवार ने कराया बाकी सभी शहीदों की शहादत तो नगण्य हो गई। रिटायर्ड मेजर जनरल डी जी बख्शी ने अभी हाल ही में किसी न्यूज चैनल पर एक आंकड़ा दिया 60000 में से 26000 सैनिकों की शहादत का परिणाम है देश की आजादी, फिर ताज किसी एक परिवार के सिर पर क्यों!!!! 
नाम बदलने का विरोध करने वालों का इल्जाम है कि मौजूदा सरकार इतिहास बदलने का प्रयास कर रही है परंतु वह ये क्यों भूल जाते हैं कि इतिहास को गलत पेश करने का कार्य तो उन्होंने ही किया था क्या इतिहास सिर्फ किसी एक परिवार की कहानी कहता है? सरकार का कर्तव्य है कि इतिहास को सत्य और पूरा पेश किया जाए तो देर से ही सही सरकार कर रही है। अभी तक तो राजनीति में चापलूसी ही होती रही है राज्य सरकारें केंद्र में मौजूद कांग्रेस सरकार (गाँधी परिवार) को खुश करने के लिए किसी न किसी गाँधी के नाम पर किसी सड़क या इमारत का नामकरण कर देतीं जैसे मुंबई में ही 'बांद्रा वर्ली सी लिंक' का नाम बदल कर 'राजीव सेतु' कर दिया गया। परंतु उस समय यह सवाल नही उठाया गया कि सरकार का ध्यान कार्य की बजाय नाम परिवर्तन पर क्यों है। यदि नामकरण करना ही है और ऐसे लोगों के नाम पर करना है जिनका योगदान देश के प्रति रहा हो तो गाँधी परिवार से ज्यादा महत्वपूर्ण नाम हैं- सुभाष चंद्र बोस, शहीद भगत सिंह, राजगुरू, लक्ष्मी बाई, महाराणा प्रताप और भी बहुत से, परंतु हर जगह इन्हें नजर अंदाज किया गया। मुंबई में किसी भी महान फिल्मी व्यक्तित्व के नाम पर कुछ भी नहीं है, जबकि कला के क्षेत्र में लता मंगेशकर, रफी, किशोर कुमार जैसे कितने ही ऐसे महान कलाकार हैं जिन्होंने विदेशों में भी हमारे देश का नाम बढ़ाया है। खेल जगत में किसी खिलाड़ी के नाम कोई पुरस्कार नही परंतु 'राजीव गाँधी गोल्ड कप कबड्डी' हो सकता है जैसे राजीव गाँधी ही कबड्डी के जन्मदाता रहे हों। ऐसे-ऐसे लोगों के नाम पर योजनाओं पुरस्कारों के नाम रखे गए जिन्होंने स्वयं के बलबूते पर कुछ भी नहीं किया, जिन्हें विरासत में प्रसिद्धि और चाटुकारिता में उपलब्धि मिल गई। जैसे 'राजीव गाँधी खेल रत्न' 'इंदिरा आवास योजना' 'संजय गाँधी योजना' 'राजीव गाँधी स्पेशलिटी हॉस्पिटल' आदि। 
आजादी के बाद सत्ता कांग्रेस के हाथ में क्या आई बाकी सभी स्वतंत्रता सेनानियों की शहादत उनके योगदान को दरकिनार कर संपूर्ण उपलब्धि एक ही परिवार के नाम कर दिया गया और दशकों से उसी का महिमामंडन होता आ रहा है। 
मेरा प्रश्न महज एक ही है कि इमारतों या सड़कों का नामकरण क्यों होता है? इसलिए कि लोग उस इमारत या सड़क को जानें ? या उस व्यक्ति को याद रखें और आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें जाने जिनका नाम उन बेजान चीजों को दिया गया है.......
शायद दोनों.....या फिर दूसरा विकल्प ज्यादा सही है...
ऐसे में तो यही कहूँगी कि राजनीति से या सत्ता से जुड़े व्यक्तित्व तो वैसे ही इतने प्रसिद्ध होते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ उनके बारे में पढ़ती और याद रखती हैं फिर तो ये नामकरण उन शहीदों के नाम पर होना चाहिए जो देश की सुरक्षा करते हुए कुर्बान हो जाते हैं, जिन्हें हम जानते तक नहीं। यदि उनके नाम पर विश्वविद्यालय, अस्पताल, योजनाएँ, सड़कें, पुरस्कार आदि होंगे तो देश की भावी पीढ़ियाँ उनके योगदान और उनके इतिहास से भी परिचित होंगी। विरोध करने की बजाय यदि विपक्ष इस प्रकार का कोई सुझाव देता तो उसकी गिरती छवि सुधरती परंतु ऐसा नही हुआ, बल्कि जिस कांग्रेस को आतताई औरंगजेब के नाम पर रोड का नाम होने से कोई आपत्ति नहीं हुई उसे महाराणा प्रताप के नाम से आपत्ति है। यह देश का दुर्भाग्य ही है जो एक ऐसी पार्टी ने दशकों तक इस देश पर राज्य किया।
परंतु यदि कहीं कुछ गलत हुआ हो तो उसका सुधार आवश्यक होता है और इस समय इसी दिशा में यदि कुछ करने का प्रयास किया जा रहा हो तो देशवासियों का कर्तव्य बनता है कि हम उनका सहयोग करें जो हमें संकीर्ण मानसिकता से बाहर निकाल कर हमारे अस्तित्व से परिचित कराने का प्रयास कर रहे हैं। 

मालती मिश्रा

Saturday, 21 May 2016

सांसों के पन्नों पर....

सांसों के हर इक पन्ने पर
लिखी एक नई कहानी है,
पढ़ता तो हर व्यक्ति है इसको
पर सबने मर्म न जानी है।
स्वार्थ पूर्ति महज नही है
ध्येय हमारे जीवन का,
परोपकार सत्कर्म हेतु ही
सांसों की रवानी है। 
आँखों में छवि मानवता की
जिह्वा पर हरि बानी है,
चरण उठें सेवा करने को
हाथ हमारे दानी हैं।
अक्षर ज्ञान से हीन भले हो
पर जिसने मर्म ये जान लिया,
गरिमामयी संस्कृति का वाहक
वो ज्ञानियों में ज्ञानी है।
सांसों के..........

मालती मिश्रा

Wednesday, 11 May 2016

हकदार वही है

पथ के काँटे चुन ले जो
फूलों का हकदार वही है,
तोड़ पहाड़ बहा दे झरना
उसके लिए मृदु धार बही है 
धारा के विपरीत बहा जो 
नई कहानी का रचनाकार वही है
प्यास बुझाए जो हर प्राणी के 
पनघट का सरकार वही है
तूफानों से लड़-लड़कर
राह नई बना ले जो
नई ऊँचाई, नए कीर्ति की
यशगाथा का हकदार वही है। 

मालती मिश्रा

Wednesday, 4 May 2016

परिवार

"नहीं मिला तुझको जहाँ प्यार 
छोड़ दे तू वो घर-बार
आजा तू अब मेरे साथ
मैं दूँगा तुझको परिवार
न पा सकी जिसमें सम्मान
तोड़ दे वो रिश्ता नादान
जीने की राह मैं सिखाऊँगा
तुझको सम्मान दिलाऊँगा
समझौते कर-कर इस जीवन में 
तू तो जीना भूल गई 
धर्म निभाने की शर्म में 
बेबसी की सूली पर झूल गई
सब कष्ट तेरे मिटा दूँगा
गर मुझपर हो विश्वास तेरा
पग-पग पर पुष्प बिछा दूँगा
जो हाथ में आए हाथ तेरा
जीवनसंगिनी बनाकरके
अपना अभिमान बनाऊँगा
प्रेम मेरा निश्छल निस्वार्थ
ये दुनिया को बतलाऊँगा"
इन वादों के साथ में ही 
इस सत्य को भी बतलाते तुम
अपनी सत्यता दर्शाने को
इक बार तो ये कह जाते तुम
कि" एक शर्त बस मेरी है
गर कहा नहीं तो छल होगा
बढ़ेंगे मेरे कदम वहीं 
जहाँ परिवार का बल होगा 
परिवार के इतर तुम मुझसे
न कोई भी आशा करना
परिवार से ही है मेरी
सांसों का चलना रुकना
गर अग्रज भगिनी न चाहेंगे
तो सिंदूर का रिश्ता जो सच्चा है
खून के रंग की तुलना में तो
वो सिंदूर का रंग भी कच्चा है।"

मालती मिश्रा