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Thursday, 28 May 2015

आरक्षण बनाम योग्यता


                         आरक्षण बनाम योग्यता

रहने दो योग्यता को इस देश मे, ये विनती है सरकार से
प्रतिभाओं को मत काटो आरक्षण की तलवार से
वर्ना फिर से इतिहास खुद को दोहराएगा,
निर्धन ब्राह्मण इस देश का फिर परशुराम बन जाएगा ा

आज देश के कुछ भागों मे बड़े जोर-शोर से आरक्षण की मांग हो रही है, आंदोलन किए जा रहे हैं, यहाँ तक कि आंदोलनकारी सरकार से अपनी बात मनवाने के लिए सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने से भी नही चूकते और ऐसा करते हुए वे यह तक भूल जाते हैं कि उनके द्वारा उठाए गए इस कदम से परेशानी उनके जैसी आम जनता को ही हो रही है, नुकसान भी जनता का ही हो रहा है ा आखिर संपत्ति जुटाने के लिए पैसे(कर के रूप मे) तो जनता ही देगी न उनमे से कुछ तो ये आंदोलनकारी भी होते ही हैं ा
आरक्षण की मांग आखिर उठी कहाँ से ?
 आज से कई दशक पहले समाज मे जातिगत ऊँच-नीच की भावना इतनी अधिक व्याप्त थी कि निम्न कोटि यानि नीची जाति के व्यक्ति को समाज मे समान अधिकार नही था, वे समाज मे अधिकतर सुख सुविधाओं व अधिकारों से वंचित थे, उन्हे अस्पृश्य समझा जाता था ा तथा वे समाज के उच्च वर्ग द्वारा शोषण के शिकार होते थे, परिणामस्वरूप सरकारी सेवाओं और संस्थानों में अनुसूचित जातियों/जनजातियों तथा पिछड़े समुदायों के लोगों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नही होता था ा इस समुदाय के सामाजिक व शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करके समाज मे इनकी सहभागिता को बढ़ाने तथा इनको बराबरी का दर्जा देने हेतु ही तत्कालीन सरकार द्वारा अनुसूचित जाति/जनजातियों के लिए क्रमशः १५% और ७.५% आरक्षण दिया गया तथा पाँच साल बाद समीक्षा का प्रावधान रखा गया ा निःसंदेह उस समय समाज मे पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए उठाया गया यह कदम प्रशंसनीय था ा किन्तु धीरे-धीरे इसका राजनीतिकरण होने लगा, पिछड़े वर्गों का वोट हासिल करने के लिए आने वाली सरकारें आरक्षण की अवधि बढ़ाती गईं, धीरे-धीरे इसका दुरुपयोग होने लगा ा आरक्षण की शुरुआत समाज मे समान शिक्षा समान रोजगार को ध्यान मे रखकर किया गया ताकि व्यक्ति, समाज व देश का विकास हो किंतु आज इसे ही हथियार बनाकर विकास का मार्ग अवरुद्ध किया जा रहा है ा आज आरक्षण सर्वथा जातिगत हो गया है और इसका लाभ भी आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्ति ही उठा पाते हैं ा
सरकारी संस्थानों मे नौकरी पाना हो या पदोन्नति, योग्यता को आधार न बनाकर आरक्षण को आधार बनाया जाता है, यही कारण है कि सरकारी संस्थाओं मे गुणवत्ता की कमी पाई जाती है ा शिक्षा के क्षेत्र में भी ८०% प्राप्त किए हुए छात्र को जहाँ दाखिला नहीं मिल पाता वहीं आरक्षण के कारण ६५ या ७०% अंकों वाला छात्र दाखिला पा लेता है, कभी किसी ने सोचा कि दिन-रात मेहनत करके पढ.ने वाले उस छात्र पर क्या बीतती होगी जो अपने से कम योग्य छात्र को वहाँ जाते देखता है जहाँ उसे होना चाहिए, ऐसी परिस्थिति मे सिर्फ योग्यता ही पीछे नही रही बल्कि योग्य बनने की भावना भी आहत हो गई ा ऐसा ही हाल सरकारी कार्यालयों का भी है, ऐसी स्थिति में समाज या देश की उन्नति की या भ्रष्टाचार मुक्त देश का सपना तो भूल ही जाना चाहिए ा कुछ लोगों को तो आरक्षण की ऐसी आदत हो गई है कि आवश्यकता न होते हुए भी इसकी मांग के लिए आंदोलन धरने आदि करते हैं तथा तोड़-फोड़ आदि के द्सवारा रकारी संपत्ति को हानि पहुँचाते हैं, जिससे परेशानी आम जनता को भुगतनी पड़ती है, सोचने की बात है क्या ऐसे लोग आरक्षण के हकदार हो सकते हैं जो देश व समाज के प्रति अपना कर्तव्य नही जानते ा
यही वजह है कि आज समाज का वो वर्ग जो आरक्षण से बाहर है स्वयं को लाचार महसूस करता है और इसीलिए कुछ ऐसी घटनाएँ भी देखने को मिली हैं कि स्वयं को पिछड़ी जाति का दिखाने के लिए नकली जातिप्रमाण पत्र बनवा कर शिक्षण संस्थाओं मे दाखिले लिए गए ा विचारणीय है कि ऐसी परिस्थिति का जिम्मेदार कौन है?
हमारा देश धर्म निरपेक्ष देश है यहाँ का कानून सभी जाति-धर्म के मानने वालों को समानता का अधिकार देता है फिर किसी एक वर्ग को आरक्षण देकर उसे वी.आई.पी. क्यों बनाया जाता है? सर्व धर्म समभाव ही देश के लिए हितकर होगा ा शिक्षा व रोजगार के क्षेत्र में योग्यता को चयन का आधार बनाया जाना चाहिए न कि जाति या वर्ण को, यदि किसी को आरक्षण देना ही है तो आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग तथा देश के लिए शहीद हुए सैनिकों के परिवार को देना चाहिए न कि जाति या धर्म को देखकर......

Wednesday, 27 May 2015

ANTARDHWANI: अंतर्ध्वनि

ANTARDHWANI: अंतर्ध्वनि: अंतर्ध्वनि मेरे अंतर्मन की वो ध्वनि है जो मुझे दिन-प्रतिदिन कुछ नया करने को प्रेरित करती है तथा मुझे अपने-आप से जोड़े रखती है ा मेरी अंत...

Monday, 25 May 2015

अंतर्ध्वनि



अंतर्ध्वनि मेरे अंतर्मन की वो ध्वनि है जो मुझे दिन-प्रतिदिन कुछ नया करने को प्रेरित करती है तथा मुझे अपने-आप से जोड़े रखती है ा मेरी अंतर्ध्वनि ही है जो मुझे हिन्दी साहित्य से जोड़े हुए है और नित्य कुछ न कुछ ऐसा मेरे अंतर्मन मे जागृत करती है कि जिस हिन्दी से आज का समाज कटता जा रहा है, मुझे उसी हिंदी से आत्मिक लगाव महसूस होता है ा मेरी अंतर्ध्वनि ने हिंदी भाषा व हिंदी साहित्य को मेरे जीवन का अभिन्न अंग बना दिया है

Sunday, 24 May 2015

                          गुरु बनाम शिक्षक
वर्तमान समय मे शिक्षा का महत्व जितना बढ़ता जा रहा है, शिक्षक का उतना ही घटता जा रहा है ा आज न ही शिक्षक का वो सम्मान रहा और न ही समाज मे पहले जैसा स्थान, हालांकि मांग कहीं अधिक है क्योंकि शिक्षा लेने वालों की संख्या मे वृद्धि हुई है ा आज जहाँ एक ओर छात्र शिष्य नही रहे तो दूसरी ओर शिक्षक भी गुरु नही रहे, परिस्थितियों ने बहुत कुछ बदल दिया है ा  छात्र मे इस सोच का विकास हुआ है कि वो शिक्षा खरीद रहा है तो शिक्षक मे भी यह धारणा विकसित हुई है कि वह शिक्षा बेच रहा है, अर्थात् गुरु शिष्य की भावना का अंत हो चुका है, जिस तरह पहले शिष्य गुरु के प्रति समर्पण की भावना रखते थे आज तो वो कहीं दिखना तो दूर उसके विषय मे सोचना भी मूर्खता माना जाता है ा
हमारी प्राचीन मान्यताओं या यूँ कहें कि संस्कृति का ह्रास होने का मुख्य कारण पाश्चात्य संभ्यता का विकास ही है, हम पश्चिमी सभ्यता मे अंधे होकर अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं, जिसके कारण आज शिक्षा का क्षेत्र अत्यधिक प्रभावित हुआ है, कुछ स्थानों मे तो ये महज दिखावा बन कर रह गया है ा
युग निर्माता कौन..

शिक्षक तो है युग निर्माता
पर कहीं न वो पूजा जाता ा
कोटि-कोटि प्राणियों में,
शिक्षा की ज्योति जगाता है,
अंध मार्ग में इस जग के
ज्ञान का दीप जलाता है ा
एक युग रचना का रचनाकार,
नही चाहता युग पर अधिकार,
पर कहीं नही है जय-जयकार ा
जय है तो बस उस श्रेणी की,
जो युगदृष्टा बन भरमाते हैं,
देकर झांसा भोले समाज को,
अपनी झोली भर ले जाते हैंा
बन बैठे हैं वो कर्ता-धर्ता,
लोगों के भाग्य विधाता ये,
विश्वास प्राप्त कर लोगों का,
विश्वासघात कर जाते हैं ा
फिरभी ये मौका परस्त दानव ही,
देव बन पूजे जाते हैं ा
शिक्षक तो है युग निर्माता
पर कहीं न पूजे जाते हैं ा