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Wednesday, 13 September 2017

हिंदी हमारी भाषा है.....

हिंदी हमारी भाषा है 
मेरी प्रथम अभिलाषा है,
भारत देश के गरिमा की 
यही परिष्कृत परिभाषा है।
हिंदी हमारी भाषा है..

जिसको अपनी भाषा का 
ज्ञान नहीं सम्मान नहीं,
बेड़ियों में बँधी हुई
उसकी हर प्रत्याशा है।
हिंदी हमारी भाषा है..

पर भाषा पर संस्कृति से
इसको कोई गुरेज़ नहीं,
हर भाषा-शब्द आकर इसमें
लवण सदृश घुल जाता है।
हिंदी हमारी भाषा है..

हिन्दुस्तान की जान है हिंदी
हम सबका अभिमान है हिंदी,
आओ सब मिल गर्व से बोलें
यही भविष्य की आशा है।
हिंदी हमारी भाषा है..

अपने-पराए के भेद-भाव का
इसमें कोई भाव नहीं
नुक्ता जो क़दमों में पड़ी हुई
उसको मस्तक पे सजाता है।
हिंदी हमारी भाषा है..

सबको संग ले चलने वाली
क्षेत्रीय भाषाओं में घुलने वाली
देश का हर भाषा-भाषी
इससे खुद जुड़ जाता है।
हिंदी हमारी भाषा है..
मालती मिश्रा

Thursday, 31 August 2017

धार्मिक कानून और देश

दरअसल हम अभी भी परदेशी ही हैं, सिर्फ किसी देश में पैदा हो जाने मात्र से हम उस देश के या वह देश हमारा नहीं हो जाता। जब तक हम देश को भली-भाँति जान नहीं लेते जब तक  उसकी संस्कृति उसकी शक्ति या दुर्बलता हमारे भीतर रच बस नहीं जाती तब तक हम उसके नही हो सकते। देश में बहुत से ऐसे जड़ पदार्थ हैं और हम भी उन्हीं की भाँति मात्र एक जड़ पदार्थ बनकर रह रहे हैं, देश ने हमें नही अपनाया न हमने देश को। हम यहाँ पैदा जरूर हुए परंतु इसकी मिट्टी की सोंधी खुशबू हमारी आत्मा में न बस सकी, हम यहाँ के जड़त्व के मोहपाश में बँधे होकर इसे अपना कहने लगे हैं। जो हमें लुभाते हैं और हम उसी के वशीभूत हो उसे पाने की लालसा में देश को अपना कहने लगते हैं। जो मोह से अभिभूत है वही चिरकाल का परदेशी है। वह नहीं समझता कि वह कहाँ है, किसका है?
जो हमें प्यारा होता है, जो हमारा होता है या हम जिसके होते हैं, उसकी हर अच्छाई-बुराई को हम दिल से अपनाते हैं। उसके सम्मान के लिए कुछ भी कर गुजरने को तत्पर रहते हैं परंतु इसी देश में जन्म लिया इसकी माटी का तिलक किया,  आज भी इसके प्रति अपनी अखंड भावना दर्शाने से डर लगता है।
हर देश के नागरिक को अपने देश और राष्ट्रगान के प्रति श्रद्धा होती है परंतु हमारे देश में ही किसी खास संप्रदाय के लोगों को राष्ट्रगान गाने की इज़ाजत उनका ही धर्म नहीं देता। कहते हैं कि शरिया कानून उन्हें जन गण मन और वंदेमातरम् गाने की इज़ाजत नहीं देता है, फिर सवाल यह उठता है कि जन-गण-मन और वंदेमातरम् जिस देश की आत्मा हैं आपका कानून आपको उस देश में रहने की इज़ाजत कैसे देता है? भारत माता की धरती पर जन्म लेकर इसे ही अपनी कर्मभूमि बनाने वाले को 'भारत माता की जय' बोलने से कौन-सा कानून रोकता है। कौन-सा कानून है जो माँ को माँ का सम्मान देने से रोकता हो? यदि कोई धर्म मनुष्य को मानव-धर्म निभाने से रोकता है तो वह धर्म नहीं। हर धर्म व्यक्ति को पहले इंसान बाद में हिंदू या मुसलमान बनाता है।
किसी भी देश में रहने वाले हर नागरिक का प्रथम कर्तव्य अपनी मातृभूमि के प्रति समर्पण और उसका सम्मान होना चाहिए, धर्म और मज़हब दूसरे स्थान पर होते हैं। यदि हमें अपने ईश्वर की आराधना के लिए अपनी अधिकृत भूमि और बेफिक्री और सुकून के दो पल ही न मिलें तो धर्म के प्रति कर्तव्य कहाँ निभाएँगे?
हमारा घर हमारा देश तब ही हमारा होता है जब हम तन-मन से उसके होते हैं जब हमारे देश की मिट्टी की खुशबू हमारी आत्मा में बसती है और अनायास ही हमारे मुँह से ही नहीं दिल से निकलता है "वंदेमातरम्" तब हम इस देश के हो पाते हैं। तब हम इसके हो पाते हैं जब सिर्फ हम इसमें नहीं बल्कि यह हममें बसता है, अन्यथा तो हम पैदा होकर परदेशी बनकर रहते हुए पशुओं के समान अपना भरण-पोषण करते हुए एक दिन परदेशी ही बनकर चले जाएँगे और सवाल रह जाएगा धार्मिक कानून बड़ा या देश........
मालती मिश्रा

Saturday, 26 August 2017

अंधभक्ति

हमारा देश महाशक्ति होने का दावा करता है..किस आधार पर? जहाँ एक बाबा के अंध भक्तों की गुंडागर्दी नहीं रोकी जा सकी! आखिर इन बाबाओं को इतना शक्तिशाली बनाता कौन है? हमारे आपके बीच से ही आम लोग जो अज्ञानता वश ढोंगी गुरुओं में ही भगवान होने का भ्रम पाल लेते हैं और फिर आँखें मूंद कर इनका अनुसरण करते हैं। यह अंध भक्ति और अज्ञानता ही है जो देश को आगे नहीं बढ़ने दे रहा, कहीं लोग आँख बंद कर के किसी ढोंगी गुरु के प्रति आस्था प्रदर्शन करते हुए अमानवीयता की सीमा लांघ जाते हैं तो कहीं लोग किसी राजनीतिक पार्टी की सदियों तक आँखें बंद करके भक्ति करते हैं और परिणामस्वरूप उनकी अमानुषता का भी कोई जायज कारण ढूँढ़ लेते हैं। ऐसे लोगों को परिवर्तन पसंद नहीं आता, हर एक पायदान पर हर एक घटना में अपने पुराने दिनों की दुहाई देते हुए उनमें अच्छाइयाँ दिखाने का प्रयास करते हैं। ऐसी स्थिति में वो भूल जाते हैं कि बीते समय को सिर्फ उन्होंने नहीं औरों ने भी जिया है, सच्चाई से बाकी भी वाकिफ़ हैं।
यह अंधा विश्वास ही है जो कोई भी बाबा बनने का ढोंग रचाकर स्वयं को गरीबों का मसीहा जता कर लोगों की सोच पर लोगों की आस्था पर कब्जा कर लेता है और लाखों की तादात में चेले-चपाटे की फौज तैयार कर लेता है और इतना शक्तिशाली बन जाता है कि उसे कानून का भी भय नहीं होता और निर्भय होकर ईश्वर को शारीरिक, आर्थिक और सामाजिक करता है। वोटों के लालच में राजनीतिक पार्टियाँ भी इन्हें भारी मात्रा में चढ़ावे चढ़ाती हैं इसीलिए जब ऐसे बाबाओं के विरोध में कोई फैसला लेना हो तो ये पार्टियाँ पंगु बनी नजर आती हैं।
ऐसे छद्म वेशी गुरुओं को पनपने ही न देना हम आम नागरिकों के हाथ में होता है, हमें पता होना चाहिए कि हमे ईश्वर प्राप्ति का मार्ग दिखाने वाला कोई भौतिक भोगी गुरु नहीं हो सकता, हमें पता होना चाहिए कि जिसका मन राम में रम जाता है वो ऐशो-आराम और लग्ज़री लाइफ से कोसों दूर होता है। यदि किसी के पास अरबों-खरबों की सम्पत्ति भक्तों के जरिए आती है तो वह आस्था का व्यापारी हो सकता है प्रभु का अनुरागी नहीं। ऐसे ढोंगी बाबा सिर्फ गुंडे पालते हैं इनकी भक्ति करने वाला या तो अराजक मानसिकता वाला गुंडा हो सकता है या महामूर्ख।
अंत में बस इतना ही कि ईश्वर प्राप्ति के लिए मन में ईश्वर के प्रति आस्था जगाएँ कोई ढोंगी जो स्वयं धन प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त कर रहा है वह किसी को ईश्वर प्राप्ति का मार्ग कैसे दिखा सकता है?
मालती मिश्रा

Monday, 14 August 2017


जिस देश की धरती शस्य-श्यामला
हृदय बहे गंग रसधार
जिसके सिर पर मुकुट हिमालय
सागर रहा है पैर पखार
स्वर्ग बसा जिसकी धरा पर
सुरासुर करते जिसका यश गान
जिस धरा पर पाकर जन्म हुए
आर्यभट्ट चाणक्य महान
उस देश को न झुकने देंगे
उस देश को न मिटने देंगे
प्रणों की आहुति भी देंगे
बचाने को इसका सम्मान
मालती मिश्रा

Sunday, 13 August 2017

गरिमामयी पद के गरिमाहीन पदाधिकारी

 देश के दूसरे सर्वोच्च पद पर आसीन पदाधिकारी उप-राष्ट्रपति मो० हामिद अंसारी ने पद छोड़ते समय जो कुछ भी कहा नि:संदेह उससे राष्टृवादी लोगों के हृदय को ठेस लगी होगी। उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर फिर ऐसा बयान दिया जो उनके पद की गरिमा को धूमिल करता है। उनके कथनानुसार हमारे देश में आज अल्पसंख्यक असुरक्षित है। पिछले दस वर्षों से इस पद पर बने रहने के बावजूद कई बार विवादित बयान देने के बावजूद, देश के राष्ट्रध्वज को सम्मान न देने के बावजूद वह आज तक उसी पद पर उतना ही सम्मान पाते रहे हैं फिर भी उन्हें अल्पसंख्यक यानी अपने धर्म के लोग डरे हुए नजर आ रहे हैं। कमाल की बात तो यह है कि वह अल्पसंख्यक सिर्फ मुस्लिम समुदाय के लोगों को ही मानते हैं, जैन, पारसी, ईसाई आदि उन्हें अल्पसंख्यक नहीं लगते। उनकी दृष्टि में देश में इतनी असहिष्णुता थी फिर भी वह अपने पद अपने अधिकारों के मोह का त्याग नहीं कर पाए, यदि वास्तव में उन्हें अपने समुदाय के लोग डरे सहमें नजर आ रहे थे और वह पदासीन रहते हुए कुछ नहीं कर सकते थे तो क्यों नहीं अपने पद से त्यागपत्र दे कर अपनी आवाज उठाई? पर उनका अब ऐसा बयान देना एक अलग ही खेल दर्शाता है। अब वह समुदाय विशेष को डराकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। जिस देश में रहते हैं, जिस देश का नमक खाते हैं और पूरी सुरक्षा और सुख-सुविधाओं का भोग करते हैं उसी देश के राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान को सम्मान नहीं देते फिर भी वही देश इन्हें सिर आँखों पर बिठाता है; फिर भी इनका अस्तित्व खतरे में है! फिर भी देश में असहिष्णुता है!!
क्या ऐसे बोल बोल कर ये स्वयं देश के लोगों में एक समुदाय विशेष के लिए जहर नहीं घोल रहे? जो लोग आपस में जाति-धर्म को भूल कर भाईचारे की भावना से रहते हैं उनमें ये परस्पर भेदभाव और असुरक्षा की भावना को जन्म दे रहे हैं।
समझ नहीं आता कि ऐसी विचारधारा के व्यक्ति को ऐसे उज्ज्वल पद पर क्या सिर्फ पद की गरिमा को धूमिल करने के लिए बैठाया गया या फिर यह कहूँ कि इन्हें भी सिर्फ पूर्वजों के नाम उनके कार्यों का सहारा मिला और इन्होंने भी नेहरू परिवार की तरह सिर्फ पूर्वजों के नाम के सहारे देशहित की आड़ में सिर्फ अपना स्वार्थ सिद्ध किया। आज सिर्फ एक ही प्रश्न बार-बार समक्ष होता है कि कब तक पूर्वजों के स्वतंत्रता आंदोलन में सहयोग देने के नाम पर ये वंशज देश को खोखला करते रहेंगे और हम इमोशनल फ़ूल बनते रहेंगे। किस शास्त्र में लिखा है कि यदि दादा-परदादा देशभक्त हों तो पोते-परपोते देशद्रोही नहीं हो सकते?
आखिर कब तक यह देश गरिमामयी पदों के गरिमाहीन पदाधिकारियों के बोझ तले दबा रहेगा?  कब तक??
मालती मिश्रा

Saturday, 12 August 2017

बहुत याद आता है गुजरा जमाना

बहुत याद आता है गुजरा जमाना

वो अल्हड़ औ नटखट सी बचपन की सखियाँ
वो गुड्डा और गुड़िया की शादी की बतियाँ
वो पलभर में झगड़ना रूठना और मनाना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना.......

वो गाँव की चौड़ी कहीं सँकरी सी गलियाँ 
वो गलियों में छिप-छिप के सबको चिढ़ाना
वो दादा जी का छड़ी दिखाकर डराना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना....

वो मन भाती दुल्हन की बजती पायलिया
वो शर्माती आँखों को ढँकती चुनरिया
वो देखने को उसको बहाने बनाना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना....

वो बाबा की लाठी को चुपके से उठाना
दिखा करके उनको वो दूर से चिढ़ाना 
वो उनके झूठे गुस्से पर तालियाँ बजाना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना.....

वो खेतों-खलिहानों की मीठी सी यादें
वो गन्ने की ढेरी पर जागी सी रातें
वो मस्ती में कोल्हू के बैलों संग चलते जाना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना.....

वो ओस में भीगी खेतों की हरियाली
वो बेमौसम बारिश कराती सी डाली
वो कोहरे की चादर में खेतों का छिप जाना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना........

वो पनघट पर हँसती चहकती सी गोरी
वो नदिया की कल-कल ज्यों गाती सी लोरी
वो पानी में कागज की नावों का चलाना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना........

वो बारिश के पानी में मेढक की टर-टर
वो खेतों से आती सी झींगुर की झर-झर
वो बारिश में हरियाली का नहाकर निखर जाना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना.....

वो बारिश के पानी का घुटनों तक भर आना
पानी में उतर कर तैराकी दिखाना
वो अल्हड़ से बचपन का उसमें नहाना
बहुत याद आता है गुजरा जमाना.......

मालती मिश्रा

Wednesday, 2 August 2017

आशा की किरन


इक आशा की किरण पाने को
अंधकार में भटक रही है,
आँखों में उदासी के बादल
मसि बन अश्रु बिखर रही है।

शब्द-शब्द में पीर बह रही 
खामोशियाँ चीत्कार कर रहीं 
पीड़ा किसी को दिखा न सके जो 
वो शब्दों में हाहाकार कर रही।

जुबाँ खामोशी की चादर ओढ़े
अधरों पर निःशब्दता का पहरा
आँखों का असफल प्रयास भी
पलकों तक आकर ठहरा।

अनकहे अनसुने शब्दों में
हाहाकार सुनाई देता,
शांत नयन में झिलमिल करते
अपरिमित व्याकुलता देखा।

सूना दर्पण जीवन का
हर गुजरे पड़ाव बताता है,
कोरे कागज का रीतापन
अकथ्य कथा सुनाता है।

अधर सकुचाने लगे जब 
ज़ज़्बात घबराने लगे,
हिय की सब आकुलता 
तब नयन बतलाने लगे।

मुस्कुराते अधरों के पीछे
उदासी की बदली घिर आई
चहकती खनकती सी हँसी में
मन की चीख पड़ती है सुनाई।

मालती मिश्रा