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Tuesday, 22 May 2018

पचास साल का युवा गर दिखाए राह तो
बुद्धि का विकास कब होगा इस देश में

जनता समाज सब भ्रम में ही फँस रहे
हर पल विष घुल रहा परिवेश में।।

रोज नए मुद्दे बनें नई ही कहानी बने
भक्षक ही घूम रहे रक्षक के वेश में।।

उचित अनुचित का खयाल बिसरा दिया
चापलूस चाटुकार मिले अभिषेक में।।

Saturday, 19 May 2018

साहित्यकार के दायित्व

साहित्य सदा निष्पक्ष और सशक्त होता है, यह संस्कृतियों के रूप, गुण, धर्म की विवेचना करता है और  साहित्यकार साहित्य का वह साधक होता है जो शस्त्र बनकर साहित्य की रक्षा साहित्य के द्वारा ही करता है तथा इस साहित्य साधना के लिए वह लेखनी को अपना शस्त्र बनाता है। ऐसी स्थिति में वह साहित्य की शक्ति का प्रयोग लेखनी के माध्यम से करता है। लोग लेखनी के माध्यम से साहित्य की पूजा करते हैं। साहित्य में वह शक्ति है जो संस्कृतियों का सृजन करने में सक्षम है। इसीलिए साहित्यकार बड़े गर्व से अपनी लेखनी को तलवार से अधिक शक्तिशाली कहता है और यह अक्षरशः सत्य भी है। लेखनी में सत्ता पलट देनें की शक्ति होती है, यह मुर्दों में प्राण फूँक देने का माद्दा रखती है बशर्ते कि यह सही हाथ में हो, साहित्यसर्जक यदि अपने ज्ञान का सकारात्मक प्रयोग करें तो नवयुग की रचना करने में भी समर्थ हो सकते हैं। परंतु सकारात्मकता और नकारात्मकता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और यह लेखनी रूपी तलवार दोनों का शस्त्र है इसीलिए इतने सब के बाद भी साहित्य भी आजाद कहाँ?
यह तो मात्र साहित्यकारों के हाथों की कठपुतली बन गया है। अब लेखनी है तो साहित्यकार के हाथ में ही न, साहित्यकार उसको जैसे चाहेगा वैसे ही प्रयोग करेगा, वह सही या गलत जिस पक्ष को भी रखेगा सशक्त होकर रखेगा क्योंकि साहित्यकार जो ठहरा।
साहित्यकार है तो क्या! आखिर है तो एक जीता-जागता मानव मात्र ही न, जिसमें यदि कुछ गुण होते हैं तो कुछ अवगुण भी होते हैं। साहित्य का ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद भी वह मानवीय गुणों अवगुणों से मुक्त नहीं होता। इसीलिए यह आवश्यक नहीं कि हर साहित्यकार की लेखनी सदा सत्य और निष्पक्ष बोलती हो।
तकनीक का जमाना है, सोशल मीडिया का वर्चस्व है देर-सबेर साहित्यकारों के विषय में किसी न किसी माध्यम से जानने को अवश्य मिल जाता है। अभी हाल ही में मैंने एक महिला साहित्यकार का ऑन लाइन इंटरव्यू news tv पर यू-ट्यूब के माध्यम से देखा। जानी मानी साहित्यकार हैं उपन्यास कविताएँ आदि कुल 52  पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं , अतः साहित्य के क्षेत्र में अनुभवी और ज्ञानी भी हैं। परंतु साक्षात्कार की प्रक्रिया के दौरान ज्यों-ज्यों संवाददाता द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब मोहतरमा ने दिए त्यों-त्यों एक साहित्यकार की छवि धुंधली होती गई। साफ-साफ उन्होंने न सिर्फ एक धर्म को इंगित कर उसे कटघरे में खड़ा किया बल्कि उसकी धार्मिक मान्यताओं पर भी प्रहार कर दिया और इतने पर ही बस नहीं किया बल्कि वो राजनीति पर भी चर्चा करते हुए किसी एक ही पार्टी की पक्षधर भी बन गई। उनके जवाब सुनकर मुझे वो साहित्यकार याद हो आए जिन्होंने एक अखलाक की हत्या के कारण अपने अवॉर्ड वापस करके असहिष्णुता का इल्जाम लगाकर पूरी दुनिया में अपने ही देश की छवि धुँधली करने में कोई कोर-कसर न छोड़ी। साहित्य सर्जक भले ही मानव मात्र है परंतु यदि उसने हाथ में कलम पकड़ ली है तो उसकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। फिर वह स्व-हिताय स्व-सुखाय की श्रेणी से बाहर बहुजन-हिताय बहुजन-सुखाय की श्रेणी में आ जाता है।  साहित्यकार का यह दायित्व है कि वह अपने ज्ञान का प्रयोग समाज और देश के हितार्थ करे न कि स्वहितार्थ, उसे चाहिए कि लेखनी से जब सरस धारा बहे तो उसकी निर्मलता को समस्त मानव मन महसूस करे और उस पावन निर्मलता को आत्मसात करे। साधक ऐसा कुछ न करे कि उसके ज्ञान को नकारात्मकता की श्रेणी में रखा जाए। साहित्यिक ज्ञान प्रयोग समाज और देश के हित में हो न कि कुछ गिने-चुने लोगों के हित में या किसी विशेष जाति-धर्म के हित में।
#मालतीमिश्रा

Wednesday, 16 May 2018

एक और न्यूजपेपर हिन्दू सहस्रधारा साप्ताहिक मध्यप्रदेश में पुस्तक की समीक्षा को स्थान मिलना मेरे उत्साह के लिए संजीवनी।

Sunday, 13 May 2018

अन्तर्ध्वनि की समीक्षा का 'डेली हिन्दी मिलाप दैनिक' में प्रकाशन




माँ के आशीर्वाद से एक और शुभ समाचार ज्ञात हुआ।
जाने-माने साहित्यकार, समीक्षक आ०अवधेश अवधेश कुमार अवध जी द्वारा की मेरी पुस्तक की समीक्षा 'डेली हिन्दी मिलाप' दैनिक हैदराबाद के पेपर में छपी।
आदरणीय अवधेश जी का आभार व्यक्त करते हुए अपनी प्रसन्नता आप सभी मित्रों के साझा कर रही हूँ।

Saturday, 12 May 2018

इतनी क्या जल्दी थी माँ..

लाई तू मुझे इस दुनिया में
अपरिमित कष्टों को सहन किया
नाना जिद और नखरों को
हँसकर तूने वहन किया
कुछ और समय इस दुनिया को
माँ तूने सहन किया होता,
इतनी क्या जल्दी थी माँ
इक बार तो मुझे कहा होता
कष्ट तेरे अंतिम पल के
कुछ मैंने भी तो सहा होता

माँ तुझको जब-जब कष्ट हुआ
मुझ तक न हवा लगने पाई
खुद क्रूर काल की ग्रास बनी
मुझको न खबर होने पाई
काश हमारी अनुमति का
विधना ने विधान लिखा होता
इतनी क्या जल्दी थी माँ
इक बार तो मुझे कहा होता
कष्ट तेरे अंतिम पल के
कुछ मैंने भी तो सहा होता

छोड़ गई तू मुझे अकेली
गैरों की इस भीड़ में
रखा सदा सुरक्षित जिसको
अपने आँचल के नीड़ में
काश तेरे आँचल को मैंने
मुट्ठी में तेजी से गहा होता
इतनी क्या जल्दी थी माँ
इक बार तो मुझे कहा होता
कष्ट तेरे अंतिम पल के
कुछ मैंने भी तो सहा होता

उस घर से जब मुझे विदा किया
भर अंक में मुझको रोई थी
खुद विदा हुई जब दुनिया से
भर बाहों में तुझे न मैं रो पाई
दूर होती छाया को तेरी
मैंने भी महसूस किया होता
इतनी क्या जल्दी थी माँ
इक बार तो मुझे कहा होता
कष्ट तेरे अंतिम पल के
कुछ मैंने भी तो सहा होता

आता है जो दुनिया में
इक रोज तो उसको जाना है
विधना का यह अटल सत्य
कटु है पर सबने माना है
इस सत्य से लड़ने की कोशिश को
मैंने भी तो जिया होता
इतनी क्या जल्दी थी माँ
इक बार तो मुझे कहा होता
कष्ट तेरे अंतिम पल के
कुछ मैंने भी तो सहा होता

दूर भले मुझसे थी पर
आशीष की छाया घनेरी थी
हाथों का स्पर्श सदा साथ रहा
जो सिर पर तूने फेरी थी
अब वो स्पर्श नहीं वो छाया नहीं
सूख गया ममता का सोता
इतनी क्या जल्दी थी माँ
इक बार तो मुझे कहा होता
कष्ट तेरे अंतिम पल के
कुछ मैंने भी तो सहा होता।
कष्ट तेरे...........
कुछ मैंने...........
#मालतीमिश्रा

Friday, 11 May 2018

भक्ति जगाय दीजिए

शारदे की पूजा करूँ काम नहीं दूजा करूँ
भक्ति ऐसी मेरे हिय में जगाय दीजिए।।

साथ दे जो हर घड़ी कभी न अकेला छोड़े
धर्म पथ पर कोई वो सहाय दीजिए।।

लेखनी का शस्त्र धरूँ अशिक्षा पे वार करूँ।
ज्ञान दीप मेरे हिय में जलाय दीजिए।।

शिक्षा जो ग्रहण किया सभी में मैं बाँट सकूँ
मानव का धर्म हमें बतलाय दीजीए।।
#मालतीमिश्रा

Sunday, 6 May 2018

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक समीक्षा : अन्तर्ध्वनि

       समीक्षक : अवधेश कुमार 'अवध'



मनुष्यों में पाँचों इन्द्रियाँ कमोबेश सक्रिय होती हैं जो अपने अनुभवों के समन्वित मिश्रण को मन के धरातल पर रोपती हैं जहाँ से समवेत ध्वनि का आभास होता है, यही आभास अन्तर्ध्वनि है। जब अन्तर्ध्वनि को शब्द रूपी शरीर मिल जाता है तो काव्य बन जाता है। सार्थक एवं प्रभावी काव्य वही होता है जो कवि के हृदय से निकलकर पाठक के हृदय में बिना क्षय के जगह पा सके और कवि - हृदय का हूबहू आभास करा सके।

नवोदित कवयित्री सुश्री मालती मिश्रा जी ने शिक्षण के दौरान अन्त: चक्षु से 'नारी' को नज़दीक से देखा। नर का अस्तित्व है नारी, किन्तु वह नर के कारण अस्तित्व विहीन हो जाती है। शक्तिस्वरूपा, सबला और समर्थ नारी संवेदना हीन पुरुष - सत्ता के चंगुल में फँसकर अबला हो जाती है। बहुधा जब वह विद्रोह करती है तो  अलग - थलग, अकेली व असमर्थित और भी दयनीय होकर लौट आती है। प्रकृति का मानवीकरण करके कवयित्री स्त्री के साथ साम्य दिखलाने की कोशिश की है और इस प्रयास में वह छायावाद के काफी निकट होती है। नैतिक अवमूल्यन से कवयित्री आहत है फिर भी राष्ट्रीयता की भावना बलवती है तथा सामाजिक उथल- पुथल के प्रति संवेदनशील भी।

यद्यपि स्त्री विमर्श, सौन्दर्य बोध, प्रकृति चित्रण, सामाजिक परिवेश, सांस्कृतिक समन्वय, पारिवारिक परिमिति सुश्री मालती मिश्रा की लेखनी की विषय वस्तु है तथापि केन्द्र में नारी ही है। बहत्तर कविताओं से लैस अन्तर्ध्वनि कवयित्री की पहली पुस्तक है । भाव के धरातल पर कवयित्री की अन्तर्ध्वनि पाठक तक निर्बाध और अक्षय पहुँचती है । कविताओं की क्रमोत्तर संख्या के साथ रचनाकार व्यष्टि से समष्टि की ओर अग्रसर देखी जा सकती है। अन्तर्ध्वनि शुरुआती कविताओं में आत्म केन्द्रित है जो धीरे - धीरे समग्रता में लीन होती जाती है। स्वयं की पीड़ा जन साधारण की पीड़ा हो जाती है तो अपने दर्द का आभास कम हो जाता है।

कुछ कविताओं का आकार काफी बड़ा है फिर भी भाव विन्यास में तनाव या विखराव नहीं है अतएव श्रेयस्कर हैं । न्यून अतुकान्त संग सर्वाधिक तुकान्त कविताओं में गीत, गीतिका और मुक्तक लिखने की चेष्टा परिलक्षित है, जिसमें छंद की अपरिपक्वता स्पष्ट एवं अनावृत है किन्तु फिर भी भावपक्ष की मजबूती और गेय - गुण अन्तर्ध्वनि को स्तरीय बनाने हेतु पर्याप्य है। अन्तर्ध्वनि की कविता 'प्रार्थना खग की' द्रष्टव्य है जिसमें खग मानव से वृक्ष न काटने हेतु प्रार्थना करता है -
"करबद्ध प्रार्थना इंसानों से,
करते हम खग स्वीकार करो।
छीनों न हमारे घर हमसे,
हम पर तुम उपकार करो ।।"

' बेटी को पराया कहने वालों' कविता में कवयित्री एक बेटी की बदलती भूमिका को उसके विशेषण से सम्बद्ध करते हुए कहती है -
"जान सके इसके अन्तर्मन को
ऐसा न कोई बुद्धिशाली है
भार्या यह अति कामुक सी
सुता बन यह सुकुमारी है
स्नेह छलकता भ्राता पर है
पत्नी बन सब कुछ वारी है।"

उन्वान प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मात्र रुपये 150 की 'अन्तर्ध्वनि' में 'मजदूर', 'अंधविश्वास', 'तलाश', 'प्रतिस्पर्धा' और 'आ रहा स्वर्णिम विहान' जैसी कविताएँ बेहद प्रासंगिक हैं। एक ओर जहाँ शिल्प में दोष से इन्कार नहीं किया सकता वहीं रस के आधिक्य में पाठक - हृदय का निमग्न होना अवश्यम्भावी है। माता - पिता को समर्पित सुश्री मालती मिश्रा की अन्तर्ध्वनि को आइए हम अपनी अन्तर्ध्वनि बनाकर स्नेह से अभिसिंचित करें।

अवधेश कुमार 'अवध'
मेघालय 9862744237
awadhesh.gvil@gmail.com