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Monday, 22 May 2017

लेखनी स्तब्ध है...


लेखनी स्तब्ध है
मिलता न कोई शब्द है

गहन समंदर भावों का
जिसका न कोई छोर है,
डूबते-उतराते हैं शब्द
ठहराव पर न जोर है।
समझ समापन चिंतन का
पकड़ी तूलिका हाथ ज्यों,
त्यों शब्द मुझे भरमाने लगे
लगता न ये आरंभ है।
लेखनी स्तब्ध है
मिलता न कोई शब्द है

भावों का आवागमन 
दिग्भ्रमित करने लगा
शब्दों के मायाजाल में
सहज मन उलझने लगा।
बढ़ गईं खामोशियाँ
जो अंतर को उकसाने लगीं,
निःशब्द शोर मेरे हृदय के
ये नहीं प्रारब्ध है।
लेखनी स्तब्ध है
मिलता न कोई शब्द है।

चाहतों के पंख पे
उड़ता चला मेरा भी मन,
आसमाँ से तोड़ शब्द 
भर लूँगी मैं खाली दामन।
शब्द बिखरने लगे
रसनाई सूखने लगी,
देखकर ये गत मेरी
मेरा दिल शोक संतप्त है।
लेखनी स्तब्ध है
मिलता न कोई शब्द है। 

जीवन के अनोखे अनुभव
कुछ मधुर तो कसैले कई 
भाव इक-इक हृदय घट में
पल-पल मैंने समेटे कई
वो भाव अकुलाने लगे
बेचैनी दर्शाने लगे
बयाँ करूँ कैसे उन्हें मैं
जो हृदय में अब तक ज़ब्त हैं
लेखनी स्तब्ध है
मिलता व कोई शब्द है........
मालती मिश्रा

चित्र साभार....गूगल से













Saturday, 13 May 2017

माँ

जब-जब मुझको हिंचकी आती
तब याद माँ तेरी थपकी आती
जब तपती धूप सिर पर छाई
तेरे आँचल की ठंडक याद आई
ठोकर से कदम लड़खड़ाने लगे
तेरी बाँहों के घेरे याद आने लगे
तन्हाई मुझे जो सताने लगी
तेरी लोरी मुझको सुलाने लगी
माँ कर्ज तेरा लिए चलती हूँ
तुझसे मिलने को मचलती हूँ
यूँ कहते हुए हुए दिल रोता है
अच्छा तो अब मैं चलती हूँ।
दुनिया का दस्तूर निभाने को
खुद कोखजनी को दूर किया
चाहूँ तो भी कर्ज चुका न सकूँ
दस्तूर ने मुझे मजबूर किया।
मातृदिवस की ये बधाइयाँ फिर
यादें सारी लेकर आईं
तेरी ममता तेरा वो दुलार
हृदय में हूक सी बन फिर छाई।
मालती मिश्रा

चित्र साभार...गूगल

मन की पाती


भोर हुई जब कलियाँ चटकीं
डाली पर चिड़ियाँ चहकीं,
पत्तों ने खिड़की खटकाया
मैं समझी कोई अपना आया।

चंदा भी थककर सफर से
अंबर की आगोश समाया,
संगी साथी तारक जुगनू
सबको मीठी नींद सुलाया।

दृग सुमनों के खुलने लगे
मधुपों ने गाकर उन्हें जगाया,
चहुँदिशि में सौरभ बिखराने
पवन भी गतिमय हो आया।

संध्या को गए सब भोर को आए
दिनकर ने स्वर्ण कलश बिखराए,
पशु-पक्षी सब खुशियों में झूमें
नवल-सरस सुर में मिल गाएँ।

रजत रश्मियाँ पकड़ के झूले
मुरझाए सूरजमुखी फूले,
अभिनंदन करने दिनेश का
पथ में पाटल पुष्प बिछाए।

मिलन को आतुर खोल कपाट
इत-उत निरखूँ बाट मैं जोहूँ,
दूर डगर धुँधलाने लगे सब
नयनों में तेरा रूप समाया।

छायी गहन विरहा की उदासी
बैठ झरोखे मैं बाट जोहती,
और तो काहू से बोल न पाऊँ
चिड़ियाँ बाँचें मेरे मन की पाती।

मालती मिश्रा
चित्र साभार..गूगल

Saturday, 6 May 2017

अधूरा न्याय

आज सब गर्वित हो कहते हैं
निर्भया को न्याय मिल ही गया,
कुछ लोगों की नजरों में
हमारा कानून फिर महान बन गया।
पर पूछे कोई उस बिलखती आत्मा से
क्या उसको तृप्ति मिल पाई,
अपने अंगों को क्षत-विक्षत कर भी
अपनी अस्मत को बचा नहीं पाई।
या आज भी वह भटक रही है
उस वहशी नराधम के पीछे,
जिसे वह कानून संरक्षण दे रहा
जो उस रात था आँखें मीचे।
उसने उसकी नाजुक काया ही नहीं
आत्मा भी घायल कर डाला था,
अपने भीतर की हैवानियत को
उसने उस घड़ी दिखा डाला था।
क्रूरतम कोई राक्षस भी न होगा
जितना वह मानव रूप हुआ,
और हमारे कानून के समक्ष
वह नाबालिग मासूम हुआ।
एक माँ ने अपनी लाडली को
कितने अरमानों से पाला था,
अपने ममता के आँचल को
उसने झूला बना डाला था।
उसके आँचल को तार-तार किया
कैसे वह नाबालिग हुआ,
जिस कामवशी नराधम मानव ने
एक मासूम का जीवन छीन लिया।
एक माँ की गोद सूना किया
पिता की आँखें बेनूर किया,
भाई की कलाई सूनी करके
जीवन भर का पश्चाताप दिया।
उस पापी को बालक बताने वाला
कानून भी उतना ही दोषी है,
समाज में उसे जीवन देने वाले
भेड़िये अपराध के पोषी हैं।
निर्भया की आँखों से बहते लहू
तब तक नही तृप्त होंगे,
जब तक नीच अफरोज के
अंग-अंग कटकर न विक्षिप्त होंगे।
गर कानून इसे सजा दे न सके
तो फिर भाइयों को जगना होगा,
इस वहशी के कृत्यों के लिए
निर्भया के न्याय को चुनना होगा।
नारी की मर्यादा याद रहे
जन-जन में ये भाव भरना होगा,
कानून ने किया जो न्याय अधूरा
उस न्याय को पूरा करना होगा।।
मालती मिश्रा



बेटा जन इन माँओं ने
भारत माँ की सेवा में खपा दिया
लानत होगी सरकार पर
जो बलिदानों को इनके गँवा दिया
माँ की बिलखती ममता को
तब तक न पूर्ण तृप्ति होगी
जब तक शत्रुओं के लहू से
देश की धरती को न भिगा दिया

Thursday, 27 April 2017

शत-शत नमन


कितने ही घरों में अँधेरा हो गया
सूख गया फिर दीयों का तेल
उजड़ गई दुनिया उनकी
जो हँसते मुसकाते रहे थे खेल

देख कर आँसुओं का समंदर
क्या आसमाँ भी न रोया होगा
दूध से जो आँचल होता था गीला
खून से कैसे उसे भिगोया होगा

आँखों में लिए सुनहरे सपने जिसने
चौथ का चाँद निहारा होगा
मेंहदी भी न उतरी थी जिन हाथों की
उनसे मंगलसूत्र उतारा होगा

सूनी आँखों से तकती थीं जो राहें
उन माओं ने मृत देह निहारा होगा
बेटे के काँधे पर जाने की चाह लिए पिता ने
बेटे की अर्थी को काँधे से उतारा होगा

हर रक्षाबंधन सूना हो गया
बहनों का वीर सदा के लिए सो गया
अनचाहे निष्ठुर हो गये वो लाल
माँ की आँखों का नूर खो गया

खुशियों का भार उठाती है जो मही
निर्जीव पूतों को कैसे उठाया होगा
लहराता है जो तिरंगा अासमां में शान से
बन कफन वीरों का वो भी थर्राया होगा।

मालती मिश्रा

Tuesday, 18 April 2017

अच्छाई और सच्चाई के मुकाबले बुराई और झूठ की संख्या बहुत अधिक होती है। इसका साक्षात्कार तो बार-बार होता रहता है। हम देश में सुरक्षित रहकर स्वतंत्रता पूर्वक अपना जीवन जीते हैं तो हमें अभिव्यक्ति की आज़ादी, सहिष्णुता-असहिष्णुता, दलित-अधिकार, अल्पसंख्यक आदि सबकुछ दिखाई देता है, हम सभी विषयों पर खुलकर चर्चा करते हैं या यूँ कहूँ कि बिना समझे अपना मुँह खोलते हैं। हमारे बोल देश-विरोधी हैं या समाज विरोधी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। परंतु ऐसे ही लोगों को पकड़ कर सरहद पर खड़ा कर देना चाहिए जो सेना के मुकाबले विद्रोहियों, देशद्रोहियों के अधिकारों की पैरवी करते हुए मानवधिकार का हवाला देते हैं।
जब तपती धूप और शरीर को जलाती लू में खुले आसमान के नीचे खड़े होंगे, जब सर्द बर्फीली हवाएँ शरीर को छेदेंगी, जब वर्षा की धार पैर नहीं टिकने देगी.... तब इन्हें समझ आएगा कि एक सैनिक की ड्यूटी कैसी होती है, तब इन्हें सहिष्णुता-असहिष्णुता, दलित-अधिकार, अल्पसंख्यक और मानवाधिकार आदि के नाम भी याद नहीं आएँगे। गर्मी में ए०सी० की ठंडक, सर्दी में रूम हीटर की गर्मी और बरसात में अपने बंगले की मजबूत छत इन सब राजसी ठाट-बाट में रहकर देश-दुनिया की चर्चा करना हर किसी के लिए आसान होता है परंतु हम मानव प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ होकर भी एक पशु जितनी समझ भी नहीं रख पाए। एक पशु भी जिसकी रोटी खाता है, जिसकी शरण में रहता है उस पर न भौंकता है और न ही उसे किसी प्रकार का नुकसान पहुँचाने का प्रयास करता है। परंतु मानव विशेषकर भारत के नागरिक जिन सैनिकों, जिन सुरक्षा बलों की सुरक्षा के साए में आजा़दी की सांस लेते हैं, जिनकी सुरक्षा में रहकर बेफिक्री की नींद सोते हैं, उन्हीं पर पत्थर बरसाते हैं,उन्हीं का अपमान करते हैं और वो भी किस लिए? चंद रूपयों के लालच में। इससे तो यही सिद्ध होता है कि इन्हें आजाद रखने की बजाय यदि बंधक बनाकर रखा जाता और रोज इनके मुँह पर कागज के चंद टुकड़े फेंके जाते तो शायद ये ज्यादा वफादारी दिखाते।
सोने पर सुहागा तो यह हुआ कि जो लोग एक अखलाक के मरने पर पूरे विश्व में असहिष्णुता का विधवा विलाप कर रहे थे, देश को बदनाम कर रहे थे, अवॉर्ड वापसी की नौटंकी कर रहे थे उन्हें इन आततायियों के पत्थर और इनका जवान (सुरक्षा कर्मी)को लात मारना दिखाई नहीं पड़ा, जिन लोगों ने देशद्रोह का नारा लगाने वाले उमर खालिद और कन्हैया को गोद लेकर कोर्ट में उनको बेगुनाह साबित करने के लिए बड़े-बड़े वकील खड़े कर दिए उन लोगों को सैनिकों का अपमान दिखाई नहीं देता, बस यदि कभी कुछ दिखाई देता है तो सिर्फ ये कि मौजूदा सरकार को किस प्रकार अपराधी के कटघरे में खड़ा करें...
यदि कश्मीरी आतताई पत्थर मारते हैं तो ये कहेंगे कि सरकार क्या कर रही है? और यदि ये आतताई पकड़ लिए जायँ तो यही राजनीति के प्यादे कहते हैं कि सरकार मानवाधिकार का हनन कर रही है, बेचारे बच्चों पर जुर्म कर रही है। मैं ही नही देश की जनता भी यही जानना चाहती है कि जब यही बेचारे बच्चे पत्थर मार रहे थे तब आप लोग किस बिल में मुँह छिपाकर बैठे थे या आप लोगों की नजर में क्या सैनिकों और सुरक्षा बलों का मानवाधिकार नहीं होता, क्यों उनका दर्द नहीं दिखता चंद जयचंदों को क्यों सिर्फ उन लोगों का मानवाधिकार दिखाई देता है जिनमें मानवता नाम की चीज नही होती।
मैं भी सरकार से कुछ अपेक्षाएँ रखती हूँ और चाहती हूँ कि ऐसे पत्रकारों, नेताओं, समाज के ठेकेदारों, बुद्धिजीवियों पर शिकंजा कसे जो इस प्रकार के आततायियों को बेचारा बताकर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहते हैं। निःसंदेह ऐसे-ऐसे तथ्य सामने आएँगे जिससे ये स्पष्ट हो जाएगा कि ये लोग हमेशा खुलकर देशद्रोहियों का ही साथ क्यों देते हैं। सेना पर पत्थर फेंकना हो, उन पर आक्रमण हो उस समय बहुत से बुद्धिजीवी और अधिकतर पत्रकारों की ऐसी चुप्पी देखने को मिलती है मानों कहीं कुछ हुआ ही न हो और जैसे ही उन पत्थर बाजों में से कोई पकड़ा जाता है ये सभी अपने-अपने खोल उतारकर मैदान में आ डटते हैं ये सिद्ध करने के लिए कि पत्थर बाज और आततायी मासूम हैं और सेना उनपर जुर्म कर रही है। पत्थर बाजों का मनोबल बढ़ाने वाले सिर्फ पाकिस्तान में नहीं उनमें से बहुत से तो यहीं दिल्ली में बैठकर ही सारी नौटंकी का क्रियान्वयन करते हैं, हाथ बेशक किसी के भी हों पत्थर पकड़ाने का कार्य तो वही करते हैं जो सरकार को असक्षम साबित करना चाहते हैं। पत्थर बाजों के सूत्रधारों की गर्दन पकड़ी जाए और कोई नरमी न बरतते हुए पत्थर के बदले गोलियाँ दागी जाएँ तो अपने आप सेना का मान बढ़ेगा और आततायियों के हौसले पस्त होंगे। हाथों में पत्थर पकड़ने और जवान पर लात मारने या अपमान करने वालों को पहले से पता हो कि वो किसी भी क्षण सैनिक की गोली का शिकार हो सकता है तो वो कभी पत्थर नहीं उठाएगा।
मालती मिश्रा