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Saturday, 28 November 2015

दर्द से रिश्ता


क्यों भागते हैं लोग खुशियों के पीछे
खुशियाँ तो हैं छलावा,
छिपा कर दर्द दिल में
करते हैं सब दिखावा
चिपका कर होठों पर झूठी मुस्कान
लिए फिरते हैं दिल में दर्दोंं का तूफान
फिर भी खुशियों को ही मानके
अपना सच्चा हमसफर,
दुखों से छुड़ाते रहते दामन
दर्द कहता सच्चा दोस्त हूँ मैं तेरा
कर मुझ पर ऐतबार ऐ इंसान....
खुशियाँ आएँगीं.....
झलक दिखलाकर चली जाएँगीं,
मैं सदा रहूँगा साथ तेरे
तू जोड़कर रिश्ता अपना...
मुझसे सच्चे दिल से
फिर देख दर्द में भी कैसे....
मुस्कुराता है तू ,
पाएगा हमेशा साथ मुझे....
कभी तन्हा खुद को पाएगा न तू 

साभार....मालती मिश्रा

Wednesday, 18 November 2015

किस ओर जा रहा देश मेरा......


किस ओर जा रहा देश ये मेरा.....

जिसने दिया शून्य का ज्ञान
जिसपर करते थे हम मान
जो कहलाया विश्व गुरू
विज्ञान का जहाँ से जन्म शुरू
सत्ता के लोभी जीवों ने 
डाला इस पर डेरा...
किस ओर जा रहा देश ये मेरा...

कालिदास, पाणिनी से विद्वान
आर्यभट्ट, चाणक्य महान
इस धरती पर ले जन्म जिन्होंने
ज्ञान से बढ़ाया इसका मान
गंगा-जमुना, सतलुज की धारा ने
जिसका पाँव पखेरा..
किस ओर जा रहा देश ये मेरा...

गाँधी, बुद्ध की ये धरती
जिसे पाने को दुनिया मरती
सम्राट अशोक जिसका सिर-मौर्य
गाता विश्व जिसकी संस्कृति का शौर्य
देश विरोधी जयचंदों ने
आज है उसको घेरा
किस ओर जा रहा देश ये मेरा....

अपनी सुसंस्कृति की खातिर
पूजा गया सदा जो देश
उसी संस्कृति का पालन आज
पैदा करने लगा है क्लेश
पाश्चात्य आडंबरों ने आकर 
मान्यताओं को है बिखेरा
किस ओर जा रहा देश ये मेरा...

पूजी जाती थी जो नारी
लगती है आज वही भारी
जन्म से पहले मार दिया
जन्मी तो दुत्कार दिया
नारी की अवमानना में किसी ने 
कोई कसर न छोड़ा
किस ओर जा रहा देश ये मेरा...

जिस देश की धरती शस्य श्यामला
पेट भरे बिन पूछे धर्म
आज उसी के चंद सपूत
भरें तिजोरी किए बिन कर्म
बाधा बने जो इनकी राहों का
असहिष्णु बता उसे ही घेरा
किस ओर जा रहा देश ये मेरा....
किस ओर....

साभार....मालती मिश्रा

Thursday, 12 November 2015



चहुँ ओर रहे प्रकाश का बसेरा
हर पल बना रहे खुशियों का सवेरा

ढूँढ़ते रह जाओगे



ईमानदारी की बातें 
सुकून भरी रातें
मानवता की सौगातें
ढूँढ़ते रह जाओगे

गिरते हुए दाम
दफ्तरों में काम 
जगत् गुरु का नाम
ढूँढ़ते रह जाओगे

सस्ती शिक्षा
मुफ्त में गुरु की दीक्षा
निस्वार्थ समीक्षा
ढूँढ़ते रह जाओगे

नेताओं में देशभक्ति
लेखकों की लेखनी की शक्ति
साधु-संतों में ईश भक्ति
ढूँढ़ते रह जाओगे

स्कूलों में पढ़ाई
बस अड्डों पर सफाई
ईमानदारी की कमाई
ढूँढ़ते रह जाओगे 

बड़ों का सम्मान
अपनी मातृभाषा पर अभिमान 
गरीबों को दान
ढूँढ़ते रह जाओगे

परोपकार की साधना
इंसानियत की भावना
दूसरों के दुखों को बाँटना
ढूँढ़ते रह जाओगे

भारतीय संस्कृति का मान
हिन्दी की शान
देशभक्ति का दिल से गान
ढूँढ़ते रह जाओगे

जनता का निस्वार्थ वोट
नेता बिन खोट 
बुराई पर अच्छाई की चोट 
ढूँढ़ते रह जाओगे 

कर्णप्रिय संगीत 
भाव प्रधान गीत
गरीबों का सच्चा मीत
ढूँढ़ते रह जाओगे 

साभार......मालती मिश्रा

Wednesday, 4 November 2015


यह सत्य सनातन है कि अच्छाई को बार-बार परीक्षा के मार्ग से गुजरना पड़ता है किंतु यह भी सत्य है कि बार-बार आग में तपने के बाद सोना कुंदन बन जाता है | जब सतयुग में भी सत्य को परीक्षा के दुर्गम मार्गों पर चलना पड़ता था तो यह तो कलयुग है फिर आज यदि हम सिर्फ यह सोचकर कि "जीत तो सत्य की ही होगी" निष्क्रिय होकर बैठ जाएँ तो इसमें कोई संदेह नहीं कि सत्य को हार का मुँह देखना पड़े...गलत नहीं कहा गया कि "इक दिन ऐसा कलयुग आएगा, हंस चुगेगा दाना-दुनका कौवा मोती खाएगा" आज यही सत्य चहुँओर व्याप्त है, आखिर समय की मार से न कोई बचा है न बचेगा फिरभी समय का फेर समझकर अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं होना चाहिए...एकबार फिर जो परीक्षा की अग्नि में तपकर निखरे वही कुंदन...
शुभरात्रि
साभार.....मालती मिश्रा

Tuesday, 3 November 2015

                                     

अपने ही देश मे गर पाना है सम्मान 
छोड़-छाड़कर धर्म अपना सब बन जाओ खान
शाकाहारी भोजन करना मानवता का अपमान
गौ माता का वध करना घर्मनिरपेक्षता का प्रमाण
अपमान का हलाहल विष चुपचाप पी जा नादान
चोटें खाकर भी घातक का सदा बढ़ाता जा तू मान
छोड़-छाड़कर धर्म अपना सब बन जाओ खान



Sunday, 1 November 2015

वापसी की ओर


गाड़ी धीरे-धीरे सरकती हुई प्लेटफॉर्म पर रुक गई, एक हाथ में अटैची और दूसरे हाथ से बैग को कंधे पर लटकाते हुए उसने गाड़ी से नीचे प्लेटफार्म पर पैर रखा ही था कि बाबूजी कुली..एक बूढ़े से व्यक्ति ने पास आते हुए पूछा, वह व्यक्ति इतना कमजोर था कि शरीर का मांस इस कदर सूख चुका था कि उसके हाथों की सिर्फ उभरी हुई नसें ही हड्डियों पर चिपकी दिखाई दे रही थीं जिन्हें चमड़ी के पतले से आवरण ने ढक रखा था...दिन भर के अनवरत सफर के बाद सूर्य देव भी थककर बादलों के आँचल में समा चुके थे और निशा ने अपनी ठंडी चादर चहुँओर पसारना शुरू कर दिया था, शाम का धुँधलका इतना गहरा चुका था कि वह उन बुजुर्ग महानुभाव का चेहरा साफ-साफ नहीं देख पा रहा था...परंतु न जाने उस चेहरे में क्या था कि वह उसे देखने के लिए अधीर हो रहा था....साबह कुली चाहिए! पीछे से आवाज आई, अ न नही उसने अचकचाते हुए जवाब दिया....अचानक ट्रेन की सीटी बजी और ट्रेन पुन: धीरे-धीरे सरकने लगी और अनायास उसका ध्यान उस ट्रेन की तरफ चला गया, ट्रेन ने गति पकड़ ली और देखते ही देखते इतनी दूर निकल गई कि इस गहराते शाम मे काली सी परछाई भी धीरे-धीरे गायब होती हुई दिखाई दी..वह पुनः पलटा पर ये क्या वो बूढ़ा कुली कहाँ गया ? उसने इधर उधर गर्दन घुमाई थोड़ी दूरी पर वो वापस जाता हुआ नजर आया, उसकी चाल में ही उसके शरीर की थकान साफ दिखाई पड़ रही थी हालाँकि कुली की आवश्यकता न थी परंतु न जाने क्यों उसने पुकारा..काका सुनो, बूढ़ा कुली पलटा..बाबूजी मुझे बुलाया? उसने वहीं से पूछा,
हाँ काका आपको ही बुला रहा हूँ....वह बूढ़ा कुली नजदीक आया, लाओ बाबू सामान दो..
न चाहते हुए भी उसने अटैची बूढ़े कुली को दे दी क्या करता ये भी तो नही कह सकता था आपकी स्थिति पर दया आ रही है इसलिए आपको सामान नही दे सकता, ऐसा कहने से उस बूढ़े व्यक्ति के आत्म सम्मान को ठेस पहुँचने का भय था| वह व्यक्ति कितना स्वाभिमानी होगा जो इस जर्जर अवस्था में भी मेहनत करके अपना पेट भर रहा है जबकि शहरों में तो हृष्ट-पुष्ट होते हुए भी कितने ही लोग भीख माँगते हैं....इसीलिए तो उसका मन उस बूढ़े कुली के प्रति सम्मान से भर गया| बैग भी दे दो बाबू, बूढ़े कुली ने कहा..
नहीं काका ये तो बहुत हल्का है मेरे कंधों पर ही ठीक है, अच्छा ये बताओ हरीपुर के लिए कोई सवारी मिलेगी? उसने बैग से ध्यान हटाने के लिए जल्दी से पूछा..
ह हाँ बाबू मिलेगी, लेकिन आप हरीपुर में किसके घर जाओगे?
आप जानते हो काका वहाँ के लोगों को?
हाँ बाबू जानता हूँ, कहकर वह बूढ़ा कुली अटैची को सिर पर रख कर एक ओर को चल पड़ा...
काका वो ठाकुर दीनदयाल हैं न मुझे उनके घर जाना है, कहते हुए वह उनके पीछे-पीछे चल पड़ा...अच्छा, चलो अभी तो आपको टैम्पो मिल जाएगा थोड़ी और देर हो जाती तो कोई सवारी वाला रात को उतनी दूर जाने को तैयार न होता..
हम दूर के कुलियों को तो रात प्लेटफार्म पर ही गुजारनी पड़ती है....बातें करते हुए दोनों स्टेशन के बाहर आ गए, बूढ़े कुली ने सामान एक टैम्पो मे रख दिया और ड्राइवर की सीट पर बैठे तीस-बत्तीस साल के युवक को जैसे अनकही हिदायत देते हुए कहा-हरीपुर के ठाकुर दीनदयाल की कोठी पर जाएँगे, रात की धुँधली रोशनी में अब नजरें गड़ाने के बावजूद वह उनका चेहरा नही देख पा रहा था अभी खंभे की लाइट भी नही जली शायद देर से जलती होगी| काका कितने पैसे हुए उसने पूछा, बाबू अब आपसे पैसे क्या लेना, मेहमान हो आप हमारे...
नहीं काका पैसे तो लेने पड़ेंगे, कहते हुए उसने पचास का नोट बूढ़े कुली के हाथ मे पकड़ा दिया, पर बाबू ये तो बहुत ज्यादा हैं...
कोई बात नहीं काका जब वापस जाउँगा तब बराबर कर लेना| टैम्पो चल पड़ा , उसे अचानक याद आया कि उसने काका की पहचान तो पूछी ही नहीं.. उसने पीछे मुड़कर देखा तब तक काका स्टेशन के गेट से भीतर जा चुके थे.....टैम्पो में सिर्फ पाँच लोग ही थे जो आपस में बातें करने में मशगूल थे, उनकी बातों से ऐसा प्रतीत होता था जैसे वो एक गाँव के न होते हुए भी एक-दूसरे से भली-भाँति परिचित थे, रिहायशी इलाके की गलियों से हिचकोले खाता हुआ टैम्पो अब मेन रोड पर आ गया था वह पूरे दस साल के बाद यहाँ आ रहा है, उसे बदलाव की उम्मीद तो थी परंतु इतनी नहीं जितनी देखने को मिल रही है....कच्चे मकानों के स्थान पर पक्के मकान, गलियाँ भले ही टूटी हुई पर पक्की थीं, गाँव से स्टेशन तक कच्चे रास्ते की जगह पक्की सड़कें.....सड़क के दोनो ओर अँधेरे में वह कहीं बिजली और कहीं लालटेन की रोशनी में टिमटिमाते गाँवों को पहचानने की कोशिश कर रहा था परंतु अभी तक किसी भी गाँव को पहचान न पाया था, कुछ गाँवों के नाम याद थे परंतु उनकी निशानियाँ ढूँढता हुआ कितना आगे निकल आया यह उसे तब पता चला जब ड्राइवर ने कहा-भैयाजी आपका गाँव आ गया|
भैया क्या आपको पता है ठाकुर दीनदयाल के घर का रास्ता, वो मैं काफी सालों के बाद आया हूँ तो सब कुछ मुझे अजनबी सा लग रहा है....
हाँ हाँ भैयाजी चलो मैं आपको कोठी तक छोड़ देता हूँ, कहते हुए उसने सामान उठा लिया, वह चुपचाप बिना कुछ बोले पीछे-पीछ चलने लगा...थोड़ी देर मे बिजली की रोशनी में नहाई ठाकुर साहब की कोठी के सामने थे वे दोनो... ड्राइवर को पैसे देकर उसने धन्यवाद बोलते हुए विदा किया और स्वयं कोठी के भीतर प्रवेश किया |
बूढ़े हो चले चाचा-चाची और उनके इकलौते बेटे उसे देखकर हैरान थे, किसी को उम्मीद न थी कि वो यहाँ वापस आएगा क्योंकि सालों से न कोई खत न संदेश, सभी ने ये सोच लिया था कि अब वह शहर से दूर आना ही नही चाहता, बहू और पोते के लिए तो वह अजनबी ही था वो उसे पहली बार देख रहे थे उनकी आँखों में जाने पहचाने से प्रश्न तैर रहे थे कि वह कौन है, कहाँ से आया, उसका ध्येय क्या है? आदि|
सालों बाद सबने साथ गपशप के बीच भोजन किया, अपने परिवार के बीच आकर वह अत्यंत खुश था परंतु फिरभी कहीं कुछ अधूरा सा महसूस कर रहा था उसका हृदय और मस्तिष्क कुछ ढूँढ रहे थे और भी बहुत कुछ जानना चाहते थे....वह सफर के बाद थक गया होगा उसे अब आराम करना चाहिए ऐसा कहकर चाची ने उसका बिस्तर लगवा दिया और सफर की थकान के कारण निद्रा ने कब उसे अपने आगोश मे ले लिया उसे पता ही न चला|
सूरज की किरणों की तीव्र चमक ने उसे अपनी आँखें खोलने पर विवश कर दिया, वह उठ बैठा खिड़की से सूरज की सीधी रोशनी कमरे मे आ रही थी वह कमरे से निकल कर घर के पीछे वाले बरामदे में आ गया...बरामदे के बाद बड़ा सा आँगन और आँगन की चारदीवारी से बाहर एक छोटा सा घर...

जिसके आँगन की दीवार कहीं-कहीं से टूटी हुई थी, घर पुराना और जर्जर हो चुका था, आँगन में कपड़े सुखाने की रस्सी बँधी हुई थी परंतु ऐसा लगता था कि वहाँ कोई नहीं रहता...वह बरामदे से निकला आँगन पार किया और धीरे-धीरे चलता हुआ उस छोटे से घर के टूटे-फूटे आँगन में आ गया, अनायास ही उसके हाथ कपड़े सुखाने की रस्सी को छूकर कुछ महसूस करने लगे..कहाँ गए होंगे ये लोग? हरीराम काका, काकी और आशा..हाँ आशा कैसी होगी अब? अब तो उसके आठ-नौ साल के बच्चे भी होंगे...सोचते हुए उसके होठों पर एक मुरझाई हुई मुस्कान तैर गई...कैसे वह बचपन से जवानी तक अपने घर से ज्यादा इस घर में रहता था...जब से उसकी माँ का देहान्त हुआ था कमला काकी उसे अपनी औलाद की तरह मानती थीं उनका कोई बेटा नहीं था लेकिन वो हमेशा कहतीं कि मेरी दो औलादें हैं मेरा बेटा विजय और बेटी आशा.... कमला काकी और हरीराम काका ने उसे माँ-बाप का प्यार दिया, एकबार तो काका उसकी खातिर चाचा जी से भी बहस कर बैठे थे, उसे कोई डाँटे वो चाहे चाचा-चाची ही क्यों न हों..काका और काकी को बर्दाश्त नहीं होता था| काकी हर दूसरे तीसरे दिन उसकी पसंद का कुछ न कुछ अवश्य बनातीं और पहले उसे और आशा को खिलाकर तभी किसी और को खाने को देतीं, काका तो उसे अपने कंधे पर बैठाकर खेतों बागों तक तो ऐसे घुमाने ले जाते जैसे वो उनका अपना बेटा हो....उसे याद है चाचा ने एकबार काका से कहा था हरीराम भगवान ने इसे गलती से हमारे घर भेज दिया दरअसल वो भेजना तो तुम्हारे ही घर चाहता होगा....तब काका ने कहा था कि सही कह रहे हो ठाकुर लेकिन भगवान ने अपनी गलती सुधारने के लिए हमे पड़ोसी बना दिया और दोनो हँस पड़े थे| विजय के प्रति काका-काकी के स्नेह ने दोनों परिवारों के बीच की आर्थिक असमानता के भेद को समाप्त कर दिया था|
साथ खेलते-कूदते, आशा और विजय ने जवानी की दहलीज पर कब कदम रखा ये अहसास भी उसे तब हुआ जब एक दिन चाची ने कहा कि वह काका के घर कम जाया करें नहीं तो जवान लड़की है उसकी बदनामी होगी....उसे ऐसा महसूस हुआ था जैसे किसी ने उसे गहरी खाई में धक्का दे दिया हो....उसके मस्तिष्क में कभी ऐसा कोई खयाल आया ही नहीं कि कहीं कुछ बदला हो....हरीराम काका और काकी के व्यवहार में तो कोई बदलाव नहीं आया फिर चाची ने ऐसा क्यों कहा? ये प्रश्न विजय को सोने नहीं दे रहा था, करवटें बदलते हुए जब काफी रात हो गई तो वह उठा और काका के घर की ओर चल पड़ा आँगन के बाँसों को चीरकर बनाए गए दरवाजे को धकेल कर भीतर पहुँचा ही था कि काका की धीमी आवाज उसके कानों में पड़ी और बरामदे में पैर रखते हुए वह वहीं रुक गया.. आशा की माँ क्यों इतनी फिकर कर रही हो जितने मुँह उतनी बातें होती हैं हम किस-किस को रोक सकते हैं?
तो अब क्या हम अपने बच्चे को ही कह दें कि वो हमारे घर न आए, ऐसा कैसे कह सकते हैं हम? काकी की आवाज दुख के गहरे सागर में डूबती हुई सी प्रतीत हो रही थी...
हम ऐसा नहीं कहेंगे, अरे लोगों का क्या अगर वो कहेंगे कि कुएँ में कूद जाओ तो क्या हम कूद जाएँगे...बकने दो लोगों को,चलो सो जाओ और बेकार की चिंता छोड़ो... काका ने आक्रोश में कहा...
आवाजें आनी बंद हो गईं | विजय स्तब्ध होकर जड़वत खड़ा रहा, कुछ देर बाद वह वापस आया और अपने कमरे में जाकर लेट गया उसके दिमाग में तरह-तरह के प्रश्न उमड़-घुमड़ रहे थे...बेचैनी में करवटें बदलते-बदलते कब सुबह हो गई उसे पता ही न चला, सुबह तड़के ही उठकर टहलने जाने की आदत थी उसे, किंतु आज उसका मन न हुआ जाने का, वह लेटा रहा और कब उसे नींद आ गई पता ही न चला |
सूरज सिर पर चढ़ आया था जब चाची ने उसे जगाया....क्या हुआ बेटा तबियत तो ठीक है न? हाँ चाची ठीक हूँ, कहते हुए वह उठकर बैठ गया,
ठीक है जाओ नहा-धो लो फिर नाश्ता कर लो बाकी सभी कर चुके हैं, तुम सो रहे थे तो जगाया नहीं...चाची ने कहा|
नाश्ता करके विजय काका के घर जाने लगा किंतु बाहर तक पहुँच कर वापस लौट आया, न जाने क्यों आज वह खुद को अपराधी सा महसूस कर रहा था, काका-काकी उसपर अपनी जान छिड़कते हैं इसलिए उसे कुछ न कहेंगे परंतु वह जानता है कि आज वह उनकी परेशानी का कारण बन गया है....
चाची जी विजय कहाँ है दो दिन से दिखाई ही नही दिया,उसको पता है कि माँ जब तक उसे देख न लें उन्हें चैन नही मिलता फिरभी पता नही कहाँ गायब रहता है, आशा की आवाज ने उसे चौंका दिया, वह उठ बैठा और स्वयं को रोक न सका तुरंत जा पहुँचा काकी के पास, काकी उदास बैठी थीं...
क्या हुआ काकी इतनी परेशान क्यों हो? उसने पूछा
आओ बेटा बैठो, तुम तो दो दिन से आए ही नहीं..क्या हुआ?
तो इसलिए परेशान हो आप, विजय ने मुस्कराते हुए कहा
नही बेटा अब तुमसे क्या छिपाना बात कुछ और है,
विजय का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा..कहीं काकी उसे घर आने को मना न कर दें, फिर उसे माँ की तरह प्यार कौन करेगा, क्या वह रह पाएगा काकी के बिना....
बेटा पिछले महीने जो लोग आशा का रिश्ता पक्का कर गए थे वो आज मना कर गए..काकी ने मायूसी भरे लहजे में कहा,
क्यों? विजय स्तब्ध हो गया
पता नहीं कुछ बताया नहीं बस कह दिया कि अभी वो इस शादी के लिए तैयार नहीं, काकी ने बताया
कोई बात नही काकी वो कोई दुनिया का आखिरी रिश्ता तो था नहीं, और न ही हमारी आशा की उम्र निकली जा रही....इधर-उधर की बातें करके काकी का मन बहलाने के बाद वह बाहर निकल आया....
काकी को तसल्ली तो दे दिया विजय ने पर उसके मस्तिष्क में कई सवाल उमड़ने लगे...कहीं आशा का रिश्ता टूटने की वजह वही तो नहीं, आखिर आशा में कमी ही क्या है? सुंदर है, सुशील है, थोड़ा बहुत अक्षर ज्ञान भी है फिर ऐसी लड़की को कोई क्यों मना करेगा, दहेज भी वजह नजर नहीं आती आदि....सोचता हुआ वह काकी के घर से सीधा नदी की ओर जाने लगा, कुछ देर अकेले में शांति से रहना चाहता था......
हरीराम की बेटी का रिश्ता टूट गया तुम्हें पता है?  उसके आगे चलती दो बजुर्ग स्त्रियाँ आपस में बतिया रही थीं...हाँ पता है और उसका कारण भी वो उनका मुँहबोला बेटा विजय और खुद आशा ही है, जब देखो उन्हीं के घर में घुसा रहता है...दूसरी महिला ने कहा...अभी दो दिन पहले की बात है कोई कह रहा था कि वो रात को भी उनके घर से निकला था, अब जवान लड़का है कमला और हरीराम को भी सोचना चाहिए मुँहबोला ही तो है सगा तो नहीं है...अब उसपर नियंत्रण तो रखना ही चाहिए....विजय के पैरों तले जमीन खिसक गई, उसके विषय में लोग ऐसा सोचते हैं, उसने तो सपने में भी कल्पना न की थी, जिन काका-काकी ने उसपर अपना प्यार लुटाया आज वह उन्हीं की बेटी के बदनामी का कारण बनता जा रहा है....क्या दोष है उन लोगों का? अब वह ऐसा नहीं होने देगा, वह उनकी परेशानी का सबब नहीं बनेगा सोचता हुआ वह वापस घर की ओर मुड़ गया |
अगले ही दिन विजय ने चाचा जी को अपना निर्णय बता दिया कि वह आगे की पढ़ाई के किए शहर जा रहा है...उसने सोचा कि उसके जाने के बाद लोग आशा के बारे में बातें बंद कर देंगे और उसका विवाह किसी अच्छे लड़के से हो जाएगा, उसे लगा था कि चाचा को मनाने में शायद कठिनाई हो पर उसकी आशा के विपरीत चाचा जी तुरंत मान गए, शायद वह भी वही सोच रहे थे जो विजय सोच रहा था....
सभी तैयारियों के बाद शाम को निकलने से पहले विजय काका के घर गया उनका आशीर्वाद लेने....काकी उसके जाने की बात सुनते ही रोने लगी थीं, काका की भी आँखें नम थीं आशीर्वाद देते हुए काका ने कहा- मैं जानता हूँ बेटा तूने ऐसा फैसला क्यों लिया..मैं तुझे रोकूँगा नहीं तू शायद सही कर रहा है, पर अपने काका-काकी को भूलना मत मिलने आते रहना...
जरूर काका..मैं भला उन्हें कैसे भूल सकता हूँ जो मेरे माता-पिता हैं..विजय की आवाज रुँध गई,
मेरी शादी में तो आओगे न..पास खड़ी आशा ने कहा और अपने आँसू छिपाने के लिए मुँह दूसरी ओर घुमा लिया, हाँ....विजय आगे बोल न सका वह रो पड़े इससे पहले ही वह काका-काकी के पैस छूकर जल्दी से बाहर आ गया....आँखों में आँसू भरे होने के कारण उसे कुछ साफ दिखाई नही दे रहा था...
वह एक बेटे का फर्ज निभाने के लिए, काका-काकी के स्नेह का कर्ज चुकाने के लिए आज उन सभी से दूर जा रहा है जिनके बिना उसका एक पल भी न कटता था, परंतु आज उसके लिए दूर जाना ही आशा की जिंदगी को सही दिशा दे सकता है.....सोचते हुए वह गाँव से बाहर पहुँच चुका था वह पीछे मुड़कर जीभर कर अपने गाँव को देख लेना चाहता था, न जाने कब फिर यहाँ आना हो...ज्यों ही उसने गर्दन घुमाई....काका लगभग दौड़ते हुए आ रहे थे, उनके एक हाथ में थैले जैसा कुछ था...विजय वहीं ठिठक गया...
नजदीक आकर काका ने लगभग हाँफते हुए उसकी ओर थैला बढ़ाते हुए कहा-ये तुम्हारे लिए आशा ने स्वेटर बुना था कह रही थी सर्दी आने पर देगी और काकी ने तुम्हारी पसंद के लड्डू रखे हैं खा लिया करना, थोड़ा रुक कर काका ने विजय के सिर पर हाथ फेरते हुए भीगी हुई आवाज मे कहा, बेटा अपना ध्यान रखना खाने-पीने में लापरवाही न करना और जाते ही खत लिखना..
आप चिंता न करें काका मैं अपना ध्यान रखूँगा, आशा की शादी अच्छे घर-परिवार में करना लड़के की पूरी तरह से पूछताछ कर लेना, जल्दबाजी न करना...कहकर विजय ने विदा लिया....
कौन...कौन हो बाबू? पीछे से आई आवाज ने विजय की तंद्रा भंग की....
वह पीछे मुड़ा..वही दुबला-पतला मात्र हड्डियों का ढाँचा बुजुर्ग सामने खड़ा था |
विजय को काटो तो खून नहीं...क्काका ये कैसी हालत हो गई है आपकी, वह काका से लिपट कर रो पड़ा...विजय बेटा ये तू है...मुझे तो कल ही लग रहा था लेकिन अँधेरे में पहचान नहीं पाया और इतने सालों बाद उम्मीद भी तो छूट चुकी थी.....
मुझे माफ कर दो काका, पर ये सब क्या है ? आपकी ऐसी हालत और काकी कहाँ हैं, आशा कैसी है ? घर की ऐसी हालत क्यों है जैसे कोई रहता ही न हो ? उसने एक ही सांस में कई सवाल पूँछ डाले
बेटा बुढ़ापे का शरीर है क्या करें, तू खड़ा क्यों है आ भीतर चल..काका हाथ पकड़कर उसे भीतर बरामदे में बिछी खाट पर ले गए...दोनों बैठे, काका ने उसे बताया कि काकी आशा की शादी एक अच्छे अमीर खानदान के इंजीरनियर बेटे से हो गई है...दहेज देने और धूमधाम से शादी करने के लिए उन्होंने अपने खेत बेच दिए, काकी ने ही जिद की थी कि नसीब से अच्छा घर-वर मिल रहा है तो उसे हाथ से जाने नहीं देना चाहिए... और तुम भी तो चाहते थे न कि आशा की शादी अच्छे खानदान में हो तो तुम्हारी इच्छा की अवहेलना कैसे करते.....
और काकी...काकी कहाँ हैं ? विजय को जैसे कुछ अनजाना सा डर सता रहा था कि कहीं कोई बुरी खबर न हो उसकी धड़कनें तेज हो रही थीं..
बेटा वो आशा की तबियत कुछ खराब थी तो काकी वहीं गई है उसे देखने....देखना तुम्हारे आने की खबर मिलते ही वो बल्लियों उछलेगी, पागलों की तरह तुम्हारा इंतजार किया है उस पगली ने...कहते हुए काका की आँखें भर आईं
माफ कर दो काका अब शिकायत का मौका नही दूँगा....और आपका यह बेटा अब आपको कुली का काम भी नहीी करने देगा....मैं अपने काका काकी के बुढ़ापे की लाठी बनूँगा.....
बेटा तुमने शादी की? काका ने पूछा
आप लोगों के आशीर्वाद के बिना कैसे कर सकता था...अब तो आप ही अपने बेटे के लिए बहू ढूँढ़िएगा...अब मुझे काकी को लेने जाना है कहते हुए विजय उठ खड़ा हुआ......

साभार...मालती मिश्रा