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Tuesday, 27 October 2015

दोस्त

                 
सितारों की भीड़ से चुराया है आपको,
दिल से अपना दोस्त बनाया है आपको |
इस दिल को कभी टूटने न देंगे,
क्योंकि इसी दिल में छिपाया है आपको ||

Saturday, 24 October 2015

राजनीति का शिकार साहित्य


 आज गुरु जी की एक बात याद आ रही है..एक बार किसी बात पर उन्होंने एक छोटी सी कहानी सुनाई थी...कि किस प्रकार जंगल में खरगोश द्वारा आसमान गिरने की बात सुन सभी जानवर बिना सच जाने उसके पीछे भाग लेते हैं...हमारे देश में कुछ ऐसी ही भेड़चाल अक्सर देखने को मिलती है, जिधर भीड़ जा रही हो सभी उसी ओर चल पड़ते हैं...
आज फिर से कुछ ऐसी ही लहर चल पड़ी है...एक व्यक्ति जिस राह जा रहा है दूसरे बिना विचारे उसी राह पर चल पड़ते हैं और ये किसी भोले-भाले कम पढ़े-लिखे व्यक्ति की बात नहीं कर रही मैं बल्कि समाज के उच्च शिक्षित वर्ग की बात कर रही हूँ....जी हाँ आज हमारा साहित्यिक वर्ग जागरूक हो गया है....सचमुच बहुत ही प्रसन्नता की बात है कि जो साहित्यिक वर्ग साठ-पैंसठ सालों से सोया हुआ था वह आज जाग गया....उसकी नींद टूट गई और आँख मलता हुआ उठ खड़ा हुआ और जिसको जिधर जाते देखा बिना सोचे-समझे, बिना अपने विवेक को कष्ट दिए स्वयं भी उधर ही चल पड़ा| खैर अच्छा लगा यह देखकर कि चलो सुबह का भूला शाम को ही सही घर तो लौटा.....देर आए दुरुस्त आए....पर फिर भी इन्हें अर्ध निद्रा में देख ये कहने को मन करता है-उठो लाल अब आँखें खोलो, पानी लाई हूँ मुँह धो लो...ताकि आँखों से नींद का आवरण हटे और कुछ खुद के विवेक से सत्य को साफ-साफ देख सको....
साहित्य के ज्ञाता हो साहित्यिक हृदयधारी हो विवेकशील बुद्धिजीवी हो फिर तुम्हारे लिए तो प्रत्येक प्राणी एक समान होना चाहिए मुख्यतः मानव...तुम्हारे हृदय में तो सभी के लिए दयाभाव भी समान होना चाहिए....और वो है भी| परंतु ये करुणा अभी क्यों दिखाई दी ? जब एक अल्पसंख्यक को बेरहमी से मार डाला गया...उस वक्त ये करुणा कहाँ थी जब मुजफ्फर नगर में अल्पसंख्यकों ने बहुसंख्यकों को बर्बरता पूर्वक काटा था, उस वक्त आपका हृदय क्यों नहीं पसीजा जब गोधरा कांड हुआ,उस वक्त आपकी नींद क्यों नहीं टूटी जब कश्मीरी पंडितों को बेघर किया गया? तब आप सब बुद्धजीवियों को क्या भांग देकर सुला दिया गया था, जब अयोध्या कारसेवकों की नृशंस हत्याएँ हुईं और परिणाम स्वरूप हजारों निरपराधों को जघन्यता पूर्वक मारा गया, उस वक्त आप सभी साहित्यकार किन सपनों की दुनिया की सैर कर रहे थे जब सरदारों की नृशंसता पूर्वक हत्या कर रहे थे?  क्या वजह है कि आप सभी बुद्धजीवियों में अचानक ही जागरूकता आ गई....या फिर जिस प्रकार रावण ने सभी वीरों को समाप्त होते देख कुम्भकरण को जगाया और एक शक्तिशाली अस्त्र के रूप में प्रयोग किया उसी प्रकार आप लोगों को एक हथियार की तरह तैयार किया जा रहा था कि जब सभी अस्त्र-शस्त्र (सूट-बूट, जुमला, मँहगाई,हर व्यक्ति के अकाउंट में पंद्रह लाख ₹) समाप्त हो गए तब साहित्यिक बाहुबलियों को मैदान में उतारा गया....और अब एकदम ही सभी महारथी नमक का कर्ज उतारने मैदान में आ डटे...जो आना चाहते थे वो भी और जो नहीं आना चाहते थे वो भी...
इन सभी बुद्धिजीवियों के समक्ष मेरा कद बहुत ही छोटा है..अभी तो मैं खड़े होना सीख रही हूँ परंतु इतना ज्ञान मुझे भी है कि सत्य को हमेशा अकेले ही लड़ना पड़ता है और बुराइयाँ सदैव एकजुट होकर चौतरफा वार करती हैं तो मैं ये कैसे मान लूँ कि इन सभी साहित्यिक महारथियों को कौरव और पांडवों की पहचान न होगी...क्या ये सभी जागरूक वर्ग ये कहना चाहते हैं कि साठ-पैंसठ सालों में जो कुछ भी नैतिक-अनैतिक हुआ वो सब सही था और आज जो कुछ भी हो रहा है वो सब गलत है...यदि ऐसा है, यदि ये सत्य होता तो कोई अवॉर्ड तो नहीं है मेरे पास पर मैं अपनी लेखनी त्याग देती....
पर मैं जानती हूँ ये सही नहीं, यदि एक अल्पसंख्यक की हत्या जुर्म है तो अनेकों बहुसंख्यकों की हत्या भी उतना ही जुर्म है...यदि साहित्यिक वर्ग सचमुच जागरूक होता तो अपने शस्त्र से युद्ध करता....बुराई के खिलाफ अपने कलम की आवाज को बुलंद करता न कि हथियार छोड़कर ये कहकर भागता कि अब हमने लड़ना बंद कर दिया और ये बुराई हमसे देखी नहीं जा रही है इसलिए हम विरोध स्वरूप आँखें बंद करके ध्यानमग्न होने जा रहे हैं....
कितने दुख की बात है कि यहाँ आपसी रंजिश को भी दलित दमन का रूप दे दिया जाता है और बच्चों के पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार करने की बजाय उसका नुमाइश बना दिया जाता है और ये सब राजनीति के चलते होता है...परंतु हमारे साहित्यिक योद्धा इस कृत्य के खिलाफ एक शब्द नहीं बोल पाते...क्या करें बेचारे शायद करुणाघात से निःशब्द हो गए होंगे या अपने शस्त्र त्याग पहले ही निःशस्त्र हो चुके हैं, या फिर मैं ये कहूँ कि इस प्रकार की नकारात्मक राजनीति के पक्षधर ये हमारे साहित्य-सैनिक भी हैं....
विचारणीय है कि एक शक्तिशाली शस्त्र भी यदि अपनी स्वतंत्रता खोकर अंधभक्ति करने लग जाएगा तो देश किस ओर जाएगा.....

साभार...मालती मिश्रा

Wednesday, 21 October 2015

नारी के प्रति बढ़ते अपराधों का जिम्मेदार कौन ?


 हमारे देश की संस्कृति प्राचीनतम और विश्वविख्यात है, हमारा देश ही वह महिमामय देश है जिसकी पावन भूमि पर महान रिषि-मुनियों ने जन्म लिया, यही वो पावन भूमि है जहाँ भगवान राम और भगवान कृष्ण ने अवतार लिया इसी देश की संस्कृति से विश्व के अन्य धर्मों व संस्कृतियों का प्रादुर्भाव हुआ| धर्मों की दृष्टि से भी देखा जाय तो विभिन्न धर्मों के प्रवर्तक जैसे महात्मा बुद्ध, महावीर जैन आदि ने इसी पावन भूमि को गौरवान्वित किया| वीरता की दृष्टि से भी हमारे देश को सम्राट अशोक, महाराणा प्रताप, रानी लक्ष्मीबाई जैसे अनेक वीरों ने गौरवान्वित किया|
हमारे देश में जहाँ पहले स्त्री को देवी समान माना जाता था, कुछ असामाजिक तत्वों के द्वारा आज उसे भोग का साधन मात्र मान लिया गया है........
यहाँ स्त्री को पूजनीय मानकर सदा उसका सम्मान किया जाता रहा है , यदि हम अपने धार्मिक ग्रंथों का भी अवलोकन करें तो पाएँगे कि जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए जिन चीजों की आवश्यकता होती है उन सभी की स्वामिनी स्त्री ही है....जैसे-हमें जीने के लिए धन,विद्या(ज्ञान) और शक्ति की आवश्यकता होती है और इन तीनों ही महत्वपूर्ण शक्तियों की स्वामिनी क्रमश: लक्ष्मी जी,  सरस्वती जी और दुर्गा जी हैं...अर्थात् इस पुरुष प्रधान समाज में स्वयं को सर्व समर्थ मानने वाला पुरुष भी निष्कंटक जीवन तभी जी सकता है जब उस पर देवियों की कृपा हो और हर व्यक्ति इस बात को भली भाँति जानता भी है....इसीलिए विभिन्न रूपों में देवियों की पूजा की जाती है|परंतु दुनिया को रास्ता दिखाने वाले इस देश की गरिमा आज इसी के नागरिकों द्वारा कलंकित हो रही है, जिस देश में स्त्री को देवी माना जाता है उसी देश में कन्या भ्रूण हत्या द्वारा उन्हें दुनिया में आने से पहले ही खत्म कर दिया जाता है और जो दुनिया में आ गईं उनमें से कितनों को घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना, छेड़-छाड़, तेजाब हमला, बलात्कार जैसे शर्मसार कर देने वाली प्रताड़नाओं का सामना करना पड़ता है.....आज स्त्री बेखौफ होकर कहीं भी आ-जा नहीं सकती, आजकल के पुरुषों की मानसिकता इतनी कुंठित हो गई है कि स्त्री तो स्त्री छोटी-छोटी बच्चियों को भी अपनी हवस का शिकार बनाते हैं, ऐसी विक्षिप्त मानसिकता के लोग न सिर्फ लड़कियों के मन में समाज के प्रति असुरक्षा की भावना उत्पन्न कर रहे हैं बल्कि सभ्य पुरुषों की छवि भी खराब कर रहे हैं| आज समाज में कोई भी लड़की किसी भी व्यक्ति पर आसानी से विश्वास नहीं कर सकती भला इस प्रकार से किसी समाज या देश का विकास कैसे संभव हो ? जहाँ छोटी-छोटी बच्चियाँ भी सुरक्षित नहीं....

समाज में इस तरह की अराजकता फैलाने वाले बीमार मानसिकता के शिकार होते हैं किंतु इनकी ऐसी मानसिकता का जिम्मेदार आखिर है कौन?
आजकल छोटो-छोटे लड़के भी बेखौफ होकर तरह-तरह के अपराधों को अंजाम देते हैं जिनमें एक बलात्कार भी है| यदि मैं इसपर विचार करती हूँ तो मुझे तो बस यही समझ आता है कि ऐसे अपराधों का जिम्मेदार हमारा समाज और सबसे अधिक परिवार है जो अपने बच्चों को नैतिकता की शिक्षा नहीं दे पाता| लोग पुलिस और कानून पर उँगली उठा कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं, नेता या स्वयं को समाज का शुभचिंतक बताने वाले ऐसी हर घटना के बाद अपनी राजनीति करना नहीं भूलते और एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर जनता की नजर में स्वयं को उसका हितैषी साबित करने का  प्रयास करते हैं और कुछ रूपयों से और सहानुभूति के बोल बोल कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं...बहुत हुआ तो कैंडल मार्च करते हुए जनता के साथ सड़कों पर उतर आए.. पर क्या आज तक ऐसे कदमों से अपराधों में कोई कमी आई है? उल्टा अपराधी भी विरोध करने वालों में शामिल होकर कैंडल मार्च का हिस्सा बन शरीफों की भीड़ बढ़ाता है.....

मैं नहीं कहती कि कानून सख्त नहीं होने चाहिए बल्कि मैं तो ये कहती हूँ कि कानून सबके लिए समान होना चाहिए एक जुर्म की एक समान सजा सबके लिए होनी चाहिए फिर चाहे वो साठ साल का बुजुर्ग हो, पच्चीस साल का युवा हो या तेरह-चौदह साल का नाबालिग....किंतु सवाल यह है कि नौबत यहाँ तक आए ही क्यों ?क्यों बच्चों की मानसिकता इतनी कुंठित होती है कि वो हैवानियत पर उतर आते हैं? यदि मैं ये कहूँ कि हमारा हाईटेक टेक्निकल समाज ही इसका जिम्मेदार है तो गलत नहीं होगा....आजकल हमारे देश में भी शहरों में सत्तर प्रतिशत परिवार एकल परिवार होते हैं जिनमें अधिकतर परिवारों में माता-पिता दोनों कामकाजी होते हैं वो बच्चों को पूरा समय भी नहीं दे पाते जिससे बच्चे अपने मनोरंजन व पढ़ाई के लिए भी क्रमश: टेलीविजन और ट्यूशन व कंप्यूटर आदि पर निर्भर रहते हैं, ऐसे में वो उन नैतिक मूल्यों से वंचित रह जाते हैं जो पहले घरों में बच्चों को अपने दादा-दादी व माता-पिता से मिला करते थे| साथ ही आज की आधुनिक सोच जिसके तहत माता-पिता बच्चों का भविष्य बनाने के नाम पर उन्हें उस उम्र में अधिक छूट दे देते हैं जब उन पर ज्यादा अंकुश की आवश्यकता होती है..पढ़ाई के नाम पर अधिक से अधिक समय घर से बाहर बिताते हैं, माता-पिता बिना सवाल किए बच्चों की हर माँग को पूरा करते हैं तथा कभी पैसों का हिसाब नहीं  माँगते, ये भी किशोरावस्था के लड़कों के बिगड़ने का एक कारण है....
आजकल माता-पिता बच्चों को आधुनिक सुविधाएँ मुहैया कराकर अपने-आपको जिम्मेदारी से मुक्त मान लेते हैं जिसके कारण बच्चे मनमाने तरीके से दोस्तों के साथ बिना अच्छे-बुरे का भेद जाने वही करते हैं जो उन्हें अच्छा लगता है उन्हें पता है कि यदि उनसे गलती भी हो गई तो उन्हें बच्चा समझ कर छोड़ दिया जाएगा|
आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराते हुए बच्चों को मानसिक या शारीरिक आघात न पहुँचे इन बातों का ध्यान रखते हुए आजकल स्कूलों में भी बच्चों को किसी भी प्रकार से दंडित नही किया जाता, इसलिए बच्चे स्कूलों में भी मनमानी करते हैं...दोष स्कूलों का नही यदि माता-पिता ही नही चाहते कि उनके बच्चे को सिखाने के लिए सख्ती बरती जाय तो क्यों कोई स्कूल अपने लिए परेशानी खड़ी करेगा इसीलिए स्कूल भी लिखित सूचना आदि देकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं|
इसके साथ ही आजकल विद्यालयों में बच्चों को मातृभाषा, मातृभूमि,देशभक्ति,संस्कृति,संस्कार, समाज के प्रति कर्तव्य, नैतिकता आदि की बातें बताना तो दूर इनसे बच्चों को पूर्णतया अनभिज्ञ रखा जाता है, बच्चों को विदेशी भाषा, विदेशी संस्कृति का ज्ञान तो होता है किंतु अपने देश की संस्कृति से अनभिज्ञ होता है...सभी नामी स्कूलों का महज एक ही ध्येय होता है स्वयं को राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाश्चात्य शैली में सर्वोपरि लाना, जबकि यदि यही स्कूल बच्चों को सर्वोपरि रखकर कार्य करें तो समाज में ऐसी समस्याएँ उत्पन्न न हों...
इस प्रकार जब सभी (माता-पिता, स्कूल) अपनी जिम्मेदारियों का महज दिखावा करते हैं तो बच्चे को नैतिकता का पाठ कौन पढ़ाए??  परिणामस्वरूप यही बच्चे ऐसे-ऐसे अपराधों को अंजाम देते हैं जो कि मानवता को शर्मसार कर दे....

बेटियाँ जो माँ-बाप की लाडली हैं, बेटियाँ जो घरों की लक्ष्मी हैं, बेटियाँ जो दो-दो कुलों का भविष्य हैं, बेटियाँ जो माँबाप के साथ देश का भी गौरव हैं.....उन बेटियों को समाज में सुरक्षित वातावरण देना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है और इसके लिए सबसे जरूरी है प्रत्येक परिवार में अपने बच्चों को नैतिकता की शिक्षा देना तथा विद्यालयों को भी पाश्चात्य सभ्यता के पीछे भागना छोड़ अपनी संस्कृति और सभ्यता पर जोर देना चाहिए ताकि निकट भविष्य में एक स्वस्थ समाज का निर्माण हो सके......

साभार- मालती मिश्रा

Saturday, 17 October 2015

हर रात का सवेरा होता है....


चली थी कभी किसी के दम पर
अपनी सारी दुनिया छोड़ कर
सपने सजाकर आँखों में
सुनहरे दिन और चाँदनी रातों के
धीरे-धीरे समय ने ली करवट
दिन ढलने लगा अँधेरे की गोद में
खुशियों का सूरज ढलने लगा 
गमों के काले बादल में
सामने थी एक काली स्याह लंबी रात
जिसका कोई सवेरा न था
चली थी जिसका हाथ थाम
वो नजर आता था बेगाना
लगता था शमा से भाग रहा परवाना
रोज रहता था उसकी आँखों को इंतजार
कब ढले गम की रात आए सुबह की बहार
पर लगता था इस रात का
कोई सवेरा ही न था
हो चली थी मैं जिंदगी से बेजार
तन्हा अकेली जिए जा रही थी
तन्हाई का जहर घूँट-घूँट पिये जा रही थी
तभी.......
रात के अँधेरे को चीरती हुई
उम्मीद की एक किरण कुछ यूँ चमकी
मानों प्यासे को पानी नहीं 
सागर मिला हो
भूखे को भोजन नहीं
अन्नपूर्णा का वरदान मिला हो
तुम मेरी जिंदगी में आई वरदान बनकर
शायद किसी पुण्य का परिणाम बनकर
मैं झूम उठी, मेरा रोम-रोम खिला उठा
मेरी नन्हीं कली को पा
मेरे सपनो का उपवन महक उठा
मुझे विश्वास हो गया
कि हर रात का सवेरा हेता है...

साभार....मालती मिश्रा


Wednesday, 14 October 2015

कैसे भूलूँ बचपन तुझको..


शहरों की इस भाग-दौड़ में,
इक याद जो मुझसे कहती है...
मेरे तो रग-रग मे अब भी,
मेरे गाँव की खुशबू बसती है |
कैसे भूलूँ बचपन तुझको.....
इक जीवन तुझमें जिया मैंने
बाबुल की उन गलियों में
मेरा बचपन अब भी रहता है
आमों की अमराइयों में,
पेड़ों के घने झुरमुटों में
मेरे गाँव की पगडंडी पर,
हर खेतों के हर मेड़ों पर,
मेरे भीतर की इक नन्ही परी
हर पल मुझसे कहती है....
मेरे तो रग-रग में अब भी
मेरे गाँव की खुशबू बहती है |
मेरे सांसो के हर तार में,
हर धड़कन की झंकार में
खेतों की खु्शबू बिखरी है
कैसे भूलूँ बचपन तुझको.........
तू मुझमे अब जिन्दा है
छूट गया तेरा हाथ जो मुझसे,
इसलिए तो हम शर्मिंदा हैं |
वो सखियों संग लुकना-छिपना
तितली के पीछ-पीछेे भगना
पेड़ों पर चढ़ना फिर गिरना,
गिरकर उठना उठकर गिरना
वो छड़ी पे टिकाना टोकरी को,
चिड़ियाँ पकड़ने की जुगत लगाना
धानों के सूखे पुआलों के
ढेरों पर चढ़कर इतराना
कैसे भूलूँ बचपन तुझको......
तुझमें ही गाँव बसा मेरा
पेड़ों के झुरमुटों में से वो
सूरज की लाली का तकना
चिड़ियों की चहक फूलों की महक,
सब सोने के रंग सा रंगना
वो खेतों खलिहानों से जुड़ी यादें,
मुझसे हर पल कहती हैं
कैसे भूलूँ बचपन तुझको...
मेरे तो रग-रग में अब भी
मेरे गाँव की खुशबू बसती है.....
जो हर पल मुझसे कहती है....
कैसे भूलूँ बचपन तुझको....
कैसे भूलूँ बचपन तुझको.......

चित्र: साभार..गूगल से..
साभार....मालती मिश्रा

Saturday, 10 October 2015

मेरी दादी


ट्रिन...ट्रिन...
फोन के बजने की आवाज आ रही थी पर मैं बाथरूम में थी उठा नही सकती थी, घर पर भी कोई नहीं था जिसे फोन उठाने को कहती....पता नही किसका फोन होगा, क्या पता कोई जरूरी फोन भी हो सकता है...सोचते हुए जल्दबाजी में मेरे हाथ से पानी का मग छूट गया और फोन की घंटी भी बंद हो गई | दस-पंद्रह मिनट में मैं बाथरूम से बाहर आई आते ही सबसे पहले मैं अपने फोन की ओर लपकी और मिस्डकॉल चेक किया कोई अनजान नंबर था |
खैर छोड़ो मुझे किसका जरूरी फोन आने लगा?सोचते हुए मैंने फोन टेबल पर रख दिया,
लेकिन पता नही क्यों जैसे किसी के फोन का इंतजार कर रही थी..पर किसका? नहीं जानती | वैसे भी जिसका कोई नहीं होता वो कुछ अधिक ही लोगों को अपना कहने का आदी होता है, शायद ये मन के भीतर की वो अनकही चाह होती है जिसे किसी के साथ साझा नहीं कर सकते या फिर स्वयं को बहलाने का एक निमित मात्र...फिर चाहे भले ही लोग 'थोथा चना बाजे घना' कहकर मेरे पीछे हँसते हों| मेरी दुनिया भी मेरे परिवार तक ही सिमटी हुई है, न कोई रिश्तेदार न ही कोई सखी सहेली, जो भी हैं वो सैकड़ों किलोमीटर दूर हैं जिनसे कभी-कभी फोन पर ही बात हो पाती और जाना तो सालों में हो पाता....मैं तो खुद से ही बातें कर लेती हूँ खुद ही खुशी मना लेती हूँ और कोई दुख हो तो अकेली ही बैठकर रो-धोकर शांत हो लेती हूँ...फिरभी मेरे भीतर का खालीपन मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ता, और शायद यही खालीपन मुझे ये उम्मीद नही छोड़ने देता कि मैं अकेली नहीं हूँ | मेरा एक छोटा-सा परिवार तो है, पति और मेरी दो बेटियाँ...और मेरी पूरी दुनिया मेरे छोटे से परिवार के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गई है...मेरा जीना-मरना सब इन्हीं के लिए है...आज मैंने ऑफिस से छुट्टी ली हुई थी कि घर पर थोड़ा आराम करूँगी, पति के ऑफिस और बच्चों के स्कूल जाने के बाद घर की रोजमर्रा की सफाई बगैरा करके नहाकर नाश्ते की तैयारी करने लगी अचानक फिर से फोन बज उठा मैं जल्दी से बैठक की ओर लपकी और इतनी जल्दबाजी में फोन उठाया कि मेरे हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा, मुझे नहीं पता था कि किसका फोन होगा परंतु ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मैं इसी का इंतजार कर रही थी मैंने नंबर देखे बिना ही फोन उठा लिया...
हलो...
हलोsss दूसरी तरफ से आवाज आई,
माँ..प्रणाम, कैसी हो आप ? एक पल को ऐसा लगा मेरा इंतजार पूरा हुआ शायद मैं इसी फोन का इंतजार कर रही थी
मैं ठीक हूँ बेटा, बहुत दिनों से तुमने फोन नहीं किया तो चिंता हो रही थी, सब ठीक तो है ? माँ ने अपने उसी चिर-परिचित गाँव की भाषा में पूछा
सब ठीक है माँ, मैने कई बार फोन किया था पर आपका नंबर ही नही लग रहा था...मैंने शिकायत भरे लहजे में जवाब दिया
हाँ वो फोन खराब हो गया था इसीलिए....अब दूसरा लिया है,
अच्छा माँ और सब ठीक है वहाँ, मैंने बातों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए कहा
वैसे तो सब ठीक है...तुम्हारी दादी जी नहीं रहीं..
क्या...मेरे हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा...
कब? क्या हुआ था? मैंने पूछा, मुझे अपनी ही आवाज दूर से आती प्रतीत हो रही थी |
दो महीने हो गए, तुम्हें तो पता ही है कितनी बूढ़ी हो चुकी थीं, बीमार थीं....
और आप मुझे आज बता रही हो माँ, मुझे बताना भी जरूरी नहीं समझा, मैं भी आ जाती..अनजाने ही मेरा गला भर आया पर मैं रोना नहीं चाहती थी, नहीं चाहती थी कि माँ को मेरे रोने का पता चले..
क्या करतीं बेटा आके, देख तो तब भी नहीं पाती इतनी दूर जो हो..माँ ने कहा, अब तुम परेशान मत हो अपना ध्यान रखना मैं अभी फोन रखती हूँ....माँ ने कहा
ठीक है माँ, प्रणाम.......मैंने फोन रख दिया|
मैं धम्म से सोफे पर बैठ गई, मेरी दादी जी मर गईं और किसी ने मुझे बताना जरूरी नहीं समझा..क्यों?
एक दादी ही तो थीं जिनसे मैं सबसे ज्यादा जुड़ाव महसूस करती थी, मुझे आज भी याद है जब मैं छोटी थी माँ पापा के साथ लखनऊ में रहती थी पापा की सरकारी नौकरी थी तो हमारा पूरा परिवार लखनऊ में ही रहता, जब स्कूल की गर्मियों की छुट्टियाँ होतीं तो हम सभी गाँव जाने के लिए इतने उतावले होते थे कि एक-एक दिन काटना मुश्किल होता था| रोज पापा से पूछते कि आपको छुट्टी कब मिलेगी? चाचा के लड़कों के लिए खिलौने, पापा के चचेरे भाई यानी मेरे चाचा जो लगभग मेरी ही उम्र के थे उनके लिए मैं अपनी किताबें ले जाती और हम कंचे भी इकट्ठा करके रखते थे कि गाँव में खेलेंगे, उन्हें भी सहेज कर रख लेते....कुछ ऐसी ही होती थी हम बच्चों के गाँव जाने की तैयारी, हमें मतलब नहीं होता था कि माँ-पापा क्या लेकर जा रहे हैं क्या नहीं ये तो हमारी व्यक्तिगत तैयारी होती थी|

गाँव पहुँचने पर गाँव से बाहर ही दादी खड़ी मिलतीं हाथों में पीतल के चमकते हुए लोटे में जल लेकर,वो पहले जल भरे लोटे को हमारे सिर से पैर तक वारती फिर उस जल को एक तरफ किसी देवी या देवता को डाल देतीं तब कहीं हमें गाँव में प्रवेश की अनुमति देतीं | घर पहुँच कर सब अपने अपने अनुसार काम, खेल, रिश्तेदारी के निर्वाह आदि में व्यस्त हो जाते थे और मैं व्यस्त हो जाती थी दादी के साथ....

दादी वैसे तो अपने सभी पोतों को भी प्यार करती थी परंतु उनका लगाव मुझसे कुछ विशेष ही था...सर्दियों मे जब गुड़ बनाया जाता तो मेरे लिए सोंठ और मेवे डालकर बनवाया हुआ गुड़ वो बचा कर गर्मियों की छुट्टी तक रखती थीं, पका हुआ सीताफल एक जरूर बचाकर रखतीं ताकि जब हम छुट्टियों में आएँ तो वो हलवा बनाकर मुझे खिला सकें, इतना ही नहीं वो हर जगह मुझे अपने साथ ले जातीं और मैं भी..
जहाँ दादी वहीं मैं, दादी खेतों में जातीं तो मैं भी साथ जाती, वो बगीचे में जातीं तो भी मुझे ले जातीं और तो और वो दूसरे गाँव में जो कम से कम डेढ़-दो किलोमीटर होगा वहाँ गेहूँ पिसवाने जातीं तो भी मैं उनके साथ होती, किसी के घर,किसी की खुशी में, किसी के गम में,पूजा-पाठ में..कहीं भी कभी भी वो अकेली नहीं जाती थीं और यदि जाना भी चाहतीं तो मैं नहीं जाने देती..यहाँ तक कि रात को भी मैं माँ के पास नहीं सोती थी| हम जब तक गाँव में रहते मैं दादी के पास ही सोती थी, हम कभी छत पर सोते तो दूर किसी गाँव मे एक बल्ब जलता दिखाई देता था मैंने एक बार दादी से पूछा था कि वहाँ पर लाइट कैसे जलती है जबकि हमारे गाँव में नही है, दादी ने क्या जवाब दिया मुझे याद नहीं पर एक बात जो उन्होंने बताई थी वो मुझे आज भी याद है कि बिजली वहाँ भी हर घर में नही जलती, जो बल्ब हमें दिखाई देता है वो आटा-चक्की पर जलने वाला बल्ब था....कुछ ऐसी ही बातें होती रहती थीं मेरे और दादी के बीच और वो रोज एक नई कहानी सुनाते हुए धीरे-धीरे मेरे बालों में हाथ फेरती रहतीं और मैं कहानी सुनते हुए कब स्वप्नलोक की सैर पर निकल जाती मुझे पता ही नहीं चलता| मेरे बालों में उनकी उँगलियों का वो कोमल स्पर्श मुझे आज भी महसूस होता है....

गाँव में कहाँ नदी है, कहाँ तालाब है हमारे कितने खेत हैं और कहाँ-कहाँ हैं ये मुझे दादी के ही कारण पता चला....
मेरे पापा जी तीन भाई हैं और पूरे परिवार में मैं अकेली लड़की, शायद ये वजह भी रही हो मेरी दादी के प्यार की| जो भी मुझपर कोई टिप्पणी करता उसका पहला सवाल यही होता था कि मैं लखनऊ में दादी के बिना कैसे रहती हूँगी.....
खैर छुट्टियाँ खत्म होतीं दादी हमें नम आँखों से गाँव के बाहर काफी दूर तक छोड़ने आतीं और जाते हुए मैं बार-बार मुड़-मुड़ कर उन्हें तब तक देखती रहती जब तक दूर और दूर होते हुए वो मात्र एक छोटी सी परछाई में तब्दील नहीं हो जातीं और फिर दादी की परछाई अपने साथ आई अन्य दूसरी परछाइयों के साथ धीरे-धीरे विलुप्त हो जाती|

हर साल गर्मियाँ आतीं, स्कूल की छुट्टियाँ होतीं और फिर यही सिलसिला....मैं कुछ नौ-दस साल की हूँगी जब मंझले चाचा की जिद पर मेरे पापा और दोनों चाचा के बीच बँटवारा हुआ था तब दादी को कितना दुख हुआ था मैं खुद इसकी साक्षी हूँ, दादी अपनी हमराज, हमदर्द मान अपनी किसी सखी के घर जातीं तो मैं भी उनके साथ होती थी, वो उनसे घर की तनावपूर्ण स्थिति के बारे में बातें करते-करते रो पड़ती थीं भले ही दादी की बातें उस समय मेरी समझ से परे थीं परंतु उनकी आँखों से बहते आँसू मुझे भी रुला देते थे, मैं दादी की बाँह पकड़े उनसे ऐसे चिपक कर बैठ जाती मानो मुझे भय हो कि दादी मुझे छोड़कर कहीं चली न जाएँ...मुझे रोती देख सभी यही कहते कि पूरे घर में सिर्फ इसे ही तुम्हारी चिंता है, और आज...मेरी दादी सच में सदा के लिए मुझे छोड़ गईं....छोड़ तो वो मुझे दो महीने पहले ही गईं थी पर उनकी उँगलियों के कोमल स्पर्श का अहसास आज दो महीने बाद मुझसे दूर हुआ.....
गाँव पहुँचने पर लोटे के जल से नजर उतार कर स्वागत करने की परंपरा तो अबसे सालों पहले समाप्त हो चुकी है पर अब तो स्वागत करती हुई वो नजरें भी नहीं रहीं जिनमें मेरे लिए आशीर्वाद और हमेशा कुछ नया बनवाकर खिलाने की इच्छा नजर आती....

साभार....मालती मिश्रा

Tuesday, 6 October 2015

माँ..मुझे स्कूल न जाना

                     

माँ री मुझे स्कूल न जाना
तू कहती मुझे ज्ञान मिलेगा
पढ़-लिख कर सम्मान मिलेगा
पढ़ने का ध्येय मैने अबतक न जाना
ऐ माँ मुझे स्कूल न जाना

मास्टर जी बस अंग्रेजी पढ़ाते
हमसे भी अंग्रेजी में बतियाते
अपना देश अपनी भाषा से
माँ हमको है दूर न जाना
माँ हमको स्कूल न जाना

अंग्रेजी की पढ़ाई लाई
पचश्चिमी सभ्यता के हर कर्म
इनमें खोती जाए हे माँ
अपनी संस्कृति अपना धर्म
माँ हमको धरम न खोना 
ऐ माँ हमें स्कूल न जाना

हमने देखा स्कूल के बच्चे
अपनी मातृभाषा में कच्चे
सेवा,आदर,परोपकार की बातें
उन स्कूलों में नहीं बताते
स्कूलों ने अपना कर्तव्य न जाना
सुन माँ हमें स्कूल न जाना

जहाँ गुरू का नही है आदर
दिखावे का सब ओढ़े चादर
अंग्रेजी सभ्यता का पहन के जामा
शिक्षा का बस करते ड्रामा
दिखावे को जहाँ पर धर्म है माना
माँ मुझे ऐसे स्कूल न जाना

प्रार्थना ने जहाँ पहचान है खोई
मानव की मानवता भी सोई
हिंदी हिंदुस्तान की बोली
उन लोगों को लगे बेगाना
माँ मुझे ऐसे स्कूल न जाना

सूट-बूट अनिवार्य बनाकर
बाहर से ये सभ्य दिखाते
अमानुषता का प्रतिपादन कर
मानुषता का पाठ पढ़ाते
प्रेम,सहयोग जहाँ नही पाना
माँ हमें उस स्कूल न जाना

विद्या तो है ज्ञान का मंदिर
होती है जहाँ ज्ञान की पूजा
पर ज्ञान वो कैसे पूर्ण हो माई
जिसमें मातृभाषा न समाई
बिन मातृभाषा कुछ सीखना न सिखाना
मुझको माँ ऐसे स्कूल न जाना

गैर भाषा को मुकुट पहनाते
अपनी भाषा को हीन बताते
माँ का अनादर करे जो संतान 
वो जग में पाए क्यों कर सम्मान
माँ मुझको सम्मान न खोना 
ऐ माँ मुझे स्कूल न जाना

साभार...मालती मिश्रा

Thursday, 1 October 2015

काश वो बचपन लौट आए...

                                       

काश कुछ ऐसा हो जाए...
उछल-कूद करता वो बचपन
फिर से मुझको मिल जाए 
काश कुछ ऐसा हो जाए...
स्कूल जाते हुए राह में 
खेतों के गन्ने फिर हमें बुलाएँ 
काश कुछ ऐसा हो जाए...
आधी छुट्टी के वक्त मिलकर
हम वो चटनी-रोटी फिर मिल खाएँ 
काश कुछ ऐसा हो जाए ...
स्कूल से लौटते हुए घरों को 
खेतों में भागें होड़ लगाएँ 
काश कुछ ऐसा हो जाए ...
जाति-धर्म को बिन पूछे
हर किसी को अपना मित्र बनाएँ 
काश कुछ ऐसा हो जाए ...
वो प्यारा बचपन लौट आए 
काश..............

साभार : मालती मिश्रा