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Wednesday, 14 October 2015

कैसे भूलूँ बचपन तुझको..


शहरों की इस भाग-दौड़ में,
इक याद जो मुझसे कहती है...
मेरे तो रग-रग मे अब भी,
मेरे गाँव की खुशबू बसती है |
कैसे भूलूँ बचपन तुझको.....
इक जीवन तुझमें जिया मैंने
बाबुल की उन गलियों में
मेरा बचपन अब भी रहता है
आमों की अमराइयों में,
पेड़ों के घने झुरमुटों में
मेरे गाँव की पगडंडी पर,
हर खेतों के हर मेड़ों पर,
मेरे भीतर की इक नन्ही परी
हर पल मुझसे कहती है....
मेरे तो रग-रग में अब भी
मेरे गाँव की खुशबू बहती है |
मेरे सांसो के हर तार में,
हर धड़कन की झंकार में
खेतों की खु्शबू बिखरी है
कैसे भूलूँ बचपन तुझको.........
तू मुझमे अब जिन्दा है
छूट गया तेरा हाथ जो मुझसे,
इसलिए तो हम शर्मिंदा हैं |
वो सखियों संग लुकना-छिपना
तितली के पीछ-पीछेे भगना
पेड़ों पर चढ़ना फिर गिरना,
गिरकर उठना उठकर गिरना
वो छड़ी पे टिकाना टोकरी को,
चिड़ियाँ पकड़ने की जुगत लगाना
धानों के सूखे पुआलों के
ढेरों पर चढ़कर इतराना
कैसे भूलूँ बचपन तुझको......
तुझमें ही गाँव बसा मेरा
पेड़ों के झुरमुटों में से वो
सूरज की लाली का तकना
चिड़ियों की चहक फूलों की महक,
सब सोने के रंग सा रंगना
वो खेतों खलिहानों से जुड़ी यादें,
मुझसे हर पल कहती हैं
कैसे भूलूँ बचपन तुझको...
मेरे तो रग-रग में अब भी
मेरे गाँव की खुशबू बसती है.....
जो हर पल मुझसे कहती है....
कैसे भूलूँ बचपन तुझको....
कैसे भूलूँ बचपन तुझको.......

चित्र: साभार..गूगल से..
साभार....मालती मिश्रा

7 comments:

  1. बचपन की स्मृतियाँ कहाँ विस्मृत होती है , सुन्दर रचना

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  2. धन्यवाद डॉ० मोनिका ब्लॉग पर आने के लिए

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  3. धन्यवाद डॉ० मोनिका ब्लॉग पर आने के लिए

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  4. बार बार आती है मुझको मधुर बचपन तेरी

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  5. बचपन की बात ही निराली होती है, आज जब कभी याद आता है तो मन ह़जार बार उछल जाता है
    आपकी रचना ने फिर एक बार बचपन का बच्चा बना दिया
    बहुत सुंदर रचना मन को छूती
    बधाई

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  6. आभार आप सभी का ब्लॉग पर आने के लिए, आशा करती हूँ कि इसी तरह मेरा उत्साहवर्धन करते रहेंगे

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  7. आभार आप सभी का ब्लॉग पर आने के लिए, आशा करती हूँ कि इसी तरह मेरा उत्साहवर्धन करते रहेंगे

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