डर कभी अचानक नहीं आता,
वह धीरे-धीरे हमारे भीतर
घर बना लेता है।
डर इस बात का नहीं होता
कि हम लिख नहीं पाएँगे,
डर इस बात का होता है
कि लिखने के बाद
कहीं फिर से टूट न जाएँ।
डर से लड़ना नहीं, उसे समझना है
मैंने अब डर से लड़ना छोड़ दिया है।
मैं उसे सुनती हूँ।
वह मुझे बताता है— तुम इंसान हो,
कमज़ोर हो,
और शायद
सच लिखने से लोग असहज होंगे।
और यही सच
मेरी आज़ादी बन जाता है।
अब आज़ादी का मतलब
आज आज़ादी का मतलब
बेपरवाह होना नहीं है।
आज आज़ादी का मतलब है—
अपनी गति चुनना
अपनी चुप्पी को सम्मान देना
और अपनी आवाज़ को
किसी मान्यता की मोहताज न बनाना
लिखते हुए डर साथ चलता है
डर अब भी साथ है,
पर वह रास्ता नहीं रोकता।
वह बस याद दिलाता है—
कि जो लिखा जा रहा है,
वह मायने रखता है।
क्योंकि जो शब्द
डर के बिना लिखे जाएँ,
अक्सर सतही होते हैं।
अब मैं खुद को आज़ाद लिखती हूँ
मैं अब
पसंद किए जाने के लिए नहीं लिखती,
समझे जाने के लिए भी नहीं।
मैं लिखती हूँ
क्योंकि लिखना
मेरी साँसों जैसा ज़रूरी है।
और जब ज़रूरत
आज़ादी से मिल जाती है,
तो शब्दों में
कोई बेड़ी नहीं रहती।
यह कमबैक अब मजबूरी नहीं
यह कमबैक
अब खुद को बचाने की कोशिश नहीं,
खुद को अपनाने का तरीका है।
और शायद
यही असली आज़ादी है।
मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️


लिखती रहें |
जवाब देंहटाएंसादर धन्यवाद आदरणीय 🙏
हटाएंबेहद शानदार रचना मालती जी...वाह
जवाब देंहटाएंआपकी टिप्पणी से लेखन के लिए उत्साहित हुई। बहुत-बहुत धन्यवाद 🙏
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