मंगलवार

स्वीकृति से शांति तक

 

सबसे कठिन लड़ाई

दुनिया से नहीं होती,

वह खुद से होती है।

खुद को वैसे ही स्वीकार करना

जैसे हम हैं—

बिना सजावट,

बिना सफ़ाई दिए।

अब खुद से सवाल नहीं

पहले मैं खुद से पूछती थी—

क्या मैं काफ़ी हूँ?

क्या मेरा लिखा किसी काम का है?

अब सवाल थम गए हैं।

क्योंकि मैंने समझ लिया है—

खुद को साबित करने की दौड़

कभी ख़त्म नहीं होती।

स्वीकृति हार नहीं है

स्वीकृति का मतलब

समझौता नहीं होता।

स्वीकृति का मतलब

यह मान लेना है कि

मैं अपनी पूरी ताक़त के साथ

और अपनी पूरी कमज़ोरियों के साथ

यहाँ मौजूद हूँ।

और यही मौजूदगी

शांति बन जाती है।

शांति शोर से दूर रहती है

शांति तालियों में नहीं रहती,

वह उस क्षण में रहती है

जब लिखने के बाद

दिल हल्का हो जाता है।

जब किसी अनजान पाठक का संदेश

कहता है—

“आपका लिखा मुझे छू गया।”

बस, वही काफ़ी है।

अब कमबैक पूर्ण है

यह कमबैक

किसी मंच पर खड़े होने का नहीं,

किसी मुकाम पर पहुँचने का नहीं।

यह खुद के साथ

फिर से खड़े होने का है।

और जब इंसान

खुद के साथ खड़ा हो जाए,

तो दुनिया की दूरी

महत्वहीन हो जाती है।

नया साल, नया संतुलन

इस नए साल में

मैं न ज़्यादा चाहूँगी,

न कम।

मैं बस

संतुलन में रहूँगी—

लिखने और जीने के बीच।

क्योंकि अब मुझे पता है—

शांति ही सबसे बड़ी सफलता है।

मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️ 

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