शनिवार

ख़ामोश वापसी की कहानी- भाग-२


जब ख़ामोशी भी बोलने लगती है

ख़ामोशी को अक्सर कमज़ोरी समझ लिया जाता है,

जबकि सच यह है कि

ख़ामोशी सबसे लंबी तैयारी होती है।

मैं जब लिख नहीं रही थी,

तब भी भीतर कुछ लिखा जा रहा था—

अनकहे अनुभव,

टूटे हुए विश्वास,

और खुद से पूछे गए कठिन सवाल।

हर रुकना हार नहीं होता

कुछ रुकावटें हमें रोकने नहीं,

हमें समझाने आती हैं।

मैं रुकी क्योंकि

मुझे खुद को समझना था—

कि मैं क्या लिखना चाहती हूँ,

या क्यों लिखना चाहती हूँ।

और इसी समझ ने

मेरे कमबैक को जन्म दिया।

इस वापसी में कोई घोषणा नहीं

यह वापसी किसी पोस्टर की तरह नहीं,

जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा हो— I’M BACK

यह वापसी एक धीमी दस्तक है—

जिसे वही सुन सकता है

जो सच में इंतज़ार कर रहा हो।

अब लिखना बोझ नहीं, ज़रूरत है

पहले लिखना आदत थी,

अब लिखना ज़रूरत है।

यह ज़रूरत

तालियों की नहीं,

तसल्ली की है।

शब्द अब सजावट नहीं,

सच हैं।

नया साल, नई समझ

नया साल मुझे यह सिखा रहा है—

हर दिन लिखना ज़रूरी नहीं,

पर खुद को रोज़ महसूस करना ज़रूरी है।

और जब महसूस करना गहरा हो जाए,

तो शब्द अपने आप रास्ता ढूँढ लेते हैं।

यह कमबैक जारी है

यह कोई एक दिन की वापसी नहीं,

यह एक सफ़र है—

जिसमें मैं गिरूँगी भी,

चुप भी रहूँगी,

और फिर लिखूँगी।

क्योंकि अब मैं जानती हूँ—

ख़ामोश वापसी सबसे टिकाऊ होती है।

मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️ 

✨ क्रमशः…

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