उम्मीद कभी तेज़ रोशनी
बनकर नहीं आती,
वह अक्सर
एक छोटे से दीये की तरह
हवा में काँपती हुई आती है।
इस कमबैक में भी
कोई बड़ा दावा नहीं है,
बस इतना भरोसा है—
कि जो भीतर बचा है,
वही काफ़ी है।
अब खुद पर शक नहीं
पहले हर शब्द लिखने से पहले
मैं खुद से पूछती थी—
क्या यह अच्छा है?
क्या लोग पढ़ेंगे?
अब सवाल बदल गए हैं—
क्या यह सच है?
अगर सच है,
तो वह किसी न किसी दिल तक पहुँचेगा।
आत्मविश्वास शोर नहीं करता
मैंने समझ लिया है—
आत्मविश्वास
ऊँची आवाज़ में नहीं बोलता।
वह रोज़
खुद से किया गया
एक छोटा सा वादा निभाने में दिखता है।
आज एक पंक्ति,
कल एक पैराग्राफ,
और धीरे-धीरे
पूरा सच।
लिखना अब लौटना नहीं, बढ़ना है
यह सिर्फ़ वापसी नहीं,
यह विस्तार है।
मैं अब वही नहीं हूँ
जो पहले लिखती थी—
अनुभव बदल चुके हैं,
नज़र बदल चुकी है।
और शायद
इसीलिए शब्दों में
अब ठहराव है।
नया साल, नया रास्ता
इस साल मैं जल्दी नहीं करूँगी—
न ट्रेंड पकड़ने की,
न खुद को साबित करने की।
मैं बस
लिखती रहूँगी।
क्योंकि अब मुझे पता है—
जो सच से लिखा जाता है,
वह देर से सही,
पर गहराई से पढ़ा जाता है।
यह अंत नहीं है
यह तो बस
एक नई लय की शुरुआत है।
अगर आप यहाँ तक पढ़ रहे हैं,
तो शायद
आप भी अपने किसी कमबैक के
कगार पर खड़े हैं।
याद रखिए—
उम्मीद का उजाला
कभी व्यर्थ नहीं जाता।
मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️


0 Comments:
Thanks For Visit Here.