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Tuesday, 30 April 2019


आओ बच्चों तुम्हें बताएं मजदूर दिवस की बातें खास।
श्रमिक दिवस कहते क्यों इसको आओ हम जानें इतिहास।।
एक मई सन 1886 की जानो तुम बात।
अंतर्राष्ट्रीय तौर पर मजदूर दिवस की हुई शुरुआत।।

10 से 16 घंटों तक तब काम कराया जाता था।
उस अवसर पर नहीं इन्हें मानव भी समझा जाता था।।
चोटें खाकर लहूलुहान तक हो जाते थे इनके गात।
महिला, पुरुष, और बच्चों की मृत्यु का बढ़ता अनुपात।।

लिया गया तब अधिकारों के हनन रोकने का संकल्प।
मजदूर संघ ने हड़तालों को माना था तब मात्र विकल्प।।
शुरू किया विरोध प्रदर्शन करेंगे हम कितना काम,
आठ घंटे तय हों केवल काम के और उचित हों दाम।।

घटित हुई थी दुर्भाग्यपूर्ण घटना एक उस दौरान।
बम फोड़ गया शिकागो में कोई मानव रूपी श्वान।।
तैनात पुलिस थी पहले से ही लगी चलाने गोली,
मजदूर मासूमों के खून से उसने खेली होली।

इस नरसंहारक घटना को सब भूल भला कैसे जाते।
याद में उन निर्दोषों की हम सब श्रमिक दिवस मनाते।।
तीन वर्ष फिर बीत गए पर नहीं बुझी यह आग।
इस संहारक घटना से फिर  मानवता गई जाग।।

सत्र 1889 के समय में जागा फिर से जोश।
समाजवादी सम्मेलन में फिर हुआ एक उद्घोष।।
श्रमिकों का संहारक दिवस अब श्रमिक दिवस कहलाएगा।
सब अधिकारों के साथ श्रमिक इस दिन अवकाश मनाएगा।

दुनिया के 80 देशों ने सहर्ष इसे स्वीकार किया।
तब नवीन रूपों में सबने इस दिन को सँवार दिया।।
यूरोप में तो इसको बसंत का पर्व भी माना जाता है।
आज के दिन हर श्रमिक सभी से उच्च सम्मान को पाता है।।

आओ बच्चों आज मनाएँ श्रमिक दिवस हम शान से।
उनके दिवस को खास करेंगे हम उनके सम्मान से।।
कर्तव्यों को निभाता है वह पूरे जी और जान से।
फिर क्यों वह वंचित रह जाए उचित मान-सम्मान से।।

चित्र- साभार गूगल से
मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️

Thursday, 18 April 2019

'आप पुराने जमाने के आधुनिक पिता थे।'

जिस उम्र में बेटियाँ किसी को नमस्ते कहते हुए शर्मा कर माँ के आँचल के पीछे दुबक जाया करती थीं, उस उम्र में मैं आपकी उँगली पकड़ आपके पीछे दुबका करती थी। ऐसा नहीं है कि मुझे अम्मा की कमी नहीं महसूस होती थी लेकिन अम्मा के साथ होने पर भी मुझे संबल आपसे ही मिलता था। मैं तो अम्मा की याद आने पर आपसे दुबक कर सो जाया करती इस बात से अंजान कि हमारा भविष्य बनाने के लिए आप कितना बड़ा त्याग कर रहे थे। आज सोचती हूँ तो लगता है कि कितनी अंजान थी मैं, मेरे दामन में आकाश भर खुशियाँ थीं पर शायद मैं उनको जी भरकर जी नहीं पाई। बाबूजी, पता नहीं कभी आपने भी इस बात को महसूस किया होगा या नहीं कि दुनिया की अन्य बेटियों की तरह मुझपर मेरी माँ की आदतों का असर बहुत कम या शायद नगण्य था, मेरे आदर्श तो आप थे इसलिए मुझपर तो सदा से आपकी आदतों और विचारों का ही वर्चस्व रहा, आज भी है। आपको कभी बता न सकी कि जब कभी आप किसी के सामने मेरा समर्थन करते थे न! तो उस समय मैं इतना गौरवान्वित महसूस करती थी जैसे मुझे कोई मैडल मिल गया हो या शायद कोई मैडल भी मुझे उतनी संतुष्टि, उतनी खुशी नहीं दे सकता था। मेरे लिए तो आपकी मुस्कुराहट ही किसी तमगे से कम न थी। सभी बेटियाँ खाना बनाना, घर-गृहस्थी के अन्य काम अपनी माँ से सीखती हैं पर मुझे तो आपने सिखाया था, इसलिए जब तक आपसे अपने काम की तारीफ नहीं सुन लेती तब तक खुद को उसमें पास नहीं समझती थी। मुझे आज भी याद है जब गाँव से अम्मा के आने के बाद खाना खाते हुए बची हुई रोटियाँ देखकर आपने कहा था कि "तुमसे ज्यादा अंदाजा तो इसे है, उतना ही आटा माड़ती है कि न एक रोटी ज्यादा होती है न कम।" उस समय अपनी तारीफ सुन मेरा मन बल्लियों उछलने लगा था। 'आप पुराने जमाने के आधुनिक पिता थे।' काश मैं कभी आपसे कह पाती। जिस समय हमारे गाँव के लोग लड़कियों को सबके सामने चारपाई पर नहीं बैठने देते थे, उस समय आपने मुझे पूरी छूट दे रखी थी कि जहाँ मन हो जाओ, जिससे मन बात करो, कहीं बैठो-उठो कोई रोक-टोक नहीं। कितने ही लोगों को मुझसे जलन होती थी पर आपके कारण किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि वो मुझे कुछ कह सकें। आपसे प्रेरणा लेकर गाँव में और दो-तीन लोगों ने अपनी बेटियों को पढ़ाया था, वो अलग बात है कि दसवीं से आगे नहीं पढ़ा सके। हर कोई मेरे बाबूजी जैसा तो नहीं हो सकता। आप किस मिट्टी से बने थे कभी समझ नहीं पाई, इतने सख्त कि बड़े-छोटे किसी की हिम्मत नहीं होती थी आपके खिलाफ बोलने की, जबकि आपको कभी किसी से झगड़ते भी नहीं देखा पर कभी-कभी कुछ ऐसा कर जाना या कह जाना जिससे लगता कि आप इतने कोमल हृदय हो हम तो नाहक ही डर रहे थे, परंतु इसके बाद भी आपके समक्ष गलत बोलने या गलत करने का साहस कोई न कर सका। अपने बच्चों को सुनहरा भविष्य देने की कामना तो हर पिता की होती है, आपकी भी थी, इसीलिए तो आपने उस समय के अन्य पुरुषों की भाँति अपने बच्चों को माँ के पास नहीं छोड़ा बल्कि नौकरी करते हुए अपने साथ रखा और हमारे खाने-पीने से लेकर छोटी-बड़ी हर जरूरत का ध्यान उसी तरह रखते जैसे माँ रखती है। हमें अपने हाथों से नहलाना कपड़े धोना, खाना बनाना घर की सफाई-बरतन धोना और अपनी नौकरी भी करना। आज सोचती हूँ तो आश्चर्य होता है कि कैसे करते थे आप? आज अगर मैं बाहर नौकरी करती हूँ तो घर के कार्य कुछ-कुछ तो रोज ही रह जाते हैं, पर आपने तो सब कुछ बहीं ही कुशलता से वहन किया। आपको देखकर कभी नहीं लगा कि कोई मुश्किल आपको कभी हिला भी सकती है। साल में आठ महीने तो आप हम बच्चों के साथ अम्मा से दूर रहते थे शायद इसीलिए हमारे मन में कहीं न कहीं यह विचार पनप गया था कि अम्मा के साथ आपका रिश्ता तो सामान्य पति-पत्नी जैसा है पर वह असीम प्रेम नहीं है, जैसा अन्य लोगों में होता है। परंतु मुझे कुछ धुंधला सा याद है जब एक बार अम्मा बहुत बीमार थीं और वह बेहोश हो गईं तब आप बिलख-बिलखकर रो पड़े थे। खैर वो तो पुरानी बात हो गई उतना ही प्यार अब भी हो यह आवश्यक नहीं लेकिन अम्मा के चले जाने के बाद जब मैं आपसे मिली तब आपका फिर से वैसे ही बिलख-बिलख कर रोना मुझसे देखा नहीं जा रहा था। तब कहाँ जानती थी मैं कि आप अम्मा के बिना एक साल ही बमुश्किल निकाल पाएँगे। कहाँ जानती थी मैं कि मैं आपसे आखिरी बार मिल रही हूँ।
पहले अम्मा गईं फिर आप भी मुझे छोड़कर चले गए, अब तो मेरी मातृभूमि ही पराई हो गई, अब वो घर पराया और बेजान लगता है जिसमें कभी खुशियाँ खिलखिलाती थीं। अब भी मैं वहाँ जाकर उस घर में आपके और अम्मा के प्यार और दुलार को महसूस करना चाहती हूँ, पर वो अपनापन आप साथ ले गए जिसके सहारे मैं वहाँ एक/दो दिन रुक सकती थी। आपने अपने जीवन में सब सही किया बस एक और काम आप कर गए होते तो मैं आप दोनों को महसूस करने से वंचित नहीं होती, काश मुझे भी अपने बेटों की तरह अपनी विरासत का हकदार बनाया होता तो मैं भी उस मिट्टी की खुशबू से वंचित न होती।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

Wednesday, 17 April 2019

समीक्षा- 'कवच'



 वर्तमान परिवेश के धरातल पर रची गई काल्पनिक सत्य है 'कवच'

मानव का परिपक्व मन समाज की, परिवार की हर छोटी-बड़ी घटना से प्रभावित होता है और एक साहित्यकार तो हर शय में कहानी ढूँढ़ लेता है। आम व्यक्ति जिस बात या घटना को दैनिक प्रक्रिया में होने वाली मात्र एक साधारण घटना मान कर अनदेखा कर देते हैं या बहुत ही सामान्य प्रतिक्रिया देकर अपने मानस-पटल से विस्मृत कर देते हैं, उसी घटना की वेदना या रस को एक साहित्यिक हृदय बेहद संवेदनशीलता से महसूस करता है और फिर उसे जब वह शिल्प सौंदर्य के साथ कलमबद्ध करता है तो वही लोगों के लिए प्रेरक और संदेशप्रद कहानी बन जाती है। एक कहानीकार की कहानी कोरी काल्पनिक होते हुए भी अपने भीतर सच्चाई छिपाए रहती है, वह एक संदेश को लोगों के समक्ष रोचकता के साथ प्रकट करती है और चिंतन को विवश करती है। एक कहानीकार पाठक को मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक दायित्वों के लिए जागरूक भी बनाता है। एक साहित्यकार अपने साहित्य से समाज के उत्थान या पतन दोनों की दिशा सुनिश्चित कर सकता है और साहित्य की विधाओं में कहानी अति प्रभावी होती है। इसमें लोगों को बाँधे रखने के साथ-साथ सकारात्मक या नकारात्मक सोच को जन्म देने की गुणवत्ता होती है।  कहानीकार दिलबाग 'विर्क' जी ने अपने संकलन 'कवच' में ऐसी ही इक्कीस संदेशप्रद कहानियों को संकलित किया है, जो वर्तमान समाज का आईना हैं। वर्तमान समाज की हर सकारात्मक, नकारात्मक पहलू पर उनकी लेखनी चली है। उनकी लेखनी से निकला हर शब्द कहानी की आत्मा प्रतीत होता है।
इसका कथानक रिश्तों की कशमकश, बेरोजगारी, रूढ़िवादिता, आधुनिकता की फिसलन, पारिवारिक बंधन की छटपटाहट आदि को अपने भीतर समेटे हुए है।
कथोपकथन को पात्रों के अनुकूल रखने का प्रयास किया है।
घर-गृहस्थी की चक्की में पिसता आज का युवा
घर-परिवार के बंधनों से कुछ देर की मुक्ति हासिल कर मानों स्वयं को खुले आकाश का पंछी समझ लेता है और उसका चंचल मन कल्पनाओं के पंख लगा बंधन मुक्त स्वच्छंद होकर खुले आकाश में उड़ान भरना चाहता है और उसकी इस कल्पना की चिंगारी को हवा देने का काम आजकल सोशल मीडिया के द्वारा बखूबी कर दिया जाता है। कभी-कभी तो व्यक्ति मात्र क्षणिक हँसी-मजाक समझकर की गई बातों की श्रृंखलाओं में ऐसा उलझता जाता है कि उसे ज्ञात ही नहीं होता कि वह कितनी दूर निकल आया और जो वह कर रहा है वह गलत है या सही, किंतु किसी अपने के ऐसी परिस्थिति में होने की आशंका मात्र से सजग हो उठता है, 'खूँटे से बँधे लोग' कहानी के माध्यम से लेखक ने बेहद सजीवता से इसका चित्रण किया है। इसके एक-एक संवाद बेहद सहज आम बोलचाल की भाषा में लिखे गए हैं जो हिन्दी-अंग्रेजी के बंधनों से सर्वथा स्वतंत्र हैं।
कहानी के संवाद पात्रों और घटनाओं को सजीवता प्रदान करते हैं।
दृष्टव्य है- कहानी का मुख्य पात्र अपनी सोशल मीडिया की महिला मित्र के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहता है-
"नहीं-नहीं, हम खूँटे से बँधे लोग क्या सहेली बनाएँगे।"
"खूँटे?"
"घर गृहस्थी खूँटे ही तो हैं।"- "हा हा हा" कहकर रमेश ने अपनी इस गंभीर बात को मजाक का रंग देने की कोशिश की।
"हम्म, कभी-कभी छूट तो मिल ही जाती होगी?" उसने आँख मारती स्माइली के साथ मैसेज भेजा।
"छूट तो कहाँ मिलती है, बस खूँटे पर बँधे थोड़ा उछल-कूद कर लेते हैं।" रमेश ने भी उसी स्माइली के साथ रिप्लाई किया।
पुस्तक की प्रतिनिधि कहानी 'कवच' के माध्यम से लेखक निश्चित समय पर कार्य न कर पाने की स्थिति में बहानों का कवच तैयार करने के प्रयास करता है जो एक मानव मन की सहज प्रक्रिया होती है और मस्तिष्क पर यही दबाव लेकर सो जाने से स्वप्न में वही सब देखता है कि महाभारत के पात्रों ने भी किस प्रकार स्वयं को  निर्दोष दिखाने के लिए कवच ओढ़ रखा है।  महाभारत के पात्रों के माध्यम से पौराणिकता में पत्रकार रंजन जैसे आधुनिक पात्रों को सम्मिलित करके लेखक ने कहानी को वर्तमान धरातल पर सार्थक कर दिया है। वहीं 'सुहागरात' जैसी कहानी समाज में व्याप्त रिश्तों के विकृत पहलू को नग्न करती है।
कवच की सभी कहानियाँ वर्तमान परिवेश के धरातल पर रची गई काल्पनिक सत्य हैं। सभी कहानियों को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि ये पात्र तो हमारे जाने-पहचाने से हैं, शायद ये कहानी हम अक्सर अपने आसपास देखते हैं। जब किसी कहानी को पढ़ते हुए पाठक स्वयं को उस कहानी का पात्र महसूस करने लगे तो वह कहानी कहानी नहीं जीवन प्रतीत होने लगती है, कुछ ऐसी ही हैं कवच की जीवंत कहानियाँ।

संबल जैसी कहानी जहाँ आजकल लड़कियों का संबल बनाए रखने हेतु और बुराई से सामना करने के लिए माता-पिता को बेटियों के साथ मित्रवत् व्यवहार करने की सीख देती है, वहीं कार्यक्षेत्र में महिला सहकर्मियों को लेकर पुरुष वर्ग द्वारा बनाई जाने वाली बातें तथा किंवदंतियों की भी बड़ी खूबसूरती से 'चर्चा' कहानी में चर्चा की गई है।
जहाँ एक ओर जाति-पाँति, धर्म-गोत्र में उलझे समाज के स्याह पहलू में विलीन बेटियों की व्यथा को दर्शाते हुए माता-पिता के बलिदान के द्वारा इस रूढ़िवादिता के तिमिर से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने का प्रयास 'बलिदान' कहानी का मूल विषय है, तो वहीं पुत्र और पति के रिश्तों में पिसते एक ऐसे पुरुष वर्ग की दास्तां सोचने पर विवश कर देती है कि वास्तव में दोष किसका है? साधारण नौकरीपेशा उस पुत्र का जो अपनी माँ को संतुष्ट रखने के प्रयास में पत्नी की दृष्टि में उपेक्षित होता है या उस पति का जो पत्नी के साथ सामंजस्य बिठाने के प्रयास में माँ की उलाहनों का शिकार होता है, और अंततः माँ और पत्नी इन 'दो पाटन के बीच' पिसता हुआ उस अपराध का सजाभोगी बनता है, जो उसने किया ही नहीं।
कार्यालयी परिवेश में साथ काम करते हुए विवाहेतर आकर्षण का सजीव चित्रण 'च्युइंगम' के माध्यम से किया है तो बढ़ती महात्वाकांक्षाओं को पूरा करने और दिखावे के अधीन होकर खर्चे पर नियंत्रण न करके कर्ज के बोझ में दबकर आत्महत्या करने की घटना का बेहद सजीव चित्रण कहानी 'सुक्खा' के माध्यम से किया गया है।
एकबार यदि किसी के माथे सजायाफ्ता का कलंक लग जाए तो वह कभी पीछा नहीं छोड़ता और व्यक्ति निराशा के दलदल में धँसता जाता, इसका उदाहरण है कहानी 'दलदल'।
कॉलेज के दिनों में दोस्ती के महत्व तथा प्यार के इज़हार न कर पाने की कशमकश का चित्र 'इजहार' में जीवंत हो उठा तथा रोज़गार की आड़ में उसूलों और अनुचित कार्यों के मध्य जद्दोज़हद कहानी 'रोज़गार' में परिलक्षित है।
देश के प्रति उदासीन रवैया दर्शाती कहानी 'गर्लफ्रैंड जैसी कोई चीज' तथा भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, लाचारी, गरीबी और बेरोजगारी पर प्रहार है 'कीमत' कहानी।
कलुषित मानसिकता, चारित्रिक पतन और  समाज की विद्रूपताओं का आईना है 'प्रदूषण' तो दिल और दिमाग के अन्तर्द्वन्द्व में मानवता और नैतिकता का ह्रास दर्शाती कहानी 'गुनहगार' जो पाठक को झकझोर कर रख देने की क्षमता रखती है।
लेखक ने समाज के हर पहलू को पाठक के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

अंजुमन प्रकाशन से प्रकाशित 152 पृष्ठ की 'कवच' का मूल्य मात्र 150/ है।
मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि 'कवच' की कहानियाँ पाठक को बाँधे रखने में पूर्णतः सक्षम हैं तथा इसके प्रत्येक पात्र को आप अपने आसपास महसूस कर पाएँगे। लेखक अपनी कहानियों के माध्यम से जो संदेश पाठक तक पहुँचाना चाहते हैं उसमें पूर्णतः सफल हुए हैं।

मालती मिश्रा 'मयंती'
समीक्षक, कहानीकार व लेखिका
बी-20, गली नं०- 4, भजनपुरा, दिल्ली-110053
मो. 9891616087

Friday, 12 April 2019

जब से तुम आए सत्ता में (व्यंग्य)

जब से तुम आए सत्ता में
एक भला न काम किया
क्यों न तुम्हारी करें खिलाफत
हर दिशा में हलचल मचा दिया
आराम पसंद तबके को भी
काम में तुमने लगा दिया
चैन की बंसी जहाँ थी बजती
मचा वहाँ कोहराम दिया

क्या कहने सरकारी दफ्तर के
आजादी से सब जीते थे
बिना काम ही चाय समोसे
ऐश में जीवन बीते थे
उनकी खुशियों में खलल डालकर
चाय समोसे बंद किया
वो क्यों न तुम्हारी करें खिलाफत
जिन्हें समय का पाबंद किया
चैन की बंसी जहाँ थी बजती..
मचा वहाँ कोहराम दिया..

बहला-फुसलाकर लोगों को
अपनी जागीर बनाई थी
पर सेवा के नाम पर
विदेशों से करी कमाई थी
उनकी सब जागीरों पर
ताला तुमने लगा दिया
वो क्यों न तुम्हारी करें खिलाफत
जिनकी जागीरें मिटा दिया
चैन की बंसी........
मचा........

बड़े-बड़े घोटाले करके
भरी तिजोरी घरों में थी
स्विस बैंक में भरा खजाना
जिन पर किसी की नजर न थी
बदल रुपैया सारे नोटों को
रद्दी तुमने बना दिया
क्यों न तुम्हारी करें खिलाफत
ख़जानों में सेंध लगा दिया
चैन की......
मचा .........

ऊपर से नीचे तक सबके
निडर दुकानें चलती थीं
बिना टैक्स के सजी दुकानें
नोटें छापा करती थीं
ऐसी सजी दुकानों का
शटर तुमने गिरा दिया
क्यों न तुम्हारी करें खिलाफत
टैक्स सभी से भरा दिया
चैन की बंसी........
मचा वहाँ........

बिन मेहनत रेवड़ियों की जगह
नए आइडिया तुमने बांटी है
बड़े रसूख वालों की भी
जेबें तुमने काटी हैं
राजा हो या रंक देश का
सबको लाइन में खड़ा किया
वो क्यों न तुम्हारी करें खिलाफत
धूल सड़कों की जिन्हें चटा दिया
चैन की बंसी.......
मचा वहाँ.........

क्यों न तुम्हारी करें खिलाफत
ऐसा क्या तुमने काम किया
चैन की बंसी जहाँ थी बजती..
मचा वहाँ कोहराम दिया..

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

चयन का अधिकार

व्यथित हृदय मेरा होता था
देख के बार-बार,
राष्ट्रवाद को जब जहाँ मैं
पाती थी लाचार।

संविधान ने हमें दिया है
चयन हेतु अधिकार,
राष्ट्रहित के लिए बता दो
किसकी हो सरकार।

लालच की विष बेल बो रहे
करके खस्ता हाल,
जयचंदों को आज बता दो
नहीं गलेगी दाल।

चयन हमारा ऐसा जिससे
बढ़े देश का मान,
विश्वगुरु फिर कहलाएँ और
भारत बने महान ।।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

Wednesday, 10 April 2019

अधिकार और कर्तव्य

अधिकार और कर्तव्य
अपने बीते हुए समय पर विचार करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि समय की गति कितनी तीव्र है। आज से बस कुछ दशक पहले के लोग और उनके विचारों की तुलना वर्तमान से करें तो देखेंगे कि पहले लोग कर्म तो करते थे परंतु अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नही थे और इसी कारण अक्सर सामाजिक और आर्थिक हानि उठाते थे परंतु वर्तमान में परिस्थिति बिल्कुल विपरीत हो गई है, आजकल लोग अधिकारों से अधिक और कर्तव्यों से कम परिचित हैं। एक शिशु जब जन्म लेता है तब से ही नहीं बल्कि गर्भ में आने के साथ ही उसके अधिकार निश्चित हो जाते हैं, जन्म के पश्चात् अधिकारों के वट वृक्ष के नीचे वह पोषित होता है। जैसे-जैसे उसका शारीरिक व मानसिक विकास होता जाता है उसके दायित्वों का जन्म होने लगता है। अब वह अधिकारों की उँगली थाम दायित्वों के निर्वहन की ओर बढ़ता है। माता की ममता पिता की सुरक्षा परिजनों के प्यार-दुलार के अधिकारों की छाँव में पुत्र/पुत्री, भाई/बहन, पोता/पोती आदि के दायित्वों को सीखता है। पहले इनका संतुलन बखूबी देखने को मिलता था, व्यक्ति परिवार के प्रति, समाज के प्रति और देश के प्रति उत्तरदायी होता था किन्तु आज पुत्र अपने माता-पिता की संपत्ति पर तो पूरा अधिकार जताता है किन्तु कर्तव्य पालन का समय आता है तो परिवार से महरूम कर उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ देता है। विचारणीय है कि जो व्यक्ति अपने पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन नहीं कर सकता वह सामाजिक व राष्ट्रीय दायित्वों का निर्वहन कैसे करेगा!
वर्तमान समय में सभी को स्वच्छ और सुरक्षित परिवेश चाहिए परंतु वह सिर्फ दूसरों से चाहिए। जब रास्ते चलते हुए कागज फेंकते हैं, केले खाकर उसका छिलका फेंकते हैं, गुटखा, पान, तंबाकू खाकर जगह-जगह थूकते हैं, तब यह विचार मस्तिष्क में नहीं आता कि आसपास के क्षेत्रों को साफ रखना हमारा कर्तव्य। स्थिति हास्यास्पद और दुखद तब हो जाती है जब गंदगी फैलाकर कहते हैं सरकार प्रचार के लिए सफाई अभियान का ढोंग करती है। अस्वच्छता के लिए दूसरों पर उँगली उठाने वाले स्वयं ही गंदगी फैलाते हैं क्योंकि दायित्वों को निभाने में लगने वाली थोड़ी मेहनत वो नहीं करना चाहते। कौन ढूँढ़े कूड़ेदान....कौन ढूँढ़े शौचालय...जहाँ तन वहीं विसर्जन।
अपने गंतव्य पर जाते हुए सड़क पर कोई दुर्घटना का शिकार घायल पड़ा तड़प रहा होता है तो लोग पास खड़े होकर तमाशा देखते हैं, सहानुभूति जताते हैं किन्तु मानवता का धर्म निभाते हुए कोई उसकी मदद नहीं करता, फिर चाहे वह घायल तड़पते हुए दम ही तोड़ दे किन्तु वहीं जब पीड़ित कोई अपना होता है तो दूसरों को कोसते हैं, सिस्टम को कोसते हैं।
ऐसी कितनी ही दुर्घटनाओं को टाला जा सकता है यदि चालक अपने दायित्व का ध्यान रखकर वाहन चलाएँ और दुर्घटना के पश्चात् यदि लोग मूकदर्शक बनने के बजाय एक मानव का दायित्व निभाएँ या जिम्मेदार नागरिक होने का दायित्व निभाएँ तो कितनी ही जानें बचाई जा सकती है।
हमें सड़क पर स्वच्छंद होकर चलने का अधिकार चाहिए परंतु वही सड़क सभी के लिए सुरक्षित हो सके इसके लिए अपनी स्वच्छंदता पर थोड़ा अंकुश लगाने को तैयार नहीं। अधिकतर देखा जाता है कि जब हम किसी दफ़्तर में अपना कोई काम करवाने जाते हैं तो हमारा कार्य शीघ्रातिशीघ्र बिना दौड़-भाग के हो जाए इसके लिए चपरासी से लेकर अफसर तक को टेबल के नीचे से रिश्वत देते हैं फिर कहते हैं चारों ओर भ्रष्टाचार व्याप्त है। छोटे से लेकर बड़े व्यापारी तक सरकार को टैक्स देकर अपना नागरिक होने का उत्तरदायित्व नहीं निभाना चाहते और सुविधाएँ अमेरिका, स्विट्ज़रलैंड वाली चाहते हैं।
आज भी हमारे देश की जनता का एक बड़ा भाग मुफ्त की मलाई चाहते हैं, वह कर्म करने के दायित्व का निर्वहन भी नहीं करना चाहते और उम्मीद करते हैं कि सरकार उन्हें बिना कर्म ही रुपए या अन्य आवश्यक वस्तुएँ प्रदान करे और इसीलिए स्वार्थ के वशीभूत होकर सही या गलत को जाँचे बगैर ऐसा निर्णय ले लेते हैं कि अधिकारों की माँग रखने वाले ही भविष्य में अपने न जाने कितने अधिकारों से हाथ धो बैठते हैं। ऐसे लोग अधिकारों के नाम पर भ्रमित होते हैं और निर्णय नहीं कर पाते कि वास्तव में अधिकार का सही स्वरूप है क्या। सभी को नौकरियों में उच्च पद चाहिए परंतु शिक्षा ग्रहण करने के दायित्व का निर्वहन करने के बजाय आरक्षण की ढाल ओढ़कर सब हासिल करने का प्रयास करते समय हम यह नहीं सोचते कि जो परिश्रम से योग्यता प्राप्त करते हैं हम उनके अधिकारों का हनन कल रहे हैं।
वह स्थिति अति दुखद प्रतीत होती है जब एक जघन्य अपराध करने वाला अपराधी भी न्यायालय में मानवाधिकार की दुहाई देकर सजा से बचना चाहता है परंतु न्यायालय को यह कहते नहीं सुना जाता कि उसने जिसकी हत्या या बलात्कार का अपराध किया क्या उसका कोई मानवाधिकार नहीं था? उस समय मन और अधिक कुंठित हो उठता है जब आतंकवादियों के लिए भी मानवाधिकार की दुहाई दी जाती है, क्या उसने मानव होने का दायित्व निभाया? नहीं, तो मानव होने का अधिकार क्यों?
अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे के साथ चलते हैं, एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं जिस दिन व्यक्ति को यह समझ आ जाएगा उस दिन वह स्वार्थ से मुक्त हो एक आदर्श नागरिक की श्रेणी में आ जाएगा।
मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

Wednesday, 3 April 2019

गरीबों की नाव पर राजनीति की सवारी


सत्ता के इस महासंग्राम में कुछ राजनीतिक पार्टियों द्वारा गरीब को सदैव सारथी बनाया जाता है। जो कि अपने गरीबी के रथ पर बैठाकर अमीरी की ओर बढ़ती इन राजनीतिक पार्टियों को इस महा संग्राम के चुनावी रणक्षेत्र से बाहर विजयी बनाकर निकालता है। हमेशा इन्हीं गरीब सारथियों के सहारे चुनाव का रणक्षेत्र पार करके उसे फिर उसी प्रकार गरीबी की मँझधार में डूबने-उतराने के लिए छोड़ दिया जाता है। इसके बावजूद, इतने दशकों तक छले जाते रहने के बाद भी आज भी गरीब छले जाने के लिए तैयार हैं, ऐसा मानना है राजनीतिक दलों का, और क्यों न हो, जब तक ऐसा सोचने वालों को माकूल ज़वाब नहीं मिलता, तब तक तो उनकी धारणा यही रहेगी क्योंकि आज तक का उनका अनुभव उनका हौसला बढ़ाता है।

गरीबी यूँ तो अभिशाप है, गरीबी का दर्द क्या होता है ये गरीब के अलावा और कोई नहीं समझ सकता, लेकिन गरीब स्वार्थी ही हो यह आवश्यक नहीं, आवश्यक नहीं कि जो इंसान गरीब पैदा हो वह आजीवन गरीब ही रहे। किसी ने सत्य ही कहा है कि 'इंसान गरीब पैदा हो, इसमें उसका कोई दोष नहीं, किन्तु गरीब ही मर जाए तो वह दोषी ही नहीं अपराधी है। क्योंकि जन्म कहाँ किस परिवार में होना है ये हमारे वश में नहीं किन्तु ईश्वर प्रदत्त  शारीरिक अवयवों की सक्षमता के बाद भी यदि हम राजनीति द्वारा पोषित गरीबी के शिकार बने रहें तो यह हमारी अकर्मण्यता ही है। बहुधा देखा जाता है कि गरीबी व्यक्ति को निरीह व दया का पात्र बना देती है परंतु कुछ ऐसे उदाहरण भी दृष्टव्य हैं कि परिश्रमी व्यक्ति गरीबी से हारकर भी अपना स्वाभिमान नहीं छोड़ता। वह मुश्किलों से घबराकर परिश्रम करना नहीं छोड़ता और अंततः गरीबी के दलदल से बाहर भी निकल आता है। परिस्थितियाँ सदैव हमारे अनुकूल नहीं होतीं तो सदैव प्रतिकूल भी नहीं होतीं, आवश्यकता होती है सदैव चैतन्य अवस्था में रहते हुए उन्हें पहचानने और सही दिशा में कर्म करने की। जिस प्रकार दिवस और रात्रि प्रकृति का नियमित चक्र है उसी प्रकार सुख-दुख, अच्छा-बुरा भी नियमित चक्र है किन्तु यह तभी संभव है जब हम सदैव सकारात्मक सोच के साथ क्रियाशील रहेंगे। यदि धारणा ही ऐसी बना ली जाय की गरीब पैदा हुए हैं इसलिए गरीब ही मरेंगे, तो निश्चित ही यही होगा। कहा भी गया है कि- 'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।' और सत्य यही है कि "व्यक्ति तब तक नहीं हारता जब तक वह हार न मान ले।" इसलिए कैसी भी परिस्थिति हो पर हार मान कर नहीं बैठना चाहिए बल्कि संघर्षरत रहना चाहिए।
आजकल चुनावी माहौल में गरीबों को लोक-लुभावने सब्ज़बाग दिखाकर उनका वोट हासिल करने का प्रयास हो रहा है। योजनाओं तक तो बात ठीक थी माना जा सकता है कि सरकार का काम है देश की जनता के हितार्थ काम करना किन्तु अब तो मुफ्त में पैसे देकर गरीबों का भला करने के वादे किए जाते हैं। ऐसा नहीं है कि ये पहली बार है, ऐसी तरह-तरह की योजनाएँ दशकों से चलती रही है, कभी किसी पार्टी के द्वारा मुफ्त में साइकिल वितरण किया गया तो कभी लैपटॉप वितरण हुआ। कभी प्रैशर कुकर बाँटा गया तो कभी साड़ी बाँटी गई, कहीं मुफ्त खाने के लिए भोजनालय खुलवा दिए गए तो कहीं मुफ्त पानी, वाई-फाई का वादा करके सत्तारूढ़ हुए। परंतु प्रश्न यह उठता है कि इतनी सारी मुफ़्त वस्तुओं के वितरण के पश्चात भी क्या गरीबी में अंश मात्र की भी कमी आई? बल्कि गरीबों की संख्या बढ़ी है, आत्महत्या की घटनाएँ बढ़ी हैं तथा सरकार पर निर्भरता बढ़ी है। कहते हैं कि 'बैठे मिले खाने को तो कौन जाए कमाने को' यह सूक्ति चरितार्थ होती नजर आती है। आम जनता में अधिकांश की धारणा बन गई है कि गरीबी उन्मूलन सरकार का काम है किन्तु यह नहीं समझ सके कि यदि मुफ्त वितरण से आर्थिक समानता आती तो हमारे देश से गरीबी कब की मिट चुकी होती। राजनीतिक पार्टियाँ जनता के इस सोच से या यूँ कहा जाए कि इस कमजोरी से भली भाँति परिचित हैं इसीलिए जब चुनाव आता है तब कर्ज़ माफी, रुपए वितरण जैसे लोक-लुभावने वादे किए जाते हैं और अकर्मण्यता के शिकार लोग लालच में आकर सिर्फ अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर ऐसी पार्टियों को वोट दे देते हैं। वो यह नहीं समझते कि ऐसे लालच देकर ये नेता उन्हें लालची और आलसी बना रहे हैं ताकि वे कभी आगे न बढ़ें और अगले चुनाव में भी उनका इसी प्रकार प्रयोग किया जा सके। परिणामस्वरूप मुफ्त का लालच देने वाली पार्टी सत्ता में आ जाती है। सोचने की बात है कि जो मुफ्त पैसे बाँटने को तैयार हो, वह ऐसा अपने स्वार्थपूर्ति के लिए ही तो करेगी, न कि गरीबों के लिए और इसीलिए सत्ता में आते ही गरीब और गरीबी भूलकर भ्रष्टाचार घोटाले आदि से अपना ख़जाना भरना प्रारंभ कर देती है और घोषित राशि कुछ दस-पाँच प्रतिशत लोगों तक पहुँचा कर दिखावे की राजनीति भी हो जाती है। परिणामस्वरूप गरीब गरीब ही रह जाते हैं और अगले आने वाले चुनाव का चारा बनने को तैयार होते हैं। यदि गरीब अपने स्वाभिमान को जगाए रखे और परिश्रम से ही आजीविका तलाशे तो कदाचित स्वयं वह अपनी नकारात्मक परिस्थितियों ने निकल सकता है और मुफ्त के लालच का शिकार बनकर देश को गलत हाथों में सौंपने के अपराध से भी बच जाएगा। हर व्यक्ति को सदैव अपने कर्मों पर भरोसा रखना चाहिए क्यों 'दैव-दैव' पुकारना आलसी का काम है। इसीलिए तो कहा गया है 'दैव-दैव आलसी पुकारा' कर्मयोगी के लिए तो 'अपना हाथ जगन्नाथ' होता है।

मालती मिश्रा 'मयंती'