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Saturday, 24 October 2015

राजनीति का शिकार साहित्य


 आज गुरु जी की एक बात याद आ रही है..एक बार किसी बात पर उन्होंने एक छोटी सी कहानी सुनाई थी...कि किस प्रकार जंगल में खरगोश द्वारा आसमान गिरने की बात सुन सभी जानवर बिना सच जाने उसके पीछे भाग लेते हैं...हमारे देश में कुछ ऐसी ही भेड़चाल अक्सर देखने को मिलती है, जिधर भीड़ जा रही हो सभी उसी ओर चल पड़ते हैं...
आज फिर से कुछ ऐसी ही लहर चल पड़ी है...एक व्यक्ति जिस राह जा रहा है दूसरे बिना विचारे उसी राह पर चल पड़ते हैं और ये किसी भोले-भाले कम पढ़े-लिखे व्यक्ति की बात नहीं कर रही मैं बल्कि समाज के उच्च शिक्षित वर्ग की बात कर रही हूँ....जी हाँ आज हमारा साहित्यिक वर्ग जागरूक हो गया है....सचमुच बहुत ही प्रसन्नता की बात है कि जो साहित्यिक वर्ग साठ-पैंसठ सालों से सोया हुआ था वह आज जाग गया....उसकी नींद टूट गई और आँख मलता हुआ उठ खड़ा हुआ और जिसको जिधर जाते देखा बिना सोचे-समझे, बिना अपने विवेक को कष्ट दिए स्वयं भी उधर ही चल पड़ा| खैर अच्छा लगा यह देखकर कि चलो सुबह का भूला शाम को ही सही घर तो लौटा.....देर आए दुरुस्त आए....पर फिर भी इन्हें अर्ध निद्रा में देख ये कहने को मन करता है-उठो लाल अब आँखें खोलो, पानी लाई हूँ मुँह धो लो...ताकि आँखों से नींद का आवरण हटे और कुछ खुद के विवेक से सत्य को साफ-साफ देख सको....
साहित्य के ज्ञाता हो साहित्यिक हृदयधारी हो विवेकशील बुद्धिजीवी हो फिर तुम्हारे लिए तो प्रत्येक प्राणी एक समान होना चाहिए मुख्यतः मानव...तुम्हारे हृदय में तो सभी के लिए दयाभाव भी समान होना चाहिए....और वो है भी| परंतु ये करुणा अभी क्यों दिखाई दी ? जब एक अल्पसंख्यक को बेरहमी से मार डाला गया...उस वक्त ये करुणा कहाँ थी जब मुजफ्फर नगर में अल्पसंख्यकों ने बहुसंख्यकों को बर्बरता पूर्वक काटा था, उस वक्त आपका हृदय क्यों नहीं पसीजा जब गोधरा कांड हुआ,उस वक्त आपकी नींद क्यों नहीं टूटी जब कश्मीरी पंडितों को बेघर किया गया? तब आप सब बुद्धजीवियों को क्या भांग देकर सुला दिया गया था, जब अयोध्या कारसेवकों की नृशंस हत्याएँ हुईं और परिणाम स्वरूप हजारों निरपराधों को जघन्यता पूर्वक मारा गया, उस वक्त आप सभी साहित्यकार किन सपनों की दुनिया की सैर कर रहे थे जब सरदारों की नृशंसता पूर्वक हत्या कर रहे थे?  क्या वजह है कि आप सभी बुद्धजीवियों में अचानक ही जागरूकता आ गई....या फिर जिस प्रकार रावण ने सभी वीरों को समाप्त होते देख कुम्भकरण को जगाया और एक शक्तिशाली अस्त्र के रूप में प्रयोग किया उसी प्रकार आप लोगों को एक हथियार की तरह तैयार किया जा रहा था कि जब सभी अस्त्र-शस्त्र (सूट-बूट, जुमला, मँहगाई,हर व्यक्ति के अकाउंट में पंद्रह लाख ₹) समाप्त हो गए तब साहित्यिक बाहुबलियों को मैदान में उतारा गया....और अब एकदम ही सभी महारथी नमक का कर्ज उतारने मैदान में आ डटे...जो आना चाहते थे वो भी और जो नहीं आना चाहते थे वो भी...
इन सभी बुद्धिजीवियों के समक्ष मेरा कद बहुत ही छोटा है..अभी तो मैं खड़े होना सीख रही हूँ परंतु इतना ज्ञान मुझे भी है कि सत्य को हमेशा अकेले ही लड़ना पड़ता है और बुराइयाँ सदैव एकजुट होकर चौतरफा वार करती हैं तो मैं ये कैसे मान लूँ कि इन सभी साहित्यिक महारथियों को कौरव और पांडवों की पहचान न होगी...क्या ये सभी जागरूक वर्ग ये कहना चाहते हैं कि साठ-पैंसठ सालों में जो कुछ भी नैतिक-अनैतिक हुआ वो सब सही था और आज जो कुछ भी हो रहा है वो सब गलत है...यदि ऐसा है, यदि ये सत्य होता तो कोई अवॉर्ड तो नहीं है मेरे पास पर मैं अपनी लेखनी त्याग देती....
पर मैं जानती हूँ ये सही नहीं, यदि एक अल्पसंख्यक की हत्या जुर्म है तो अनेकों बहुसंख्यकों की हत्या भी उतना ही जुर्म है...यदि साहित्यिक वर्ग सचमुच जागरूक होता तो अपने शस्त्र से युद्ध करता....बुराई के खिलाफ अपने कलम की आवाज को बुलंद करता न कि हथियार छोड़कर ये कहकर भागता कि अब हमने लड़ना बंद कर दिया और ये बुराई हमसे देखी नहीं जा रही है इसलिए हम विरोध स्वरूप आँखें बंद करके ध्यानमग्न होने जा रहे हैं....
कितने दुख की बात है कि यहाँ आपसी रंजिश को भी दलित दमन का रूप दे दिया जाता है और बच्चों के पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार करने की बजाय उसका नुमाइश बना दिया जाता है और ये सब राजनीति के चलते होता है...परंतु हमारे साहित्यिक योद्धा इस कृत्य के खिलाफ एक शब्द नहीं बोल पाते...क्या करें बेचारे शायद करुणाघात से निःशब्द हो गए होंगे या अपने शस्त्र त्याग पहले ही निःशस्त्र हो चुके हैं, या फिर मैं ये कहूँ कि इस प्रकार की नकारात्मक राजनीति के पक्षधर ये हमारे साहित्य-सैनिक भी हैं....
विचारणीय है कि एक शक्तिशाली शस्त्र भी यदि अपनी स्वतंत्रता खोकर अंधभक्ति करने लग जाएगा तो देश किस ओर जाएगा.....

साभार...मालती मिश्रा

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