रविवार

गरिमामयी पदों के गरिमाहीन पदाधिकारी

उच्च पदों पर सभी पहुँचना चाहते हैं दिन रात कठोर परिश्रम करते हैं ताकि वो अपनी मंजिल पर पहुँच सकें। जिन्हें बचपन से ही सही मार्गदर्शन प्राप्त होता है और वो बचपन में ही अपना लक्ष्य निर्धारित कर लेते हैं, वो सही मार्गदर्शन में अपने लक्ष्य प्राप्ति की ओर अग्रसर होते हैं। ऐसे परिश्रमी व्यक्ति को जब उसका लक्ष्य प्राप्त हो जाता है तो वह उसकी गरिमा को समझता है और अपने पद की गरिमा बनाये रखने के लिए सदैव प्रयासरत रहता है, उस व्यक्ति को न सिर्फ पद की गरिमा का अहसास होता है बल्कि अपने माता-पिता का त्याग उनका सम्मान भी याद रहता है और वह जानते बूझते ऐसा कार्य नहीं करना चाहता जिससे कोई उसके माता-पिता की परवरिश या संस्कारों पर उँगली उठा सके।
कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जिनको किस्मत से उच्च पद प्राप्त हो जाते हैं तब भी वह अपने संस्कारों के धनी होने के कारण अपने पद की गरिमा का मान रखते हैं। कुछ व्यक्ति इसे अवसर की दृष्टि से देखते हैं और सोचते हैं कि भाग्य ने उन्हें कुछ कर दिखाने का अवसर दिया है तो वो कुछ ऐसा करें जिससे समाज व देश का हित हो। हालांकि ऐसा सोचने व करने वालों की संख्या कम होती है परंतु हम यह नहीं कह सकते कि नहीं होती। 
अब हम बात करते हैं राजनीति की... राजनीति के क्षेत्र में कितने ऐसे भाग्यशाली होंगे जो पहली बार चुनाव लड़े हों और भारी बहुमत से विजयी होकर सीधे मुख्यमंत्री बन गए हों। हमारे माननीय मुख्यमंत्री जी ऐसे ही भाग्यशाली व्यक्ति हैं। परंतु एक कहावत सुना है कि 'बिल्ली को घी हज़म नहीं होता' वही हाल मुख्यमंत्री जी का भी है रह-रह कर नहीं लगातार पेट में उबाल आता है और जब डकार लेते हैं तो बस एक ही बात मुँह से निकलती है-"मोदी जी कुछ करने नहीं देते, या सब बीजेपी की साजिश है।" इसीलिए तो किसी भी पद के लिए उसके अनुसार योग्यता और अनुभव आवश्यक होता है। एक कहावत तो सबने सुना या पढ़ा होगा-"नाच न जाने आँगन टेढ़ा" वही हाल इस समय हमारे माननीय मुख्यमंत्री जी का है। चुनाव के समय मुफ्त की खैरात बाँटने का लालच देकर वोट तो हासिल कर लिया परंतु अब ये समझ नहीं आ रहा कि वादों को पूरा कैसे किया जाय या राज्य का विकास कैसे किया जाय तो अपने कार्यों से स्वयं को ऊपर ले जाने की बजाय दूसरों को नीचे खींचने का प्रयास करते हैं, जो दिमाग विकास के विकल्प सोचने में लगाना चाहिए वो विकास रोकने के विकल्प सोचने में लगाते हैं। किसे किस प्रकार संबोधित करना चाहिए यह तक नहीं पता। उनके अब तक के कार्यों से सिर्फ एक ही चीज समझ में आई है कि उन्हें राज्य या देश से कोई लेना-देना नहीं, सत्ता में आने के बाद ज्यादा से ज्यादा सुर्खियों में रहना उनका एकमात्र उद्देश्य है, जिसके कारण उन्होंने सिर्फ अपने फोटो वाले बैनर और विज्ञापन पर ही जनता के करोड़ों रूपए पानी की तरह बहा दिए, यह जानते हुए भी कि यह गैरकानूनी है वो बिना झिझक ऐसे कार्य करते हैं जो संवैधानिक नहीं होते और उन पर जो ऐतराज करे वो उनके अपशब्द सुनने को तैयार रहे। ये कानून के अनुसार कार्य नहीं करते कानून को अपने अनुसार तोड़ना-मोड़ना चाहते है, सात के स्थान पर इक्कीस सचिवों की नियुक्ति इस बात का प्रमाण है और जब कानूनी कार्यवाही होती है तो सारा इल्जाम प्रधानमंत्री जी पर डाल देते हैं कि प्रधानमंत्री सब कर रहे है। जैसे स्वयं सारे फैसले स्वयं ले लेते हैं वैसे ही प्रधानमंत्री जी को समझते हैं। और तो और बात करते समय पद की गरिमा का भी मान नहीं रखते कि वो किस प्रकार की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं जिसके कारण उनके संस्कारों पर उँगली उठना तो स्वाभाविक ही है। स्वयं हिटलरी फरमान जारी करते हैं और प्रधानमंत्री जी को तानाशाह बताते हैं, उन्हें आजकल देश या राज्य के विकास से ज्यादा आवश्यक प्रधानमंत्री जी की डिग्री जानना है हालांकि स्वयं की डिग्री भी साफ-सुथरी नहीं है परंतु उसकी शर्म ही किसे है लक्ष्य तो प्रधानमंत्री जी को बदनाम करना है। एक और लक्ष्य है जो वो बखूबी निभा रहे हैं वो रिलीज के पहले सप्ताह में ही सभी फिल्में देखना और उस पर टिप्पणी करना। 
अधिक क्या कहें जहाँ कहीं से देशद्रोह की बू आए वहाँ जाकर उसको संरक्षण प्रदान करना तो इनके देशप्रेम में शामिल है।
खैर हमारे माननीय मुख्यमंत्री जी के इस छोटे से कार्यकाल में समाज विरोधी, देशविरोधी, कानून विरोधी तथा कुसंस्कारों को दर्शाने वाले इतने कारनामे हैं कि लिखते-लिखते हम थक जाएँ पर इनकी महिमा का गुणगान समाप्त न होगा।

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8 टिप्‍पणियां:

  1. जहाँ तक वादे करने का प्रश्न है माननीय प्रधान मंत्री और दिल्ली के मुख्य मंत्री लगभग एक जैसे ही और बड़े बड़े वादे कर चुके हैं जिनको याद कर के हंसी आती है.
    तानाशाही में भी दोनों मिलते जुलते हैं. एक ने अडवाणी और जोशी को किनारे कर दिया दूसरे ने भूषण और यादव को.
    तीसरी १५ अगस्त आने वाली है एक का स्वच्छता अभियान फ्लॉप हो गया, दूसरे का फ्री wifi.
    हरी अनंत हरी कथा अनंता.
    बात यहीं समाप्त करता हूँ ये कह के कि दोनों ने निराश किया.

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    1. हर्षवर्धन जी क्षमा कीजिएगा मैं आपकी बातों से सहमत नहीं हूँ, प्रधानमंत्री मोदी जी और मुख्यमंत्री केजरीवाल जी की तुलना करना दिन और रात की तुलना करने के समान है। रही वादों की बात तो वादे तो सभी करते हैं परंतु दोनों के वादों मे और उसके क्रियान्वयन में जमीन आसमान का अन्तर है किसी को मुफ्त देने का वादा ही अपने-आप में गलत है। खैर मोदी जी अपने वादों को पूरा करने की राह पर अग्रसर हैं वह पत्ते को पानी नहीं हो रहे वह जड़ मजबूत कर रहे हैं, जिसके कारण आज बहुत से देशों तक में खलबली मची है खैर मैं किसी के विचार नहीं बदल सकती परंतु अपने विचार रखना अपना कर्तव्य समझती हूँ। बाकी समय सबसे बलवान है सत्य-असत्य समक्ष आ ही जाता है।

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  2. आप का आलेख साफ़ दर्शाता है कि आप मोदी जी को लेकर बहुत निष्पक्ष नहीं है । मेरी गुजारिश है कि आप पुनः एक बार सारे तथ्यों के साथ अवलोकन करें ।

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  5. आप का आलेख साफ़ दर्शाता है कि आप मोदी जी को लेकर बहुत निष्पक्ष नहीं है । मेरी गुजारिश है कि आप पुनः एक बार सारे तथ्यों के साथ अवलोकन करें ।

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  6. शिवराज जी यह आवश्यक नहीं होता हम सभी किसी विषय पर एकमत हों परंतु सत्य जानने का प्रयास अवश्य करना चाहिए, मैं किसी भी बात पर बहुत आसानी से और अति शीघ्रता से विश्वास नहीं करती और हर उस व्यक्ति और विचार का समर्थन नही करती जो मेरे देश समाज मातृभाषा और धर्म के विरुद्ध हो। रही मोदी जी की बात तो मैं सिर्फ उनपर कार्यों का समर्थन करती हूँ जो हमारे देश के हितार्थ हैं और यदि मोदी जी के अधिकतर कार्य देश के हित में हैं तो मैं निश्चय ही उनका समर्थन करती हूँ।

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  7. शिवराज जी यह आवश्यक नहीं होता हम सभी किसी विषय पर एकमत हों परंतु सत्य जानने का प्रयास अवश्य करना चाहिए, मैं किसी भी बात पर बहुत आसानी से और अति शीघ्रता से विश्वास नहीं करती और हर उस व्यक्ति और विचार का समर्थन नही करती जो मेरे देश समाज मातृभाषा और धर्म के विरुद्ध हो। रही मोदी जी की बात तो मैं सिर्फ उनपर कार्यों का समर्थन करती हूँ जो हमारे देश के हितार्थ हैं और यदि मोदी जी के अधिकतर कार्य देश के हित में हैं तो मैं निश्चय ही उनका समर्थन करती हूँ।

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