शुक्रवार

याद आता है प्यारा वो गाँव

याद आता है पुराना वो पीपल का पेड़
वो नदी का घाट
वो छोटे बगीचे में महुआ के नीचे 
बिछी हुई खाट 
सूरज की तपती दुपहरी की बेला 
बाग में बच्चों के रेले पर रेला 
तपती दुपहरी में गर्म लू के थपेड़े 
पेड़ों की छाँव में वो बकरी वो भेड़ें 
बेपरवा बचपन की अल्हड़ किलोलें 
लुका-छिपी और झुकी टहनी के झूले 
अंधड़ के झोंके से बाँसों का हिलना 
आपस में लड़ना और गले मिलना 
दुपहरी के धूप से बचने की खातिर
खाटों पर बैठे काका और ताऊ
गाँव की तरक्की पर बतियाने मे माहिर
दूर-दूर तक धूप में फैले वो खेत 
मानों ओढ़े सुनहरी धूप की चूनर
गर्म हवा के तेज थपेड़ों से 
गेहूँ की बालियों के बजते वो घूँघर
आज भी याद है मुझे प्यारा वो गाँव
पंखे कूलर छोड़ भाती थी 
सिर्फ पेड़ों की छाँव.....
याद आता मुझको प्यारा वो गाँव.....

मालती मिश्रा

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2 टिप्‍पणियां:

  1. अच्‍छा लगा आपके ब्‍लॉग पर आकर....आपकी रचनाएं पढकर और आपकी भवनाओं से जुडकर....

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    1. धन्यवाद संजय जी, ब्लॉग पर आपका स्वागत है, कृपया इसी तरह हौसला बढ़ाते रहें।

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