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Wednesday, 22 June 2016

मातृभाषा को समर्पित कुछ पल

अकस्मात् मस्तिष्क मे विचार आया
क्यों न संकुचित विचारों को कुछ विस्तार दिया जाए
इस प्रक्रिया हेतु हिन्दी वाचन का अभ्यास किया जाए
इन्हीं विचारों में मग्न मैं चली जा रही अपने गन्तव्य की ओर
अचानक वातावरण में गूंजने लगा मानवों का मिलाजुला शोर
देखा हमने एक त्रिचक्रिका मानव चालित वाहन से
भिड़ंत हो गई थी एक अन्य त्रिचक्रिका वाहन की
दोनों ही चालक जिद करते, वाद-विवाद में अकड़े थे
दोनों अपने निर्देशित पथ पर हैं इसी कथ्य पर अड़े हुए थे
शांत कराया उनको कुछ बुद्धिजीवी दर्शकों ने
तब अवसर पाकर मैने अपना प्रश्न पूछा एक त्रिचक्रिका वाहन के चालक से
क्यों भाई क्या प्रस्तर पथ गामी स्थानक चलने को तुम 'राजी हो
चालक ने सिर खुजलाया फिर सिर से पैरों तक मुझको निहारा और पूछा
कहाँ से आए हो तुम, भाई कौन सी भाषा है अपनाई 
ये नई जगह है कौन सी हमारी नजर में तो कभी न आई
पास खड़े एक महानुभाव मंद-मंद से  मुस्कराए
बस स्टॉप की बात कर रहे चालक को वो समझाए
ओहो, बस स्टॉप से फिर सरजी आगे कहाँ को जाना है
चालक का मंतव्य हमने भी भाँप लिया और बोले
चालक महोदय आज तो हमने परिभ्रमण की योजना बनाई है 
परिसदन से आरंभ करें यही सोच मस्तिष्क में आई है
चालक पुनः चकराया बोला साहब जी जरा हिंदी में बात करो 
दूसरी भाषाओं से हम सदा दूर ही रहे
हमने कहा चालक महोदय हम हिंदी में ही बोल रहे
वह मन ही मन बुदबुदाया
मोदी जी का नशा है कैसा सब पागल बन डोल रहे
पास खड़े महानुभाव नजरों से मुझको तोल रहे
ऑटो वाले को समझाया 
कि इन्होंने घूमने का मन है बनाया, सक्रिट हाउस से शुरू करें 
ऐसा अभी है बताया
चलिए सर जी, पर याद रखें मुँह बिल्कुल न खोलेंगे
सक्रिट हाऊस पहुँचकर वहाँ से दूसरा ऑटो ले लेंगे
मैं और साथ वाले सज्जन दोनों त्रिचक्रिका वाहन में बैठ गए
कुछ दूर चले होंगे हम मेरे मस्तिष्क में विचार कौंध गए
मैंने वाहन चालक से पूछा
क्यों श्रीमान चालक महोदय इस नगर में कितने 'छवि गृह' हैं?
चालक चकराया फिर सिर खुजलाया और क्रोधित हो बोला
"छवि गृह" मतलब
मतलब कितने "चलचित्र मंदिर" है, मैंने प्रश्न दुहराया
चालक का दिमाग हिल गया परंतु मुखड़ा खिल गया
मानो सोच रहा कि चलो किसी प्रश्न का तो उत्तर उसके पास है
बोला साहब मंदिर तो बहुत हैं इस शहर में बिड़ला मंदिर यहीं पास है
नहीं चलचित्र मंदिर की बात कर रहा मैंने उसे समझाया 
जहाँ नायक-नायिका का मंचभिनंदन पर प्रेमालाप जाता है दिखाया
फिल्म हॉल की बात कर रहे दूसरे सज्जन ने बतलाया
किंतु इससे पहले ही चालक चकरा चुका था 
अपनी त्रिचक्रिका वाहन को किसी अन्य त्रिचक्रिका से ठोंक चुका था
मैं बोला श्रीमन यह क्या हो गया
तुम्हारी वाहिनी का अग्र चक्र वक्र हो गया
आगे पंचर की दुकान थी
मैंने दुकान वाले से कहा-
हे त्रिचक्रिका सुधारक महोदय हमारी त्रिचक्रिका का अग्र चक्र है वक्र क्या तुम इसे सुधारोगे
दुकान वाला मानो पहले ही क्षुब्ध था, बोला सुबह से यहाँ बोहनी नही हुई तू मुझे श्लोक सुनाता है
चल भाग यहाँ से वर्ना मैं तेरा अगला-पिछला चक्र सब वक्र बनाता है
क्षमा याचना के साथ मैंने चालक से पुनः प्रश्न किया
महोदय कितनी मुद्राएँ हुईं आपकी कृपया मुझे बताएँ 
और हाँ यहाँ से जाने से पूर्व कृपया
अपने वाहन के चक्र में वायु ठूसक यंत्र से वायु भरवाएँ
चालक बोला श्रीमन मुझे क्षमा करें, आपके आदि से अंत तक का भाड़ा मेरे वाहन के भाड़ा सूचक यंत्र में प्रदर्शित है
कृपया स्वयं देखें और निर्देशित मुद्राएँ देकर अपने मार्ग पर अग्रसर हों
अब चकराने की बारी मेरी थी
स्तब्ध सा मैं स्वचालित भाव से भाड़ा चालक को देकर अपने पथ पर चल दिया 
मन में अपार संतुष्टि और साथ ही एक प्रश्न भी था...
वाहन चालक ने अभी-अभी जो भाषा उच्चारित किया
क्या वो मेरी संगति का असर था या वो चालक पहले से प्रखर था.....
मातृभाषा को समर्पित

मालती मिश्रा 








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