रविवार

हिंदी तुझ पर क्यों है बिंदी.....

हिंदी !!!!!
तुझ पर कितनी बिंदी......
क्यों नहीं हटा देती इसको ?
बिन बिंदी और बिन नुक्ता के
सीधी-सरल और स्वच्छ
क्यों नहीं बना लेती खुद को..

हिंदी बोली सुन इंसान!!!!
हिंदी के मस्तक पर बिंदी
हिंदी का गर्व और शान
नुक्ता चरणों में गिरकर 
बना गया अपनी पहचान

बिंदी हिंदी का अभिन्न अंग
यह चला सदियों से संग-संग
बिंदी बिन हिंदी बनी दीन
हिंदी बिन बिंदी अस्तित्वहीन

हिंदी से बिंदी को मिली पहचान
बिंदी से हिंदी की बढ़ी शान
बिंदी बिन अर्थ का हुआ अनर्थ
हिंदी में बिंदी सत्य समर्थ

हिंदी से बिंदी कैसे हो दूर
बिंदी से हिंदी का बढ़ा नूर
बिंदी का हिंदी में वही स्थान
जैसे काया में बसे प्राण

साभार
मालती मिश्रा



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