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Sunday, 20 December 2015

बढ़ती सुविधाएँ.....घटते संस्कार


आज दुनिया ने विकास के नये-नये आयाम हासिल कर लिए हैं मनुष्य ने अपनी बुद्धि, अपनी सूझ-बूझ से विकास की ऊँचाइयों को छू लिया है, मनुष्य ने तकनीकी विकास के द्वारा सुख-सुविधाओं के उन साधनों का आविष्कार किया है जिनके विषय में पहले व्यक्ति सोच भी नहीं सकता था, आज व्यक्ति विकास की उस ऊँचाई पर है जहाँ पर पहुँचने की कल्पना भी पहले का मानव नहीं कर सकता था....हालांकि आविष्कार का आरंभ तो 'आग' के आविष्कार के साथ ही प्रारंभ हो चुका था किंतु यह आविष्कार मनुष्य को इतना आगे ले आएगी ये किसी ने सोचा भी न होगा....

जो दूरी व्यक्ति पहले महीनों में पैदल चलकर तय करता था आज वही दूरी चंद घंटों मे तय कर लेता है, पहले व्यक्ति अपने करीबी लोगों को समाचार प्रेषित करने के लिए पक्षियों का फिर राहगीरों का और फिर डाक का सहारा लेने लगा, इन सभी तरीकों में समय अधिक लगता था परंतु अब मोबाइल के आविष्कार ने न सिर्फ यह समस्या हल कर दिया बल्कि क्षण भर में ही समाचार प्राप्त होने के साथ-साथ वीडियो कॉल के जरिए व्यक्ति विशेष से आमने-सामने बात भी हो जाती है...किंतु इन तकनीकी साधनों के द्वारा जहाँ दूरियाँ घटी हैं वहीं व्यक्ति के दिलों में दूरियाँ इतनी बढ़ गई हैं कि उन्हें तय कर पाना लगभग असंभव होता जा रहा है...जहाँ एक स्थान से दूसरे स्थान, एक शहर से दूसरे शहर और एक देश से दूसरे देश तक जाने आने में बहुत कम समय लगता है वहीं अब एक ही घर में रह रहे व्यक्तियों के पास भी एक-दूसरे से बात करने का भी समय नहीं होता, दो-चार कदम की दूरी पर रह रहे अपने रिश्तेदारों,मित्रों से भी महीनों नही मिल पाते.....जबकि इन तकनीकी सुविधाओं के आविष्कार से पहले व्यक्ति दूर होते हुए भी दिल के इतने करीब होते थे कि मिलने का समय निकाल ही लेते थे चाहे फिर कोसों दूर पैदल चलकर जाना पड़ता था, दूर रहने वाले रिश्तेदारों के बारे में समाचार पूछने हेतु दूर-दूर तक चले जाया करते थे |

आज के समय में तकनीकी साधनों ने स्थानों की दूरियाँ जितनी कम की हैं दिलों की दूरियाँ उससे अधिक बढ़ा दी हैं, रिश्तों की डोर कमजोर होती जा रही है, संस्कारों के मापदंड बदलने लगे हैं, स्वार्थांधता लोगों पर हावी होती जा रही है,रिश्तों को देखने का नजरिया बदलने लगा है,उनके प्रति सम्मान तथा जिम्मेदारी का भाव समाप्त हो रहा है| 

माता-पिता बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर मोबाइल दिलवाते हैं ताकि जब बच्चा घर से बाहर हो तो वह उनके संपर्क में रहे किंतु बच्चों ने मोबाइल को ही अपना सब कुछ बना लिया है, वह घर से बाहर रहकर तो माता-पिता के संपर्क में रहते हैं किंतु घर पर आने के बाद माता-पिता व परिवार के अन्य सदस्यों से उनका संपर्क लगभग टूट-सा जाता है... अलग-थलग कमरे में बैठकर सोशल साइट्स पर अनजाने मित्रों से चैटिंग करते हैं किंतु घर के ही दूसरे कमरे में माता-पिता को उनकी जरूरत होगी इस बात का अहसास भी नहीं होता....फेसबुक पर अनजाने मित्रों की फोटो देखकर उसपर कमेंट देना कभी नहीं भूलते परंतु माँ ने प्यार से पकाकर जो खिलाया उसके विषय में कुछ कहना चाहिए ये पता ही नहीं होता....देर रात तक मोबाइल पर गेम खेलने, चैटिंग करने के लिए जागते है परंतु बहन या छोटे भाई की पढ़ाई में एक घंटे की मदद देने को तैयार नहीं....आजकल की नई पीढ़ी फेसबुक पर बुजुर्गों की तस्वीरें देखकर उनपर दया दर्शाते तथा बड़े बुजुर्ग की सेवा व सम्मान पर कमेंट तो करते हैं पर अपने माता-पिता व दादा-दादी के लिए सोचने का समय भी उनके पास नहीं होता..
मदर्स-डे पर बड़े-बड़े आदर्शों की बातें करके ही वो माँ के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर लेते हैं....बढ़ते तकनीकी ज्ञान ने आज की पीढ़ी में निःसंदेह ज्ञान का सर्जन किया है, समय की बचत किया है, कार्यों को आसान किया है, इसने देशों के बीच की दूरी को समाप्त करके दुनिया को एक साथ जोड़ने का भी कार्य किया है किंतु इतने सारे महत्वपूर्ण सकारात्मक परिणामों के बाद एक नकारात्मक परिणाम भी सामने आने लगा है वो है रिश्तों के बीच दूरी, आपसी जुड़ाव का अभाव, भावनाओं की समाप्ति, आदर्शों का क्षय, जिम्मेदारी के अहसास की समाप्ति, कुल मिलाकर तकनीकी ज्ञान और तकनीकी सुविधाएँ हमें सभ्य तो बना रही हैं किंतु संस्कार कहीं खोते जा रहे हैं और संस्कार विहीन समाज सम्पन्न और प्रसन्न दिखाई तो पड़ता है परंतु प्रसन्न होता नहीं...अपने मूल्यों से जुदा होकर कभी कोई प्रसन्न नहीं होता.....

साभार......मालती मिश्रा

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