गुरुवार

दर्द


दर्द क्या है कोई पूछे उससे,
जो दर्द को दिल बसा बैठी|
वफादारी की चरम सीमा तक,
वफा को सांसों में समा बैठी|
वफा बाँटा वफा चाहा,
वफा के सागर में वो बहने वाली
एक बूँद वफा का पा न सकी|
अपने भ्रम को मिटाने की चाह में,
भ्रमजाल में वो फँसती ही गई|
आँखों का भ्रम है या दिल का है धोखा,
भ्रम के भँवर में डूब गई|
न नाव मिली न पतवार मिला,
माँझी नही न किनारा ही मिला|
दर्द के अथाह सागर में आज भी,
दूर से किनारे को तकती वो रही|
कब शाम ढले कब रात ढले,
कब उल्लास का सूर्य उदय होगा|
पर क्या रह लेगी इस दर्द बिना,
जिसने है उसे पनाह दिया|

साभार.... मालती मिश्रा

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