Search This Blog

Thursday, 6 July 2017


एक लंबे अंतहीन सम इंतजार के बाद 
आखिर संध्या का हुआ पदार्पण
सकल दिवा के सफर से थककर
दूर क्षितिज के अंक समाने
मार्तण्ड शयन को उद्धत होता
अवनी की गोद में मस्तक रख कर
अपने सफर के प्रकाश को समेटे
तरंगिनी में घोल दिया
प्रात के अरुण की लाली से जैसे
संध्या की लाली का मेल किया
धीरे-धीरे पग धरती धरती पर
यामिनी का आगमन हुआ
जाती हुई प्रिय सखी संध्या से
चंद पलों का मिलन हुआ
तिमिर गहराने लगा
निशि आँचल लहराने लगा
अब तक अवनी का श्रृंगार 
दिनकर के प्रकाश से था
अब कलानिधि कला दिखलाने लगा
निशि के स्याम रंग आँचल में
जगमग तारक टाँक दिया
काले लहराते केशों में 
चंद्र स्वयं ही दमक उठा
अवनी का आँचल रहे न रिक्त
ये सोच जुगनू बिखेर दिया
टिमटिमाते जगमगाते तारक जुगनू से
धरती-अंबर सब सजा दिया
कर श्रृंगार निशि हुई पुलकित
पर अर्थहीन यह सौंदर्य हुआ
मिलन की चाह प्रातः दिनकर से
उसका यह स्वप्न व्यर्थ हुआ।
मालती मिश्रा

2 comments:

  1. बहुत सुंदर मीता!
    ढलती शाम और मदमाती निशा का वर्णन काव्यात्मक और आलंकारिक साथ ही निशा का दिवाकर से न मिलपाने का अंतहीन इंतजार। शुभ रात्री।

    ReplyDelete
    Replies
    1. 🍁🍁🌷🌷🌷🌾🌾🙏🙏🙏🙏 स्वागत है आपका, बता नहीं सकती कि कितनी खुशी हो रही है आपको ब्लॉग पर देखकर। आपकी प्रतिक्रिया से लिखने की प्रेरणा मिलती है। धन्यवाद मीता आभार।

      Delete