शनिवार


मैं ढलते सूरज की लाली
कुछ पल का अस्तित्व है मेरा
फिर तो लंबी रात है काली
सब पर एक सा प्यार लुटाकर
अपने रंग में रंग दूँ धरा को
पत्ता पत्ता डाली डाली
मैं ढलते...

जानूँ अपनी नियति का लेखा
कुछ पल में मैं ढल जाऊँगी
सौंदर्य बिखेरा अपनी हर शय
सबके मन को मैं लुभाऊँगी
नहीं किसी से बैर निकाली
फिर भी मेरा दामन खाली
मैं ढलते....
#मालतीमिश्रा

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