रविवार
मंगलवार
स्वीकृति से शांति तक
सबसे कठिन लड़ाई
दुनिया से नहीं होती,
वह खुद से होती है।
खुद को वैसे ही स्वीकार करना
जैसे हम हैं—
बिना सजावट,
बिना सफ़ाई दिए।
अब खुद से सवाल नहीं
पहले मैं खुद से पूछती थी—
क्या मैं काफ़ी हूँ?
क्या मेरा लिखा किसी काम का है?
अब सवाल थम गए हैं।
क्योंकि मैंने समझ लिया है—
खुद को साबित करने की दौड़
कभी ख़त्म नहीं होती।
स्वीकृति हार नहीं है
स्वीकृति का मतलब
समझौता नहीं होता।
स्वीकृति का मतलब
यह मान लेना है कि
मैं अपनी पूरी ताक़त के साथ
और अपनी पूरी कमज़ोरियों के साथ
यहाँ मौजूद हूँ।
और यही मौजूदगी
शांति बन जाती है।
शांति शोर से दूर रहती है
शांति तालियों में नहीं रहती,
वह उस क्षण में रहती है
जब लिखने के बाद
दिल हल्का हो जाता है।
जब किसी अनजान पाठक का संदेश
कहता है—
“आपका लिखा मुझे छू गया।”
बस, वही काफ़ी है।
अब कमबैक पूर्ण है
यह कमबैक
किसी मंच पर खड़े होने का नहीं,
किसी मुकाम पर पहुँचने का नहीं।
यह खुद के साथ
फिर से खड़े होने का है।
और जब इंसान
खुद के साथ खड़ा हो जाए,
तो दुनिया की दूरी
महत्वहीन हो जाती है।
नया साल, नया संतुलन
इस नए साल में
मैं न ज़्यादा चाहूँगी,
न कम।
मैं बस
संतुलन में रहूँगी—
लिखने और जीने के बीच।
क्योंकि अब मुझे पता है—
शांति ही सबसे बड़ी सफलता है।
मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️
सोमवार
ख़ामोश वापसी भाग-४ 'डर से आज़ादी तक'
डर कभी अचानक नहीं आता,
वह धीरे-धीरे हमारे भीतर
घर बना लेता है।
डर इस बात का नहीं होता
कि हम लिख नहीं पाएँगे,
डर इस बात का होता है
कि लिखने के बाद
कहीं फिर से टूट न जाएँ।
डर से लड़ना नहीं, उसे समझना है
मैंने अब डर से लड़ना छोड़ दिया है।
मैं उसे सुनती हूँ।
वह मुझे बताता है— तुम इंसान हो,
कमज़ोर हो,
और शायद
सच लिखने से लोग असहज होंगे।
और यही सच
मेरी आज़ादी बन जाता है।
अब आज़ादी का मतलब
आज आज़ादी का मतलब
बेपरवाह होना नहीं है।
आज आज़ादी का मतलब है—
अपनी गति चुनना
अपनी चुप्पी को सम्मान देना
और अपनी आवाज़ को
किसी मान्यता की मोहताज न बनाना
लिखते हुए डर साथ चलता है
डर अब भी साथ है,
पर वह रास्ता नहीं रोकता।
वह बस याद दिलाता है—
कि जो लिखा जा रहा है,
वह मायने रखता है।
क्योंकि जो शब्द
डर के बिना लिखे जाएँ,
अक्सर सतही होते हैं।
अब मैं खुद को आज़ाद लिखती हूँ
मैं अब
पसंद किए जाने के लिए नहीं लिखती,
समझे जाने के लिए भी नहीं।
मैं लिखती हूँ
क्योंकि लिखना
मेरी साँसों जैसा ज़रूरी है।
और जब ज़रूरत
आज़ादी से मिल जाती है,
तो शब्दों में
कोई बेड़ी नहीं रहती।
यह कमबैक अब मजबूरी नहीं
यह कमबैक
अब खुद को बचाने की कोशिश नहीं,
खुद को अपनाने का तरीका है।
और शायद
यही असली आज़ादी है।
मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️
रविवार
ख़ामोश वापसी भाग–3 : उम्मीद का धीमा उजाला
उम्मीद कभी तेज़ रोशनी
बनकर नहीं आती,
वह अक्सर
एक छोटे से दीये की तरह
हवा में काँपती हुई आती है।
इस कमबैक में भी
कोई बड़ा दावा नहीं है,
बस इतना भरोसा है—
कि जो भीतर बचा है,
वही काफ़ी है।
अब खुद पर शक नहीं
पहले हर शब्द लिखने से पहले
मैं खुद से पूछती थी—
क्या यह अच्छा है?
क्या लोग पढ़ेंगे?
अब सवाल बदल गए हैं—
क्या यह सच है?
अगर सच है,
तो वह किसी न किसी दिल तक पहुँचेगा।
आत्मविश्वास शोर नहीं करता
मैंने समझ लिया है—
आत्मविश्वास
ऊँची आवाज़ में नहीं बोलता।
वह रोज़
खुद से किया गया
एक छोटा सा वादा निभाने में दिखता है।
आज एक पंक्ति,
कल एक पैराग्राफ,
और धीरे-धीरे
पूरा सच।
लिखना अब लौटना नहीं, बढ़ना है
यह सिर्फ़ वापसी नहीं,
यह विस्तार है।
मैं अब वही नहीं हूँ
जो पहले लिखती थी—
अनुभव बदल चुके हैं,
नज़र बदल चुकी है।
और शायद
इसीलिए शब्दों में
अब ठहराव है।
नया साल, नया रास्ता
इस साल मैं जल्दी नहीं करूँगी—
न ट्रेंड पकड़ने की,
न खुद को साबित करने की।
मैं बस
लिखती रहूँगी।
क्योंकि अब मुझे पता है—
जो सच से लिखा जाता है,
वह देर से सही,
पर गहराई से पढ़ा जाता है।
यह अंत नहीं है
यह तो बस
एक नई लय की शुरुआत है।
अगर आप यहाँ तक पढ़ रहे हैं,
तो शायद
आप भी अपने किसी कमबैक के
कगार पर खड़े हैं।
याद रखिए—
उम्मीद का उजाला
कभी व्यर्थ नहीं जाता।
मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️
शनिवार
ख़ामोश वापसी की कहानी- भाग-२
जब ख़ामोशी भी बोलने लगती है
ख़ामोशी को अक्सर कमज़ोरी समझ लिया जाता है,
जबकि सच यह है कि
ख़ामोशी सबसे लंबी तैयारी होती है।
मैं जब लिख नहीं रही थी,
तब भी भीतर कुछ लिखा जा रहा था—
अनकहे अनुभव,
टूटे हुए विश्वास,
और खुद से पूछे गए कठिन सवाल।
हर रुकना हार नहीं होता
कुछ रुकावटें हमें रोकने नहीं,
हमें समझाने आती हैं।
मैं रुकी क्योंकि
मुझे खुद को समझना था—
कि मैं क्या लिखना चाहती हूँ,
या क्यों लिखना चाहती हूँ।
और इसी समझ ने
मेरे कमबैक को जन्म दिया।
इस वापसी में कोई घोषणा नहीं
यह वापसी किसी पोस्टर की तरह नहीं,
जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा हो— I’M BACK
यह वापसी एक धीमी दस्तक है—
जिसे वही सुन सकता है
जो सच में इंतज़ार कर रहा हो।
अब लिखना बोझ नहीं, ज़रूरत है
पहले लिखना आदत थी,
अब लिखना ज़रूरत है।
यह ज़रूरत
तालियों की नहीं,
तसल्ली की है।
शब्द अब सजावट नहीं,
सच हैं।
नया साल, नई समझ
नया साल मुझे यह सिखा रहा है—
हर दिन लिखना ज़रूरी नहीं,
पर खुद को रोज़ महसूस करना ज़रूरी है।
और जब महसूस करना गहरा हो जाए,
तो शब्द अपने आप रास्ता ढूँढ लेते हैं।
यह कमबैक जारी है
यह कोई एक दिन की वापसी नहीं,
यह एक सफ़र है—
जिसमें मैं गिरूँगी भी,
चुप भी रहूँगी,
और फिर लिखूँगी।
क्योंकि अब मैं जानती हूँ—
ख़ामोश वापसी सबसे टिकाऊ होती है।
मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️
✨ क्रमशः…
शुक्रवार
एक खामोश वापसी की कहानी
नया साल, नया कमबैक: एक ख़ामोश वापसी की कहानी
नया साल सिर्फ़ तारीख़ बदलने का नाम नहीं है,
यह खुद से दोबारा मिलने का
अवसर है।
कुछ साल, कुछ महीने या कुछ दिन—
ऐसे होते हैं जब हम भीतर से थक जाते हैं।
लिखना छूट जाता है,
सपने धुंधले हो जाते हैं,
और हम धीरे-धीरे खुद से दूर हो जाते हैं।
मैं भी उसी ख़ामोशी से गुज़री हूँ।
लेकिन नया साल मुझे याद दिलाता है—
कमबैक हमेशा शोर से नहीं होता,
कभी-कभी वह बहुत शांत होता है।
कमबैक मतलब क्या?
कमबैक का मतलब यह नहीं कि
आप सबको दिखाएँ कि आप कितने मजबूत हैं।
कमबैक का मतलब है—
फिर से कलम उठाना
फिर से अपने शब्दों पर भरोसा करना
और खुद से कहना: “मैं अभी ख़त्म नहीं हुई हूँ।”
नया साल, नई शुरुआत नहीं—नई हिम्मत
हर साल नई शुरुआत नहीं लाता,
लेकिन हर साल नई हिम्मत ज़रूर देता है।
इस साल मैं वादा करती हूँ—
ज़्यादा लिखूँगी, पर खुद पर ज़ोर नहीं डालूँगी
अपनी रफ़्तार से चलूँगी
और अपनी आवाज़ को दबने नहीं दूँगी
मेरा ब्लॉग—मेरी वापसी का घर
अंतर्ध्वनि मेरे लिए सिर्फ़ एक प्लेटफ़ॉर्म नहीं,
वह जगह है जहाँ मेरे शब्द सुने जाते हैं।
और मेरा ब्लॉग—
वह मेरा निजी कोना है,
जहाँ मैं बिना डर के खुद को लिख सकती हूँ।
इस नए साल पर
मैं किसी ट्रेंड के लिए नहीं,
किसी लाइक के लिए नहीं—
खुद के लिए लिखने वापस आई हूँ।
अगर आप भी रुक गए थे…
तो यह लेख आपके लिए है।
अगर आप भी कहीं रुक गए थे,
थक गए थे,
या खुद को भूल गए थे—
तो जान लीजिए:
कमबैक की कोई आख़िरी तारीख़ नहीं होती।
नया साल सिर्फ़ एक बहाना है,
वापसी का फ़ैसला तो दिल करता है।
यह एक प्रयास है खुद से मिलने का
इस उम्मीद के साथ
कि फिर से लड़खड़ाना नहीं है
रुकना नहीं है
भले ही गति धीमी हो
पर चलते रहना जरूरी है।
मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️






