रविवार

ख़ामोश वापसी भाग–3 : उम्मीद का धीमा उजाला

उम्मीद कभी तेज़ रोशनी 

बनकर नहीं आती,

वह अक्सर

एक छोटे से दीये की तरह

हवा में काँपती हुई आती है।

इस कमबैक में भी

कोई बड़ा दावा नहीं है,

बस इतना भरोसा है—

कि जो भीतर बचा है,

वही काफ़ी है।

अब खुद पर शक नहीं

पहले हर शब्द लिखने से पहले

मैं खुद से पूछती थी—

क्या यह अच्छा है?

क्या लोग पढ़ेंगे?

अब सवाल बदल गए हैं—

क्या यह सच है?

अगर सच है,

तो वह किसी न किसी दिल तक पहुँचेगा।

आत्मविश्वास शोर नहीं करता

मैंने समझ लिया है—

आत्मविश्वास

ऊँची आवाज़ में नहीं बोलता।

वह रोज़

खुद से किया गया

एक छोटा सा वादा निभाने में दिखता है।

आज एक पंक्ति,

कल एक पैराग्राफ,

और धीरे-धीरे

पूरा सच।

लिखना अब लौटना नहीं, बढ़ना है

यह सिर्फ़ वापसी नहीं,

यह विस्तार है।

मैं अब वही नहीं हूँ

जो पहले लिखती थी—

अनुभव बदल चुके हैं,

नज़र बदल चुकी है।

और शायद

इसीलिए शब्दों में

अब ठहराव है।

नया साल, नया रास्ता

इस साल मैं जल्दी नहीं करूँगी—

न ट्रेंड पकड़ने की,

न खुद को साबित करने की।

मैं बस

लिखती रहूँगी।

क्योंकि अब मुझे पता है—

जो सच से लिखा जाता है,

वह देर से सही,

पर गहराई से पढ़ा जाता है।

यह अंत नहीं है

यह तो बस

एक नई लय की शुरुआत है।

अगर आप यहाँ तक पढ़ रहे हैं,

तो शायद

आप भी अपने किसी कमबैक के

कगार पर खड़े हैं।

याद रखिए—

उम्मीद का उजाला

कभी व्यर्थ नहीं जाता।

मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️ 

शनिवार

ख़ामोश वापसी की कहानी- भाग-२


जब ख़ामोशी भी बोलने लगती है

ख़ामोशी को अक्सर कमज़ोरी समझ लिया जाता है,

जबकि सच यह है कि

ख़ामोशी सबसे लंबी तैयारी होती है।

मैं जब लिख नहीं रही थी,

तब भी भीतर कुछ लिखा जा रहा था—

अनकहे अनुभव,

टूटे हुए विश्वास,

और खुद से पूछे गए कठिन सवाल।

हर रुकना हार नहीं होता

कुछ रुकावटें हमें रोकने नहीं,

हमें समझाने आती हैं।

मैं रुकी क्योंकि

मुझे खुद को समझना था—

कि मैं क्या लिखना चाहती हूँ,

या क्यों लिखना चाहती हूँ।

और इसी समझ ने

मेरे कमबैक को जन्म दिया।

इस वापसी में कोई घोषणा नहीं

यह वापसी किसी पोस्टर की तरह नहीं,

जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा हो— I’M BACK

यह वापसी एक धीमी दस्तक है—

जिसे वही सुन सकता है

जो सच में इंतज़ार कर रहा हो।

अब लिखना बोझ नहीं, ज़रूरत है

पहले लिखना आदत थी,

अब लिखना ज़रूरत है।

यह ज़रूरत

तालियों की नहीं,

तसल्ली की है।

शब्द अब सजावट नहीं,

सच हैं।

नया साल, नई समझ

नया साल मुझे यह सिखा रहा है—

हर दिन लिखना ज़रूरी नहीं,

पर खुद को रोज़ महसूस करना ज़रूरी है।

और जब महसूस करना गहरा हो जाए,

तो शब्द अपने आप रास्ता ढूँढ लेते हैं।

यह कमबैक जारी है

यह कोई एक दिन की वापसी नहीं,

यह एक सफ़र है—

जिसमें मैं गिरूँगी भी,

चुप भी रहूँगी,

और फिर लिखूँगी।

क्योंकि अब मैं जानती हूँ—

ख़ामोश वापसी सबसे टिकाऊ होती है।

मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️ 

✨ क्रमशः…

शुक्रवार

एक खामोश वापसी की कहानी

 


नया साल, नया कमबैक: एक ख़ामोश वापसी की कहानी

नया साल सिर्फ़ तारीख़ बदलने का नाम नहीं है,

यह खुद से दोबारा मिलने का

अवसर है।

कुछ साल, कुछ महीने या कुछ दिन—

ऐसे होते हैं जब हम भीतर से थक जाते हैं।

लिखना छूट जाता है,

सपने धुंधले हो जाते हैं,

और हम धीरे-धीरे खुद से दूर हो जाते हैं।

मैं भी उसी ख़ामोशी से गुज़री हूँ।

लेकिन नया साल मुझे याद दिलाता है—

कमबैक हमेशा शोर से नहीं होता,

कभी-कभी वह बहुत शांत होता है।

कमबैक मतलब क्या?

कमबैक का मतलब यह नहीं कि

आप सबको दिखाएँ कि आप कितने मजबूत हैं।

कमबैक का मतलब है—

फिर से कलम उठाना

फिर से अपने शब्दों पर भरोसा करना

और खुद से कहना: “मैं अभी ख़त्म नहीं हुई हूँ।”

नया साल, नई शुरुआत नहीं—नई हिम्मत

हर साल नई शुरुआत नहीं लाता,

लेकिन हर साल नई हिम्मत ज़रूर देता है।

इस साल मैं वादा करती हूँ—

ज़्यादा लिखूँगी, पर खुद पर ज़ोर नहीं डालूँगी

अपनी रफ़्तार से चलूँगी

और अपनी आवाज़ को दबने नहीं दूँगी

मेरा ब्लॉग—मेरी वापसी का घर

अंतर्ध्वनि मेरे लिए सिर्फ़ एक प्लेटफ़ॉर्म नहीं,

वह जगह है जहाँ मेरे शब्द सुने जाते हैं।

और मेरा ब्लॉग—

वह मेरा निजी कोना है,

जहाँ मैं बिना डर के खुद को लिख सकती हूँ।

इस नए साल पर

मैं किसी ट्रेंड के लिए नहीं,

किसी लाइक के लिए नहीं—

खुद के लिए लिखने वापस आई हूँ।

अगर आप भी रुक गए थे…

तो यह लेख आपके लिए है।

अगर आप भी कहीं रुक गए थे,

थक गए थे,

या खुद को भूल गए थे—

तो जान लीजिए:

कमबैक की कोई आख़िरी तारीख़ नहीं होती।

नया साल सिर्फ़ एक बहाना है,

वापसी का फ़ैसला तो दिल करता है।

यह एक प्रयास है खुद से मिलने का

इस उम्मीद के साथ 

कि फिर से लड़खड़ाना नहीं है

रुकना नहीं है

भले ही गति धीमी हो

पर चलते रहना जरूरी है।

मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️