रविवार

बहुत करीब से देखा है तुम्हें..



बहुत करीब से देखा है तुम्हें
दूर जाते हुए…
इतना पास
कि तुम्हारे बदलते लहज़े
मैंने सबसे पहले महसूस किए।
तुम्हारे चुप हो जाने से पहले
मैंने खुद को
ज़्यादा बोलते पाया।
तुम्हारा जाना
अचानक नहीं था,
मैं रोज़
थोड़ा-थोड़ा छूटती रही।
मैंने तुम्हें
पीठ फेरते नहीं देखा,
मैंने तुम्हें
मेरे भीतर से
खिसकते हुए देखा है।
स्त्रियाँ
दूरी कदमों से नहीं नापतीं,
हम दूरी
बदलते स्पर्शों से पहचानती हैं।
बहुत करीब से देखा है तुम्हें
दूर जाते हुए…
इसलिए
आज भी
तुम्हारी गैरमौजूदगी
मेरे साथ रहती है।
मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️ 



मंगलवार

स्वीकृति से शांति तक

 

सबसे कठिन लड़ाई

दुनिया से नहीं होती,

वह खुद से होती है।

खुद को वैसे ही स्वीकार करना

जैसे हम हैं—

बिना सजावट,

बिना सफ़ाई दिए।

अब खुद से सवाल नहीं

पहले मैं खुद से पूछती थी—

क्या मैं काफ़ी हूँ?

क्या मेरा लिखा किसी काम का है?

अब सवाल थम गए हैं।

क्योंकि मैंने समझ लिया है—

खुद को साबित करने की दौड़

कभी ख़त्म नहीं होती।

स्वीकृति हार नहीं है

स्वीकृति का मतलब

समझौता नहीं होता।

स्वीकृति का मतलब

यह मान लेना है कि

मैं अपनी पूरी ताक़त के साथ

और अपनी पूरी कमज़ोरियों के साथ

यहाँ मौजूद हूँ।

और यही मौजूदगी

शांति बन जाती है।

शांति शोर से दूर रहती है

शांति तालियों में नहीं रहती,

वह उस क्षण में रहती है

जब लिखने के बाद

दिल हल्का हो जाता है।

जब किसी अनजान पाठक का संदेश

कहता है—

“आपका लिखा मुझे छू गया।”

बस, वही काफ़ी है।

अब कमबैक पूर्ण है

यह कमबैक

किसी मंच पर खड़े होने का नहीं,

किसी मुकाम पर पहुँचने का नहीं।

यह खुद के साथ

फिर से खड़े होने का है।

और जब इंसान

खुद के साथ खड़ा हो जाए,

तो दुनिया की दूरी

महत्वहीन हो जाती है।

नया साल, नया संतुलन

इस नए साल में

मैं न ज़्यादा चाहूँगी,

न कम।

मैं बस

संतुलन में रहूँगी—

लिखने और जीने के बीच।

क्योंकि अब मुझे पता है—

शांति ही सबसे बड़ी सफलता है।

मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️ 

सोमवार

ख़ामोश वापसी भाग-४ 'डर से आज़ादी तक'

 

डर कभी अचानक नहीं आता,

वह धीरे-धीरे हमारे भीतर

घर बना लेता है।

डर इस बात का नहीं होता

कि हम लिख नहीं पाएँगे,

डर इस बात का होता है

कि लिखने के बाद

कहीं फिर से टूट न जाएँ।

डर से लड़ना नहीं, उसे समझना है

मैंने अब डर से लड़ना छोड़ दिया है।

मैं उसे सुनती हूँ।

वह मुझे बताता है— तुम इंसान हो,

कमज़ोर हो,

और शायद

सच लिखने से लोग असहज होंगे।

और यही सच

मेरी आज़ादी बन जाता है।

अब आज़ादी का मतलब

आज आज़ादी का मतलब

बेपरवाह होना नहीं है।

आज आज़ादी का मतलब है—

अपनी गति चुनना

अपनी चुप्पी को सम्मान देना

और अपनी आवाज़ को

किसी मान्यता की मोहताज न बनाना

लिखते हुए डर साथ चलता है

डर अब भी साथ है,

पर वह रास्ता नहीं रोकता।

वह बस याद दिलाता है—

कि जो लिखा जा रहा है,

वह मायने रखता है।

क्योंकि जो शब्द

डर के बिना लिखे जाएँ,

अक्सर सतही होते हैं।

अब मैं खुद को आज़ाद लिखती हूँ

मैं अब

पसंद किए जाने के लिए नहीं लिखती,

समझे जाने के लिए भी नहीं।

मैं लिखती हूँ

क्योंकि लिखना

मेरी साँसों जैसा ज़रूरी है।

और जब ज़रूरत

आज़ादी से मिल जाती है,

तो शब्दों में

कोई बेड़ी नहीं रहती।

यह कमबैक अब मजबूरी नहीं

यह कमबैक

अब खुद को बचाने की कोशिश नहीं,

खुद को अपनाने का तरीका है।

और शायद

यही असली आज़ादी है।

मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️ 

रविवार

ख़ामोश वापसी भाग–3 : उम्मीद का धीमा उजाला

उम्मीद कभी तेज़ रोशनी 

बनकर नहीं आती,

वह अक्सर

एक छोटे से दीये की तरह

हवा में काँपती हुई आती है।

इस कमबैक में भी

कोई बड़ा दावा नहीं है,

बस इतना भरोसा है—

कि जो भीतर बचा है,

वही काफ़ी है।

अब खुद पर शक नहीं

पहले हर शब्द लिखने से पहले

मैं खुद से पूछती थी—

क्या यह अच्छा है?

क्या लोग पढ़ेंगे?

अब सवाल बदल गए हैं—

क्या यह सच है?

अगर सच है,

तो वह किसी न किसी दिल तक पहुँचेगा।

आत्मविश्वास शोर नहीं करता

मैंने समझ लिया है—

आत्मविश्वास

ऊँची आवाज़ में नहीं बोलता।

वह रोज़

खुद से किया गया

एक छोटा सा वादा निभाने में दिखता है।

आज एक पंक्ति,

कल एक पैराग्राफ,

और धीरे-धीरे

पूरा सच।

लिखना अब लौटना नहीं, बढ़ना है

यह सिर्फ़ वापसी नहीं,

यह विस्तार है।

मैं अब वही नहीं हूँ

जो पहले लिखती थी—

अनुभव बदल चुके हैं,

नज़र बदल चुकी है।

और शायद

इसीलिए शब्दों में

अब ठहराव है।

नया साल, नया रास्ता

इस साल मैं जल्दी नहीं करूँगी—

न ट्रेंड पकड़ने की,

न खुद को साबित करने की।

मैं बस

लिखती रहूँगी।

क्योंकि अब मुझे पता है—

जो सच से लिखा जाता है,

वह देर से सही,

पर गहराई से पढ़ा जाता है।

यह अंत नहीं है

यह तो बस

एक नई लय की शुरुआत है।

अगर आप यहाँ तक पढ़ रहे हैं,

तो शायद

आप भी अपने किसी कमबैक के

कगार पर खड़े हैं।

याद रखिए—

उम्मीद का उजाला

कभी व्यर्थ नहीं जाता।

मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️ 

शनिवार

ख़ामोश वापसी की कहानी- भाग-२


जब ख़ामोशी भी बोलने लगती है

ख़ामोशी को अक्सर कमज़ोरी समझ लिया जाता है,

जबकि सच यह है कि

ख़ामोशी सबसे लंबी तैयारी होती है।

मैं जब लिख नहीं रही थी,

तब भी भीतर कुछ लिखा जा रहा था—

अनकहे अनुभव,

टूटे हुए विश्वास,

और खुद से पूछे गए कठिन सवाल।

हर रुकना हार नहीं होता

कुछ रुकावटें हमें रोकने नहीं,

हमें समझाने आती हैं।

मैं रुकी क्योंकि

मुझे खुद को समझना था—

कि मैं क्या लिखना चाहती हूँ,

या क्यों लिखना चाहती हूँ।

और इसी समझ ने

मेरे कमबैक को जन्म दिया।

इस वापसी में कोई घोषणा नहीं

यह वापसी किसी पोस्टर की तरह नहीं,

जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा हो— I’M BACK

यह वापसी एक धीमी दस्तक है—

जिसे वही सुन सकता है

जो सच में इंतज़ार कर रहा हो।

अब लिखना बोझ नहीं, ज़रूरत है

पहले लिखना आदत थी,

अब लिखना ज़रूरत है।

यह ज़रूरत

तालियों की नहीं,

तसल्ली की है।

शब्द अब सजावट नहीं,

सच हैं।

नया साल, नई समझ

नया साल मुझे यह सिखा रहा है—

हर दिन लिखना ज़रूरी नहीं,

पर खुद को रोज़ महसूस करना ज़रूरी है।

और जब महसूस करना गहरा हो जाए,

तो शब्द अपने आप रास्ता ढूँढ लेते हैं।

यह कमबैक जारी है

यह कोई एक दिन की वापसी नहीं,

यह एक सफ़र है—

जिसमें मैं गिरूँगी भी,

चुप भी रहूँगी,

और फिर लिखूँगी।

क्योंकि अब मैं जानती हूँ—

ख़ामोश वापसी सबसे टिकाऊ होती है।

मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️ 

✨ क्रमशः…

शुक्रवार

एक खामोश वापसी की कहानी

 


नया साल, नया कमबैक: एक ख़ामोश वापसी की कहानी

नया साल सिर्फ़ तारीख़ बदलने का नाम नहीं है,

यह खुद से दोबारा मिलने का

अवसर है।

कुछ साल, कुछ महीने या कुछ दिन—

ऐसे होते हैं जब हम भीतर से थक जाते हैं।

लिखना छूट जाता है,

सपने धुंधले हो जाते हैं,

और हम धीरे-धीरे खुद से दूर हो जाते हैं।

मैं भी उसी ख़ामोशी से गुज़री हूँ।

लेकिन नया साल मुझे याद दिलाता है—

कमबैक हमेशा शोर से नहीं होता,

कभी-कभी वह बहुत शांत होता है।

कमबैक मतलब क्या?

कमबैक का मतलब यह नहीं कि

आप सबको दिखाएँ कि आप कितने मजबूत हैं।

कमबैक का मतलब है—

फिर से कलम उठाना

फिर से अपने शब्दों पर भरोसा करना

और खुद से कहना: “मैं अभी ख़त्म नहीं हुई हूँ।”

नया साल, नई शुरुआत नहीं—नई हिम्मत

हर साल नई शुरुआत नहीं लाता,

लेकिन हर साल नई हिम्मत ज़रूर देता है।

इस साल मैं वादा करती हूँ—

ज़्यादा लिखूँगी, पर खुद पर ज़ोर नहीं डालूँगी

अपनी रफ़्तार से चलूँगी

और अपनी आवाज़ को दबने नहीं दूँगी

मेरा ब्लॉग—मेरी वापसी का घर

अंतर्ध्वनि मेरे लिए सिर्फ़ एक प्लेटफ़ॉर्म नहीं,

वह जगह है जहाँ मेरे शब्द सुने जाते हैं।

और मेरा ब्लॉग—

वह मेरा निजी कोना है,

जहाँ मैं बिना डर के खुद को लिख सकती हूँ।

इस नए साल पर

मैं किसी ट्रेंड के लिए नहीं,

किसी लाइक के लिए नहीं—

खुद के लिए लिखने वापस आई हूँ।

अगर आप भी रुक गए थे…

तो यह लेख आपके लिए है।

अगर आप भी कहीं रुक गए थे,

थक गए थे,

या खुद को भूल गए थे—

तो जान लीजिए:

कमबैक की कोई आख़िरी तारीख़ नहीं होती।

नया साल सिर्फ़ एक बहाना है,

वापसी का फ़ैसला तो दिल करता है।

यह एक प्रयास है खुद से मिलने का

इस उम्मीद के साथ 

कि फिर से लड़खड़ाना नहीं है

रुकना नहीं है

भले ही गति धीमी हो

पर चलते रहना जरूरी है।

मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️ 



बुधवार

अरु...भाग-९


अभी तक आपने पढ़ा कि अलंकृता अपनी मम्मी के द्वारा लिखे पन्नों को पढ़ती है और भावुक हो जाती है...

आगे पढ़िए..

यह सभी की समझ से परे था कि वह इतनी हिम्मत लाती कहाँ से थी! एक ओर उसके हमउम्र बच्चे थे कि जरा-सा किसी बच्चे ने धक्का भी दे दिया तो रोते हुए पहुँच जाते थे अपनी मम्मी के पास, दूसरी ओर वो थी कि उसके छोटे भाइयों को भी कोई जरा सा डाँट भी देता तो लड़ जाती उससे, जैसे माँ अपने बच्चों के लिए लड़ती है। हाँ माँ ही तो थी अपने छोटे भाइयों की वह, जबसे माँ से दूर पापा के साथ रहना शुरू किया था तबसे अपने छोटे भाइयों की देखभाल माँ की तरह ही तो करती थी जबकि स्वयं ग्यारह-बारह वर्ष की ही तो रही होगी वह। यह उस नन्हीं सी जान का दुर्भाग्य ही तो था कि वह माँ के होते हुए भी माँ से कोसों दूर रहती थी। पापा गाँव के होते हुए भी, पुराने विचारों के होते हुए भी बच्चों को अपनी तरह अनपढ़ नहीं रखना चाहते थे, इसलिए अपने साथ शहर में रखकर उनको शिक्षा दिलवाने लगे। हालांकि ये था तो उसकी भलाई के लिए ही लेकिन इस पढ़ाई ने उससे उसका बचपन छीन लिया था। लेकिन शायद यही उसके लिए आवश्यक था। यह अजीब बात थी कि एक ओर तो उसके पापा पुराने ख्यालों के होते हुए भी अपने बेटों के साथ-साथ बेटी को भी पढ़ाना चाहते थे वहीं दूसरी ओर समाज की बाल-विवाह रूपी कुरीति में फँसकर अपनी इकलौती बेटी का विवाह आठ-नौ वर्ष की उम्र में ही कर दिया। किन्तु इस कुप्रथा में भी एक ही अच्छाई थी कि दुल्हन की विदाई तब तक नहीं होती थी जब तक वह बड़ी न हो जाए। इसी कारण उसका विवाह तो हो गया किंतु अभी माँ-बाप की छत्रछाया में रहना उसके नसीब में था या फिर शायद उसके पापा ने इसीलिए उसका विवाह करवा दिया था क्योंकि उन्हें पता था कि अभी उनकी बेटी उनसे दूर नहीं होगी। विवाह के बाद वह वापस आकर अपनी पढ़ाई करने लगी थी। वहाँ उनके परिवार के कुछ नजदीकी लोगों को छोड़कर किसी और को उसके विवाहिता होने की बात नहीं पता थी। उसे खुद भी कहाँ इस बात का अहसास था! वह तो इन सबसे अनजान स्वच्छंद लहर की तरह बस बहे जा रही थी, उसे देखकर यह बात कोई समझ नहीं पाता था कि वह कितनी कमजोर कितनी अकेली महसूस करती होगी, जब अपने हमउम्र बच्चों को अपनी माँ की ममता के संरक्षण में देखती होगी।
जब कभी उसकी मम्मी गाँव से आतीं तब वह इतनी खुश होती थी कि मानो पागल हो गई हो, उस समय सब सचमुच उसे पागल ही समझते थे। स्कूल में उस दिन खुशी के मारे दूसरे बच्चों को छेड़ती कभी किसी की चोटी खींच लेती तो कभी किसी की पुस्तक लेकर भाग जाती। कभी कक्षा में पढ़ाते हुए मास्टर जी के पीछे-पीछे चलकर उनकी नकल उतारती तो कभी अपनी सहेलियों की घड़ियाँ उतरवा कर अपने दोनों हाथों में पहनकर बैठी रहती और मास्टर जी के पूछने पर खुश होकर कहती कि "आज मेरा टाइम बहुत-बहुत-बहुत अच्छा हो गया, इसीलिए एक घड़ी से पूरा नहीं हो रहा था न इसलिए।" इन सबके बाद भी आखिर थी तो बच्ची ही, जब कोई बच्चा उससे लड़ता और फिर उसी की शिकायत अपनी माँ से करके उल्टा उसे ही डाँट खिलाता तब वह बहुत दुखी होती थी। उसके सामने तो निडर बन कर खड़ी हो जाती, जवाब भी दे देती थी लेकिन घर में आकर अकेले में खूब रोती थी। उस समय उसका भी जी मचलता कि मम्मी होतीं तो मैं भी उनके आँचल में दुबक जाती, फिर किसी का साहस नहीं होता कि मुझ पर झूठा इल्जाम लगा पाता। उस समय उसे अपनी मम्मी की बहुत याद आती थी।
बच्चों के खेलने खाने और पढ़ने की उम्र में वह घर के काम के साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी करती और साथ ही अपने पापा की अनुपस्थिति में पूरा दिन छोटे भाइयों की देखभाल भी करती थी। मजाल है जो कोई उसके भाइयों को कुछ कह देता, वह बड़ों की तरह लड़ जाती थी। कहती थी "मेरी मम्मी यहाँ नहीं हैं तो क्या कोई भी मेरे भाइयों को डाँट लेगा? मैं तो हूँ न।"
किताबें उसका परिवार थीं और चित्रकारी उसकी सखियाँ। चित्र कला के माध्यम से ही वह अपने मन के भावों को अंकित कर दिया करती और फिर जब उसके अध्यापक और सहपाठियों से उसकी कला की प्रशंसा मिलती तो खुश हो जाती। वह समाज की अधिकतर रीतियों-कुरीतियों से अंजान ही थी और जाति-पाति से उसे कोई मतलब ही नहीं था। बस जिसका स्वभाव अच्छा हो, वह झूठ न बोलता/बोलती हो, तो उसे अरुंधती पसंद करती थी। खुद वह पिछड़े वर्ग से आती थी लेकिन दोस्ती अधिकतर ठाकुरों और ब्राह्मणों की लड़कियों से ही होती थी क्योंकि उसे उनके रहन-सहन और व्यवहार ही पसंद आते थे।  स्त्रियों का स्वभाव अधिक लचीला व सरल होता है इसलिए वह अवसर देखकर बात कहती हैं तथा किसी का दिल न दुखे ऐसा व्यवहार करती हैं। वह आदर्शवादिता से अधिक व्यावहारिकता पर ध्यान देती हैं किंतु अरुंधती  पर पापा के विचारों और स्वभाव का प्रभाव अधिक था। वह झूठ तब तक नहीं बोलती थी जब तक उसके सत्य से किसी का नुक़सान न हो। वह जो बात एक बार कह देती उसके लिए वह पत्थर की लकीर हो जाती। किन्तु किसी की बुराई न करना लेकिन अपनी बर्दाश्त भी न करना उसकी आदत थी। कुल मिलाकर उसके व्यवहार में आदर्शवादिता की छाप अधिक थी।
वह भाग्य को नहीं मानती थी, कहती थी "अगर निवाले को उठाकर मुँह में डालने के लिए अपने हाथ नहीं हिलाओगे तो वह भाग्य के सहारे चलकर तुम्हारे मुँह में नहीं आएगा। भोजन का वह निवाला अपनी तकदीर में लाने के लिए हाथों को हिलाने की तदवीर करनी पड़ती है, तदवीर से ही तकदीर बनती है।"
पर उसे कहाँ पता था कि जिस तकदीर को वह तदवीर से सँवारना चाहती थी, अपने जिस भाग्य को वह अपने कर्मों की स्याही से लिखना चाहती थी, उसे तो भगवान ने पहले ही लिख दिया था जो कि उसकी तदवीरों से बदलने वाला नहीं था। जिन कुरीतियों को वह नहीं मानती थी, उन्हीं में फँसना उसका भाग्य था।
वह गलत बातों को चुपचाप नहीं सहती थी उसकी यही आदत कभी-कभी उसके लिए मुसीबत बन जाती थी। अपने पड़ोस में ही रहने वाली कमली दीदी ने एक बार उससे अपने ब्वॉयफ्रेंड के साथ भाग जाने की मंशा जाहिर की, तो उसने घर आकर उसकी माँ से यह सोचकर शिकायत कर दी कि कहीं सचमुच उसने ऐसा कर लिया तो इल्जाम उस पर भी लगेगा कि उसने जानते हुए भी क्यों नहीं बताया, पर परिणाम क्या हुआ? उल्टा उस पर उनकी बेटी को बदनाम करने का आरोप लगा दिया और पापा ने अरुंधती की पिटाई कर दी। हालांकि उसके मम्मी-पापा जानते थे कि उनकी बेटी झूठ नहीं बोल रही है परंतु वह अपनी बेटी को सजा देकर कमली की माँ का मुँह बंद करना चाहते थे। बाद में मम्मी ने समझाया कि कोई भी बात पहले अपने मम्मी-पापा को बताना चाहिए न कि किसी और को। खैर वह बात तो आई-गई हो गई।

अक्सर हमारे समाज में लोग किसी को असहाय कमजोर देखते हैं तो उसके प्रति सहानुभूति दर्शाते हैं, उसकी मदद भी करते हैं किंतु उसी के बिल्कुल विपरीत जो उनके विचार से कमजोर होना चाहिए परंतु वास्तव में नहीं होता उसके प्रति उनके मन में घृणा या उसे नीचा दिखाने की भावना पैदा हो जाती है। कुछ ऐसी ही स्थिति थी अरुंधती की। उसके गाँव के वो लोग जो उसके पड़ोसी थे उन्हें उसके सक्षम होने से समस्या थी इसलिए वह उसे नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। माँ के बिना सब संभाल कैसे लेती है, माँ के न होने पर भी पढ़ाई में उनके बच्चों से आगे कैसे रहती है, उनके बच्चों से डरती क्यों नहीं वगैरह... वगैरह। यही वजह थी कि सब ताक में रहते कि कब उसमें कोई कमी दिखाई दे और वह उसका तिल का ताड़ बनाएँ। उन्हें अवसर मिल भी गया। जब वह दसवीं कक्षा में पढ़ती थी तभी उसकी एकमात्र सबसे अच्छी सहेली इमली अपने प्रेमी से अन्तर्जातीय विवाह करना चाहती थी, उसने अपने घर में बताया तो घर में कोहराम मच गया। उसके माँ-बाप का रो-रोकर बुरा हाल था। संयोग की बात है कि अरुंधती के पापा वहाँ से गुजर रहे थे तो उनके घर चले गए और जब उन्हें सब पता चला और साथ ही उस लड़की के पिता ने यह इल्जाम भी अरुंधती पर मढ़ दिया कि "तुम्हारी बेटी सब जानती थी पर उसने कभी नहीं बताया, आज अगर हमारी बेटी कुछ उल्टा-सीधा कर लेती तब भी तुम्हारी बेटी नहीं बताती।"

फिर क्या था, एक बेटी के बाप का रोना अरुंधती के पिता से देखा नहीं गया और घर आकर उन्होंने अपनी ही बेटी की पिटाई कर दी। वह बेचारी बिलख-बिलखकर रोते हुए यही सोचती रही कि 'जब एक बार बताया था... तब भी पिटी थी और अब, जब नहीं बताया तब भी मैं ही पिटी। जिसने सब किया उसके माँ-बाप ने तो अपनी बेटी के सारे इल्जाम झाड़-फूँक करवाकर ऊपरी चक्कर के बहाने धो दिए... लेकिन दोषी साबित हुई मैं..... क्या यह सब तब भी होता जब मेरी भी मम्मी साथ में होतीं? शायद नहीं….. पर इसमें मेरा क्या दोष था.... मैंने तो कुछ किया ही नहीं.... मुझे सिर्फ पता ही तो था..... तो पता तो और सहेलियों को भी था.... फिर उन पर कोई उँगली क्यों नहीं उठी?' इन्हीं सवालों से लड़ती-जूझती, रोती सिसकती अरुंधती को उस समय अपनी माँ की दूरी बहुत खल रही थी। 'काश... मम्मी होतीं तो किसी की हिम्मत नहीं होती उस पर दोष लगाने की... पापा क्यों नहीं समझते कि मैं ऐसा कुछ नहीं कर सकती जिससे उनका सिर झुके.... क्यों हमेशा वो दूसरों के किए की सजा मुझे ही देते हैं...सब जानते थे... पर उनके मम्मी-पापा ने उन्हें कुछ नहीं कहा और मेरे पापा!!!'

ऐसी ही न जाने कितनी बातें उसके दिल में टीस उठाती रहीं और वह सिसकते-सिसकते सो गई।

सत्येंद्र प्रसाद भी जानते थे कि उनकी बेटी ने इतनी बड़ी गलती नहीं की है, जितनी उन्होंने सजा दे दी। पर वो भी क्या करते! वह ठहरे उसूलों वाले व्यक्ति, एक बेटी के पिता हैं इसलिए बेटी के पिता का दर्द महसूस कर सकते हैं, यही कारण था कि इमली के पिता का रोना उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ और साथ ही कोई उनकी बेटी की बुराई करे, उसे गलत कहे यह भी वो सहन नहीं कर पाते। परंतु अपनी यह कमजोरी वह किसे बताते! इसलिए उनका दुख गुस्सा बनकर टूट पड़ा और उन्होंने अपनी ही बेटी को सजा दे दी। अब वह पछता रहे थे, नींद आँखों से कोसों दूर थी। करवटें बदलते रात्रि का दूसरा प्रहर भी बीत गया तब उनसे रहा न गया, वह उठे और रो-रोकर सो चुकी अरुंधती के सिरहाने बैठकर उसके मासूम चेहरे की ओर देखा तो उनका दिल भर आया। गालों पर सूख चुके आँसुओं के निशान उसके मन की व्यथा बयाँ कर रहे थे। वह प्यार से उसका सिर सहलाते हुए बुदबुदाए "मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची।" 

बहुत देर तक उसे यूँ ही निहारते रहने के बाद वह वापस अपने बिस्तर पर जाकर सोने की कोशिश करने लगे।

इस तूफान का असर अरुंधती पर कई महीनों तक रहा, वह स्कूल जाती पर अपनी सहेली से दूरी बनाकर रखती अब पहले की तरह उसके पास नहीं बैठती। लेकिन उसे महसूस हुआ कि उसकी वह सहेली इमली भी उससे दूर रहने की कोशिश करती है तो उसे बहुत दुख हुआ। उसे ऐसा लगा जैसे वह गलती करके अपनी गलती का ठीकरा उस पर फोड़ रही हो और दूसरों की नजरों में उसे गलत सिद्ध करने के लिए खुद उससे दूर रहने का दिखावा कर रही है। 'आखिर मेरी क्या गलती है...मैंने क्या किया...ये तो ऐसे जता रही है जैसे इसने जो कुछ भी किया उसकी दोषी मैं ही हूँ।' अरुंधती के मस्तिष्क में बार-बार यही ख्याल आता। अब उसने और अधिक दूरी बना ली थी पर उसे कहाँ पता था कि सही मायने में इस अनकिए अपराध की सजा तो उसे अब मिलने वाली है जो उसके जीवन की दिशा और दशा दोनों ही बदल देगी। 

मई माह में पड़ने वाले अवकाश में पूरा परिवार गाँव आया तब गाँव में परिवार के सदस्यों तथा अन्य मिलने-जुलने वालों की आँखों में संदेह की लकीरें उसने पढ़ ली थीं। गाँव की ही एक महिला जो कि अरुंधती की मम्मी इरावती की सहेली भी थीं उन्होंने बताया कि अरुंधती के बारे में गाँव में लोगों में अफवाह फैला था कि वह भाग गई और इसकी पुष्टि उसकी सहेली इमली ने भी की थी। सभी के संदेह का कारण सत्येंद्र प्रसाद को पता चल गया तो सारी बातें भी साफ हो गईं। लेकिन यह गाँव है यहाँ बात फैलते देर नहीं लगती और यही कारण था कि ये अफवाह अरुंधती की ससुराल तक भी पहुँच गई थी। कानों में खबर पड़ते ही मास्टर जी (उसके ससुर) अरुंधती के घर आ पहुँचे। गाँव वालों ने और सत्येंद्र जी ने उनको सत्य बताकर संतुष्ट तो कर दिया लेकिन अब वह ऐसा कोई मौका नहीं देना चाहते थे जिससे उनकी बदनामी हो, या फिर ये भी कहा जा सकता था कि वह हाथ आए अवसर को छोड़ना नहीं चाहते थे।

यूँ तो जब से अरुंधती ने होश संभाला था तब से ही तकदीर से वह टकराती ही आई थी परंतु अब सही मायने में भाग्य से उसकी आँख-मिचौली शुरू हो चुकी थी। जिस बाल-विवाह का असर उस पर उस समय नहीं हुआ था जब यह विवाह संपन्न हुआ था, उसकी आँच अब उस पर पड़ने लगी और दूर से ही उसके कोमल किशोर सपनों को झुलसाने लगी। अब तो वह सोलह वर्ष की ही सही पर समझदार बालिका थी, पहले की तरह नासमझ बच्ची नहीं थी कि इसे गुड़िया-गुड्डा का खेल समझकर खुशी-खुशी खेलने के लिए उद्यत हो जाती। अब वह अपनी शिक्षा के पूर्ण होने को लेकर चिंतित थी, इसलिए उसने अपनी माँ को समझाने का प्रयास किया परंतु असफल रही। 

अरुंधती के गौना की तैयारी होने लगी, उसने भी अपने-आप को तकदीर के हाथों में छोड़ दिया। 

घर में रिश्तेदारों की चहल-पहल से माहौल खुशनुमा बना हुआ था। कल बारात आने वाली है और आज सुबह से एक-एक करके रिश्तेदारों का आना लगा हुआ है। उसका गौना है, कल वह विदा हो जाएगी और आज रिश्तेदारों की खातिरदारी में भी वही लगी हुई है। उसे ऐसे काम में लगी देखकर माँ का दिल भी दुखता है पर वह भी असहाय हैं, क्या करतीं शादी-ब्याह के घर में काम की कोई सीमा नहीं होती, जब तक एक काम करो तब तक दस और तैयार हो जाते हैं, यही वजह थी कि वह अरुंधती को मना नहीं कर पा रही थीं। वो आज ही थोड़ी न काम कर रही है, अपने गौने के अवसर पर अधिकतर तैयारियाँ उसने ही तो की थीं, माँ अकेली क्या-क्या करतीं! इकलौती बुआ हैं वो तो मायके में सिर्फ मेहमान नवाजी करवाने आती हैं चाहे अवसर कोई भी हो, इसलिए किसी को उनसे कोई आशा भी नहीं थी। इकलौती मौसी हैं वो भी अपना घर छोड़कर पहले कैसे आतीं तो अब आई हैं एक दिन पहले। उन्होंने अरुंधती की माँ के काम में तो हाथ बँटा लिया पर अरुंधती की स्थिति तो ज्यों की त्यों रही। 

शाम होते-होते रिश्तेदारों की संख्या बहुत बढ़ गई पर आने वाले रिश्तेदारों में महिलाओं की संख्या बेहद कम थी। घर के छोटे-छोटे कामों से लेकर खाना बनाने तक में महिलाएँ ही अग्रणी होती हैं और यहाँ वही नहीं थीं। 

अत: रात के भोजन की तैयारी में अरुंधती ने ही पहल की और फिर धीरे-धीरे उसकी चाचियों, बुआ और मौसी को शायद अपनी भी कुछ जिम्मेदारी का अहसास हुआ और सबने मिलकर खाना बनाना शुरू किया। भाई-पट्टीदारों और रिश्तेदार सभी को मिलाकर कम से कम सत्तर-अस्सी लोगों का खाना तो बनना ही था, इसलिए बड़ी-बड़ी हाँडियाँ और कड़ाह चढ़े थे। चूल्हे पर रखे इन बड़े-बड़े बर्तनों को देखकर अरुंधती के पापा अपने छोटे भाई से बोले- 

"मैं कह रहा था कि खाना बनाने के लिए एक दिन पहले से ही हलवाई लगा लेते हैं पर तुम लोग नहीं माने, अब देखो इतना खाना ये औरतें बना पाएँगीं? कुछ गड़बड़ हुई तो शर्मिन्दा होना पड़ेगा।" 

"आप तो खामख्वाह परेशान हो रहे हो, सभी के घर में शादी-ब्याह होता है और घर की औरतें ही बनाती खिलाती हैं, सिर्फ बारात वाले दिन हलवाई लगवाते हैं। आप ने तो सुबह से लगवाया है जबकि औरों के वहाँ तो खाली बारात के लिए लगवाते हैं और तब भी किसी को शर्मिंदगी नहीं उठानी पड़ती।" अरुंधती के चाचा जी बोले। 

"ठीक है बस देख लो कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए।" पापा जी बोले।

खाना बना सभी नाते-रिश्तेदारों ने और पट्टीदारों ने खाया-पिया और अपने-अपने बिस्तर पर बैठकर देर रात तक गप-शप करते रहे।

महिलाओं के मध्य भी देर रात तक बातें होती रहीं लेकिन कल क्या कैसे होगा, इस विषय पर अधिक चर्चा हुई साथ ही अरुंधती की मम्मी बात करते-करते रोने लगतीं, उनकी इकलौती लाडली बिटिया कल अपनी ससुराल जो चली जाएगी। चाची, मौसी सब उन्हें समझातीं और फिर खुद ही दुबारा उसकी विदाई की बातें शुरू करके फिर रुला देतीं। उस बेटी की माँ को तो बस याद दिलाने भर की देर है कि उनकी आँखें फिर गंगा-यमुना बन जातीं। रात्रि के तीसरे पहर के बीतते-बीतते औरतों को नींद आई। 

अगले दिन सुबह से ही कोई न कोई महिला अरुंधती  के आस-पास ही रहती कभी किसी काम से तो कभी किसी काम से जैसे आज सभी अपना सारा प्यार उस पर उड़ेल देना चाहती थीं, उसने कुछ खाया या नहीं, उसको किसी चीज की जरूरत तो नहीं? सभी को आज उसकी बहुत परवाह थी और कुछ न हुआ तो कोई सामान पूछने ही आ जाती कि फलां सामान कहाँ रखा है? आखिर सभी सामान भी तो उसी ने रखे थे। मम्मी जब भी उसके आसपास से होकर गुजरतीं तो कातर नजरों से उसे देखती हुई जातीं। वह उनकी आँखों में छिपे दर्द को महसूस कर रही थी, उसे भी उनसे दूर होने का दुख हो रहा था लेकिन दूसरे ही पल अपनी शिक्षा अधूरी छूटने का भी दर्द टीस बनकर सीने में उभर आता और उस दूर होने के दर्द के अहसास को कम कर देता। 

नाई ठाकुर की पत्नी आ गई थी उसे उबटन लगाने। उसने उनसे कह दिया कि बस शगुन के लिए हाथ-पैरों का जितना भाग खुला हुआ है बस उतने में ही लगाए, वह पूरे शरीर पर नहीं लगवाएगी। उसने भी बात मानकर सिर्फ हाथ-पैर में ही लगाया, वैसे तो रीति के नाम पर वह सभी के पूरे शरीर पर उबटन लगाती है पर अरुंधती की मम्मी ने पहले ही समझा दिया था कि वह अरुंधती की इच्छा के विपरीत कुछ न करे। गाँव में गौना के दिन विदाई से पहले दुल्हन को उबटन तो लगाया जाता है पर स्नान निषेध है, लेकिन चाहे सिर्फ हाथ-पैर में ही क्यों न हो पर उबटन तो लगा ही था इसलिए अरुंधती ने नाइन से कह दिया कि उसे तो नहाना ही है। अब नाइन ठकुराइन मना कैसे करती अत: अरुंधती को नहाने की भी अनुमति मिल गई। शाम होते-होते विदाई की घड़ी आ गई। बुआ और गाँव की कुछ लड़कियों ने मिलकर उसे तैयार किया। वह निश्चेष्ट बिना रुचि दर्शाए तैयार हुई। उसे बहुत अजीब लग रहा था, आज वह इस घर से ही नहीं अपने माँ-पापा से भी दूर हो जाएगी साथ ही अपने सपनों से भी, जो उसने उच्च शिक्षा का स्वप्न देखा था वह भी उससे दसवीं के बाद ही सदा-सदा के लिए छूट रहा था। वह मम्मी-पापा से दूर होने के कारण अधिक दुखी थी या शिक्षा अधूरी छूटने के कारण अधिक दुखी थी, इसका ठीक-ठीक अनुमान तो वह खुद नहीं लगा पा रही थी। 

विदाई का समय आया उसने आधे बंद दरवाजे से बाहर बरामदे में देखा उसकी मम्मी उसके पति के समक्ष बिलखकर रो रही थीं, आज उनकी वो इकलौती बेटी पराई हो रही थी जिसको वो कभी अपने साथ रख ही नहीं पाईं। मम्मी को रोते देख उसके मन में तुरंत यही बात कौंध गई कि पहले भी तो एक-दो महीने के लिए ही साथ रहती थीं अब भी वैसे ही रह लेंगे और शायद इसी सोच ने उसकी आँखों के आँसू सुखा दिए। मम्मी को रोते देख वो रोना चाहती थी, मन दुखी भी था पर आँसू नदारद थे। 

जब विदाई के समय माँ ने उसे गले लगाया तब अचानक ही धैर्य का बाँध टूट गया और वह बाकी सारी बातें भूल बस माँ की बेटी बन ममता की लहर में बह चली। 

वो सखियाँ तो नहीं थीं उसकी जिनके सहारे वह लंबे से घूँघट में बिना धरती देखे अपने कदम आगे बढ़ाते हुए डोली की तरह सजी गाड़ी की ओर बढ़ती जा रही थी। यहाँ गाँव में जान-पहचान और बोलना-बतियाना तो सबसे है पर उसकी कोई सखी नहीं है तो उसे यह भी पता नहीं चल पा रहा था कि उसे किसने पकड़ रखा है। दो-चार लड़कियाँ जो उसके साथ पढ़ती थीं, जिन्हें वह सखी कह भी सकती थी, उनमें से तो शायद कोई भी नहीं है जिसने उसे सहारा दिया हो। खैर! वह कार में बैठा दी गई और चल पड़ी एक अनजाने सफर पर, एक ऐसे हमसफ़र के साथ जिसे न कभी देखा न जाना। पहले जब गाँव से शहर जाती थी तब मन में उल्लास होता था। दादी और माँ से दूर होने का दुख जरूर होता था पर उतना नहीं, जितना इस समय हो रहा था। ऐसा लग रहा था उसके अस्तित्व का एक भाग उससे सदा के लिए छूट रहा था। उसका मन किया कि जोर-जोर से रोये पर अनजान लोगों के बीच वह ऐसा नहीं कर सकती थी, भले ही उन अनजाने लोगों में एक स्वयं उसका पति ही था जो ठीक उसके बगल में बैठा हुआ था। आगे की सीट पर ड्राइवर के पास कोई व्यक्ति था जो शायद रिश्ते में उसके पति का बड़ा भाई था। उसने उनकी बातों से ही यह अनुमान लगाया। उसकी सिसकियाँ धीरे-धीरे थमती गईं, आँसू आँखों में ही जब्त होने लगे। अपनों को देखकर अपनों के लिए रोना आता है परंतु अनजानों के बीच रोकर अपनी कमजोरी क्यों दिखाना। आखिर थी तो वही अरुंधती न! जो भीतर से कितनी भी डरी हुई हो पर अपना डर किसी को दिखाकर उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने देती थी तो आज क्यों अपनी कमजोरी दिखाती, इसलिए किसी को चुप कराने का मौका दिए बगैर खुद ही चुप हो गई। 

क्रमशः 

चित्र साभार- गूगल से

मालती मिश्रा 


मंगलवार

अरु..भाग-८- २


प्रिय पाठक अब तक आपने पढ़ा कि अरुंधती ट्रेन में अपनी बर्थ पर पैर फैलाकर बैठ गई और डायरी खोलकर पढ़ने लगी... डायरी के पहले पन्ने पर ही लिखा था..

अब गतांक से आगे....

"बची न वजह अब जीने की कोई

फिर भी घूँट-घूँट साँसों को

पिए जा रही हूँ..

जिए जा रही हूँ

जिए जा रही हूँ.."

यह कैसी जीवन यात्रा है! जो सर्वथा औचित्यहीन है, अस्तित्वहीन है, जो न चलती है न थमती है। ऐसा जीवन जो दुनिया के लिए नहीं है फिर भी इन हवाओं में उसके साँसों की सरगोशी है। बहुधा हम मानवीय जीवन यात्रा को प्रकृति की निरंतरता से जोड़ने का प्रयास करते हैं..कहते हैं कि सूरज उदय होता हैै तो अस्त भी होता है, दिन के उजाले के बाद रात का अंधकार और गहन अंधकार के बाद सुबह का सूर्योदय अवश्य होता है, उसी प्रकार जीवन में सुख और दुख की निरंतरता बनी रहती है परंतु आज स्वयं को देख रही हूँ तो सोचती हूँ क्या ये निरंतरता अब मेरे जीवन में संभव है? क्या अब तक ये निरंतरता सचमुच थी? अगर थी.. तो मुझे अंधकार के पीछे की प्रकाशित किरणें क्यों नहीं दिखाई दीं? आज मेरी शारीरिक और मानसिक स्थिति जिस मोड़ पर है, उसी मोड़ पर उसकी भी थी.. नहीं..नहीं..ईश्वर न करे वैसी स्थिति किसी के जीवनकाल में आए...

इंसान शारीरिक व्याधि से लड़ सकता है, मानसिक और सामाजिक संघर्षों पर विजित हो सकता है परंतु वह रिश्तों और विश्वास की व्याधियों से नहीं लड़ सकता, यही तो जाना है मैंने। उसने सोचा ही नहीं होगा कि एक बड़ी जंग जीतते ही वह इस प्रकार हार जाएगी। उसने बड़ी बीमारी को हरा दिया था पर अपने दिल से, अपने रिश्तों से, अपनी ममता से और स्वयं से हार गई।

उसकी दास्तां है ही ऐसी कि जो सुन ले भीतर तक हिल जाए, भगवान दुश्मन को भी ऐसे दिन न दिखाए। मेरा तो उससे कोई व्यक्तिगत या सामाजिक रिश्ता न होते हुए भी एक ऐसा रिश्ता जुड़ गया जो इन सबसे अधिक गहरा और अपनेपन का हो गया, वो है सम-व्याधिक रिश्ता, एक ऐसा रिश्ता जिसमें हम बिना बताए एक दूसरे की शारीरिक और मानसिक पीड़ा को समझ सकते हैं, महसूस कर सकते हैं। इसके साथ रिश्ते की गहराई का एक और कारण है कि हम दोनों ने अपने सबसे करीबी रिश्ते से विश्वासघात का आघात झेला है..पर सोचती हूँ तो महसूस कर पाती हूँ कि नहीं उसका दर्द मुझसे कहीं अधिक, सहनशक्ति के परे था और मुझसे दुगना...हाँ मुझसे दुगना था या शायद कई गुना अधिक..जिसका अनुमान लगा पाना असंभव है, इसीलिए तो वह आज भी भटक रही है, आज भी तड़प रही है। इस संसार को छोड़कर भी छोड़ नहीं पाई, उसकी आत्मा घायल हुई है, वह विश्वासघात के उस जख्म से उठने वाली टीस को हर पल महसूस करती है। काश! मैं उसके लिए कुछ कर पाती, काश!!"

"मम्मा काश कि मैं आपका दर्द दूर कर पाती, काश! मैं आपको आपकी खुशियाँ लौटा पाती..." डायरी पढ़ते हुए अलंकृता बुदबुदाई और आँखों से निकलकर गालों पर ढुलक आए आँसुओं को हथेली से पोंछकर आगे पढ़ने लगी।

"इतना तो समझ गई हूँ कि वह विश्वासघात के दर्द से जितना तड़प रही है, उस दर्द को किसी से न बाँट पाने के दर्द से भी उतना ही तड़प रही है। शायद यही कारण है कि वह आज भी रो-रोकर अपने दर्द को आँसुओं में बहाने की कोशिश करती रहती है। 

शायद मैं पहली इंसान हूँ जिसे उसने अपना हमराज बनाया लेकिन उसके जख्मों की टीस मुझसे सहन नहीं हो रही, उसकी हर बात से मुझे अनिरुद्ध की बेवफ़ाई, उनका विश्वासघात याद आ रहा है और ऐसा महसूस हो रहा है जैसे सब कुछ मेरे साथ ही घटित हो रहा हो... आखिर कोई कितना बर्दाश्त कर सकता है... कैसे???" 

उसकी कहानी जानकर यह विश्वास करना मुश्किल हो रहा है कि वह वही अरुंधती है जो उसके स्वयं के बताने के अनुसार बहुत ही निडर, साहसी, खुले विचारों की, अत्यंत मेधावी, आत्मविश्वास से भरी हुई और कभी ग़लत बात को बर्दाश्त न करने वाली हुआ करती थी। लेकिन अविश्वास का कोई कारण भी नहीं है..."

वह एक मध्यमवर्गीय परिवार में दो सगे और पाँच चचेरे भाइयों की इकलौती बहन थी। पिता सत्येंद्र प्रसाद सरकारी कर्मचारी थे इसलिए बचपन से ही उसने कभी अभाव नहीं देखा था।  वह मात्र तीन या चार वर्ष की अबोध बालिका थी जब सत्येंद्र प्रसाद ने उसे स्कूल भेजना शुरू किया था। वह नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे उनकी तरह अनपढ़ रहें। पहले तो गाँव के ही कुछ सहकर्मी मित्रों ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि लड़की जात को पढ़ाने का कोई लाभ नहीं आखिर उसे चूल्हा-चौका ही तो करना है। परंतु उन्होंने किसी की एक न सुनी और अरुंधती की पढ़ाई जारी रखा। बाद में उन्हीं सहकर्मियों ने भी उनका अनुसरण किया और अपनी बेटियों को स्कूल भेजने लगे। उनमें एक हरिजन सहकर्मी भी थे, उनकी इकलौती बेटी इमली अरुंधती की बहुत अच्छी सहेली बन गई।

दोनों साथ ही स्कूल आते-जाते, एक साथ बैठते और साथ में ही लंच करते। अरुंधती उसे अपनी सबसे अच्छी सहेली मानती थी जबकि अरुंधती से तो कक्षा की सभी लड़कियाँ दोस्ती करना चाहती थीं। वो थी ही ऐसी...अत्यंत मेधावी थी सभी विषयों में कक्षा के अन्य बच्चों से आगे रहती बिल्कुल बिंदास, चुलबुली और निडर। पढ़ाई में तो आगे थी ही स्कूल में होने वाले सभी कार्यक्रम चाहे वह एन. सी. सी. से संबंधित हो चाहे सांस्कृतिक हो, वह बढ़-चढ़कर भाग लेती, इसीलिए सभी अध्यापकों की चहीती भी थी। एक और बहुत बड़ी खूबी थी उसमें कि वह किसी की बुराई पीठ पीछे न करके उसके सामने ही करती थी। कभी-कभी उसकी सहेलियाँ उसे समझातीं कि ऐसा मत किया करो नहीं तो सब तुमसे चिढ़ने लगेंगे। तब उसका जवाब होता "जो मेरी सच में दोस्त होंगी वो नहीं चिढ़ेंगी, मैं किसी की बुराई पीठ पीछे करके उसकी छवि नहीं खराब करती, सामने से कहती हूँ किसी को अच्छा लगे या बुरा।" बच्चे तो बच्चे वह तो बड़ों को भी नहीं छोड़ती थी। उसके अंग्रेजी के अध्यापक कुछ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते थे। उनकी एक बुरी आदत थी कि जिन्हें वह ट्यूशन पढ़ाते थे उन बच्चों को अपने विषय के परीक्षा के प्रश्न-पत्र में आने वाले सभी प्रश्न पहले ही बताकर उनके अभ्यास करवा दिया करते थे। यह बात अन्य बच्चों को पता चल जाती थी तो स्वाभाविक है कि उन्हें बुरा लगता था पर सब मन मसोस कर रह जाने के अलावा कुछ कर नहीं पाते थे। एक बार परीक्षा चल रही थी, उस दिन भूगोल विषय की परीक्षा थी। अरुंधती जिस परीक्षा कक्ष में बैठी थी, उसमें उन्हीं मास्टर जी की ड्यूटी थी। परीक्षा के दौरान मास्टर जी के ट्यूशन के किसी बच्चे ने उनसे किसी प्रश्न का उत्तर पूछा तो उन्होंने बताया। अरुंधती की आदत थी कि परीक्षा के समय वह किसी से बात नहीं करती थी, उसे जितना आता था उतना ही करती पर न किसी से पूछती और न ही बताती। पर जब उसने मास्टर जी को बताते हुए देखा तो उससे रहा नहीं गया, उसे न जाने क्या सूझा कि उसने भी मास्टर जी से एक प्रश्न पूछा। मास्टर जी ने कहा कि "यह मेरा विषय नहीं है इसलिए मुझे नहीं पता।" 

"लेकिन सर अगर आप को नहीं आता तो दूसरे बच्चों को कैसे बता रहे हैं?" उसने कहा।

"तुम चुप रहो और पूछने की बजाय चुपचाप परीक्षा दो, पढ़कर नहीं आईं क्या?" मास्टर जी ने कह तो दिया पर उन्हें कहाँ पता था कि किससे उलझ गए। 

"सर ये तो गलत है न कि आप एक बच्चे को बता कर चीटिंग करवा रहे हैं और मुझे डाँट रहे हैं। या तो सबको बताइए या किसी को भी मत बताइए।" उसने कहा।

"तुम बहुत बहस कर रही हो, मैं उत्तर पुस्तिका छीन कर घर भेज दूँगा तब समझ में आएगा कि टीचर से बहस का नतीजा क्या होता है।" 

मास्टर जी ने क्रोध में आकर कहा।

"सर छीन लीजिए, अब मैं भी नकल करूँगी वो भी कॉपी से और आप छीनिए ताकि मैं प्रिंसिपल सर से शिकायत कर सकूँ कि आप कैसे अपने ट्यूशन के बच्चों को बताते हैं और प्रश्न-पत्र भी लीक करते हैं।" आवेश में आकर बोलती हुई वह उठी और कक्षा से बाहर रखे अपने बस्ते से भूगोल की कॉपी निकाल कर अपनी सीट पर बैठकर उसे डेस्क के ऊपर रखकर खोल लिया और लिखने लगी। मास्टर जी ने तो सोचा भी नहीं होगा कि उनको छठीं कक्षा की एक छोटी सी बच्ची से ऐसा जवाब मिल सकता है। वह झल्लाकर बाहर चले गए और किसी और अध्यापक को भेज दिया। उनके जाते ही अरुंधती ने कॉपी बंद करके खिड़की से बाहर की तरफ रखे बैग पर रख दिया और चुपचाप लिखने लगी। यह बात सबको पता थी कि उसे नकल की जरूरत नहीं थी पर जब मेहनत करने वाले से ज्यादा अच्छे नंबर उन लोगों के आएँ जो उसके हकदार नहीं होते तब मन आहत होता है और ऐसा बार-बार होता आ रहा था इसीलिए उसके सब्र का बाँध टूट गया और वह न चाहते हुए भी धृष्टता कर बैठी। परंतु मास्टर जी को एक बात बखूबी समझ आ गई थी कि वो ग़लत बात बर्दाश्त नहीं कर सकती चाहे मास्टर जी उसके लिए उसे सजा ही क्यों न दे दें। 

सत्रह वर्ष पूर्व अपनी मम्मी के द्वारा अचेतन अवस्था में लिखे गए पन्नों में से यह पहला पन्ना था जिसे अलंकृता बार-बार पढ़ती है।

आगे के पन्नों में क्या लिखा है जानने के लिए हमारे साथ बने रहिए। अगला भाग अगले सप्ताह...

क्रमशः 

चित्र साभार- गूगल से

मालती मिश्रा 'मयंती'



गुरुवार

हिन्दी दिवस पर हिन्दी


 हिन्दी दिवस पर हिन्दी

हिन्दी दिवस का आज हम सब
खूब प्रदर्शन करते हैं,
बीत जाएगी जब ये घड़ी
दम इंग्लिश का भरते हैं।

हिन्दी हम सबकी माता है
शान से ये बताते हैं,
दूजे दिन से इस माता को
माँ कहते शर्माते हैं।

हिन्दुस्तां की शान है हिन्दी
कह कर खुशी मनाते हैं,
नाना विधि से मान दिखाते
हिन्दी मय हो जाते हैं।

बीत गया ये हिन्दी दिवस फिर
अगले साल हि आएगा,
तब तक हर इक भारतवासी
जेंटलमेन बन जाएगा।।

सभी को हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ 💐
मालती मिश्रा 'मयंती'✍️