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Monday, 22 January 2018

अधूरी कसमें...2

रात्रि का दूसरा प्रहर था, हड्डियाँ कंपकंपा देने वाली कड़ाके की ठंड, चारों ओर घनघोर अँधेरा था, हाथ को हाथ सुझाई नहीं दे रहा था; पतली-सी सड़क के दोनों ओर लंबे-लंबे पेड़ों की कतारें मानो अँधकार से बल पाकर दानव के समान झूमते हुए डरा रहे थे। पेड़ों की कतारों से बाहर नजर जाती तो सिर्फ घना कोहरा दिखाई पड़ता, कोहरे को चीर कर उस पार देखने का प्रयास करना बेवकूफी थी। ऐसे मौसम में अपरा की गाड़ी अपने गंतव्य की ओर बढ़ी जा रही थी। मौसम की भयावहता से अधिक उथल-पुथल इस समय उसके भीतर चल रही थी। वह जल्द से जल्द घर पहुँचना चाहती थी पर घर पहुँचकर करेगी क्या इसका कोई अंदाज़ा नहीं था, उसके भीतर का तूफान इतना अधिक था कि वह अपने-आपको उससे भी अधिक तूफानी मार में झोंक देना चाहती थी ताकी दिल में उठने वाले दर्द के अहसास को अनदेखा कर सके, उस तूफान में घिरने से खुद को बचा सके।
घर के बाहर ही गाड़ी को साइड से लगाकर वह यंत्रचालित सी गेट खोलकर लॉन को पार करती हुई बरामदे में आकर बिना लाइट जलाए हॉल का गेट खोला और सीधी जाकर सोफे पर निढाल होकर बैठ गई। उसने लाइट तक ऑन नहीं किया। उसके कानों में बस यही ध्वनि गूँज रही थी.....
"ये हैं मेरे पतिदेव और नील ये मेरी सबसे अच्छी सहेली, मेरी तन्हाइयों की साथी 'अपरा' "
धीरे-धीरे ध्वनि तेज..तेज और तेज होती जा रही थी....
"नो...नो....नो...मैं नहीं जानना चाहती तुम्हारे बारे में...क्यों आए मेरे सामने?" दोनों कानों पर हाथ रखकर चीख पड़ी मानों उस आवाज को बंद कर देना चाहती हो।
"जिस अतीत को मैं सालों पहले सपना समझकर दफन कर चुकी थी, क्यों वो मेरे सामने हकीकत बनकर खड़ा हो गया? मेरी किस्मत क्यों बार-बार मेरा इम्तहान लेती है? नीलेश धोखेबाज है ये तो पता था, पर संजना का पति..... मैं कैसे सामना करूँगी संजना का? क्या कहूँगी उससे..... कि वो उसका पति ही है जिसने मेरी दुनिया वीरान कर दी? नहीं, मैं उसे नहीं बता सकती, क्या बीतेगी बेचारी पर?वो दर्द छिपाकर हमेशा खिलखिलाने वाली संजना क्या ये दर्द भी सहन कर पाएगी?" अपरा अपने आपसे बड़बड़ाई।
नीलेश की छवि तैर गई अपरा की आँखों में, बिल्कुल नहीं बदला, वही पहले जैसा.... आँखों में मासूमियत और चेहरे पर आत्मविश्वास के मिले-जुले भाव लिए आकर्षक व्यक्तित्व। संजना के साथ परफेक्ट मैचिंग, लेकिन कभी उसकी और नीलेश की जोड़ी इससे कहीं अधिक परफेक्ट लगती थी। उंह्ह ये क्या सोचने लगी मैं..सोचते हुए अपरा ने अपनी गरदन को झटका, जैसे सारी स्मृतियों को मस्तिष्क से निकाल देना चाहती हो। तभी अचानक अपरा का मोबाइल बज उठा... इतनी रात को किसका फोन हो सकता है? सोचते हुए उसने पर्स से मोबाइल निकालकर देखा तो संजना का नं० था।  संजना से बात करने का इस समय उसका मन नहीं हो रहा था फिरभी ये सोचकर कि शायद उसे फिक्र हो रही  होगी, उसने फोन रिसीव किया...
"तू ठीक से घर पहुँच गई न, कोई प्रॉब्लम तो नहीं हुई?" फोन उठाते ही दूसरी तरफ से संजना की आवाज आई। उसकी आवाज से साफ पता चल रहा था कि वो अपरा के लिए फिक्रमंद थी।
"अरे हाँ..हाँ बाबा तू सांस तो ले ले, मैं बिल्कुल ठीक-ठीक पहुँच गई और अब अपने घर में सुरक्षित हूँ। आप बेफिक्र होकर एन्जॉय करें।" अपरा ने अपने को संयत करते हुए कहा।
"तुझे पता नहीं मुझसे ज्यादा तो नील को तेरी फिक्र हो रही थी, अब तक कई बार कह चुके हैं कि "फोन कर लो, पहुँच गई होगी, पता करो..." वो तो मुझे पता है कि कितनी मुश्किल से अब तक टाला मैंने, ये कह-कहकर कि घर पहुँच जाने दो, नहीं तो ड्राइविंग करते हुए फोन रिसीव करना खतरनाक हो सकता है; वो कह रहे थे कि मैंने तुझे इतनी रात को अकेले जाने ही क्यों दिया?" संजना बिना रुके बोलती रही।
"तूने बताया नहीं कि मेरा आना कितना आवश्यक था?" अपरा ने कहा।
"बताया था, तो कहने लगे इतना ही जरूरी था तो मुझे बतातीं किसी को साथ भेज देता।" संजना ने कहा।
"चल अब तो आ गई, इतनी फिक्र के लिए मेरी तरफ से धन्यवाद कहना और कहना कि हालात लोगों को कठिनाइयों से लड़ते हुए अकेले चलना सिखा देते हैं, अच्छा चल अब मैं  सोऊँगी सुबह निकलना है। गुड नाइट।" कहकर अपरा ने संजना का उत्तर सुने बिना ही फोन डिस्कनेक्ट कर दिया। उसका मन कसैला हो रहा था वह नहीं चाहती थी कि संजना को उसकी आवाज से उसके भीतर चल रहे द्वंद्व का जरा भी अहसास हो। वह बहुत देर तक करवटें बदलती रही, सोने की नाकाम कोशिश करती रही पर आँखों में रह-रह कर नीलेश की छवि तैरने लगती। कभी वो मेरी दुनिया हुआ करता था और आज मेरी सहेली की दुनिया है, मैं कैसे सहन कर लूँ कि उसने मेरी आँखों के सपने किसी और की आँखों में बसा दिए। मेरे दिल के किसी कोने में उम्मीद की एक किरण थी कि शायद वो किसी वजह से फँस गया होगा पर अभी भी मेरा ही होगा; उसने तो मेरी ये उम्मीद भी किसी अन्य के साथ सात फेरों की आग में जलाकर राख कर दी।
सोचा था जब कभी मिलूँगी तो पूछूँगी कि ऐसा क्यों किया? पर उसने तो ये अधिकार भी छीन लिया। अपरा के मस्तिष्क में विचारों का द्वंद्व चलता रहा और आँखों से नींद का मानो कभी कोई नाता ही न रहा हो। उसने करवट बदली तो पाया कि उसकी तकिया गीली हो चुकी थी, उसने आँसुओं से भीगे गालों को साफ किया और सोने की कोशिश में करवटें बदलती रही और घड़ी की सुई अपनी चाल से टिक-टिक करती रही।
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सर्दी हड्डियों में सुइयाँ चुभाने लगी पर नीलेश की इंद्रियाँ मानों सुप्त हो चुकी थीं या फिर वह भीतर ही बेबसी की आग में इस कदर जल रहा था कि उसे सर्दी का अहसास ही नहीं हो रहा था। उसका पूरा शरीर रह-रह कर सूखे पत्ते-सा काँप जाता, पता नहीं सर्दी के कारण या बेबसी का घूँट पीने के प्रयास से।
उसने सोचा था कि अब इस जीवन में कभी अपरा के सामने नहीं जाएगा; वह उसका सामना नहीं करेगा पर आज......उसकी आँखों के समक्ष एक बार फिर वही दृश्य नाचने लगा जब संजना बोली- "ये मेरी सबसे अच्छी सहेली, मेरी तन्हाइयों की साथी 'अपरा' "...... अपरा.... अपरा....यह शब्द कानों से होता हुआ दिल की गहराई तक उतर कर उस जख्म को छू गया जिसके दर्द को नीलेश पिछले चार वर्षों से सहेज कर दुनिया से छिपाए हुए है। इस शब्द के साथ-साथ जब स्वयं अपरा साक्षात् उसके समक्ष खड़ी हो गई तो नीलेश की धड़कनों ने मानों उसके साथ झंझावात शुरू कर दिया। उसे महसूस हुआ जैसे दिल सीने में जोर-जोर से ठोकरें मारता हुआ बाहर निकलने को तत्पर है। वह बमुश्किल खड़ा रह सका..."क्या हुआ?" संजना नीलेश की ओर से कोई प्रतिक्रिया न आते देख पूछ बैठी।
"क्क कुछ नहीं, हैलो अपरा जी।" संभलते हुए नीलेश बोला।
"आपसे मिलकर अच्छा लगा।" अपरा ने अभिवादन की मुद्रा में हाथ जोड़ते हुए कहा।
"मुझे भी" बोलते हुए नीलेश को अपनी ही आवाज गहराई से आती हुई प्रतीत हुई। उसे ऐसा लगा कि अपरा की आँखें उसके चेहरे को टटोल रही हैं, वो पूछ रही हैं कि तुमने ऐसा क्यों किया? उसे पता था कि इस प्रकार से उन दोनों की चुप्पी आसपास खड़े मेहमानों और संजना को अजीब लग सकती है, पर उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या बात करे? तभी अचानक जैसे ईश्वर ने उसके मन की दशा जान उसके लिए एक सहायक भेज दिया....
"हे हैलो नीलेश, हैप्पी मैरिज एनीवर्सरी यार?" इस आवाज़ के साथ ही एक हाथ उसकी ओर बढ़ा।
" हे हाय, थैंक्यू सो मच, बहुत देर कर दी...." कहते हुए नीलेश अभी-अभी आए किसी मेहमान से बातों में व्यस्त हो गया और उसका ध्यान दूसरी ओर जाते देख अपरा वहाँ से हटकर भीतर हॉल की ओर चल दी थी। सच तो ये था कि नीलेश आगंतुक से बातों में व्यस्त होने का सिर्फ दिखावा कर रहा था, उसका पूरा ध्यान तो अपरा के ऊपर था।
जैसे-जैसे वह दूर होती जा रही थी उसे लग रहा था कि वह फिर से उससे दूर हो रही है, वह खुद समझ नहीं पा रहा था कि उसके लिए ज्यादा तकलीफ़ देह क्या था संजना के साथ अपरा का उसके पास रुकना या उससे दूर जाना....वह खुद क्या चाहता था? जिसकी यादों को वह भूल जाना चाहता था, वही आज उसके समक्ष सजीव अपने आकार में संपूर्ण आकर्षण के साथ खड़ी थी, और अब वह चातक की भाँति स्वाति नक्षत्र की उस बूंद के लिए लालायित हो उठा था, जिसकी वो वर्षों से प्रतीक्षा कर रहा था और आज सामने पाकर भी उसे पाना या छूना तो दूर उसकी ओर जी भरकर देख भी नहीं सकता था।
"नील, आप यहाँ! इतनी सर्दी में यहाँ टेरिस पर क्या कर रहे हो? मैं कब से आपको ढूँढ़ रही थी; ओह माई गॉड! इंसान जम जाए इस ठंड में और आप हो कि..... चलो नीचे।" कहती हुई संजना अधिकार से उसका हाथ पकड़कर सीढ़ियों की ओर चल दी।

"आप यहाँ क्यों आ गए, देखो आपके हाथ कितने ठंडे हो रहे हैं इतनी ठंड में बीमार पड़ने का इरादा है क्या?" संजना की झिड़की में भी प्यार झलक रहा था। पर नीलेश निर्विकार उसके साथ चल रहा था मानों उसे कुछ सुनाई ही नहीं पड़ रहा था।
"आप सुन क्यों नहीं रहे?" संजना ने उसके हाथ को हल्के से झटका देते हुए कहा।
ह् हाँ वो मुझे जरूरी कॉल करना था और यहाँ नीचे शोर बहुत था, इसीलिए मैं टेरिस पर चला गया, तुम परेशान मत हो।
"बाई-द-वे तुमने कॉल किया अपनी फ्रैंड को? वो  घर पहुँच गई?" नीलेश ने अपरा के बारे में पूछा, जिसे उसने मिलने के कुछ देर बाद ही जाते देखा था।
"कौन-सी फ्रैंड?" संजना ने कहा।
"अरे वही जो मुझसे मिलते ही चली गई थी, क्या नाम बताया था तुमने... अपरा"
"नहीं, अभी वो पहुँची नहीं होगी।" संजना ने कहा।
"क्यों अधिक दूर है क्या?
"हाँ, वो आशीर्वाद एन्क्लेव में रहती है, और फिर कुहरा इतना अधिक है तो वैसे भी गाड़ी धीरे चला रही होगी, टाइम तो लगेगा ही।" संजना ने कहा।
"अगर वो अकेली थी तो तुम्हें इतनी रात को अकेले जाने ही नही देना चाहिए था।" नीलेश ने चिंतित होते हुए कहा।
"उसकी टिकट है, उसे सुबह-सुबह निकलना है इसलिए...."  संजना ने बात अधूरी छोड़ दी।
नीलेश को चिंता होने लगी, वह जानता था कि उससे मिलने के बाद अपरा की भी मानसिक दशा कुछ उसी की तरह या फिर उससे भी ज्यादा खराब होगी। पता नहीं वह ठीक से ड्राइव कर पा रही होगी या नहीं। वह अपनी यह परेशानी संजना को बता भी नहीं सकता था। उसने कहा- "अगर इतना ही जरूरी था तो मुझे बतातीं मैं किसी को साथ भेज देता। खैर अब फोन करके पता करो और जब पहुँच जाए तो मुझे भी बता देना।"
सत्य से अंजान संजना को यह देख बहुत अच्छा लगा कि उसका पति उसकी सहेली के लिए भी फिक्रमंद है, इसीलिए अपरा से बात होते ही उसने नीलेश को बता दिया ताकि वह निश्चिंत हो जाए।
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आज कई दिनों के बाद फिजां में सूरज की रश्मियों की गरमाहट थी, देर से ही सही पर सूर्यदेव ने दर्शन तो दिया था और अब अपनी आभा को समेटते हुए दूर दिखाई पड़ने वाले पहाड़ों के पीछे क्षितिज के अंक में स्वयं को छिपाने को तत्पर है। किरणों की लाली वृक्षों के शिखर को रक्तिम आभा से नहला रही थीं। अनुकूल मौसम होने की वजह से शाम को नियमित रूप से टहलने वालों के अलावा अन्य लोग भी आज पार्क में टहलते नजर आए। जगह-जगह बच्चे खेल रहे थे। इतनी चहल-पहल के मध्य पार्क के एक कोने में पेड़ के नीचे अकेले बैठा नीलेश न जाने किन खयालों में खोया हुआ था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह वहाँ होकर भी वहाँ नहीं है। दोनों पैर फैलाकर  पेड़ से पीठ टिकाकर बिल्कुल शांत मुद्रा में बैठा एकटक आसमान में बिखरी सिंदूरी लाली के सौंदर्य को निरखते हुए उसकी आँखों में अपरा का सौंदर्य तैरने लगा और वह अतीत में खोने लगा......
"नीलेश तुम्हारे मम्मी-पापा हमारी शादी के लिए मान तो जाएँगे न?" नीलेश के चेहरे पर गड़ी हुई अपरा की शांत आँखें उससे बार-बार यही प्रश्न पूछ रही थी और नीलेश आँखों ही आँखों में उसे यही समझा रहा था कि चिंता मत करो वो सब मान जाएँगे। उस समय नीलेश को जरा भी अहसास नहीं था कि अपरा के मन का डर बेवजह नहीं था, बल्कि वह एक स्त्री की छठी इंद्री का संकेत था।
वह अपरा और उसके मम्मी-पापा को आश्वत करके अपने घर के लिए रवाना हो गया। अब उसे पापा की चिंता सताने लगी थी कि पता नहीं उनकी तबियत कितनी खराब होगी; आखिर माँ ने इतनी जल्दबाजी में क्यों बुलाया? कहीं पापा की तबियत ज्यादा खराब तो नहीं! इन्हीं प्रश्नों में उलझा वह बर्थ पर लेटा सोने की कोशिश करता रहा। ट्रेन गाँव, जंगल, नदियाँ, ताल, पेड़ों के झुरमुट आदि सब पीछे छोड़ते हुए अपनी तेज रफ्तार से भागी जा रही थी नीलेश के ख़यालों में उसी तीव्रता से दृश्य बदल रहे थे...कभी अपरा का मायूस चेहरा तो कभी उसके मम्मी-पापा की उम्मीद से उसकी ओर तकती आँखें, कभी नीलिमा का शरारती चेहरा, कभी बालकनी में खड़ी अपरा की छवि तो कभी नीलिमा की मम्मी द्वारा अपरा को चोरी से देखते हुए पकड़े जाना। ये सभी खयाल रह-रहकर उसके मन को गुदगुदाते रहते। जब भी पापा की ओर ध्यान जाता और वो परेशान होता तो अपना ध्यान अपरा की ओर मोड़ लेता और फिर उसके मीठे खयालों में से तब बाहर आता जब गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकती। इसीप्रकार आँखों ही आँखों में रात कट गई और उसकी मंज़िल आ गई। बैग उठाकर उसने ट्रेन से नीचे प्लेटफॉर्म पर पैर रखते हुए ऐसा महसूस किया मानो अपने घर में आ गया हो, अब वह शीघ्रातिशीघ्र घर पहुँच कर पापा से मिलना चाहता था।

गेट पर खड़े होकर उसने अंदर नजर दौड़ाई, कहीं कोई दिखाई न दिया चारों ओर सन्नाटा पसरा था। गेट को धकेला तो वह खुल गया। वह ट्रॉली बैग को खींचता हुआ अंदर आया, लॉन पार करते हुए बरामदे में चढ़ते ही आवाज लगाया- "माँ...पापा...कहाँ हैं आप लोग?"
कहते हुए वह हॉल में पहुँच गया, उसकी आवाज सुनकर श्वेता अंदर से भागती हुई आई।  "भईया अच्छा किया कि तुम आ गए!" कहती हुई वह नीलेश के गले से लग गई उसकी आँखों से अश्रुधार बह निकले।
"क्या हुआ तू रो क्यों रही है? पापा कहाँ हैं? अब कुछ बताएगी भी।" नील ने घबरा कर पूछा।
"पापा को हार्ट अटैक आया है वो आई. सी. यू. में हैं।" श्वेता ने रोते हुए बताया।
"क्या! कैसे हुआ ये सब?" नीलेश के मुँह से बेसाख्ता निकला।
फिर जवाब का इंतजार किए बिना "चल मेरे साथ अस्पताल चल।" कहता हुआ वह बाहर की ओर तेजी से चल पड़ा।
"माँ, पापा कैसे हैं अब?" आई.सी.यू. के बाहर बैठी माँ को देखते ही नीलेश ने पूछा।
इस मुश्किल घड़ी में बेटे को देखते ही माँ की आँखें बरस पड़ीं, साथ ही उन आँखों में एक विश्वास भी जागा; जैसे बेसहारे को अकस्मात् सहारा मिल गया हो।
"अभी तक खतरा टला नहीं है, होश में आए तो तुझसे ही मिलना चाहते थे।" माँ ने खुद को संभालते हुए कहा।
"आप मिस्टर नीलेश है?" आई.सी.यू. से बाहर आती हुई नर्स ने पूछा।
"जी, मैं हूँ।" नीलेश ने कहा।
"डॉ० साहब आपको अंदर बुला रहे हैं।" नर्स ने कहा।
नीलेश भीतर गया, न जाने क्यों उसे घबराहट हो रही थी, वह भीतर ही भीतर अपने डर को जीतने की कोशिश कर रहा था और खुद को ही तसल्ली दे रहा था कि पापा ठीक हो जाएँगे।
"डॉक्टर! पापा कैसे हैं?" उसने भीतर पहुँचते ही पूछा।
"न् नील्लेश!" पापा की लड़खड़ाती हुई सी आवाज आई।
नीलेश एकदम से पापा की ओर मुड़ा और उनके हाथ को अपनी दोनों हथेलियों के बीच पकड़कर बोला- "जी पापा! मैं आ गया हूँ, आपको कुछ नहीं होने दूँगा, आप ठीक हो जाएँगे।"
"नहीं बेटा.. अब...मेरा... बुलावा.. आ.. गया... है..तुम मेरी ब्बात ध्यान..से सुनो...म्मेरे वादे.. का..मान रखना बेटा, मेरे.... स्स्वर्गीय.. दोस्त.. महेन्द्र..प् प्रताप की... बेटी..से...विवाह..कर.. लेना। मैं उस..उसके... अहस्..सानों...के कर्ज तले दब..कर... नहीं.... जाना... चाहता... नहीं तो... ऊपर...उस्.. उसे...क्क्या... मुँह... दिखाऊँगा।"
"पर पापा!...कहता हुआ नीलेश चुप हो गया जब उसने अपने कंधे पर किसी का हाथ महसूस किया, उसने देखा कि डॉ० उसे इशारे से मना कर रहा था कि वह कुछ भी नकारात्मक न बोले।
"पापा जो आप चाहते हैं वही होगा, बस आप जल्दी से ठीक हो जाइए।" उसने अपने ऊपर काबू पाते हुए कहा। इस समय वह यही सोच रहा था कि पापा ठीक होकर घर आ जाएँ, फिर वह उन्हें सब समझा देगा, परंतु उसे कहाँ पता था कि उसके पापा तो बस उसका इंतजार कर थे, ताकि वह अपनी अंतिम जिम्मेदारी पूरी कर सकें और अब आश्वासन पाकर वह सुकून की नींद सो गए, कभी न उठने के लिए।
गम का पहाड़ सा टूट पड़ा था नीलेश और उसके परिवार पर; इस समय नीलेश के पापा की मृत्यु से सिर्फ उनका ही परिवार संरक्षक विहीन नहीं हुआ था, बल्कि महेंद्र प्रताप जी का परिवार भी स्वयं को अनाथ महसूस करने लगा था।
महेंद्र प्रताप नीलेश के पापा के बहुत ही खास  मित्र थे, दोनों दोस्त कम भाई अधिक थे, दोनों की सारी नाते-रिश्तेदारी एक-दूसरे तक ही सिमट कर रह गई थी। दोनों के ही एक बेटा और एक बेटी थी। दुर्भाग्यवश शादी के एक वर्ष बाद ही महेंद्र प्रताप के बेटे की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। अब परिवार में उसकी विधवा पत्नी और नन्हा अयान था। दुर्भाग्य ने यहीं बस नहीं किया बल्कि नीलेश के पापा का बिजनेस भारी घाटे और लोन के चलते ठप्प पड़ गया; ऐसे में नीलेश की इंजीनियरिंग की पढ़ाई का सारा दारोमदार महेंद्र प्रताप जी ने ले लिया, जिससे नीलेश पूरी तरह से अंजान था। सबकुछ धीरे-धीरे संभलने लगा था कि तभी नीलेश की माँ को सड़क पार करते हुए एक्सीडेंट से बचाते हुए महेंद्र प्रताप खुद तेज रफ्तार ट्रक की चपेट में आ गए और अपने परिवार की जिम्मेदारी तथा अपनी बेटी संजना की शादी नीलेश से करने का वादा लेकर स्वर्ग सिधार गए।
नीलेश के पापा ने भी अपनी दोस्ती का फ़र्ज़ और अहसानों के कर्ज को बखूबी निभाया और कभी भी बच्चों को पता तक न चलने दिया, किंतु जब उन्हें दूसरी बार हार्ट-अटैक आया था तभी उन्होंने नीलेश की माँ को सारी बातें बता दी थीं।
नीलेश धर्म संकट में फंस चुका था, वह अपरा के बिना अपने जीवन की कल्पना भी नहीं करना चाहता था, किन्तु जीवन के अंतिम पल में पापा को दिए वचन को न निभाए तो भी पुत्र धर्म का अपमान होगा। वह जीवन के दोराहे पर खड़ा था, जहाँ से समझ नहीं पा रहा था कि किस राह जाए?.पिता को दिया वचन निभाए, उनकी अधूरी जिम्मेदारी को पूरी करे या अपरा को दिया वचन निभाए। पापा की जिम्मेदारी तो वो अपरा से विवाह करने के बाद भी पूरी कर सकता है। इन्हीं विचारों के भँवर में घिरा वह माँ से बात करने के लिए उनके कमरे में गया, पर माँ की दशा देख कुछ कहने का साहस नहीं कर पाया, कुछ देर चुपचाप बैठकर वहाँ से चलने के लिए खड़ा हुआ तभी माँ बोल पड़ीं-
"कुछ कहना चाहते हो नीलेश?"
"माँ!...वो मैं आपसे बात करने तो आया था पर कोई खास बात नहीं है, बाद में भी हो सकती है।" नीलेश ने हिचकते हुए कहा। वह इस समय ऐसा कुछ नहीं कहना चाहता था, जिससे माँ के दुख में बढ़ोत्तरी हो।
"तुम उस लड़की के बारे में बात करना चाहते हो जिसके बारे में तुमने फोन पर बताया था?" माँ ने बिना कहे ही नीलेश के मन की बात जान ली।
"जी मम्मी, मेरी समझ में नहीं आ रहा कि मैं क्या करूँ! आते हुए मैं अपरा के मम्मी-पापा से वादा करके आया था कि मैं जल्दी ही सभी की रजामंदी की खुशखबरी के साथ वापस आऊँगा, पर भगवान ने हम सबकी खुशियाँ छीन लीं लेकिन माँ अब मैं दुविधा में फँस गया हूँ कि मैं उस वचन को निभाऊँ जो मैंने अपरा को दिया है, या उस वचन को जो पापा को दिया? माँ क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मैं पापा की जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए अपरा को दिया वादा भी निभा सकूँ।" नीलेश ने साहस जुटाकर नजरें झुकाकर सबकुछ एक ही सांस में कह दिया।
"बेटा, जब हम सही होते हैं तो हमें नजरें झुकाने की जरूरत नहीं होती, तुम्हारी नजरें झुक रही हैं, इसका मतलब है कि तुम खुद ही मानते हो कि तुम जो कह रहे हो उसके सही होने पर संदेह है"....
पर माँ...माँ की बात बीच में ही काटकर नीलेश ने कुछ कहना चाहा पर माँ ने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया।
"बेटा, तुम्हें ये तो पता है कि तुम्हारे पापा और महेंद्र प्रताप भाई साहब के रिश्ते कैसे थे, पर तुम्हें उनके हमारे ऊपर किए गए अहसानों का पता नहीं। आज तुम जो कुछ भी हो उन्हीं की वजह से हो, मैं जिन्दा हूँ तो उनके ही प्राणों की कीमत पर"....ऐसा कहते हुए माँ ने नीलेश को महेंद्र प्रताप सिंह द्वारा उस परिवार के लिए किए गए सभी कार्यों के बारे में बताया।
नीलेश के पैरों के नीचे से मानो किसी ने धरती खींच ली हो, आज तक वह अपने जिस जीवन को अपना समझता था वह उधार का प्रतीत होने लगा;  उसके सिर पर माँ की छाया, उसकी शिक्षा, उसका करियर सब कुछ उसका खुद का न होकर उधार का महसूस होने लगा। अब यदि उसने इस कर्ज़ को न चुकाया, अब अगर पापा को दिया वचन न निभाया तो अपनी ही नजर में गिर जाएगा।
"मुझे जो बताना था नील बेटा मैंने तुम्हें बता दिया, आज उनका परिवार बेसहारा है, तो हमारे परिवार का फ़र्ज है कि तुम्हारे पापा के दिए वचन को पूरा करें। तुम बच्चे नहीं हो कि मैं तुम पर दबाव डालकर अपनी बात मनवा सकूँ, इसलिए मैंने तुम्हें सारी परिस्थितियाँ बता दीं, अब तुम्हें जो ठीक लगे वो करो।" माँ ने कहा।
"मम्मी, आपने बहुत अच्छा किया कि मुझे सबकुछ बता दिया, नहीं तो मुझसे गलती भी हो सकती थी। आपने मेरी राह आसान कर दी है।" कहते हुए नीलेश का गला भर आया; वह अपने आँसू छिपाते हुए कमरे से बाहर चला गया। आज उसे अपनी दुनिया उजड़ती हुई महसूस हो रही थी, वह जी भर कर रोना चाहता था, बार-बार उसकी आँखों के सामने अपरा का उदास चेहरा आ जाता। वह स्वयं को उसका अपराधी महसूस कर रहा था, अब उसमें साहस नहीं था कि वह अपरा का सामना कर पाता, उसके सवालों के जवाब दे पाता। वह उसके पापा से वादा करके आया था, अब कैसे जाएगा उनके सामने....तरह-तरह के सवाल उसके दिमाग में चल रहे थे, वह घर से निकलकर कब सड़क पर आ गया उसे पता नहीं, अब वह बेमकसद, अपने-आपसे लड़ता, अपने भीतर उठ रहे झंझावातों से लड़ता हुआ सड़क पर चलता जा रहा था.....क्या वह अपरा के बिना जी सकेगा? क्या अपरा उसकी मजबूरी समझ पाएगी? वह कैसे उसे समझाए? तरह-तरह के सवाल उसके दिल पर चोट कर रहे थे। अचानक उसे एक गेंद आकर लगी और उसकी तंद्रा भंग हो गई...
"सॉरी भइया...मेरी गेंद प्लीज़" कहते हुए एक बारह-तेरह साल का बच्चा नीलेश के सामने गेंद के लिए हाथ फैलाए खड़ा था, गेंद उसके पैर के पास पड़ी थी। उसने चौंककर इधर-उधर गरदन घुमाकर देखा तो अब तक सूरज अपना तेज समेट कर क्षितिज के अंक में समा चुका था। तिमिर गहराने लगा था; नीलेश को पार्क में बैठे काफी देर हो चुकी थी, वह अतीत की यादों में इस कदर खो चुका था कि समय का पता ही नहीं चला; इसका अहसास होते ही उसने अपनी यादों की गठरी समेटी और घर की ओर चल पड़ा।
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डी. ए. वी. पी. जी. कॉलेज के मेन गेट से दाईं ओर लगभग तीस-चालीस मीटर की दूरी पर एक पेड़ से पीठ टिकाए खड़ा था वो, वह यहाँ इसी अवस्था में पिछले लगभग एक घंटे से खड़ा था। पेड़ के पीछे उसने अपने आप को इस प्रकार छिपा रखा था कि कॉलेज से निकलने वाले हर शख्स को वह देख सके पर उस पर किसी की नजर न पड़े। अचानक गार्ड ने गेट खोला और एक लाल रंग की गाड़ी बाहर आई, ऐसे पहले भी वह कई गाड़ियों को गुजरते देखकर सावधान हुआ और फिर मायूस हो चुका था, इसीलिए इस बार उसने लापरवाही से गाड़ी की ओर देखा कि अचानक ही उसकी सारी इंद्रियाँ जाग्रत हो गईं; ड्राइविंग सीट पर अपरा को देखकर वह ऐसे उछलकर खड़ा हो गया मानो बिजली का नंगा तार छू लिया हो। वह अपनी गाड़ी की ओर लपका ताकि उसका पीछा कर सके पर अचानक ठिठक गया, अपरा के साथ संजना भी थी, जो कि उसे देख चुकी थी। उसने रोड के साइड में गाड़ी रुकवाई तब तक नीलेश उसके पास पहुँच चुका था।
"आप यहाँ?" संजना ने आश्चर्यचकित होकर पूछा।
"तुम्हें लेने आया था, तुम्हारा फोन नहीं लग रहा था तो सोचा यहीं इंतजार कर लूँ, फिर तुम्हें जाते देख रोकने के लिए ऐसे भागना पड़ा।" नीलेश ने बोलते हुए अपरा की ओर देखा, उसे लगा कि उसके चेहरे पर क्रोध या घृणा के भाव होंगे; पर वह उसके चेहरे के भाव पढ़ पाने में असक्षम रहा। वह निर्विकार उसकी ओर देख रही थी, उसके मन में क्या चल रहा था यह समझ पाना नीलेश के लिए संभव न था। वह अपराध बोध से दबा जा रहा था, परंतु इस वक्त संजना की उपस्थिति में माफी भी नहीं मांग सकता था।
संजना गाड़ी से नीचे उतर आई और अपरा को बाय बोलकर अपनी गाड़ी की ओर चल दी। अपरा ने गाड़ी स्टार्ट की और चल दी, पर नीलेश उसे वहीं खड़ा तब तक देखता रहा जब तक उसकी गाड़ी दिखाई दी, इस समय वह ये भी भूल गया कि उसकी पत्नी गाड़ी के पास खड़ी उसका इंतजार कर रही थी। वह धीरे-धीरे थके हुए कदमों से अपनी गाड़ी के पास आया और संजना को लेकर घर की ओर रवाना हुआ। अब उसके मस्तिष्क में अपरा से मिलने की नई योजना के ताने-बाने बुने जा रहे थे। वह संजना को धोखा नहीं देना चाहता, इन चार वर्षों में उसने पूरी कोशिश की थी कि संजना को भरपूर प्यार दे, परंतु वह उसे अपरा का स्थान कभी न दे पाया, वह संजना की मम्मी, उसकी भाभी और भतीजे का पूरा खयाल रखते हुए अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाता रहा है, पर संजना को वो प्यार न दे सका जिसकी वो हकदार है, इसीलिए वो काम के बहाने अधिकतर बाहर ही रहता है। अब अपरा को देखकर वो खुद पर संयम खोता जा रहा है, उससे मिलकर बात करने के लिए उतावला हो रहा है। पिछले एक हफ्ते तक वह अपनी मम्मी के पास गई हुई थी इसलिए उस समय जैसे-तैसे इंतजार में समय काट दिया, पर अब मुशकिल हो रहा था। वह अपरा के लिए ही तो अब तक रुका हुआ है, नहीं तो एनीवर्सरी के दूसरे दिन ही चला गया होता। अब उसके पास अपरा के घर जाने के अलावा कोई और उपाय न था, इसके लिए उसे उसके घर का पता लेना होगा। उसका पता तो उसे संजना ही दे सकती है, पर कैसे? सोचते हुए वह घर पहुँच गया।

स्टडी रूम में अपरा पुस्तक के पन्ने पलट रही थी परंतु पढ़ कुछ नहीं रही थी, उसके दिलो-दिमाग में बस नीलेश हावी था, उसे बार-बार संजना की बात याद आ रही थी कि उसका पति यानि नीलेश अधिकतर बाहर ही रहता है.... और दोनों का रिश्ता शायद किसी दबाव में हुआ था, संजना और नीलेश के बीच रस्मों का, सात फेरों का रिश्ता है, प्यार का नहीं। तो क्या नीलेश आज भी मुझे प्यार....छिः छिः क्या सोचने लगी मैं। ऐसी बात मेरे दिमाग में आ भी कैसे सकती है। सोचते हुए अपरा सामने खुली मैगजीन पढ़ने लगी परंतु उसके मस्तिष्क में फिर नीलेश का चेहरा घूमने लगता। तभी पास ही रखा हुआ उसका मोबाइल बज उठा, उसने देखा कोई अनजाना नम्बर था, उसने फोन उठाया...."हैलो"..
दूसरी ओर से कोई आवाज नहीं आई।
वह फिर बोली- "हैलो!"
"अपरा!" दूसरी ओर से आवाज आई।
अपरा की आवाज गले में ही रुक गई, उसका पूरा वज़ूद सूखे पत्ते सा काँप गया, उसे समझ नहीं आया कि उसकी ऐसी हालत क्यों हो रही है? वह बात कैसे करे और उससे क्या बात करे? वह कुछ समझ नहीं पा रही थी। क्या अब उसका नीलेश से बात करना ठीक होगा?
"अपरा, प्लीज़ फोन मत काटना, मैं तुमसे बात करना चाहता हूँ, क्या मिल सकती हो मुझसे?" नीलेश की आवाज आई।
"अब क्या बात करनी है नील...सॉरी नीलेश?" अपरा की आवाज में रोष के साथ-साथ शिकायत भी थी।
"प्लीज़ अपरा! एक बार मिल लो, उसके बाद चाहे कभी मेरी बात न सुनना पर आखिरी बार मुझे मेरी बात कह लेने दो, प्लीज़!" नीलेश की  बार-बार याचना सुनकर अपरा का हृदय पसीज गया।
वह बोली "ठीक है पर...." उसे समझ नहीं आया कि क्या बोले इसलिए उसने अपनी बात अधूरी छोड़ दी।
"तो मैं शाम को तुम्हारे घर आ जाऊँ?" नील की आवाज में बच्चों-सा उत्साह झलक रहा था, एक पल को अपरा भूल ही गई कि अब उसका  नीलेश से कोई रिश्ता नहीं है, उसका उत्साह और बेचैनी महसूस करके उसके होठों पर भी मुस्कान तैर गई लेकिन अगले ही पल सच्चाई का भान होते ही उसकी आँखें भर आईं। उसके मुँह से बमुश्किल निकला..."ह् हाँ"
कहकर अपरा ने फोन कट कर दिया।
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"दीदी, आपसे मिलने कोई आए हैं!" लक्ष्मी ने स्टडी-रूम का दरवाजा थोड़ा-सा खोलकर कहा।
"हाँ मैं आती हूँ, उन्हें बैठाओ।" अपरा ने कहा।
नीलेश से बात होने के बाद से वह कमरे से बाहर नहीं आई थी। उसने पुस्तकें उठाकर जगह पर रखीं और लिविंगरूम में आई। सोफे पर बैठे आगंतुक की पीठ दरवाजे की ओर थी, अपरा ने सामने आकर अभिवादन के लिए हाथ जोड़ने के लिए उठाए ही थे कि नीलेश को देखकर उसके हाथ यथास्थान रुक गए, कुछ पलों के लिए दोनों एक-दूसरे की आँखों में इस तरह खो गए कि उन्हें लक्ष्मी का कमरे में आना पता ही न चला,
"साहब जी पानी" लक्ष्मी ने कहा।
"नहीं लक्ष्मी, इन्हें हल्का सा गुनगुना पानी दो, इससे इन्हें जुकाम हो जाएगा।" अपरा बेखयाली में ही बोल पड़ी।
लक्ष्मी अचम्भित हो कर उसे देखने लगी, वहीं नीलेश को खुशी हुई कि अपरा को अब भी उसकी फिक्र है, उसे अब भी सब कुछ याद है। प्रत्यक्ष में उसने कहा- "हाँ मैं ठंडा पानी नहीं पीता।"
लक्ष्मी चली गई। अपरा सामने ही बैठ गई, वह चुप थी मन में न जाने कितने सवाल और शिकायतें बार-बार उभरते, कंठ तक आते और जिह्वा तक आते-आते दम तोड़ देते; वह चाहकर भी कुछ नहीं बोल पा रही थी।
"कुछ बोलोगी नहीं अपरा?" नीलेश ने कहा।
"क्या बोलूँ?" वह इस प्रकार बोली मानो कहना चाहती हो कि तुमने बोलने लायक ही कहाँ छोड़ा।
"कुछ नहीं तो शिकायत ही करो, मुझे कोसो, डाँटो कुछ तो कहो; तुम्हारा अपराधी हूँ मैं।" नीलेश बोला।
लक्ष्मी पानी रखकर चुपचाप चली गई।
"कुछ भी कहने का कोई फायदा है मिस्टर नीलेश?" अपरा की आवाज तल्ख़ हो गई।
"तुम मुझे सिर्फ नील कहो प्लीज़, इतना अधिक परायापन मैं सह नहीं पाऊँगा।" दुख की परछाई नीलेश की आवाज के साथ-साथ उसकी आँखों में भी तैर गई।
"तुम मेरे अपने तो कभी थे ही नहीं नीलेश, मैं ही भ्रम में जी रही थी, खैर भ्रम का परदा तो कब का छँट गया, अब मैं जागृत अवस्था में हूँ। आज मैं तुमसे बात भी इसलिए कर रही हूँ क्योंकि तुम मेरी सहेली के पति हो।" अपरा को अपनी ही आवाज किसी गहरे कुएँ से आती महसूस हो रही थी, वह समझ नहीं पा रही थी कि वह चाहकर भी खुद को सामान्य क्यों नहीं रख पा रही थी? क्यों वह अपने-आप को इतनी कमजोर महसूस कर रही थी?
"ठीक है अपरा, फिर अपनी सहेली के पति के नाते ही सही, तुम मेरी मज़बूरी सुन लो; फिर मुझे माफ करना या न करना तुम्हारे ऊपर है, प्लीज़!" नीलेश लगभग गिड़गिड़ा ही तो पड़ा था।
"ठीक है, कहो, मैं भी तो सुनू कौन-सी मजबूरी थी तुम्हारी!" अपरा ने कहा।
नीलेश ने एक गहरी सांस ली और अपरा को अपने पापा के हार्ट-अटैक से लेकर अपनी शादी तक की सभी बातें विस्तार से बता दी। अपरा की आँखों से लगातार आँसुओं की बरसात होती रही। लक्ष्मी कब चाय रखकर चली गई थी दोनों को याद नहीं।
"मैंने उत्तरदायित्व निभाने के लिए शादी तो कर ली अपरा, पर आज तक मैं तुम्हारी जगह संजना को नहीं दे सका, वो बहुत अच्छी है, कभी कोई शिकायत नहीं करती पर फिर भी है तो इंसान ही न! उसके भी अरमान होंगे। मैं अपराधबोध से दबा रहता हूँ, तुम्हारा भी अपराधी हूँ और संजना का भी।"
"पर तुम्हें चाहे फोन करके ही सही, बताना तो चाहिए था नील! संजना ने शिकायत तो की पर उसे ही अपनी यह शिकायत बेजान लगी। क्या वैसी परिस्थिति में वो बता सकती थी? शायद...नहीं।
"कैसे बताता मैं अपरा....मुझमें इतना साहस नहीं था। मैं आइना देखते हुए भी घबराता था, जब भी आइने के सामने खड़ा होता तो खुद की शक्ल से नफरत सी होती थी।" नीलेश के चेहरे पर पश्चात्ताप के भाव साफ देखे जा सकते थे साथ ही आँखों में सुकून भरी खुशी जो शायद इस अनुमान के कारण थी कि अपरा अब उसे क्षमा कर देगी या शायद इस विचार से कि अब वह अपरा के नजदीक रह सकेगा।
नीलेश! बीती बातों को भूल जाओ, संजना बहुत अच्छी है उसे उसके हिस्से के प्यार से महरूम मत करो.....
न् नील! अचानक आई इस आवाज को सुनकर नीलेश ऐसे खड़ा हो गया मानों बिजली का नंगा तार छू लिया हो.. अपरा को लगा कि उसके कानों को धोखा हुआ है, मुड़कर पीछे देखा तो दरवाजे पर संजना खड़ी थी, आँखों से झरते आँसू सब कुछ बयाँ कर रहे थे.....
#मालतीमिश्रा

2 comments:

  1. मालती जी कहानी के दोनों भाग पढ़े मैंने बेहद उम्दा लिखती है आप...लाज़वाब...हम तो सब भूलकर कहानी के पात्रों को जीने लगे..रिश्तों का ताना-बाना बुनती बेहद हृदयस्पर्शी कहानी आपकी👌👌👌

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    1. श्वेता जी दिल से आभार व्यक्त करती हूँ कि आपने अपना कीमती समय निकाल कर कहानी पढ़ी और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत करवाया। आपकी टिप्पणी से निःसंदेह मेरा उत्साह बढ़ा है, आगे भी इसी प्रकार अफनी प्रतिक्रिया देती रहें। सादर अभिनंदन🙏

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