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Tuesday, 9 January 2018

'माँ' तो बस माँ होती है।
संतान हँसे तो हँसती है
संतान के आँसू रोती है,
अपनी नींद तो त्याग दिया
संतान की नींद ही सोती है
'माँ' तो बस 'माँ' होती है।

संतान की पहचान बनाने में
अपना अस्तित्व जो खोती है
उसके भविष्य की ज्योति में
अपना अाज जलाती है
खुद के सपने त्याग के वो
संतान के स्वप्न संजोती है
'माँ' तो बस माँ होती है।

घने पेड़ की छाया से भी
अधिक शीतल माँ का आँचल
कष्टों के निष्ठुर घाम में भी वह
ममता से ढक लेती है
सूखे बिस्तर पर पुत्र सुलाती
खुद गीले में सोती है
'माँ' तो बस माँ होती है।
#मालतीमिश्रा

13 comments:

  1. शुभ संध्या सखी
    बेहतरीन....
    माँ बस माँ होती है
    माँ की कोई उपमा नही हो सकती
    सादर

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद सखी🙏 शुभ संध्या

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 11-01-2018 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2845 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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    1. धन्यवाद दिलबाग विर्क जी

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना सोमवार १२जनवरी २०१८ के ९१० वें अंक के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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    1. रचना को इस योग्य समझने और सूचित करने के लिए आभार श्वेता जी।

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  4. Replies
    1. बहुत-बहुत आभार नीतू जी, ब्लॉग पर स्वागत है आपका।

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  5. Replies
    1. हार्दिक आभार रितु जी, ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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  6. भावपूर्ण शब्द ...
    सच में माँ के आगे कोई नहीं है ... माँ ही सबसे ज्यादा अपने बच्चे को समझ सकती है ...

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    1. उत्साहवर्धन के लिए हृदय से आभार सर।🙏

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