शनिवार

अरु..भाग-६ (१)

 


गतांक से आगे..

उसकी चीख सुनकर अस्मि भागती हुई आई। उसने देखा सौम्या मेज के ऊपर बेसुध पड़ी है, बाल बिखरे हुए थे, उसके हाथ में पेन था और मेज पर तथा नीचे फर्श पर बहुत सारे पन्ने बिखरे पड़े थे। अलंकृता उसे झिंझोड़कर उठाने की कोशिश कर रही थी, अस्मि को देखकर उससे पानी लाने के लिए बोली। वह भागकर पानी ले आई, अलंकृता ने पानी छिड़क कर उसे होश में लाने का प्रयास किया। धीरे-धीरे उसकी चेतना लौटने लगी और वह उठकर बैठ गई लेकिन उसकी आँखों में दिखाई देने वाले सूनेपन से कृति काँप गई।

वह दोनों बच्चों को ऐसे देख रही थी जैसे अजनबी हों। अस्मि के पुकारने पर उसकी ओर ऐसे देखा जैसे कुछ सुना ही नहीं। दोनों उसे पकड़कर बेडरूम में लाए और लिटा दिया। घबराई हुई अलंकृता ने अनिरुद्ध को फोन करके सारी बात बता दी। अनिरुद्ध ने उसे समझाया कि वह किसी पड़ोसी से वहाँ के किसी डॉक्टर का पता करके उसे घर पर बुला ले और वह तुरंत वापस आ रहा है। 

दो महीने हो गए, अनिरुद्ध ने सौम्या को अच्छे से अच्छे डॉक्टर को दिखाया पर उसकी दशा में जरा भी सुधार नहीं हुआ। वह पूरा दिन निश्चेष्टता की स्थिति में बैठी शून्य में निहारती रहती। लाख कोशिशों के बाद भी किसी को नहीं पहचानती। इतना ही नहीं सभी के हरपल ध्यान रखने के बावजूद पता नहीं कब जाती लेकिन रोज सबेरे स्टडी रूम में उसी अवस्था में मिलती थी, बेसुध सी, हाथ में पेन पकड़े और आसपास ढेर सारे पन्ने बिखरे हुए। अलंकृता ने एक फाइल बना ली और वे सारे पन्ने सहेजती जा रही थी। अनिरुद्ध ने सौम्या को अस्पताल में भर्ती करवा दिया और बच्चों की देखरेख के लिए रेणुका को उनकी केयर टेकर बनाकर  बंगले में ले आया। परंतु उसे कहाँ पता था कि रेणुका को यह घर रास नहीं आने वाला था। एक सप्ताह भी नहीं बीते थे, रेणुका को न जाने क्या हुआ वह कभी अनिरुद्ध से झगड़ने लगती, कभी बच्चों को डाँटती तो कभी गुस्से में सामान उठाकर फेंकने लगती। बच्चे जो कभी उसके साथ इतने प्यार से घुल-मिल कर रहा करते थे, उसका यह रूप देखकर भय से आशंकित रहने लगे। आखिर परेशान होकर एक दिन अलंकृता ने कह ही दिया, "डैड हम अपनी और अपनी मम्मी की देखभाल खुद कर सकते हैं, आप प्लीज इन्हें इनके घर छोड़ आइए। इन्हें पता नहीं क्या हो गया है, कहीं ऐसा न हो कि ये गुस्से में हममें से ही किसी के साथ कुछ अनिष्ट कर दें।" 

रेणुका के व्यवहार से अनिरुद्ध भी बहुत निराश और आश्चर्यचकित था, उसे अलंकृता की बात सही लगी और वह रेणुका को वापस उसके घर छोड़ आया। अब उसे जब भी उससे मिलना होता तो उसी के घर चला जाता था परंतु रेणुका के मन में न जाने कौन सा भय समा गया था कि उसने उस घर में आना बंद कर दिया।

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17 वर्ष बाद

क्रमशः

चित्र साभार गूगल से

मालती मिश्रा 'मयंती'

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2 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामी29 जुलाई, 2023

    अत्यंत रोचक! अगली कड़ी की प्रतीक्षा कर रही हूँ! - गीतांजलि

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    1. उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद सखी।

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