मंगलवार

चेहरों के उतरते नकाब

चेहरों के उतरते नकाब....

मन की बात कह-कह हारे
पर मुफ्त खोर अब भी हाथ पसारे।
कालेधन पर किया स्ट्राइक
फिर भी पंद्रह लाख गुहारे।
काला हो या श्वेत रूपैया
इनको बस है नोट प्यारे।
भ्रष्टाचार मिटाएँगे
सबको स्वराज दिलाएँगे।
लोकतंत्र को रोपित करने
आए थे धरनों के मारे।
लक्ष्य समक्ष आया इनका
कैसे जनता को भरमाएँ,
उल्लू अपना सीधा करने को
भिन्न-भिन्न आरोप लगाएँ।
आरोपों के चंदों से
भरते रहे खजाने सारे,
नोटबंदी की मार पड़ी तो
कहाँ जाएँ और किसे पुकारें।
चोर-चोर मौसेरे भाई
फिर क्यों न इक-दूजे को उबारे,
थामा एक-दूजे का दामन
जनता को बरगलाने चले हैं सारे।
जनता अब इतनी मूर्ख नही
समझ रही है पैंतरे सारे,
सरकार के एक कठोर कदम ने
उतार दिए नकाब तुम्हारे।
जनता पशेमान है
पर ज्यादा हैरान है,
कल तक भ्रष्टाचार मिटाने वाले
आज भ्रष्ट उनका ईमान है।।
मालती मिश्रा


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3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 24.11.2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2536 पर दिया जाएगा
    धन्यवाद

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    उत्तर
    1. रचना को चर्चा मंच पर शामिल करने के लिए बहुत-बहुत आभार दिलबाग जी।

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    2. रचना को चर्चा मंच पर शामिल करने के लिए बहुत-बहुत आभार दिलबाग जी।

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