शनिवार

राजनीति का शिकार.."किसान"


जिस प्रकार माता-पिता जीवन की हर कठिनाइयों का सामना करते हुए नाना प्रकार के मुश्किलों से बचाते हुए अपनी संतान का पालन-पोषण करते हैं, स्वयं भूखे रहकर अपनी संतान की आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयास करते हैं उसी प्रकार किसान अपनी फसल की देखभाल, उसका पालन-पोषण करता है। वह मौसम की हर मार से उसे बचाने का प्रयास करता है। पूस-माघ की कड़कड़ाती सर्दी में भी यदि उसे आभास हो कि सुबह पाला पड़ने वाला है तो उस पाले से अपनी फसल को बचाने के लिए वह हड्डियाँ गलाने वाली सर्दी की परवाह किए बिना रात को खेतों में पानी भरता है ताकि सुबह का पाला उसकी फसल खराब न कर सके। उस भयंकर सर्दी में भी वह फसल की रखवाली के लिए घर की छत का आनंद छोड़कर खेतों में पड़ी टूटी-फूटी झोपड़ी में सोता है। जब वह अंकुर निकलते देखता है तो इस प्रकार प्रसन्न होता है जैसे एक पिता अपने पुत्र को पहली बार देखकर प्रसन्न होता है। लहलहाती फसल को देखकर उसकी छाती उसी प्रकार गर्व से फूल जाती है जिसप्रकार अपने पुत्र की तरक्की से एक पिता की। जब फसल पककर तैयार हो जाती है और किसान उसे काटकर घर ले आता तब कहीं वह सुकून की साँस लेता है। खेत की जोताई, बीज रोपाई, सिंचाई ,फसल की खाद आदि के लिए वह न जाने कितनी नींदें और कितने समय का भोजन भी त्याग देता है; ऐसी कठोर मेहनत और त्याग से तैयार फसल को यदि उसे बर्बाद करना पड़े तो क्या वह कभी भी किसी भी कीमत पर तैयार होगा?
क्या कोई अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए अपनी संतान को नुकसान भी पहुँचा सकता है? हाँ यह हो सकता है कि किसी प्रलोभन के वशीभूत होकर वह सस्ते में बेच दे और खरीदने वाला उसको पैरों तले रौंदता हो और सड़कों पर बहाता हो।

किसान बहुत ही सरल स्वभाव का होता है, यह सही है कि राजनीतिक लोग उसके भोलेपन का फायदा उठाते हैं परंतु अपने भोलेपन में वह हिंसक नहीं हो सकता, अपने भोलेपन में वह अपनी मेहनत को दान कर सकता है परंतु उसे सड़क पर बहाकर उसे पैरों से रौंद नहीं सकता, अपने भोलेपन में वह किसी जलते घर में दूसरों की जान बचाने के लिए कूद कर अपनी जान दे सकता है परंतु खुद बसों में आग लगा कर लोगों को मरने नहीं दे सकता। यह जरूर हो सकता है कि दंगा भड़काने वाले तत्वों द्वारा ही उनकी सब्जियों और दूध को खरीद कर सड़कों पर बहाया और रौंदा गया हो। खेतों में पसीना बहाने वाला किसान कभी अपने पसीने की कमाई को ऐसे नष्ट नहीं करेगा।
आंदोलन का यह गैर वाज़िब रूप और यह हिंसात्मक रूप निःसंदेह इस आंदोलन पर सवाल उठाता है।

किसान परिश्रम करके सिर्फ अपना ही नहीं पूरे देश का पेट भरता है तो उसके फसल का वाज़िब दाम पाना उसका अधिकार है और सरकार को भी चाहिए कि ऐसी स्थिति ही न उत्पन्न हो कि किसी को देश के अन्नदाता के नाम पर अराजकता फैलाने का अवसर मिले।
निःसंदेह किसानों को आंदोलन के नाम पर बुलाया गया और प्रारंभ में किसान शांतिपूर्वक आंदोलन कर रहे थे किंतु कुछ राजनीतिक पार्टियों के नेताओं की अगुवाई में इस आंदोलन को एक उग्र रूप दिया गया ताकि मौजूदा सरकार की छवि खराब की जा सके।

राजनीति के कुचक्र का शिकार हमेशा देश की सीधी-सरल जनता होती है, कभी धर्म और मज़हब के नाम पर दंगे-फसाद, कभी दलित-सवर्ण के नाम पर दंगे-फसाद तो कभी भोलेभाले किसानों को शिकार बनाया जाता है। चंद किसानों को बहका कर एकत्र करके उनमें अपने खरीदे हुए अराजक तत्वों को मिलाकर आंदोलन के नाम पर दहशत-गर्दी फैलाई जाती है ऐसे में गोलियाँ भी चलती हैं और गोली का शिकार होता है बेचारा किसान...

राजनीति के गिरते स्तर को पहचानकर स्वयं को उनका मोहरा बनने से बचाना अब देश की जनता की ही जिम्मेदारी है और किसानों की आड़ में पत्थर बाजों, लुटेरों, दंगाइयों को मौका न देकर उनके हौसले पस्त करना भी आम नागरिकों का भी कर्तव्य है। कम से कम हम इतना को कर ही सकते हैं कि खुद को ऐसे अराजक तत्वों का शिकार न बनने दें।
मालती मिश्रा

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