शुक्रवार

एक खामोश वापसी की कहानी

 


नया साल, नया कमबैक: एक ख़ामोश वापसी की कहानी

नया साल सिर्फ़ तारीख़ बदलने का नाम नहीं है,

यह खुद से दोबारा मिलने का

अवसर है।

कुछ साल, कुछ महीने या कुछ दिन—

ऐसे होते हैं जब हम भीतर से थक जाते हैं।

लिखना छूट जाता है,

सपने धुंधले हो जाते हैं,

और हम धीरे-धीरे खुद से दूर हो जाते हैं।

मैं भी उसी ख़ामोशी से गुज़री हूँ।

लेकिन नया साल मुझे याद दिलाता है—

कमबैक हमेशा शोर से नहीं होता,

कभी-कभी वह बहुत शांत होता है।

कमबैक मतलब क्या?

कमबैक का मतलब यह नहीं कि

आप सबको दिखाएँ कि आप कितने मजबूत हैं।

कमबैक का मतलब है—

फिर से कलम उठाना

फिर से अपने शब्दों पर भरोसा करना

और खुद से कहना: “मैं अभी ख़त्म नहीं हुई हूँ।”

नया साल, नई शुरुआत नहीं—नई हिम्मत

हर साल नई शुरुआत नहीं लाता,

लेकिन हर साल नई हिम्मत ज़रूर देता है।

इस साल मैं वादा करती हूँ—

ज़्यादा लिखूँगी, पर खुद पर ज़ोर नहीं डालूँगी

अपनी रफ़्तार से चलूँगी

और अपनी आवाज़ को दबने नहीं दूँगी

मेरा ब्लॉग—मेरी वापसी का घर

अंतर्ध्वनि मेरे लिए सिर्फ़ एक प्लेटफ़ॉर्म नहीं,

वह जगह है जहाँ मेरे शब्द सुने जाते हैं।

और मेरा ब्लॉग—

वह मेरा निजी कोना है,

जहाँ मैं बिना डर के खुद को लिख सकती हूँ।

इस नए साल पर

मैं किसी ट्रेंड के लिए नहीं,

किसी लाइक के लिए नहीं—

खुद के लिए लिखने वापस आई हूँ।

अगर आप भी रुक गए थे…

तो यह लेख आपके लिए है।

अगर आप भी कहीं रुक गए थे,

थक गए थे,

या खुद को भूल गए थे—

तो जान लीजिए:

कमबैक की कोई आख़िरी तारीख़ नहीं होती।

नया साल सिर्फ़ एक बहाना है,

वापसी का फ़ैसला तो दिल करता है।

यह एक प्रयास है खुद से मिलने का

इस उम्मीद के साथ 

कि फिर से लड़खड़ाना नहीं है

रुकना नहीं है

भले ही गति धीमी हो

पर चलते रहना जरूरी है।

मालती मिश्रा 'मयंती' ✍️ 



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