बुधवार


ऐ जिंदगी पहचान करा दे मुझसे तू मेरी
खुद को ढूँढ़ते एक उम्र कटी जाती है।

मैं कौन हूँ, क्या हूँ, मेरा अस्तित्व क्या है खुदाया
खोजने के जद्दो-ज़हद में खुद को मिटाए जाती हूँ।

रिश्तों के चेहरों में ढका वजूद मेरा इस कदर
आईने में अपना अक्श भी अंजाना नजर आता है।

पहचान अपनी पाने की कोशिशें जो की मैंने या रब
जमींदोज़ मुझे करने को ज़माना नजर आता है।
मालती मिश्रा

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5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत-बहुत आभार दिलबाग विर्क जी

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  2. बहुत-बहुत आभार दिलबाग विर्क जी

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  3. Bhut achhi kavita likha hai apne, is kavita ko book ka roop dene ke liye hme visit kre:https://www.onlinegatha.com/

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    1. ब्लॉग पर पधारने के लिए धन्यवाद, पुस्तक प्रकाशन हेतु अवश्य संपर्क करूँगी।

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    2. ब्लॉग पर पधारने के लिए धन्यवाद, पुस्तक प्रकाशन हेतु अवश्य संपर्क करूँगी।

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