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Saturday, 14 January 2017

कसम


कसम....
रसोई में काम करते-करते अचानक ही दिव्या चौंक पड़ी उसके हाथ से प्लेट छूटते-छूटते बची, वह बच्चों के कमरे की ओर भागी जहाँ से सनी के चीखने की आवाज आई थी....मम्मीzzzzzz 
क्या हुआ???  कहते हुए कमरे में पहुँची और एकदम से ठिठक गई....दोनों बच्चे सनी और महक एक दूसरे से लड़ते हुए गुत्थम-गुत्था हो रहे थे, सनी ने महक की चोटी पकड़ रखी थी और महक सनी के एक हाथ की मुट्ठी को अपने दोनों हाथों से खोलने की नाकाम सी कोशिश कर रही थी। 
"मम्मा देखो सनी ने चोरी की" दिव्या को देखते ही महक ने सनी की मुट्ठी छोड़ते हुए शिकायत की।
सनी ने भी झटके से चोटी छोड़ दी और दौड़कर मम्मी से लिपट गया। "नहीं मम्मी मैने चोरी नहीं की" सनी ने मासूमियत से कहा।
"क्या चीज है मुझे दिखाओ, आप तो अच्छे बच्चे हो न!" दिव्या ने घुटनों पर बैठते हुए सनी के दोनो बाजू पकड़ कर प्यार से कहा।
"मम्मा मैने चोरी नहीं की।" सनी ने अपनी बात पर जोर देते हुए बड़े ही भोलेपन से कहा।
"नहीं मम्मा आप देखो तो ये ट्वाय इसका नहीं है, कल तक इसके पास नहीं था।" महक ने जल्दी से सनी का वो हाथ आगे करते हुए कहा जिसमें सनी ने मुट्ठी में कुछ पकड़ रखा था।
"एक मिनट..एक मिनट मैं देख रही हूँ बेटा, और महक! बेटा आप बड़ी हो न! तो छोटे भाई से ऐसे लड़ते नहीं, उसे समझाते हैं।" 
"जी मम्मा, सॉरी" नन्ही महक ने कान पकड़ कर बड़े ही भोलेपन से कहा, जैसे सचमुच ही वो कितनी बड़ी हो जबकि वो सात साल की थी और सनी पाँच साल का।
"दैट्स लाइक ए गुड गर्ल" दिव्या ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा।
"ओ के नाउ योर टर्न माय ब्वाय, दिखाओ तो क्या है आपकी जादुई मुट्ठी में?" दिव्या ने प्यार से सनी के गालों को पकड़ कर कहा।
सनी ने अपना हाथ आगे करके मुट्ठी खोल दी....उसकी हथेली पर एक छोटा सा खिलौने वाला जहाज था जिसके पुर्जे जोड़कर बनाया गया था। "मम्मा ये मैंने चुराया नहीं है, ये मेरे फ्रैन्ड ने दिया है सच्ची।" सनी ने मासूमियत से कहा।
"झूठ बोल रहा है, खा मम्मी की कसम!" महक तुनककर बोली।
"मम्मा की कसम मैं झूठ नहीं बोल रहा।" सनी ने रुआँसी सी आवाज में कहा जैसे कि कसम खाते हुए उसे कितना जोर पड़ रहा हो पर शायद उससे कहीं अधिक दर्द दिव्या को हुआ उसने सनी को सीने से लगा लिया और प्यार से उसकी पीठ सहलाने लगी, उसकी आँखों में न जाने कौन सा दर्द आँसू बन झिलमिलाने लगा।
"नहीं बेटा कसम खाने की कोई जरूरत नहीं, मम्मी तो आप लोगों की बात वैसे ही मानती है, मुझे पता है कि मेरे बच्चे मुझसे झूठ नहीं बोलते, आप दोनों ध्यान रखना एक-दूसरे पर विश्वास किया करो, कोई झूठ नहीं बोलेगा और आगे से कभी एक-दूसरे को कसम खाने को नहीं कहोगे।" दिव्या ने महक की ओर देखते हुए कहा।
"जी मम्मा" दोनों बच्चे बोले, सनी भी ऐसे खुश हो गया मानो उसकी बात पर विश्वास कर लेने से वह निरपराध घोषित कर दिया गया और अब उसके मन पर कोई बोझ नहीं।
दिव्या दोनों को खुश देखकर मुस्कुराते हुए वापस किचन में आ गई, वह अपने काम में लग गई किंतु उसके दिमाग में फिर से एक द्वंद्व सा छिड़ गया.... 'कसम'... क्यों लोग बिना कसम खाए किसी की बातों पर विश्वास नहीं करते? और क्यों कभी-कभी लोग कसम खाने वाले पर भी विश्वास नहीं करते? क्यों कुछ लोगों की बातों का आरंभ और अंत दोनो ही कसम से होता है और क्यों किसी-किसी को कसम खाने में बहुत जोर पड़ता है। यह कसम खाना भी हर किसी के लिए आसान नहीं होता और किसी-किसी के लिए बिल्कुल भी मुश्किल नहीं होता अभी कल शाम की ही तो बात है जब उसकी जेठानी अपनी सास की शिकायत बताते हुए रो पड़ीं और कसम खाने हुए बोलीं कि "अगर मैं झूठ बोल रही हूँ तो तुम मेरा मरा मुँह देखो।" दिव्या को तब भी अजीब असहजता महसूस हुई थी उसके मन में आया कि बोल दे कि "भाभी जी मैं आपकी सारी बातें मानती हूँ आपको कसम खाने की जरूरत नहीं है।" पर वह बोल न सकी थी। आज वही कसम की काली परछाई उसके बच्चों पर पड़ने लगी थी, वह ऐसा नहीं होने देगी, अपने बच्चों को इस काली और अविश्वास की परछाई से दूर ही रखेगी। उन्हें कसम के उस दर्द से नहीं गुजरने देगी जो उसने सहन किया। उन्हें सिखाएगी कि वह हमेशा सच बोलें यदि उन्होंने गलत किया है तो उसे स्वीकारें और यदि गलत नहीं किया तो सिर्फ सत्य कहें अपनी सच्चाई को साबित करने के लिए कसम न खाएँ क्योंकि यह कसम अलग-अलग व्यक्ति के लिए अलग-अलग महत्व रखता है। झूठ बोलकर अपने को सही सिद्ध करने के प्रयास में हर बात पर कसम खाने वालों के लिए यह शब्द बहुत हल्का और महत्वहीन होता है और जो व्यक्ति हमेशा सच बोलता हो कभी मजबूरीवश अपनी सत्यता सिद्ध करने के लिए यदि वह कसम खा ले और फिर भी उसका विश्वास न किया जाए तो वह उस अनचाहे खाए गए कसम के बोझ को पूरी जिंदगी अपने दिल पर ढोता है और हर पल इसी पश्चाताप में रहता है कि क्यों उसने कसम खाई? क्यों नहीं अपनी बात कहकर परिणाम सामने वाले पर छोड़ दिया? क्यों स्वयं की सत्यता सिद्ध करने के लिए कसम का बोझ अपने सीने पर लादा? 
दिव्या ने हाथ धोए और तौलिए से पोछती हुई किचन से बाहर आ गई। तौलिया जगह पर रखकर वह सोफे पर बैठ गई उसके मस्तिष्क में अतीत की कड़वाहटें हिलोरें मारने लगीं.... उस समय सनी मात्र एक साल का था जब विनीत उसे महक और सनी के साथ अपने मम्मी-पापा के पास छोड़ आया था ताकि वह एक-डेढ़ महीना उनके साथ रह लेगी उसके मम्मी-पापा की उनके पोते-पोती के साथ न रह पाने की शिकायत भी दूर हो जाएगी। विनीत दिल्ली आ गया था मम्मी-पापा और उनका बड़ा बेटा उस समय बड़ी बहू की विदाई के लिए गाँव गए हुए थे। घर पर दिव्या और उसकी पाँच ननदें थीं, सभी बहने विनीत से छोटी थीं लिहाजा इस समय घर में सबसे बड़ी दिव्या ही थी परंतु घर की मालकिन इस समय उसकी ननद गुड़िया थी जो कि ननदों में सबसे बड़ी और एक बच्ची की माँ थी। गुड़िया की अनुपस्थिति में उससे छोटी बहन रेनू का मालिकाना हुकुम चलता, परंतु वह थोड़ी समझदारी और नम्रता से काम करती, शायद बड़ों के प्रति आदर का भाव उसमें अधिक था। बाकी बहने छोटी थीं वो सबकी बातें मानती थीं पर अपनी बड़ी बहन गुड़िया से डरती थीं इसलिए उसके सामने उसके खिलाफ कुछ नहीं बोल सकती थीं, रेनू का लगाव गुड़िया से अधिक था परिणामस्वरूप वह भी उसके समक्ष कोई ऐसा कार्य या बात नहीं करती जिससे उसको बुरा लगे या वह दुखी हो। दिव्या घर के इस चलन और माहौल से पूरी तरह वाकिफ थी परंतु उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था, वह सबके साथ मिलजुल कर रहती, उसका मानना था कि कुछ दिनों के लिए आती है तो अपना बड़प्पन इसी में है कि जो जैसे चल रहा हो चलने दे यदि ननदों को घर में छोटी-बड़ी चीजों की मालकिन बनाया हुआ है, मम्मी-पापा तक उनसे ही सलाह-मशविरा करते हैं तो इसमें मेरा क्या नुकसान। इस समय भी मम्मी-पापा और बड़े भइया-भाभी (जेठ-जेठानी) की अनुपस्थिति में भी दिव्या भी हर काम गुड़िया और रेनू की सहमति से उनके साथ मिलजुल कर करती, वो भी उस पर हुकुम नहीं चलाती थीं, शायद यही सोचकर कि वह कुछ समय के लिए आई है। परंतु दिव्या को कई बार ऐसा महसूस होता कि ये बहने आपस में बात करतीं
और उसको देखते ही चुप हो जातीं या बात बदल देतीं, वह सबकुछ समझते हुए भी अंजान बनकर उनके साथ ही घुल-मिल जाती, उसका दिल भी दुखता कि किस प्रकार ये लोग उसे परायेपन का अहसास करवाती हैं परंतु वह अनदेखा कर देती। 
घर में गाय थी जो रोज दूध देती थी उस समय मम्मी-पापा और बड़े भइया गाँव गए हुए थे तो सुबह-शाम दूध निकालने की जिम्मेदारी घर में रह रहे उस किराएदार  की थी जिन्हें मम्मी-पापा के अलावा सभी सम्मान से चाचा जी कहते थे। वो रोज दूध निकाल देते फिर गुड़िया उसमें से एक-डेढ़ किलो दूध अपनी बेटी के लिए, चाय बनाने और सुबह महक के पीने के लिए  निकाल लेती बाकी बचे दूध को उपलों की आग पर रख देती वो पूरे दिन धीमीं आँच पर मिट्टी के बर्तन में पकते-पकते लालिमा लिए सुनहरा होने लगता फिर रात को उसमें एक चम्मच दही जामन के रूप में डाल देती और सुबह उस दही को बेच देती। घर के आस-पास किसी अन्य के पास गाय या भैंस नहीं थी इसलिए दही या दूध की डिमांड रहती थी। परिवार में इतने सदस्य थे कि यदि एक-एक गिलास दूध सभी पीते तो दूध खत्म हो जाता परंतु गुड़िया दूध सिर्फ अपनी बेटी के पीने के लिए रखती थी चाय सिर्फ सुबह और शाम को बनती थी उसमें भी दूध नाम मात्र को पड़ता था। दिव्या क्योंकि कुछ दिनों के लिए ही रुकी हुई थी इसलिए उसकी बेटी महक को सुबह एक बार दूध पीने को दे दिया जाता था हालाँकि महक और गुड़िया की बेटी की उम्र में महज दो माह का अंतर था, सनी तो सिर्फ माँ का दूध पाता था फिर भी दिव्या ने कभी नहीं कहा कि क्यों गुड़िया की बेटी की भाँति महक को भी दिन में भी दूध दिया जाता, वह देखती कि बड़े भइया की बेटी भी छोटी है फिर भी उसके लिए भी दूध नहीं रखा जाता महक को तो फिरभी एकबार मिल जाता था। वह कई बार जब महक को दूध देती तो चुपचाप उसी दूध में से आधा जेठ की बेटी को भी दे देती। दिव्या ने एकबार कहा भी "गुड़िया! दूध-दही उतना ही बेचा करो न जितना घर के बच्चों के खाने पीने के बाद बचे, या एक टाइम का बेच लो दूसरे टाइम का घर के लिए रख लो।" 
यह बात गुड़िया को बड़ी नागवार गुजरी थी, उसने बड़े ही तल्खी से जवाब दिया था "आपको क्या पता घर की जरूरत, अब गाय के चारे का खर्च भी नहीं निकलेगा तो गाय रख भी नहीं पाएँगे।" दिव्या के मन में आया कि बोल दे कि जब घर के बच्चों को ही दूध-दही के लिए तरसना पड़े तो क्या फायदा गाय-भैंस रखने का? और यदि कंजूसी ही करनी है तो अपनी बेटी के लिए भी करो बाकियों के लिए ही क्यों? पर वह बोल नहीं सकी थी।
सुबह के नौ-दस बज रहे होंगे सभी अपने-अपने काम में व्यस्त थे, दिव्या किचन में सबके लिए नाश्ता बना रही थी दो बहने मिलकर झाड़ू और पोछे का काम कर रही थीं एक बहन रात के बर्तन माँज रही थी, रेनू उपले की आग जलाकर उसपर दूध रख रही थी तभी दिव्या ने कहा- "मुझे मिट्टी के बर्तन में रखा हुआ दूध जो पककर लाल हो जाता है बचपन से बहुत पसंद है पर ये तभी मिलता था जब गाँव जाती थी, दादी मेरे लिए रोज दूध निकाल देतीं फिर ठंडा करके पिलाती थीं।" 
"तो अब कौन सी पहुँच से बाहर की बात है, दूध भी है घर में मिट्टी का बर्तन भी और उपले की आँच भी। रोज ही तो गरम होता है, आप आज ही पी लेना।" रेनू ने कहा। दिव्या जानती थी कि यही रेनू का असली स्वभाव है उसमें बनावटीपन बिल्कुल भी नहीं है।
उसने कहा- "ठीक है तो तुम आज दोपहर को निकाल देना।"
"ठीक है।" रेनू ने कहा।
फिर दोनों अपने-अपने काम में व्यस्त हो गईं। दोपहर को जब सभी काम खत्म करके दोपहर का खाना आदि खा-पी कर फ्री हो गए तो बड़े कमरे में सभी लेटकर टी०वी० देख रहे थे और दिव्या की दो छोटी ननदें, जेठ की दो बेटियाँ, बड़ी ननद यानि गुड़िया की बेटी एक छोटे कमरे में खेल रही थीं, महक भी वहीं थी दिव्या ने सोचा कि क्यों न महक को सुला दे इसलिए वह उसे लेने गई तभी जिस कमरे में बच्चे खेल रहे थे उसी कमरे के बाहर उपलों की आँच पर रखा दूध देखकर दिव्या को याद आ गया कि उसे दूध निकालना है, उसने रेनू को आवाज लगाई। रेनू वहाँ आई तो दिव्या ने कहा-"प्लीज एक गिलास दूध निकाल दो न! एक-दो घंटे में ठंडा हो जाएगा तो शाम को चाय के टाइम पर मैं दूध ही पीऊँगी।" 
"अरे भाभी आप ही निकाल लो न, मैं निकालूँ या आप क्या फर्क पड़ता है।" रेनू ने कहा।
"ठीक है, मैं ही निकाल लेती हूँ" कहकर दिव्या ने एक गिलास में दूध निकाल कर बाकी दूध ज्यों का त्यों ढक दिया। दूध लेकर वह किचन में रखने गई तभी देखा कि उसकी सबसे छोटी ननद जो कि छः-सात साल की थी किचन में से गुड़िया की बेटी के लिए रखे दूध के पतीले में से दूध निकाल रही थी। "क्या कर रही हो अनी?" उसने पूछा।
"भाभी हम लोग घर-घर खेल रहे हैं, मैं खीर बनाने के लिए दूध ले रही हूँ।" अनी ने कहा।
यदि मैंने ये दूध यहाँ रखा तो ये बच्चे इसे खेल-खेल में ही खत्म कर देंगे, ऐसा सोचकर दिव्या ने दूध जिस कमरे में बच्चे खेल रहे थे उसी कमरे में टाँड पर रख दिया जो कि ऊँचाई पर बच्चों की पहुँच से दूर था। और टी०वी० वाले कमरे में आकर लेट गई। टी०वी० देखते-देखते उसे नींद आ गई।
अचानक बड़े जोर-जोर से बोलने की आवाजें सुनकर दिव्या की नींद खुल गई। उसने बाहर आँगन की ओर देखा शाम हो चुकी थी, तभी उसे फिर से वही जोर-जोर से बोलने की आवाज आई..."तुम लोग बताते क्यों नहीं, किसने चुराकर रखा ये दूध? आज तक हमारे घर में चोरी नहीं हुई, अब दूध भी चुराने लगे तुम लोग" गुड़िया के चिल्लाने की आवाज थी। दूध....चोरी....ये शब्द कानों में पड़ते ही दिव्या को याद आया कि उसने दूध रखा था, वह तुरंत बाहर आई और बोली- "किस दूध की बात कर रही तुम? जो टाँड पर रखा था?"
"हाँ पर आपको कैसे पता?" गुड़िया ने कहा।
"क्योंकि वो दूध मैंने ही रखा था, बच्चों से बचाकर।" 
"बच्चों से बचाकर या चुराकर?" गुड़िया ने जहर बुझे स्वर में कहा।
व्हाट???? दिव्या को ऐसा महसूस हुआ मानो किसी ने उसे जोर का थप्पड़ मारा हो...
"मैं चोरी क्यों करूँगी, वो भी अपने ही घर में?" दिव्या ने आहत होकर कहा।
"अपना घर? किसका?" गुड़िया की आवाज पिघले शीशे सी दिव्या के कानों को चीरने लगी।
उसे अचंभा हो रहा था कि रेनू कुछ भी नहीं बोल रही थी, जबकि उसे तो सब पता था।
" सुनो गुड़िया तुम इस घर की बेटी हो तो मैं भी बहू हूँ, मुझे एक गिलास दूध के लिए चोरी करने की आवश्यकता नहीं, भगवान की दया से किसी बात की कमी नहीं है, यहाँ तुम लोगों पर डिपेंड हूँ तो क्या हुआ, हूँ तो मैं सेल्फ डिपेंड। रही चोरी की बात तो रेनू से पूछो, दूध उनसे पूछकर बल्कि उनके कहने से निकाला था मैंने। दिव्या से बर्दाश्त नही हुआ तो उसने भी कमर कस ली गुड़िया की बातों का जवाब देने के लिए।
"बहू... हुँह...और रेनू से क्या पूछूँ, मुझे दिखता नहीं क्या?" कसैला सा मुँह बनाकर गुड़िया ने कहा था।
कुछ देर ऐसी ही बहस होती रही, दिव्या को यह बहुत ही अपमान जनक लगा। वह अपने घर में तीन भाइयों के बीच इकलौती और सबसे बड़ी बेटी थी, बड़े ही लाड़-प्यार में पली थी, जिस भी चीज पर उँगली रख देती वो उसके पास हाजिर कर दी जाती। खाने-पीने, पहनने आदि की कमी का तो उसे अहसास भी नहीं था परंतु यहाँ इन लोगों ने उसपर चोरी का इल्जाम लगा दिया, और रेनू कुछ भी नहीं बोली ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सब कुछ प्लान किया गया हो। वह क्षुब्ध हो उठी, अपमान के मारे भीतर ही भीतर तिलमिला रही थी, अब एक-एक पल यहाँ काटना उसके लिए सजा के समान महसूस हो रही थी। अतः उसने विनीत को फोन कर दिया और सारी बातें बताते हुए कहा-"जबतक तुम आ नहीं जाते मैं अन्न का एक दाना भी नहीं खाऊँगी, और एक बात गुड़िया के लिए जो टी०वी० लेकर आने वाले थे वो नहीं लाओगे"
दूसरे दिन विनीत दिल्ली से आ गया किंतु दिव्या को फिर एक झटका लगा कि इतना सबकुछ होने के बाद और उसके मना करने के बाद भी विनीत टी०वी० लाया था। "मैंने तुम्हें टी०वी० के लिए मना किया था फिरभी!" उसने कहा
"मैं ये खरीद चुका था" दिव्या को विनीत का झूठ समझ आ गया। उसका आत्मसम्मान फिर से आहत हुआ, उसने स्वयं को संभाल कर कहा- "हमें आज ही वापस जाना है।"
"मम्मी-पापा को आ जाने दो मैं पहले उनसे बात कर लूँ फिर चलेंगे।" विनीत ने कहा।
"मैंने कल से न कुछ खाया है और न ही यहाँ का खाना खाऊँगी, अब तुम सोच लो क्या करना है।" कहती हुई वह दूसरे कमरे में चली गई। 
शाम को गुड़िया और विनीत के बातें करने की आवाज सुन कर दिव्या से रहा न गया तो वह भी उसी कमरे में आ गई और सनी को अपनी गोद में लिए जमीन पर ही बैठ गई।
गुड़िया कह रही थी "मैंने क्या गलत कहा कोई दूध अगर चुराएगा नहीं तो टाँड पर क्यों रखेगा?" 
वह बोल पड़ी "मुझे चोरी की जरूरत ही क्या थी, मैं तुमसे डरती हूँ क्या? तुम्हारे सामने भी लेकर पी सकती थी और रेनू के कहने से ही निकाला था।"
"रेनू को कुछ नहीं पता है ये झूठ बोल रही हैं।" गुड़िया ने जहरीले स्वर में कहा। वहीं बैठी रेनू को चुप देख दिव्या बेहद आहत हुई और अपनी सच्चाई सिद्ध करने के लिए उसके मुख से बेसाख्ता निकल पड़ा- "मेरी गोद में मेरी औलाद है मैं अपने बच्चे की कसम खाती हूँ मैंने चोरी नहीं की बल्कि रेनू के कहने के बाद ही दूध निकाला था।"
"हँह ऐसे कसम तो हम रोज गाजर मूली की तरह खाते हैं" गुड़िया ने अजीब सा मुँह बनाकर कहा।
व्हाट.... दिव्या को मानो काटो तो खून नहीं, उसे मूर्छा सी आने लगी, वैसे भी दो दिन से उसने कुछ भी खाया नहीं था और फिर अाघात पर आघात लगते जा रहे थे। वह विनीत की ओर बेबस नजरों से देखने लगी, उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं। तभी विनीत बोल पड़ा-" तुम लोग खाती होंगी हर बात पर कसम पर ना ही दिव्या और ना ही मैं कभी कसम खाते।" यह कहकर वह बाहर चला गया और दिव्या बच्चे को लेकर दूसरे कमरे में। दूसरे दिन सुबह ही विनीत के मम्मी-पापा और भाई-भाभी गाँव से आ गए पर विनीत ने उनसे कोई बात नहीं की, दिव्या कमरे से बाहर नहीं निकली भूखे होने के कारण उसे कमजोरी महसूस हो रही थी।वह तो बस शाम का इंतजार कर रही थी कि विनीत बात कर ले और शाम को वो लोग दिल्ली वापस चले जाएँ, अब उसे यहाँ रहने का बिल्कुल मन नहीं था, अपना सामान वह पैक कर चुकी थी। एक और चोट उसे सास की ओर से मिली कि सबकुछ जानते हुए भी उसकी सास ने एक बार भी उससे पूछने की जरूरत नहीं समझी कि बात क्या है? या फिर वही सबकुछ सत्य मान लिया जो उनकी बेटी ने उन्हें बताया। पर ऐसा कैसे हो सकता है वो उसे भी तो बखूबी जानती हैं उसका बैक ग्राउंड भी बहुत अच्छी तरह जानती हैं फिर बेटी के मोह में इतनी अंधी हो गईं कि बहू का पक्ष सुनना ही नहीं है।
दोपहर को बाहर से पापा जी की आवाज आई "अरे उसे अगर घर का खाना नहीं खाना है तो बाहर से कुछ ला दो खाने के लिए, क्यों पाप चढ़ा रहे हो हम पर।" 
"मैं लाया था पर उसने नहीं खाया।" विनीत ने जवाब दिया।
शाम को फिर से पापा जी ने विनीत से कहा- "दिव्या को घर का खाना नहीं खाना तो उसे बाहर ले जाओ कुछ खिला-पिला लाओ।"
यह सुनकर दिव्या से रहा नहीं गया वह बाहर आ गई और बोली- "मुझे खाना नहीं अब सिर्फ सच और झूठ का फैसला चाहिए, क्या आपकी बेटियाँ इसी तरह सब पर तानाशाही चलाएँगी, और अपमान करती रहेंगी?" 
"अब देखो अगर इस घर में रहना है तो ये सब तो सहना ही पड़ेगा।" पापा जी ने कहा और अपनी इसी बात के साथ वह सदा के लिए दिव्या की नजरों से गिर गए।
वह बोली- "तो ठीक है, ना मुझे इस घर में रहना है और ना ही मैं ऐसे वाहियात इल्जाम सहन करूँगी, मैं अपने बच्चों को लेकर जा रही हूँ आपके बेटे का मन करे तो आ जाएँ नहीं तो उन्हें भी रखिए अपने साथ बहनों की गुलामी करने के लिए।" इतना कहकर वह कमरे में गई अपना बैग कंधे पर टाँगा, सनी को गोद में लिया और दूसरे हाथ से महक का हाथ पकड़ कर घर से बाहर आ गई और बस स्टैंड की ओर चल दी। वह मन ही मन स्वयं को कोस रही थी कि मैंने क्यों विनीत को दिल्ली से बुलाया? मैंने क्यों अपने बच्चे की कसम खाई। उसने बड़े प्रयास से स्वयं को कठोर बना रखा था ताकि उसकी आँखों से आँसू न छलक पड़ें पर भीतर ही भीतर उसकी आत्मा मानो चीत्कार कर रही हो। मन ही मन उसने फैसला कर लिया कि चाहे उसकी बात कोई माने या ना माने पर वह किसी को विश्वास दिलाने के लिए कभी भी कसम नहीं खाएगी। बस स्टैंड पर बस का इंतजार करते उसे करीब दस मिनट हो गए पर अभी तक बस नहीं आई थी तभी विनीत हाथ में अटैची लिए हुए आता दिखाई दिया। वह आश्वस्त हो गई कि अब वह अकेली नहीं जाएगी।
"मम्मा...मम्मा देखो सनी मेरी बुक छीन रहा है।" बच्चों के कमरे से आती हुई महक की आवाज दिव्या को फिर वर्तमान में खींच लाई।
करीब चार साल हो गए, वह एक कसम ही थी जिसे दिव्या ने मन ही मन खाई थी उस घर में कभी वापस न जाने की और वह आज भी उस कसम को निभा रही है। उसे मन ही मन लिए गए उस कसम का कोई अफसोस नही किंतु जो कसम उसने बोलकर सबके सामने खाई थी उसका बोझ आज तक उसके दिल से नहीं उतरा। 
मालती मिश्रा
चित्र साभार..गूगल

6 comments:

  1. बहुत ही सुंदर कहानी।

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    1. जय प्रकाश जी आभार।

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    2. जय प्रकाश जी आभार।

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 19.1.17 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2582 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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    1. दिलबाग विर्क जी बहुत-बहुत आभार

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    2. दिलबाग विर्क जी बहुत-बहुत आभार

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