शनिवार

क्या रखा है जीने में

भावों का सागर बहता है
मेरे सीने में
मन करता है छोड़ दूँ दुनिया
क्या रखा है जीने में

सागर में अगणित भावों का
मानों यूँ तूफान उठा है
आपस में टकराती लहरें तत्पर
हों अस्तित्व मिटाने में

दिल और दिमाग के मध्य
मानो इक प्रतिस्पर्धा हो
एक दूजे के कष्टों के हलाहल
उधत हों मानो पीने में

भावों की अत्याधिकता भी
करती है शून्य मनोभावों को
प्यासा नदिया तीरे जाकर भी
असक्षम होता जीने में।
मालती मिश्रा

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