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Monday, 29 August 2016

इक हाथ में मटकी दूजे में रई है
रूप अधिक मनभावन भई है
स्वर्ण पात्र माखन को भरो है
बंसी भी इक ओर धरो है
कान्हा तेरो रूप सलोनो
देख-देख मन पुलकित भयो है।
बदरा ऊपर आस लगाए
उमड़-घुमड़ तोहे छूवन चाहे
भोर किरन भई बड़ भागी
अपनी आभा को तुम फैलायो
श्याम वर्ण काया पर कान्हा
नीलवरण पटका अधिक सुहायो
दिवा-रात्रि के मिलन ने जैसे
स्वर्ण-रजत की छवि बिखरायो
देख-देख छवि अति सुघड़ सलोनो
मन बार-बार तुम पर बलि जायो
मालती मिश्रा

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