सोमवार

एक नदी के दो किनारे
साथ साथ ही चलते हैं
हमराह हैं
हममंजिल भी हैं
पर कभी नहीं मिलते हैं
हम कदम बन साथ निभाते हैं
पर एक-दूजे के मन में
कभी भी उतर नहीं पाते
साथ इनका सभी ने देखा
पर जल के आवरण में ढका
अंतराल कोई न जान सका
आवरण रहे या हटे
अंतराल रहेगा
यह अस्तित्वहीन सा
साथ रहेगा
चलेंगे सदा साथ
अपनी ही वर्जनाओं में बंधे
विस्तार को सीमित करते
एक निश्चित दूरी बाँधे हुए
खुद को छलते हुए
खुद से कहते
खुद की सुनते हुए
क्योंकि आपस में कहना
और सुनना
तो सदियों से छोड़ दिया
जितना हो सका
खुद को खुद ही
एक-दूजे से
तोड़ लिया।
चलते ही जा रहे
मूक
बिना शिकवा शिकायत
कर्मों से बंधे हुए
नदी के दो किनारे।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

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8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर एहसास
    बेहतरीन

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत शानदार रचना ...👌👌👌

    जवाब देंहटाएं
  3. चलेंगे सदा साथ
    अपनी ही वर्जनाओं में बंधे
    विस्तार को सीमित करते
    एक निश्चित दूरी बाँधे हुए
    खुद को छलते हुए
    खुद से कहते
    खुद की सुनते हुए
    क्योंकि आपस में कहना
    और सुनना
    तो सदियों से छोड़ दिया..

    बहुत ही सुंदर। वाह

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. अमित जी सादर आभार, आपकी प्रतिक्रिया से लेखनी को गति मिलती है।

      हटाएं

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