रविवार

धार्मिक कानून बड़ा या देश

 धार्मिक कानून बड़ा या देश


हम जिस घर में जन्म लेते हैं, जहाँ हमारा पालन-पोषण होता है, जिस चारदीवारी में हम घुटनों के बल चले, खड़े हुए, लड़खड़ाए, गिरे और फिर उठकर चले और धीरे-धीरे उस घर की मिट्टी की खुशबू हमारी साँसों में बसती गई, उस घर की छत ने हमें सर्दी, गरमी, धूप और बरसात से बचाया, उसकी धरती ने सुख हो या दुख हमारे हर समय में हमें अपने आँचल में सुलाया फिर वह घर चाहे बड़ा हो या छोटा, कच्चा हो या पक्का, नया हो या पुराना चाहे पुराना जर्जर ही क्यों न हो सहज ही वह हमारा हो जाता है, हमारे दिल में बसता है, हमें उससे प्यार होता है।

यदि किसी को अपने घर से प्यार नहीं होता तो सही मायने में न तो वह घर उसका होता

है और न ही वो उस घर का होता है अर्थात् वह उस घर में महज़ कुछ देर का मेहमान होता है जहाँ उसे कुछ समय का आसरा मिल जाता है, हम दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि वह परदेशी होता है। 

यही बात देश में रहने वाले उन लोगों पर भी चरितार्थ होती है जिन्हें अपने देश से ही प्यार नहीं, जो इसी देश में रहकर देश के सम्मान के साथ खेलते हैं, जिस प्रकार एक घर के लोग परिवार बन अपने घर के लिए सदैव एकजुट रहते हैं उसी प्रकार देश के सभी नागरिक चाहे वह किसी भी धर्म के अनुयायी हों पर पहले इस देश की संतान हैं और उन सभी का कर्तव्य है कि देशहित को सर्वोपरि रखते हुए ही अपने सभी सामाजिक और धार्मिक कर्म करें।

हमारा देश तभी उन्नत और सशक्त होगा जब इसके नागरिक स्वयं को तनावमुक्त, सशक्त और सुरक्षित महसूस करेंगे। किन्तु यहाँ रहने वाले विभिन्न संप्रदायों के लोग अपना-अपना वर्चस्व सिद्ध करने के लिए यदि एक-दूसरे के अधिकारों का हनन करने लगें तो कोई भी नागरिक सुरक्षित कैसे महसूस करेगा। आए दिन मज़हबी रस्म अदायगी के लिए सड़कें जाम करना, कोलाहलपूर्ण वातावरण निर्मित करना तथा दमनकारी नीतियाँ अपनाकर दूसरों को सताना, विकास की ओर बढ़ते पैरों में जंजीरें डालकर उन्हें नीचे खींचने का काम करते हैं। सोने पर सुहागा तब होता है जब ऐसे उपद्रवियों द्वारा देश के कानून को मानने से यह कहकर इंकार कर दिया जाता है कि हमारा धार्मिक कानून हमें इसकी अनुमति नहीं देता।

दरअसल हम अभी भी परदेशी ही हैं, सिर्फ किसी देश में पैदा हो जाने मात्र से हम उस देश के या वह देश हमारा नहीं हो जाता। जब तक हम देश को भली-भाँति जान नहीं लेते जब तक उसकी संस्कृति उसकी शक्ति या दुर्बलता हमारे भीतर रच बस नहीं जाती तब तक हम उसके नही हो सकते। देश में बहुत से ऐसे जड़ पदार्थ हैं और हम भी उन्हीं की भाँति मात्र एक जड़ पदार्थ बनकर रह रहे हैं, देश ने हमें नही अपनाया न हमने देश को। हम यहाँ पैदा जरूर हुए परंतु इसकी मिट्टी की सोंधी खुशबू हमारी आत्मा में न बस सकी, हम यहाँ के जड़त्व के मोहपाश में बँधे होकर इसे अपना कहने लगे हैं। जो हमें लुभाते हैं और हम उसी के वशीभूत हो उसे पाने की लालसा में देश को अपना कहने लगते हैं। जो मोह से अभिभूत है वही चिरकाल का परदेशी है। वह नहीं समझता कि वह कहाँ है, किसका है? 

जो हमें प्यारा होता है, जो हमारा होता है या हम जिसके होते हैं, उसकी हर अच्छाई-बुराई को हम दिल से अपनाते हैं। उसके सम्मान के लिए कुछ भी कर गुजरने को तत्पर रहते हैं परंतु इसी देश में जन्म लिया इसकी माटी का तिलक किया, फिर भी आज भी इसके प्रति अपनी अखंड भावना दर्शाने से डर लगता है।

हर देश के नागरिक को अपने देश और राष्ट्रगान के प्रति श्रद्धा होती है परंतु हमारे देश में ही किसी खास संप्रदाय के लोगों को राष्ट्रगान गाने की इज़ाजत उनका ही धर्म नहीं देता। कहते हैं कि उनके धर्म का कानून उन्हें जन गण मन और वंदेमातरम् गाने की इज़ाजत नहीं देता है, फिर सवाल यह उठता है कि जन-गण-मन और वंदेमातरम् जिस देश की आत्मा हैं आपका कानून आपको उस देश में रहने की इज़ाजत कैसे देता है? भारत माता की धरती पर जन्म लेकर इसे ही अपनी कर्मभूमि बनाने वाले को 'भारत माता की जय' बोलने से कौन-सा कानून रोकता है। कौन-सा कानून है जो माँ को माँ का सम्मान देने से रोकता हो? यदि कोई धर्म मनुष्य को मानव-धर्म निभाने से रोकता है तो वह धर्म नहीं। हर धर्म व्यक्ति को पहले इंसान बाद में हिंदू या मुसलमान बनाता है। 

किसी भी देश में रहने वाले हर नागरिक का प्रथम कर्तव्य अपनी मातृभूमि के प्रति समर्पण और उसका सम्मान होना चाहिए, धर्म और मज़हब दूसरे स्थान पर होते हैं। यदि हमें अपने ईश्वर की आराधना के लिए अपनी अधिकृत भूमि और बेफिक्री और सुकून के दो पल ही न मिलें तो धर्म के प्रति कर्तव्य कहाँ निभाएँगे? 

हमारा घर हमारा देश तब ही हमारा होता है जब हम तन-मन-धन से उसके होते हैं, जब हमारे देश की मिट्टी की खुशबू हमारी आत्मा में बसती है और अनायास ही हमारे मुँह से ही नहीं दिल से निकलता है "वंदेमातरम्" तब हम इस देश के हो पाते हैं। तब हम इसके हो पाते हैं जब सिर्फ हम इसमें नहीं बल्कि यह हममें बसता है, अन्यथा तो हम पैदा होकर परदेशी बनकर रहते हुए पशुओं के समान अपना भरण-पोषण करते हुए एक दिन परदेशी ही बनकर चले जाएँगे और सवाल रह जाएगा धार्मिक कानून बड़ा या देश........

चित्र साभार- गूगल से

मालती मिश्रा 'मयंती'

2 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (15-2-23} को "सिंहिनी के लाल"(चर्चा-अंक 4642) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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    कामिनी सिन्हा

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    1. आलेख को सम्मिलित करके जो सम्मान दिया उसके लिए हार्दिक आभार महोदया।

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