रविवार

आजाद परिंदे

हम नभ के आज़ाद परिंदे
पिंजरे में न रह पाएँगे,
श्रम से दाना चुगने वालों को
कनक निवाले न लुभा पाएँगे।
रहने दो मदमस्त हमें
जीवन की उलझनों से दूर,
जी लेने दो जीवन अपना
आजाद, खुशियों से भरपूर।
जिनको मानव पा न सका
अपने स्वार्थ मे फँसकर,
जात-पाँत के जाल में 
उलझ गया निरीह बनकर।
पंखों में भर लेंगे वो सपने
जो हमारे जीवन आधार,
सांप्रदायिकता की बीमारी से
नहीं हुए हैं हम बीमार।
लालच के पिंजरे में फँसकर
सेक्युलर आँखें मूँद रहे,
अधिकारों के पंख काटकर
अपनी आजादी ही बेच रहे।
हम स्वतंत्र हो जीने वाले
नभ को पंखों से नापेंगे,
धूप-छाँव हो या वर्षा
किसी विपदा से न भागेंगे।

मालती मिश्रा 

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9 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक सन्देश, सुन्दर भाव !

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    1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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    2. बहुत-बहुत धन्यवाद साधना जी।

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    3. बहुत-बहुत धन्यवाद साधना जी।

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  2. जरूर,आभार यशोदा जी।

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  3. जरूर,आभार यशोदा जी।

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (27-06-2016) को "अपना भारत देश-चमचे वफादार नहीं होते" (चर्चा अंक-2385) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. मेरी रचना को अपने लिंक में सम्मिलित करने और सूचना देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय रूपचंद्र शास्त्री जी।

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  6. मेरी रचना को अपने लिंक में सम्मिलित करने और सूचना देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय रूपचंद्र शास्त्री जी।

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