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Tuesday, 20 December 2016

रिश्तों की डोर


हाथ से रिश्तों की डोर छूटी जाती है
लम्हा दर लम्हा दूरी बढ़ती जाती है
जितना खींचो इसको ये 
उतनी ही फिसलती जाती है 
ढीली छोड़ दें तो
राह भटक जाती है
कोई तो समझाए ये
कैसे संभाली जाती है?
हाथों से रिश्तों की डोर छूटी जाती है

तिनका-तिनका करके 
बनाया था जो घरौंदा
वक्त की आँधी 
बिखेरने लगी है उसको
प्रेम प्यार के तिनकों का
अस्तित्व मिटा जाता है
एक-एक तिनका
आँधी में उड़ा जाता है
अपनी थी जो दुनिया
बेगानी नजर आती है
हाथों से रिश्तों की डोर छूटी जाती है
कोई तो बताए कैसे संभाली जाती है
मालती मिश्रा

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