शुक्रवार

जनता अब जाग रही

कालेधन और भ्रष्टाचार पर 
सत्तर सालों तक रहे खामोश।
समय आ गया मुक्ति का तब
चले दिखाने मिलकर आक्रोश।

भ्रष्टाचार जब फैलता है तो
निर्धन जनता ही पिसती है,
भ्रष्टाचार निवारण पर भी 
वही लाइनों में दबती है।

जिन मज़लूमों के नाम पर
तुम अपनी रोटी सेंक रहे
स्याह को श्वेत बनाने को तुम
उनको ही भीड़ में झोंक रहे।

हर एक रोटी मज़लूमों की
छीन-छीन कर तुमने खाई
आ गया समय चुकाने का
करना होगा अब भरपाई

फूलों की जगह नोटों की माला
अरबों-खरबों का गड़बड़ झाला
इंसान तो क्या पशु को न बक्शा
उनका चारा भी खा डाला।

गरीब के सिर पर छत भी नहीं
खुद भू अधिपति बन बैठे हैं
गरीब के नाम चंदा ले-लेकर
करोड़ों अंदर कर बैठे हैं।

अपना आधिपत्य बचाने को
गरीबों को क्यों उकसाते हो
लेकर सहारा निर्धन कांधे का
क्यों बंदूक चलाते हो? 

चेत जा तू अब बदल तरीका
जनता अब है जाग रही,
निर्धन,किसान,दलित,अल्पसंख्यक
तुम्हारे पत्ते सब भाँप रही।
मालती मिश्रा

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3 टिप्‍पणियां:

  1. समागत विषयो पर बहुत अच्छी रचना..

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  2. पम्मी जी ब्लॉग पर आपका स्वागत है। प्रतिक्रिया के लिए हृदयतल से आभार व्यक्त करती हूँ।

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  3. पम्मी जी ब्लॉग पर आपका स्वागत है। प्रतिक्रिया के लिए हृदयतल से आभार व्यक्त करती हूँ।

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