Search This Blog

Friday, 9 December 2016

भोर सुहानी


उषा की लहराती चूनर से 
अंबर भया है लाल
तटिनी समेटे अंक मे 
सकल गगन विशाल
सकल गगन विशाल 
प्रकृति छटा बिखरी है न्यारी
सिंदूरी सी चुनरी मे 
दुल्हल सी भयी धरा हमारी
रंग-बिरंगे पुष्पों ने सजा दिया 
पथ दिवा नरेश का
मधुकर की मधुर गुनगुन ने 
खोल दिया पट कलियों का
मुस्काते फूलों से सज गई है 
हर क्यारी-क्यारी 
कुहुक-कुहुक कर गीत सुनाती 
कोयल फिरे है डारी-डारी
मंदिरों में घंटे की टन-टन 
कानों में पावनता घोले
माझी के आवन की बेला 
नदी में नैया इत-उत डोले
मालती मिश्रा

No comments:

Post a Comment