रविवार

संस्कारों का कब्रिस्तान बॉलीवुड

 


संस्कारों का कब्रिस्तान बॉलीवुड

हमारा देश अपनी गौरवमयी संस्कृति के लिए ही विश्व भर में गौरवान्वित रहा है परंतु हम पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध में अपनी संस्कृति भुला बैठे और सुसंस्कृत कहलाने की बजाय सभ्य कहलाना अधिक पसंद करने लगे। जिस देश में धन से पहले संस्कारों को सम्मान दिया जाता था, वहीं आजकल अधिकतर लोगों के लिए धन ही सर्वेसर्वा है। धन-संपत्ति से ही आजकल व्यक्ति की पहचान होती है न कि संस्कारों से। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा भी है...
*वित्तमेव कलौ नॄणां जन्माचारगुणोदयः ।
धर्मन्याय व्यवस्थायां कारणं बलमेव हि॥
*
अर्थात् "कलियुग में जिस व्यक्ति के पास जितना धन होगा, वो उतना ही गुणी माना जाएगा और कानून, न्याय केवल एक शक्ति के आधार पर ही लागू किया जाएगा।"

आजकल यही सब तो देखने को मिल रहा है, जो ज्ञानी हैं, संस्कारी हैं, गुणी हैं किन्तु धनवान नहीं हैं, उनके गुणों का समाज में कोई महत्व नहीं, लोगों की नजरों में उनका कोई अस्तित्व नहीं है न ही उनके कथनों का कोई मोल परंतु यदि कोई ऐसा व्यक्ति कुछ कहे जो समाज में धनाढ्यों की श्रेणी में आता हो तो उसकी कही छोटी से छोटी बात न सिर्फ सुनी जाती है बल्कि अनर्गल होते हुए भी लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण बन जाती है और यही कारण है कि निम्नता की सीमा पार करके कमाए गए पैसे से भी ये बॉलीवुड के कलाकार प्रतिष्ठित सितारे कहलाते हैं। आज भी हमारी संस्कृति में स्त्रियाँ अपने पिता, भाई और पति के अलावा किसी अन्य पुरुष के गले भी नहीं लगतीं (ये गले लगने की परंपरा भी बॉलीवुड की ही देन है) न ही ऐसे वस्त्र धारण करती है जो अधिक छोटे हों या स्त्री के संस्कारों पर प्रश्नचिह्न लगाते हों, परंतु हमारे इसी समाज का एक ऐसा हिस्सा भी है जहाँ पुरुष व स्त्रियाँ खुलेआम वो सारे कृत्य करते हैं जिससे न सिर्फ स्त्रियों के चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगता है बल्कि समाज में नैतिकता का स्तर भी गिरता है।
आजादी के नाम पर निर्वस्त्रता की मशाल यहीं से जलती है और समाज में बची-खुची आँखों की शर्म को भी जलाकर राख कर देती है और शर्मोहया की चिता की वही राख बॉलीवुड की आँखों का काजल बनती है।
पैसे कमाने के लिए ये मनोरंजन और कला के नाम पर समाज में अश्लीलता और अनैतिकता परोसते हैं और आम जनता मुख्यत: युवा पीढ़ी  इनकी चकाचौंध में फँसकर धीरे-धीरे अंजाने ही वो सब करने लगती है जिससे समाज में नैतिकता का स्तर गिरता जा रहा है।
महात्मा गाँधी ने अपनी जीवनी में लिखा था कि उन्होंने एक बार बाइस्कोप में राजा हरिश्चंद्र की कहानी देखी और उसका उनके मन पर इतना गहरा असर हुआ कि उन्होंने उसी समय से हमेशा सत्य बोलने की प्रतिज्ञा की। अब प्रश्न उठता है कि यदि चित्र के रूप में देखी गई कोई कहानी एक बार में किसी किशोर हृदय पर इतना असर छोड़ सकती है, तो वर्तमान समय में जब बच्चे, किशोर और युवा चलचित्र के रूप में अश्लीलता को  रोज-रोज देखते हैं तब उनके हृदय पर कितना असर पड़ता होगा!!! यह समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के लिए काफी है।

एक समय था जब हमारे ही देश में पहली हिन्दी फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' में हिरोइन के लिए कोई महिला नहीं मिली तो पुरुष ने महिला का रोल निभाया था और आज का समय है कि जितने कम वस्त्र उतने अधिक पैसे वाली थ्योरी पर चल रहे बॉलीवुड में थोड़े से पैसे और नाम के लिए अभिनेत्रियाँ कम से कम वस्त्रों में फोटो खिंचवाती हैं। वही बॉलीवुड कलाकार युवा पीढ़ी के आदर्श बन जाते हैं जिनका स्वयं का कोई आदर्श, कोई उसूल नहीं या फिर ये कहें कि उनके आदर्श और उसूल बस पैसा ही है परंतु विडंबना यह है कि जनता और सरकार सभी इनकी सुनते हैं।
ये मनोरंजन के नाम पर नग्नता और व्यभिचार दर्शा कर जहाँ एक ओर समाज के युवा पीढ़ी को बरगलाते हैं वहीं आजकल टीवी, सिनेमा, मोबाइल, लैपटॉप जैसे आधुनिक तकनीक छोटे-छोटे बच्चों के हाथों में किताबों की जगह ले चुके हैं, फिर इंटरनेट और सोशल मीडिया से कोई कब तक अछूता रह सकता है। चाहकर भी बच्चों को इनसे दूर नहीं रखा जा सकता और इनमें संस्कार और नैतिकता के पाठ नहीं पढ़ाए जाते बल्कि स्त्रियों की आजादी के नाम पर अंग प्रदर्शन, युवाओं की आजादी के नाम पर खुलेआम अश्लीलता फैलाना, ये सब आम बात हो चुकी है। इतना ही नहीं वामपंथी विचारधारा के समर्थक और प्रचारक बॉलीवुड में भरे पड़े हैं और ये समाज में होने वाले सभी प्रकार के देश विरोधी गतिविधियों का समर्थन करके उन्हें मजबूती देते हैं।
मेहनत तो एक आम नागरिक भी करता है और अपनी मेहनत से कमाए गए उन थोड़े से पैसों से ही अपना परिवार पालता है परंतु अधिक पैसों के लालच में अपने संस्कार नहीं छोड़ता अपनी लज्जा को नहीं छोड़ता परंतु उस सम्मानित किंतु साधारण व्यक्ति की बातों का कोई महत्व नहीं वह कुछ भी कहे किसी को सुनाई नहीं देता लेकिन यही अनैतिक और संस्कार हीन सेलिब्रिटी यदि छींक भी दें तो अखबारों की सुर्खियाँ और न्यूज चैनल के ब्रेकिंग न्यूज बन जाते हैं, इसीलिए तो इनका साहस इतना बढ़ जाता है कि ये ग़लत चीजों या घटनाओं का खुलकर समर्थन करते हैं और चाहते हैं कि सरकार उनकी अनर्गल बातों का आदेशों की भाँति पालन करे। बॉलीवुड से राजनीति में आना तो आजकल चुटकी बजाने जितना आसान हो गया है क्योंकि सब पैसों और प्रसिद्धि का ही खेल है। जिसके पास बॉलीवुड और राजनीतिक कुर्सी दोनों का बल होता है, वो अपने आप को ही राज्य या देश मान बैठे हैं, इसीलिए तो बिना सोचे समझे ही निर्णय सुना देते हैं कि जिसने हमारे विरुद्ध कुछ कहा उसने अमुक राज्य का अपमान किया और उसे अमुक राज्य में रहने का कोई अधिकार नहीं। किसी को लगता है कि महाराष्ट्र के बाहर से आए  बॉलीवुड में काम करने वाले सभी सितारे उनकी दी हुई थाली (बॉलीवुड) में खाते हैं अर्थात् बॉलीवुड रूपी थाली उन्होंने ही दिया था, दिन-रात जी-तोड़ परिश्रम का कोई महत्व नहीं, इसलिए यदि ये दिन को रात और रात को दिन या ड्रग्स को टॉनिक कहें तो उस बाहरी सितारे को भी ऐसा ही करना चाहिए, नहीं किया तो किसी का घर तोड़ दिया जाएगा या किसी की हत्या कर दी जाएगी।
देश के किसी भी कोने में देश के हित में लिए गए किसी निर्णय का विरोध करना हो या हिन्दुत्व विरोधी प्रदर्शन करना हो या सरकार को अस्थिर करने के लिए किसी असामाजिक कार्य का समर्थन करना हो तो ये जाने-माने सितारे हाथों में तख्तियाँ लेकर फोटो खिंचवा कर अपना विरोध प्रदर्शन करते हैं किंतु जब कहीं सचमुच अन्याय हो रहा हो या कोई अनैतिक कार्य हो रहा हो तब ये तथाकथित प्रतिष्ठित लोग कहीं नजर नहीं आते।
समाज में नैतिकता के गिरते स्तर का जिम्मेदार बॉलीवुड ही है और उदाहरणार्थ सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु की जाँच के दौरान नशालोक की सच्चाई सामने आने लगी और बॉलीवुड के नशा गैंग की संख्या द्रौपदी के चीर की तरह बढ़ती ही जा रही है। जहाँ बाप-बेटी के रिश्ते की मर्यादा नहीं होती, जहाँ दिन-रात गांजा ड्रग्स के धुएँ के बादल घिरे रहते हैं, जहाँ इन वाहियात कुकृत्यों का समर्थन न करने वालों के लिए मौत को गले लगाने के अलावा कोई स्थान नहीं...हम उसी बॉलीवुड की फिल्मों को देखने के लिए पैसे खर्च करते हैं और इनकी अनैतिकता को मजबूती प्रदान करते हैं। ये बॉलीवुड हमारी संस्कृति हमारे संस्कारों का कब्रिस्तान है। इसकी शुद्धि जनता के ही हाथ में है नहीं तो कहते हैं न कि 'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता।' यदि जनता एक साथ इन्हें सबक नहीं सिखाती तो अकेले आवाज उठाने वाला कब कहाँ अदृश्य हो जाए कुछ पता नहीं होता, या फिर उसका घेराव करके उसकी आवाज को ही नकारात्मक सिद्ध कर दिया जाता है। 
जनता मुख्यत: आज की युवा पीढ़ी को इन्हें बताना होगा कि उन्हें आदर्शविहीन अनैतिक सामग्री से भरी फिल्में स्वीकार नहीं और न ही ऐसी अश्लीलता परोसने वाले फिल्मी सितारों को अपना आदर्श मान सकते हैं। देश को अनैतिक संस्कारहीन सेलिब्रिटी की नहीं बल्कि ऐसे नागरिकों की आवश्यकता है जो हमारे देश की संस्कृति के रक्षक बन सके न कि उसे विकृत करके इसकी छवि को धूमिल करें।

चित्र- साभार गूगल से 

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

मंगलवार

उपन्यास कैसे लिखें

 उपन्यास लिखने के चरण


एक उपन्यास लिखना एक कठिन काम हो सकता है, लेकिन इसे प्रबंधनीय चरणों में विभाजित करने से प्रक्रिया को और अधिक प्रबंधनीय बनाने में मदद मिल सकती है। उपन्यास लिखते समय विचार करने के लिए यहां कुछ बुनियादी कदम दिए गए हैं:


विचार-मंथन और रूपरेखा: 

अपनी कहानी के लिए विचार-मंथन करके शुरुआत करें। प्लॉट, पात्रों, सेटिंग और थीम के बारे में सोचें जिन्हें आप एक्सप्लोर करना चाहते हैं। एक बार जब आप अपनी कहानी के बारे में सामान्य विचार प्राप्त कर लेते हैं, तो अपनी लेखन प्रक्रिया का मार्गदर्शन करने के लिए एक रूपरेखा तैयार करें।


चरित्रों का विकास करना: 

बैकस्टोरी, व्यक्तित्व लक्षण और प्रेरणाएँ बनाकर अपने मुख्य पात्रों को बाहर निकालें। यह आपको यथार्थवादी और भरोसेमंद चरित्र बनाने में मदद करेगा जिसकी पाठक परवाह करेंगे।

पहला मसौदा लिखना: 

एक बार जब आपके पास एक रूपरेखा और विकसित चरित्र तैयार हों, तो पहला मसौदा लिखना शुरू करने का समय आ गया है। इस स्तर पर अपने लेखन को बेहतर बनाने के बारे में ज्यादा चिंता न करें, बस अपने विचारों को कागज पर उतारने पर ध्यान दें।


संशोधन और संपादन: 

एक बार जब आप अपना पहला मसौदा पूरा कर लेते हैं, तो नए परिप्रेक्ष्य प्राप्त करने के लिए अपने काम से कुछ समय निकाल लें। फिर, वापस आकर अपने काम की समीक्षा करें, प्लॉट की खामियों, विसंगतियों और अन्य मुद्दों पर ध्यान दें जिन्हें ठीक करने की आवश्यकता है।


प्रतिक्रिया माँगना: 

उद्योग में बीटा पाठकों, लेखन समूहों या पेशेवरों से प्रतिक्रिया प्राप्त करें। अतिरिक्त संशोधन करने और अपनी कहानी को बेहतर बनाने के लिए इस फ़ीडबैक का उपयोग करें।


पॉलिश करना और प्रकाशित करना: 

एक बार जब आप अपनी कहानी से खुश हो जाते हैं, तो अपने लेखन को चमकाने और उसे प्रकाशन के लिए तैयार करने पर काम करें। इसमें एक पेशेवर संपादक को काम पर रखना, अपनी पांडुलिपि को प्रारूपित करना और अपने बुक कवर और मार्केटिंग योजना पर काम करना शामिल हो सकता है।


याद रखें, एक उपन्यास लिखने की प्रक्रिया लंबी और चुनौतीपूर्ण होती है, लेकिन इसे प्रबंधनीय चरणों में तोड़कर और लगातार बने रहने से, आप एक महान पुस्तक लिखने के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। 


मालती मिश्रा 'मयंती'

रविवार

पुस्तक कैसे लिखें..

 पुस्तक कैसे लिखें..


पुस्तक लेखन एक लिखित कार्य बनाने की प्रक्रिया है जिसे पाठकों के आनंद लेने के लिए प्रकाशित और वितरित किया जा सकता है। किताब लिखना एक चुनौतीपूर्ण और समय लेने वाला काम हो सकता है, लेकिन यह उन लोगों के लिए एक पुरस्कृत अनुभव भी हो सकता है जिनके पास बताने के लिए कहानी या साझा करने के लिए जानकारी है।


विषय निर्धारित करें-

किताब लिखना शुरू करने के लिए, सबसे पहले यह जानना ज़रूरी है कि आप किस तरह की किताब लिखना चाहते हैं और आपके लक्षित दर्शक/पाठक कौन हैं। इससे आपको अपने लेखन पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलेगी और यह सुनिश्चित होगा कि आपकी पुस्तक इस तरह से लिखी गई है जो आपके पाठकों को जोड़ेगी और उनके साथ प्रतिध्वनित होगी।


रूपरेखा तैयार करें-

एक बार आपके पास अपनी पुस्तक के लिए एक विचार होने के बाद, पुस्तक की संरचना के लिए एक रूपरेखा या योजना बनाना महत्वपूर्ण है। यह आपको व्यवस्थित रहने और अपने लेखन को ट्रैक पर रखने में मदद कर सकता है। कुछ लेखक अधिक विस्तृत रूपरेखा का उपयोग करना पसंद करते हैं, जबकि अन्य केवल एक सामान्य विचार रखना पसंद करते हैं कि वे प्रत्येक अध्याय में क्या शामिल करना चाहते हैं।


समय सारणी और लेखन लक्ष्य निर्धारित करें-

जैसा कि आप लिखना शुरू करते हैं, लेखन के लिए नियमित समय निर्धारित करना और प्रक्रिया के प्रति प्रतिबद्ध रहना महत्वपूर्ण है। इसमें दैनिक शब्द गणना लक्ष्य निर्धारित करना या लिखने के लिए नियमित समय और स्थान खोजना शामिल हो सकता है। प्रतिक्रिया के लिए खुला होना और यह सुनिश्चित करने के लिए अपने काम को संशोधित करना भी महत्वपूर्ण है कि यह सबसे अच्छा हो सकता है।


प्रकाशन प्रक्रिया तथा प्रकाशक की जानकारी हासिल करें- 

एक बार जब आपकी पुस्तक पूरी हो जाती है, तो आप किसी प्रकाशक की तलाश करना या अपना काम स्वयं प्रकाशित करना चुन सकते हैं। स्व-प्रकाशन हाल के वर्षों में एक तेजी से लोकप्रिय विकल्प बन गया है, लेखकों को उनके काम को प्रकाशित करने और वितरित करने में मदद करने के लिए कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं।


कुल मिलाकर, किताब लिखना उन लोगों के लिए एक चुनौतीपूर्ण लेकिन पुरस्कृत अनुभव हो सकता है जो इस प्रक्रिया के लिए प्रतिबद्ध हैं। समर्पण, कड़ी मेहनत और सीखने और सुधार करने की इच्छा से कोई भी एक सफल पुस्तक लेखक बन सकता है।

चित्र साभार- गूगल से 

मालती मिश्रा 'मयंती'

शुक्रवार

कहाँ जा रहे आज के बच्चे

 कहाँ जा रहे आज के बच्चे (4/5/22)  


प्रातःकालीन निर्मलता की चादर ओढ़े धरती पर नाजुक कोपलों पर झिलमिलाते पावन ओस की बूँदों की तरह निर्मल, निश्छल और कोमल होता है बचपन, जो उदीयमान बाल सूर्य की शांत नर्म और रुपहली किरणों के स्पर्श से मोती की मानिंद जगमगा उठता है और हवा के थपेड़े से बिखर कर अपना अस्तित्व मिटा बैठता है। बाल्यावस्था वह अवस्था है जब बच्चे का मन कोरे कागज सा होता है, जो चाहो जैसा चाहो उसे वैसा ही बनाया जा सकता है। इसके लिए बच्चे को विशेष देखभाल के साथ-साथ स्वस्थ वातावरण की भी आवश्यकता होती है किन्तु वर्तमान समय में विशेष देखभाल तो संभव है लेकिन स्वस्थ वातावरण का मिलना अपने-आप में एक चुनौती है। आधुनिक परिवेश में जहाँ भौतिकवाद का बोलबाला है ऐसी स्थिति में समाज में सम्मानजनक और सुविधाजनक जीवन जीने के लिए आर्थिक स्थिति का मजबूत होना अहम् हो गया है। रहन-सहन से लेकर आने वाली पीढ़ियों के भविष्य निर्माण तक में प्रतियोगिता सर्वव्यापी है। ऐसी परिस्थिति में अपनी गृहस्थी को सुचारू और सुनियोजित रूप से चलाने के लिए पति-पत्नी दोनों ही आर्थिक उत्सर्जन में सहभागिता सुनिश्चित करते हैं, जिसके कारण उन्हें अक्सर परिवार से अलग एकल परिवार के रूप में रहना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर कुछ आधुनिकता के शिकार तथा कुछ घरों में स्थान के अभाव के कारण भी एकल परिवार में रहने को प्राथमिकता देते हैं। ऐसी परिस्थितियों में जो सबसे अधिक प्रभावित होता है वह है बच्चों का जीवन। 

पहले बच्चा परिवार में दादा-दादी, नाना-नानी के साथ रहता था विभिन्न रिश्तों में घिरा होता था तो रिश्तों के महत्व को समझता और सामंजस्य बिठाना सीखता था। बड़ों का आदर छोटों से स्नेह करने का आदी होता था, वहीं दादी-नानी की कहानियों से स्वस्थ मनोरंजन और ज्ञान पाता था। पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियों से अपनी संस्कृति से परिचित होता था। घरों से बाहर अन्य बच्चों के साथ खेलता था तो वह शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होता था और साथ ही उसमें आपसी मेलजोल, सहयोग और अनुशासन के गुणों का विकास होता था। सही मायने में संयुक्त परिवार में ही बच्चा सही देखभाल और परवरिश प्राप्त करता था, विभिन्न रिश्ते-नातों से परिचित होता था तथा सभी रिश्तों के साथ सामंजस्य बिठाना सीखता था, किन्तु जैसे-जैसे हम आधुनिकता की दौड़ में शामिल होते गए वैसे-वैसे अपनों से दूर और एकाकी होते गए। आज सब कुछ मशीनी हो गया है यहाँ तक कि बच्चों का पालन-पोषण भी। एकल परिवार में जहाँ पति-पत्नी दोनों कामकाजी होते हैं वहाँ पत्नी को या कहूँ कि माँ को बच्चों की देखभाल करने का समय नहीं होता। समय के साथ समाज में तालमेल बिठाने के लिए तथा बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए यह आवश्यक भी हो चला है और इसीलिए माँ को बच्चे को आया के भरोसे या क्रच में छोड़ना पड़ता है। बच्चे से दिनभर की दूरी और समय तथा पूरा प्यार न दे पाने का अपराधबोध माता-पिता को बच्चों के प्रति अति  संरक्षात्मक बना देता है और इस अपराध बोध से निकलने के लिए वह बच्चे की हर उचित-अनुचित माँगों को पूरा करते हैं। फलस्वरूप बच्चा जिद्दी और लापरवाह बन जाता है, आवश्यक नहीं कि सभी बच्चे या सभी माता-पिता ऐसे ही हों परंतु यदि 10-20 प्रतिशत भी होते हैं तो भी यह चिंताजनक है। 

आज के समय में शिक्षण पद्धति भी बच्चों को तकनीक का आदी बना रहा है। शिक्षा के दौरान बच्चों से नेट से सामग्री की खोज करवाना, क्रिया-कलाप आदि में नेट का प्रयोग आजकल शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बन गया है और जो बच्चा यह नहीं कर पाता वह अन्य बच्चों के बीच हीन महसूस करता है, अतः आधुनिक शिक्षा में तकनीक का प्रयोग करना आना बेहद आवश्यक है। दूसरी ओर बच्चा माता-पिता के कार्यों को बाधित न करे इसलिए माता-पिता द्वारा इन्हें तब से ही मोबाइल पकड़ा दिया जाता है, जब इन्होंने बोलना भी ठीक से नहीं सीखा होता। थोड़ा और बड़ा होगा तो टैबलेट्स और फिर लैपटॉप दे देते हैं। 

घर में बड़े-बुजुर्गों का अभाव, सुरक्षा की दृष्टि से तथा समय के अभाव के कारण बाहर न खेलने की मजबूरी, ऐसी अवस्था में टेलीविजन, फोन, लैपटॉप आदि ही साथ देते हैं। माता पिता के पास बच्चों के साथ खेलने का समय नहीं होता तो बच्चा फोन में गेम खेलता है, पढ़ाने का समय नहीं तो बच्चा इंटरनेट से ढूँढ़ कर पढ़ने लगा, ऐसे में वह इंटरनेट से उचित-अनुचित के ज्ञान के अभाव में हानिकारक विज्ञापनों और भी ऐसी चीजें देखता है जो उसके अबोध मन को दिशाहीन कर सकती हैं। कदम-कदम पर प्रतियोगिता भरी जिंदगी में ट्यूशन, ट्रेनिंग आदि के जरिए बच्चे को प्रतियोगिताओं को पास करने लायक तो बना दिया जाता है पर एक सहृदय, संस्कारी, संवेदनशील, छोटे-बड़ों व स्त्रियों का सम्मान, तथा अपनी संस्कृति से जुड़ा हुआ, परंपराओं का निर्वहन करने वाला व्यक्ति नहीं बना पाते क्योंकि बच्चे के माता-पिता को बच्चे का भविष्य सिर्फ अधिकाधिक धन कमाने में दिखाई देता है, इसलिए उन्हें अपने बच्चे को आर्थिक दौड़ में आगे रहने वाला धावक बनाना होता है और इसके लिए स्वयं पैसा कमाने की भाग-दौड़ में उनके पास बच्चे के लिए समय ही नहीं होता। ऐसी स्थिति में हम उम्मीद करते हैं कि हर बच्चा संस्कृति से प्यार करने वाला हो, गुरुजनों तथा बड़ों का सम्मान करने वाला हो....वस्तुतः हमारी ऐसी अपेक्षाएँ निराधार हैं, हम उन बच्चों से ये अपेक्षा कैसे कर सकते हैं जिन्हें ऐसी शिक्षा ऐसी परवरिश दी ही नहीं गई। यानि जो बीज हमने बोये ही नहीं उसकी फसल काटना चाहते हैं। हम कहते तो हैं कि आजकल के बच्चे कहाँ जा रहे हैं? क्या भविष्य होगा इनका और देश का, परंतु हमें यह देखने की आवश्यकता है कि हम बच्चों को क्या दे रहे हैं।

चित्र साभार- गूगल से

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

शनिवार

बढ़ती असहिष्णुता के कारण और निवारण

 

बढ़ती असहिष्णुता के कारण और निवारण

वसुधैव कुटुंबकम् की मान्यता का अनुसरण करने वाले हमारे देश में अनेक विविधताओं के बाद भी सांस्कृतिक सह अस्तित्व की विशेषताएँ देखी जा सकती हैं।
यहाँ के लोग नए परिवेश के साथ आसानी से सिर्फ घुल-मिल ही नहीं जाते, बल्कि उनकी विशिष्टताओं को अंगीकार कर अपनी जीवनशैली में अपना भी लेते हैं। यही कारण है कि सहनशीलता, भाईचारा, धैर्य जैसे गुण हमेशा से हम भारतीयों की खासियत रहे हैं।
किन्तु वर्तमान समय में यदि हम अपने चारों ओर दृष्टिपात करें तो बेहद निराशा जनक परिस्थिति दिखाई देती है। पारिवारिक हो, सामाजिक हो या धार्मिक हर स्तर पर धैर्य और सहनशीलता का ह्रास होता जा रहा है।
ऐसा नहीं है कि असहिष्णुता हमारे व्यवहार की अचानक पैदा हो गई कोई नई उपज है।
बल्कि पारिवारिक या सामाजिक स्तर पर यह पहले भी यदा-कदा देखने को मिल जाती थी लेकिन इसके बावजूद यह आम जन की मानसिकता पर हावी नहीं थी।
किन्तु आज हर स्तर पर यह असहिष्णुता हमारी सोच और हमारे व्यवहार को अपनी गिरफ्त में लेती जा रही है।

लोगों के बर्दाश्त करने की क्षमता घटती जा रही है और छोटी-छोटी बातों में लोग अपना आपा खो दे रहे हैं। जो बातें या स्थितियाँ उनको पसंद नहीं आतीं या उनकी इच्छाओं और उम्मीदों के प्रतिकूल होती हैं ऐसी किसी भी बात या घटना के प्रति वे कई बार उचित-अनुचित सोचे बिना ही इतनी तीखी प्रतिक्रिया दे देते हैं, जो उस छोटी सी बात या घटना के लिए आवश्यक नहीं थी और ऐसी प्रतिक्रियाएँ सिर्फ दूसरों के ही नहीं बल्कि अपनों के प्रति भी देखने को मिलती हैं।
जिसके कारण न सिर्फ माहौल तनावपूर्ण हो जाता है बल्कि आपसी रिश्तों में कड़वाहट उत्पन्न होती है और आपसी सौहार्द्र खत्म हो जाता है।
अक्सर ऐसी खबरें देखने-पढ़ने को मिलती हैं
सड़क पर एक वाहन के दूसरे वाहन से हल्का सा छू जाने भर से हाथा-पाई हो जाती है, कभी-कभी तो जान से मार देने की घटनाएँ भी सामने आई हैं।
आजकल तो रोजमर्रा के जीवन में भी ऐसी घटनाएँ देखी जाती हैं कि पीछे से हॉर्न बजाने वाली गाड़ी को भीड़ की वजह से यदि रास्ता नहीं मिल पाया, तो वह अपशब्द बोलते और घूरते हुए ऐसे आगे निकलता है जैसे आगे वाले ने रास्ता न देकर कितना बड़ा अपराध कर दिया हो।
कक्षा में डाँट देने या सजा दे देने पर विद्यार्थी ने बाहर जाकर शिक्षक को गोली मार दिया।
पिता ने पुत्र को गेम खेलने से मना किया तो पुत्र उसकी हत्या कर देता है।
पैसों के लिए घर के बुजुर्गो की हत्या कर देना आम घटना हो चुकी है
कोई मेरी गाड़ी को बार-बार ओवरटेक कैसे कर सकता है। इस बात से क्रोधित होकर आगे जाने वाली गाड़ी पर गोलियों की बौछार कर देना..
ऐसी खबरों को पढ़ कर 'विजय दान देथा' की वर्षों पुरानी कहानी 'अनेकों हिटलर' की याद ताजा हो गई। उन्होंने इस कहानी में चित्रित किया है कि गाँव के एक सम्पन्न और दबंग परिवार के तीन भाई नया-नया ट्रैक्टर खरीद कर हँसी-ठिठोली करते हुए शान से घर लौट रहे थे। रास्ते में एक साइकिल वाला एक-दो बार उनके ट्रैक्टर से आगे निकल जाता है। यह ट्रैक्टर चलाने वालों की बर्दाश्त से बाहर था कि साइकिल वाले ने कैसे उनको पीछे करने की हिमाकत कर दी। इसी आक्रोश में उन लोगों ने उसे ट्रैक्टर से कुचल दिया।
दशकों पुरानी यह कहानी आज हमारे समक्ष जीवंत रूप में दिखाई देती है।
ऐसी घटनाओं को देखते हुए समझा जा सकता है कि किसी से अपनी उम्मीद के अनुसार व्यवहार न होते देखकर प्रतिक्रिया स्वरूप बगैर उचित-अनुचित की परवाह किये ही परिस्थिति की माँग से ज्यादा तीखी और आक्रामक प्रतिक्रिया कर देना ही असहिष्णुता है। यहाँ तक कि ऐसे लोग समाज द्वारा स्वीकृत मानकों को भी लाँघ जाते हैं, जबकि समान परिस्थिति में अधिकांश लोग शांत और सहज बने रहते हैं।

ऐसे धैर्य खो चुके लोगों को थोड़ा विरोध भी उनके आत्मसम्मान और प्रभुत्व को आहत कर देता है और भविष्य को लेकर वे आशंकित हो जाते हैं। सही-गलत की सोच से परे वे आत्मकेंद्रित हो जाते हैं और उनकी संवेदनशीलता दूसरों के प्रति घट जाती है, फलस्वरूप वो दूसरे के द्वारा किए गए व्यवहार के आशय और भावों को समझ नहीं पाते और ऐसा कुछ कर बैठते हैं जो उन्हें नहीं करना चाहिए।

ऐसी अवस्था में व्यक्ति आंतरिक संवेगों से अधिक प्रभावित होता है, जिससे उसमें संवेगात्मक अस्थिरता और उत्तेजना देखी जाती है। कुछ समय के लिये उसका विवेक क्षीण पड़ जाता है और सही-गलत, नैतिक-अनैतिक का ज्ञान समाप्त हो जाता है। दूसरों के प्रति घटी हुई संवेदनशीलता और उत्तेजना की अवस्था, दोनों मिल कर उसे असहिष्णु बना देते हैं।
मनोविज्ञान की दृष्टि से असहिष्णुता के अनेक कारणों में प्रमुख हैं, पहचान और प्रभाव की चाहत, बढ़ती महत्वाकांक्षा, बढ़ता मानसिक तनाव, रिश्तों का सिकुड़ता दायरा, सामाजीकरण का सिमटना, रिश्तो में नफा-नुकसान का आंकलन, संवाद में कमी, बेरोक-टोक वाला व्यक्तिगत जीवन, घटती संवेदनशीलता, मीडिया का बढ़ता प्रभाव इत्यादि।
यह देखा जाता है कि मीडिया भी आपराधिक और नकारात्मक खबरों को ही ज्यादा दर्शाती है जबकि ऐसी परिस्थिति में बुद्धिजीवियों और मीडिया दोनों का उत्तरदायित्व है कि ऐसी स्थिति में वे समाज सुधार की सिर्फ चर्चा न करें, बल्कि जमीनी स्तर पर लोगों के सामने ऐसे सकारात्मक उदाहरण बार-बार पेश करें जो उनके इर्द-गिर्द ही घट रहे हैं लेकिन सनसनीखेज नहीं होने के कारण उन पर किसी का ध्यान नहीं जाता।
साहित्यकारों को भी इस दिशा में सकारात्मक पहल करने की आवश्यकता है, प्रेमचंद की कहानी "ईदगाह" जैसी प्रेरणाप्रद कहानियों के समान अन्य सकारात्मक संदेश से लगातार प्रेरित करने का प्रयास करते रहना चाहिए।

यह भी आवश्यक है कि लोग मोबाइल, टी.वी., इन्टरनेट की दुनिया और एयरकंडिशनर के आरामदेह कमरे से निकल कर दूसरों से संवाद बनाएँ।
आपस की बढ़ती दूरियों, अविश्वास, प्रतिस्पर्धा और बदले की भावना से प्रेरित इस दौर से ऊबे और घबराए आम लोगों को आपसी संवाद की तथा एक दूसरे के भावों को समझने और महसूस करने की आवश्यकता है, जिसके लिए जरूरत है कि लोग चेतन स्तर पर अपनों की सीमा को बढ़ा कर आसपास, पड़ोस, मित्र, रिश्तेदार, कुछ परिचित और अपरिचित तक ले जाएँ, जिससे उनके आपसी संपर्क का दायरा बढ़ेगा।
दिल में दबी बातों को साझा कर बोझिल मन को सुकून मिलता है। सिर रख कर रोने वाले कंधे मिलते हैं। खुशी और उपलब्धियों को बाँटने वाले लोग मिलते हैं। बस जरूरत है अपने अहम को छोड़ दूसरों की तरफ हाथ बढ़ाने की।

इसके साथ ही अपने आधुनिक व्यस्तता भरे जीवन में भी बच्चों की परवरिश पर माता-पिता को व्यक्तिगत तौर पर ध्यान देना होगा। उनमें हार स्वीकार करने और "ना" सुनने की क्षमता विकसित करनी होगी। उनमें यह भाव जगाना होगा कि पढ़ाई सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धियाँ हासिल करने, ऊँचे पदों पर जाने और पैसा कमाने के लिए ही नहीं की जाती, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास में योगदान देने के लिए भी की जाती है। ऊँचाई पर पहुँचने के लिए शॉर्टकट छोड़कर सीढ़ी-दर-सीढ़ी मिली छोटी-छोटी सफलताओं में खुश होने की आदत को विकसित करना होगा।

जीवन की आपाधापी में बढ़ती उम्र के साथ जो शौक अधूरे रह गए, उन्हें नए सिरे से जीवित करना चाहिए, इससे नई ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। आजकल हमारी आदत बन चुकी है कि हर कार्य को लाभ-हानि की तुला में रखकर सोचते हैं, जबकि हमें इस लाभ-हानि को छोड़कर सिर्फ अपने शौक पूरे करने के लिए भी अपने पसंदीदा कार्यों को कुछ समय देना चाहिए, इससे मानसिक तनाव से मुक्ति मिलेगी और व्यक्ति के मन में दबी बहुत सारी ग्रंथियाँ खुल जाएँगी और कई चीजों के प्रति उनकी स्वीकार्यता बढ़ जाएगी और आपसी सौहार्द्र विकसित होगा।

चित्र साभार - गूगल से

मालती मिश्रा

प्रकृति के नैसर्गिक रूप को बिगाड़ कर विकास संभव नहीं

 प्रकृति के नैसर्गिक रूप को बिगाड़कर विकास संभव नहीं

पर्यावरण प्रदूषण किसी एक देश नहीं बल्कि विश्व के सामने व्यापक समस्या बनकर खड़ा है। इसीलिए पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षण के प्रति सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता लाने के उद्देश्य से 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 1972 में आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन में चर्चा के बाद 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई और 5 जून 1974 को पहली बार विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। किन्तु पर्यावरण की सुरक्षा किसी एक दिन के संकल्प से नहीं हो सकती बल्कि इसके लिए चहुँमुखी जागृति और क्रियान्वयन की आवश्यकता है। वर्तमान समय में जिस प्रकार से लगातार जनसंख्या बढ़ती जा रही है, उतनी ही तेजी से लोहे और कंक्रीट के जंगल भी बढ़ते जा रहे हैं, जिसका नकारात्मक प्रभाव सीधे पर्यावरण पर पड़ रहा है। प्रकृति के अपने कुछ नियम हैं, जिनके विपरीत विकास कार्य किए जा रहे हैं और जंगलों व नदियों के स्वरूपों को भी बिगाड़ा जा रहा है। इससे पृथ्वी का संतुलन भी बिगड़ रहा है। विकास के नाम पर पृथ्वी विनाश की प्रयोगशाला बनती जा रही है।

देश का विकास आवश्यक है, तभी देश के नागरिकों का विकास होगा और उन्हें सभी सुख-सुविधाएँ प्राप्त हो सकेंगी किन्तु विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति की ओर से विमुख हो जाने से हम विनाश की ओर बढ़ रहे हैं।  क्योंकि विकास के नाम पर लगातार पेड़ों की कटाई और जंगलों का खात्मा करके हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। जिससे न सिर्फ नदी-तालाब सूखते जा रहे है, भूमिक्षरण बढ़ता जा रहा है, भूमि बंजर होती जा रही है और पशु-पक्षियों को बेघर करके उनसे उनके जीने का अधिकार छीन रहे हैं। विकास तो तभी संभव है जब देश का पर्यावरण स्वच्छ हो, चारों ओर हरियाली हो। जिस तरह से विकसित देश प्रकृति के संसाधनों का दोहन कर रहे हैं, विकासशील देश भी उन्हीं के नक्शे कदम पर चलकर अंधाधुंध प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे हैं।  

विकास के नाम पर पहाड़ों-जंगलों को काटकर सुरंगें बनाना, नदियों-तालाबों को पाटकर ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी करना प्राकृतिक आपदा को आमंत्रित करना ही है।

देश को गंगा-यमुना जैसी सदानीरा नदियाँ देने वाले पहाड़ के करीब 12 हजार प्राकृतिक स्रोत या तो सूख चुके हैं या फिर सूखने के कगार पर हैं। पानी और ऊर्जा के स्रोतों को विकृत और वायु को लगातार दूषित किया जा रहा है।

तूफान, भूकंप, बाढ़, सूखा, भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं का कारण विकास के नाम पर प्रकृति से किए जा रहे खिलवाड़ के कारण ही हैं। केदारनाथ आपदा, नेपाल की महाविनाशकारी भूकंप, और समय-समय पर आने वाली प्राकृतिक आपदाएँ हमें चुनौती दे रही हैं कि यदि अंधाधुंध हो रहे प्राकृतिक दोहन को रोका नहीं गया तो आगे और भी भयानक परिणाम सामने आ सकते हैं। 

प्रकृति के नैसर्गिक रूप को बिगाड़कर, पर्यावरण को जहरीला करके विकास संभव नहीं।  

आज हम घरों को, बालकनियों को प्लास्टिक की हरियाली से कितना भी सजा लें किंतु हरियाली के नैसर्गिक गुण कहाँ से लाएँगे, उनसे प्राप्त होने वाली प्राणवायु और शीतलता इन दिखावटी पौधों से तो प्राप्त नहीं किया जा सकता। विकास के नाम पर बाग-बगीचे-जंगल काट कर बड़ी-बड़ी इमारतें बनाकर उसमें मानव का निवास तो बन गया परंतु उनमें रहने वाले पशु-पक्षियों का आवास और भोजन छीन लिया गया, जिसके कारण न जाने कितने वन्य जीव दिन-प्रतिदिन लुप्त होते जा रहे हैं। वायु प्रदूषित होती जा रही है, नदियाँ सूखती जा रही हैं, जो हैं उनका जल विषैला होता जा रहा है, धरती की उर्वरा शक्ति समाप्त होती जा रही है, जिसके कारण फसलों की अच्छी पैदावार के लिए रसायनिक खादों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। फलस्वरूप हमारा खानपान दूषित होता जा रहा है और बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं। क्या इसे हम सार्थक विकास की श्रेणी में रख सकते हैं? सही मायने में स्वच्छ और प्रदूषण रहित वातावरण ही विकास को सार्थक कर सकता है। 

विकास आवश्यक है किन्तु प्रकृति को हानि पहुँचाए बिना। अत: मौजूदा प्राकृतिक अस्थिरता से उबरने के लिए और पर्यावरण को शुद्ध करने के लिए अंधाधुंध प्राकृतिक दोहन से बचते हुए अधिकाधिक वृक्षारोपण ही एकमात्र उपाय हो सकता है, क्योंकि वृक्ष ही हमें इस लाइलाज बीमारी से उबार सकते हैं। वृक्षों के महत्व को बताते हुए एक श्लोक प्रचलित है...

दशकूपसमा वापी, दशवापीसमो ह्रदः। दशह्रदसमो पुत्रो, दशपुत्रसमो द्रुमः।।

अर्थात् दस कुओं के बराबर एक बावड़ी, दस बावड़ियों के बराबर एक सरोवर, दस सरोवरों के समान एक पुत्र और दस पुत्रों के समान एक वृक्ष का महत्त्व होता है। अत: हमारा कर्तव्य है कि विकास के नाम पर यदि हम एक वृक्ष काटते हैं तो हमें उससे पहले, दस वृक्ष लगाने चाहिए। इतना ही नहीं समाज के प्रत्येक व्यक्ति को प्रण करना चाहिए कि वह यथासंभव वृक्ष लगाएँगे और उनकी देखभाल करेंगे।


मालती मिश्रा 'मयंती'