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Saturday, 26 May 2018

एक रात की मेहमान


जेठ की दुपहरी थी बाहर ऐसी तेज और चमकदार धूप थी मानों अंगारे बरस रहे हों ऐसे में यदि बाहर निकल जाएँ तो ऐसा लगता मानो किसी ने शरीर पर जलते अंगारे रख दिए, घर के भीतर भी उबाल देने वाली गर्मी थी, अम्मा, दादी, छोटी दादी और मंझली काकी सब हमारे ही बरामदे और गैलरी में बैठे थे क्योंकि गैलरी दोनों ओर से खुली होने के कारण अगर पत्ता भी हिलता तो गैलरी में हवा आती थी, बाबूजी और छोटे काका बरामदे से उतरकर जो आम का छोटा सा पेड़ था उसी की छाँव में चारपाई पर बैठे बतिया रहे थे। मैं और मेरे तीनों छोटे भाई अम्मा के डर से सोने की कोशिश कर रहे थे, कितनी भी गर्मी हो हम तो खेल-खेल में सब भूल जाते थे पर घर के बड़े हम बच्चों की भावनाओं को समझे बिना ही जबरदस्ती 'लू लग जाएगी' कहकर सुला देते, कितना कहा था अम्मा से कि धूप में नहीं खेलेंगे, काका की घारी में खेल लेंगे पर वो भला कहाँ मानने वाली थीं, डाँट-डपट कर सुला दिया। बीच-बीच में भाई कोहनी मारता अम्मा सो गईं?
"चुप, वो बैठी हैं।" कहकर मैं आँखें मूंदकर सोने का उपक्रम करती। तभी बाहर से बातों की आवाजें पहले की अपेक्षा कुछ तेज हो गईं, बाबूजी की आवाज़ आ रही थी। शायद कोई मेहमान आया है, अम्मा बाबूजी और दादी की मिली-जुली आवाजें सुनकर मैंने अंदाजा लगाया। फिर क्या था मैं भूल गई अम्मा की डाँट और उठकर बरामदे में आ गई तो देखा एक महिला.. नहीं लड़की सिर झुकाए बैठी है, उसके गाल आँसुओं और पसीने से भीगे हुए हैं और हमारे घर की सभी स्त्रियाँ उसे घेरकर बैठी हैं, मंझली काकी पंखा झल रही थीं। बाबूजी बोले-"हमने तो जब ये छोटी थी तब देखा था इसीलिए पहचाने नहीं,  हमें लगा इतनी दुपहरी में कौन आ सकता है भला, वो भी ऐसी हालत में!" 'ऐसी हालत में!' मेरा माथा ठनका तो मैंने फिर एक नजर उस लड़की पर डाली, वह गर्भवती थी। मैं इतनी बड़ी नहीं थी कि गर्भावस्था की समस्याओं को समझ पाती लेकिन अगर बाबूजी ऐसा बोल रहे हैं तो निस्संदेह परेशानी की बात होगी।
"पता नहीं कितने पत्थर दिल हैं निगोड़े जो जरा भी दया नहीं आई ऐसी हालत में भी।" कहते हुए मंझली काकी मानो रो ही पड़ीं। छोटी काकी भी आ गई थीं उस आगंतुक के लिए लोटे में पानी और दउरी (मूंज और कुश की बनी प्लेट के आकार की छोटी टोकरी) में गुड़ की दो-चार डली रखकर लाईं। "लो पानी पी लो और रोओ नहीं अब, ये भी तुम्हारा ही घर है।" अम्मा बोलीं।
मैं चुपचाप बैठी सबकी बातें सुनकर माजरा समझने का प्रयास कर रही थी। कुछ देर के बाद जो कुछ मैंने समझा वो ये था कि वो लड़की मेरे बाबूजी के ममेरे भाई की बेटी थी ससुराल में पति से या शायद पूरे परिवार से झगड़ा हुआ उन लोगों ने उसे घर से निकाल दिया। बेचारी ऐसी दयनीय स्थिति में बिना कोई सामान, बिना पैसे के पैदल चलती हुई यहाँ तक आ पाई थी, उसका मायका यहाँ से भी दो-तीन कोस की दूरी पर था इसलिए वो यहीं आ गई थी। उसके पति के द्वारा दी गई गालियों को काकी ये कहकर नहीं बता पाईं कि इतनी गंदी गालियाँ वह ज़बान पर नहीं ला पाएँगी। सारी आपबीती जान बाबूजी भड़क गए बोले- बुलाओ कैलाश (लड़की का पिता) को और उस लड़के को यहीं बुलाओ हम देखते हैं कितना बड़ा तीसमार खाँ है साला, हिम्मत कैसे हुई उसकी इसे हाथ लगाने की!" बाबूजी का क्रोध देख मेरे क्रोध को भी बल मिला मेरा भी मन कर रहा था कि अपनी पत्नी पर अत्याचार करने लाला वो शख्स मेरे सामने आ जाए तो उसे उसकी सही जगह दिखा दूँ हालांकि मैं भी जानती थी कि मैं कुछ नहीं कर सकती, परंतु बहुत खुशी हुई थी साथ ही गर्व भी कि मेरे बाबूजी अन्य लोगों की तरह बेटी पर हुए अत्याचार को चुपचाप सहने वालों में से नहीं थे।
मेरा इंतजार समाप्त हुआ, छोटे काका जाकर शाम तक कैलाश काका को बुला लाए थे। मैं बेचैन थी ये देखने के लिए कि कैलाश काका के दामाद को बुलाकर बाबूजी उसकी कैसे खबर लेते हैं। रातभर कैलाश काका हमारे ही घर रुके, दूसरे दिन उनके दामाद को भी बुलाया गया, हम बच्चे बड़ों की बातें नहीं सुन सकते खासकर जहाँ सिर्फ पुरुष हों, इसलिए मैं उन लोगों के बीच की बातें न जान पाई, पर मैं जानती थी कि मेरे बाबूजी अब उन दीदी को उनकी ससुराल तो नहीं जाने देंगे, अब पता चलेगा महाशय को कि पत्नी पर हाथ उठाने का नतीजा क्या होता है।
उनके बीच क्या बातें होती रहीं मुझे कुछ पता नहीं चल पाया किंतु दोनों ही ओर सुगबुगाहट और खलबली सी महसूस होती रही। कभी दूर से ही उन दीदी की आँखों से बहते आँसू देखा तो कभी मंझली काकी का गुस्से से तमतमाया चेहरा। ऐसा महसूस हो रहा था जैसे महिला और पुरुष दो टोलियों में बँट गया हो पर फिर भी मुझे पता था मेरे बाबूजी ने कभी गाली देने वाले को माफ नहीं किया, फिर इसने तो गाली, मारपीट सब की थी, बस संशय था तो एक ही कि वह मेरे बाबूजी की अपनी नहीं किसी अन्य की बेटी थी तो निर्णय भी किसी अन्य का  ही माना जाएगा।
शाम होने वाली थी दीदी तैयार हो रही थीं नई साड़ी पहनकर पैरों में महावर, बिंदी, सिंदूर लगाकर दुल्हन सी लग रही थीं, विदाई होने लगी वो दादी, अम्मा और दोनों काकी के गले लगकर खूब रोईं। मैंने अम्मा से कहा- "ये अपने माँ-बाप के घर ही तो जा रही हैं, इन्हें तो खुश होना चाहिए, फिर रो क्यों रही हैं?"
माँ-बाप के घर कैसे जा सकती हैं? शादी करके माँ-बाप ने तो जैसे पल्ला झाड़ लिया होता है न, मर्दों की दुनिया है वही हमारा भगवान है, मारे-कूटे, गाली बके चाहे जान से मार डाले, हम औरतों को सब कुछ सहन करके अपनी बलि देने के हमेशा तैयार रहना पड़ता है।" काकी का क्रोध मानो फूट पड़ा।
मैं अवाक् खड़ी कभी उन दीदी को देख रही थी जो बेबस, निरीह उस बकरी सी प्रतीत हो रही थीं जिसे सजा-धजा कर बलि के लिए ले जाया जा रहा हो और कभी अपने बाबूजी और कैलाश काका को। एक रात की उस मेहमान ने मुझे समाज का वो रूप दिखाया था जिससे मैं पूर्णतः अंजान थी और काश हमेशा अंजान ही रहती।
#मालतीमिश्रा

22 comments:

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    1. आशीष जी शुक्रिया
      🙏

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  2. लाजवाब!!
    एक निरिह गाय जिस खूंटे बांधों वो खूंटा ही किस्मत बन जाती है आदर्श और हकीकत मे आधारभूत फर्क , और समझोता हर हाल मे जैसे नारी का भाग्य है...
    जो न कह पाये वो सब भी दिख रहा है मीता।
    बहुत सुंदर कहानी।

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    1. मीता आपको पसंद तो प्रयास सार्थक हुआ। अभिनंदन🙏
      सुप्रभात🙏

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  3. बहुत बढ़िया लिखा है .समाज की कड़वी हकीकत है ये.यह सब आज भी होता है ख़ास कर गांवों और कस्बों में.

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    1. सुधा जी बहुत-बहुत धन्यवाद अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराने के लिए,सच ही है ये सब अब भी होता है नारी मुक्त कहाँ हो पाई है।
      सुप्रभात🙏

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  4. आपका लेखन पढ़ा आपके बाल मन साही मेरा मन पहले उत्सुकता फिर कशमकश अंत मैं निराशा की पीड़ा से छलक ही गया ...नारी तू आखिर नारी ही होती है ...निरीह हाँकी जाने वाली गाय रस्सा तुड़ा कर भाग भी जाये तो भी पुन: नियति वही खूंटा !
    दोगले समाज की दोगली बातैं ..😪

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    1. सखी आपको यह पसंद आई मेरी कोशिश सार्थक हुई साथ ही दुविधा का निवारण भी कुछ हद तक हुआ, मैंने पहली बार किसी घटना का वर्णन इतने संक्षेप में किया है इसलिए दुविधाग्रस्त थी। आभार प्रतिक्रिया के लिए। सुप्रभात🙏

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  5. नमस्ते,
    आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
    ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
    सोमवार 28 मई 2018 को प्रकाशनार्थ साप्ताहिक आयोजन हम-क़दम के शीर्षक "ज्येष्ठ मास की तपिश" हम-क़दम का बीसवां अंक (1046 वें अंक) में सम्मिलित की गयी है।


    प्रातः 4 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक अवलोकनार्थ उपलब्ध होगा।
    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर।
    सधन्यवाद।

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    1. रविन्द्र सिंह जी कहानी सम्मिलित करने और सूचित करने के लिए आभार🙏

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  6. प्रिय मालती जी -- औरत को मानवी समझने में ना जाने कितने दिन और लगेंगे | समाज के लोग खुद फैसला कर लेते हैं उसकी ओर से ----- उसे ये भी हक कहाँ है ? बेहद सादगी से - आपने शब्दों के माध्यम से --- बहुत ही प्रभावी प्रसंग जीवंत कर दिया | मैंने भी अनेक घटनाएँ देखी सुनी हैं ऐसी | सस्नेह --

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    1. रेनू जी सुप्रभात🙏
      आपकी प्रतिक्रिया से निःसंदेह मुझे हौसला मिला है, एक संशय जो मन में था कि पता नहीं अपनी बात को समझा पाने में सफल हुई या नहीं वो भी दूर हो गया। बहुत-बहुत आभार इस उत्साहवर्धन के लिए🙏🙏🙏🙏

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  7. मालती जी आपकी कहानियां मुझे बहुत पसंद है।
    बहुत सार्थक संदेश के साथ सुंदर पारिवारिक माहौल का ताना बाना और सुगठित शिल्प ने मन मोह लिया।

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    1. सुप्रभात🙏
      श्वेता जी आपको कहानी पसंद आई तो लेखन सार्थक हुआ, प्रसन्नता हुई जानकर कि मैं अपनी बात समझा पाई। बहुत-बहुत आभार🙏🙏

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  8. बहुत ही सुन्दर हृदयस्पर्शी कहानी.....
    औरत के साथ अभी भी यही सब होता आ रहा है
    चन्द हिदायतें और चेतावनियों के साथ उसे उसी नरक में धकेल दिया जाता है जहाँ अब पहले से भी ज्यादा यातनाएं उसे सहनी होती हैं क्योंकि उसने उनकी पोल जो खोल दी होती है...

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    1. सुधा जी सत्य कहा आज भी रही होता आ रहा है और यदि कोई नारी इसके विरुध्द आवाज उठाए तो उसे कुसंस्कारी या चरित्रहीनता का सर्टिफिकेट दे दिया जाता है। कुल मिलाकर त्याग, बलिदान, समझौते सब नारी के ही हिस्से आते हैं।
      अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराने व ब्लॉग को गौरवान्वित करने के लिए हार्दिक आभार🙏🙏🙏🙏

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  9. सरल सहज शैली में लिखी गई यह कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी मालती जी...सादर, सस्नेह बधाई !

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    1. मीना जी कहानी आपको पसंद आई तो मेरा प्रयास सफल हुआ। बहुत-बहुत आभार आपका🙏

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  10. नारी जीवन का सत्य किसी भी सामाजिक स्थिति में फिट बैठती हुई आज भी लोग छोटी समस्याओं जो सिर्फ आत्मसम्मान या स्वभिमान से भी जुड़ी हो उनको दबाकर घर बसाने में ज्यादा इक्षुक होते हैं घर तो इसे न कहते जहां एक की मर्जी चले और एक सांस तक न ले सके न जाने नारी जीवन की यह विडम्बनाएं कब दूर होंगी,सरल शब्दों में आपने गहरी बात रख दी है आपकी कहानी की धारा में मैं भी कुछ क्षण को उत्साहित हो गयी थी पर अंततः वही निराशा हाथ लगी... शुभकामनाएँ

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    1. सुप्रिया जी सर्वप्रथम आपका ब्लॉग पर स्वागत है। आपकी बात अक्षरशः सत्य है पुरुष प्रधान समाज में आज भी यही होता है स्त्रियों की उठने वाली आवाज सीधे पौरुष के अहं पर चोट करती है और स्त्री का आत्मसम्मान तो दोयम दर्जे पर ही रहता है। आपके विचार जानकर प्रसन्नता हुई। सस्नेह आभार🙏

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  11. सुंदर आपबीती है।

    पितृत्व सत्ता ने नारी सम्मान की धज्जियाँ उड़ा रखी है और मजे की बात तो ये कि इन धज्जियों को नारी अपने जीवन के महत्वपूर्ण अंग मान बैठी है।
    आज से नहीं हैं ऐसा हमेशां से चलता आ रहा है।
    थोड़ी कड़वी तथा अपचनीय बात है कि जिसे हम मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं उस राम ने भी अपनी गर्भवती पत्नी के साथ ऐसा ही किया था...

    हमने भगवान ऐसों को मान रखा है तो फिर सुधार कहाँ से होय।

    अपनी कड़वी टिप्पणी के लिए अग्रिम क्षमा प्रार्थी हैं हम।


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    1. रोहितास जी ब्लॉग पर आपका स्वागत है। और आपकी टिप्पणी कटु सत्य है, क्षमा की आवश्यकता नहीं, आपने बिल्कुल सत्य कहा समाज में स्त्रियों की जो भी स्थिति है उसको स्त्रियों ने अपनी नियति मान ली है और यही कारण है कि आज भी उनकी स्थिति नहीं बदली है।

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