जरूरी नहीं कि दर्द उतना ही हो जितना दिखाई देता है,
नहीं जरूरी कि सत्य उतना ही हो जितना सुनाई देता है।
जरूरी नहीं कि हर व्यथा को हम अश्कों से कह जाएँ,
नहीं जरूरी कि दर्द उतने ही हैं जो चुपके से अश्रु में बह जाएँ।
दिल में रहने वाले ही जब अपना बन कर छलते हों,
संभव है कुछ अनकही आहें उर अंतस में पलते हों।
अधरों पर मुस्कान सजाए हरपल जो खुश दिखते हैं,
हो सकता है उनके भीतर कुछ अनकहे जख्म हर पल चुभते रिसते हैं।
जरूरी नहीं कि हर मुस्कान के पीछे खुशियों की फुलवारी हो,
गुलाब तभी मुस्काता है जब कंटक से उसकी यारी हो।
मालती मिश्रा 'मयंती'
चित्र साभार गूगल से



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