बुधवार

अनकहे जख्म

 


जरूरी नहीं कि दर्द उतना ही हो जितना दिखाई देता है,

नहीं जरूरी कि सत्य उतना ही हो जितना सुनाई देता है।

जरूरी नहीं कि हर व्यथा को हम अश्कों से कह जाएँ,

नहीं जरूरी कि दर्द उतने ही हैं जो चुपके से अश्रु में बह जाएँ।

दिल में रहने वाले ही जब अपना बन कर छलते हों,

संभव है कुछ अनकही आहें उर अंतस में पलते हों।

अधरों पर मुस्कान सजाए हरपल जो खुश दिखते हैं,

हो सकता है उनके भीतर कुछ अनकहे जख्म हर पल चुभते रिसते हैं।

जरूरी नहीं कि हर मुस्कान के पीछे खुशियों की फुलवारी हो,

गुलाब तभी मुस्काता है जब कंटक से उसकी यारी हो।


मालती मिश्रा 'मयंती'

चित्र साभार गूगल से


शनिवार

उठो लाल

 शीर्षक- उठो लाल


उठो लाल अब सुबह हो गई 

देखो कलियाँ भी खिल आईं,

चिड़िया चहक उठीं डाली पर

तुमको गीत सुनाने आईं।


पूरी रात नींद भर सोकर

मन से तमस दूर कर डाला,

बाल सूर्य ने आँखें खोलीं

पूरा विश्व लाल कर डाला।


भीनी खुश्बू ले पुरवैया

द्वार तुम्हरे दस्तक देती,

नवल प्रभात की ये ताजगी

मन के सब विकार हर लेती।


आज तो मुझे सोने दो माँ

सन्डे का सुख लेने दो माँ,

हर दिन सुबह विद्यालय भागूँ 

अपनी मधुर नींद को त्यागूँ।


तब भी सूरज आता होगा

कलियों को महकाता होगा,

मंद पवन भी बहती होगी

सभी उठें ये कहती होगी।


पर चिड़ियों की मधुर चहक को 

क्या कोई सुन पाता होगा,

सुरभित बयार की खुश्बू से

मन कैसे महकाता होगा।


भाग दौड़ से भरी जिन्दगी

कैसे उगता सूरज देखें,

वातावरण की दूषित हवा

कब सौरभ पुष्पों का निरखे।


सुन लो प्यारे सूरज दादा 

इतनी तो तुम दया दिखाते,

हफ्ते भर संग किया परिश्रम 

आज आप रविवार मनाते ।।


मालती मिश्रा, दिल्ली✍️

गुरुवार

खाली बेंच सी जिंदगी

 खाली बेंच सी जिंदगी


उस पुराने से दिखते मकान के बाहर

पेड़ों के झुरमुटों के बीच

कुछ छोटे-बड़े पेड़ों के नीचे

रखे उस खाली बेंच सी है जिंदगी

आँधी-तूफानों से घिरी हुई

धूप में तपती और वर्षा में सिहरती

सर्दियों की ठिठुरन में 

सर्द पड़ी हुई

हवाओं की लाई गर्द तन पर लपेटे

पतझड़ के पत्तों

से ढकी-सी जिंदगी

अंबर के साए में घर के आँचल से

अनछुई

धरती में जिद के पैर जमाए

बोझिल-सी

परित्यक्त जिंदगी 

इस खाली बेंच सी जिंदगी।


मालती मिश्रा 'मयंती'✍️


मेरे रोम-रोम में भारत है..

 मेरे रोम-रोम में भारत है..

मेरे रोम-रोम में भारत है, 

हर धड़कन में जन गण मन,

बना रहे सम्मान देश का, 

कर दूँ अर्पण तन-मन -धन।


आँख उठाकर देखेगा जो, 

दुर्भावना धारण कर

नहीं देखने लायक होगा, 

फिर कुछ भी वह जीवन भर,


वीर जवान हैं इसके प्रहरी, 

पहरा देते सीमा पर

तज मोह अपनी माता का,  

हुए कुर्बान भारत माँ पर।


हाथों में उठाए ध्वज देश का, 

गाते हैं मिल जन-गण-मन,

बना रहे सम्मान देश का, 

कर दूँ अर्पण तन-मन-धन।


*मालती मिश्रा 'मयंती'*✍️

चित्र- साभार गूगल से


रविवार

मनहरण घनाक्षरी


 माना हम डूब गए, दुख के भँवर बीच

आया नहीं कोई जो कि, हमको उबार ले।


सुख में सभी थे साथी, कुत्ते, बिल्ली, घोड़े हाथी,

दुख में अकेले फिरे, मन में गुबार ले।


कहाँ-कहाँ भटके हैं, कैसे बतलाएँ हम

हर पल व्याकुल कि, गलती सुधार लें।


संध्या-प्रात, दिवा-निशि, हरपल चाहा यही,

पकड़ के हाथ कोई, मुझको उबार ले।

मालती मिश्रा 'मयंती'✍️

पावन अग्नि के फेरे लिए

पावन    अग्नि   के  फेरे  लिए

हाथों    में   तेरा    हाथ   लिए

पावन    अग्नि   के  फेरे  लिए

कसमें   खाईं  संकल्प    किया

हर सुख दुख तुमसे जोड़ लिया

बचपन गुड़िया अरु सखियों से

मैंने  सब     नाते  तोड़    लिए

पावन  अग्नि   के   फेरे   लिए