रविवार

अनकही

बातें अनकही
जो सदा रहीं
उचित अवसर की तलाश में
अवसर न मिला
बातों का महत्व
समाप्त हुआ
मुखारबिंद तक
आने से पहले
दम तोड़ दिया
बोले जाने से पहले
ज्यों मुरझाई हो कली
विकसित होने से पहले
दिल की बात
दिल में रही
बनकर अनकही
शून्य में भटकती रही
टीस सी उठती रह
दर्द का गुबार उठा
सब्र बाँध टूट चला
चक्षु द्वार तोड़ कर
अश्रुधार बह चली
बातें
जो थीं अनकही
अश्कों में बह चलीं
मालती मिश्रा

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